माँ

– नरेश शांडिल्य

मंदिर की देहरी
भजन गाती मंडली
दाना चुगती चिड़िया
तुलसी का बिरवा
पीपल का पेड़
छड़ी
वॉकर
अस्पताल का स्ट्रेचर…
जब-जब भी दिखते हैं
याद आने लगती है –
माँ…

सब छोड़ गई माँ –
अपना हॉल सा कमरा
ठसाठस अलमारी
लदी-फदी टाँड
छापे लगी दीवारें
भगवान का आला
दवाइयों से भरी स्लैब
छोटे-बड़े मज़बूत
पुराने ट्रंक और बक्से…
और उनमें बंद बेशुमार चीज़ें –
नये-पुराने सिक्कों की थैली
पोटलियों में बँधे मन्नत के पैसे
बेटियों को देने के लिए
नीम के सूखे पत्तों में लिपटीं
जुटाई-ख़रीदी साड़ियाँ
पीतल और काँसे के
पुराने लोटे-गिलास-थालियाँ
हमारे बचपन के गंडे-ताबीज़-तगड़ियाँ
यहाँ तक कि बचपन में
जिनसे खेला करते थे हम
वे कंचे और लट्टू भी…
सब छोड़ गई माँ –
अपनी यादों की तरह !

आज…
जामुन ख़रीदते वक़्त
आँखें भर आईं मेरी
कितने चाव से खाती थी जामुन
माँ…

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