ज्योति रीता की छह कविताएं

लड़कियों का मन कसैला हो गया है

इन दिनों
लड़कियों का मन कसैला हो गया है

अब वह हँसती नहीं
दुपट्टा भी लहराती नहीं
अब झूला झूलती नहीं
ना ही गाती है कोई गीत
खेत की पगडंडियों पर सखियों से कुलांचे भरती नहीं
वह आकाश की तरफ भी नहीं देखती
ना ही चाँद को देर रात निहारती है
आईने के सामने घंटों सजने वाली
अब आईना भी रोता है

वह पांच कपड़ों के भीतर रहकर भी नंग-धड़ंग महसूसती है
अब भाई / पिता के नजरों से भी डरती है
वह नोंच देना चाहती है अपने मुलायम चमड़ियों को
काट देना चाहती है रेशमी बाल
भोथोड़ देना चाहती है होठ
धू-धू कर जला देना चाहती है अपना अस्तित्व
उसे धिक्कार है स्वयं के होने का
वह खो रही है धैर्य
वह धकेल रही है खुद को लिजलिजे गड्ढे में
वह निरंतर कीच में धंस रही है

अब धरती बंजर होने को है
जहां लड़कियां देह से इतर कुछ भी नहीं
वह धरती बांझ है
वहां देवता नहीं
दैत्य बसते हैं

काठ की कुर्सी पर बैठा सत्ताधारी को काठ मार चुका है वह सुंघता है जाति
देखता है धर्म
गिनता है वोट
लगाकर आग फूलों को
सेंकता है रोटी

दहक रहा है देश
दहक रहा समाज
अब थर्राने की बारी तुम्हारी है।।

 

राजनीति रहम पर नहीं दबंगई से चलती है 

जिस वक्त तुम्हें प्रहरी होना था
उस वक्त तुम जुमलेबाजी में लीन थे
जय श्रीराम के नारों से मनोरथ पूर्ण कर रहे थे

जिस वक्त देश पछाड़ खाकर निर्वाह कर रहा था
उस वक्त तुम नाई-धोबी-चमार के घर छप्पन भोग राजनीतिक पत्तलों पर खा-डकार रहे थे

ऐन उसी वक्त
मत के मथनी से मनुष्यता बुक्का फाड़े रो रहा था

एक घर में लाश सड़ रही थी
श्मशान लाशों से अटा पड़ा था
लाशों को पहचानने के लिए टोकन था
ऐसे वक्त में तुम चुनावी भीड़ जुटा रहे थे
तुम्हारे भलमनसाहत पर देश लानते भेज रहा है

जिस वक्त कंधों को तुम्हारे हाथ की जरूरत थी
सांसों को ऑक्सीजन की
जब भग्न हृदय का चित्कार बेध रहा दिशाओं को
तुम शांति-प्रिय होने का स्वांग रच रहे

सनद रहे,
यह विलाप
किसी 80 साला मृतक पर नहीं
जवान बेटे /पति, बहन/पत्नी के सीने पर किया जा रहा विलाप है
और तुम गाजे-बाजे के साथ मंचासीन हो

बारूद पर देश है
तुम भी हिस्सा यहीं के
बांच लो ज्ञान
चढ़ा दो बलि
बखिया खुलेगा तुम्हारा भी
क्योंकि-
फ़रियादी फ़न उठाने में माहिर हैं

राजनीति रहम पर नहीं दबंगई से चलती है

 

शहर के बीचों-बीच

पहले शहर में मैं थी
अब शहर मुझमें है

उनकी तमाम परेशानियों को समेटे

सींझती/पकती और उबलती हूँ

अभी उम्मीद के हर दरख्त बंद है शायद…..

चलो फिर
निकलो घरों से ढूंढ लायें
एक कतरा उम्मीद दरख्तों से

अंगोछे में भर डाल दें
शहर के बीचों-बीच

हर कोई नहाये/डूबे और इतराये

फिर खिलखिलाये बचपन
मुस्कुराये बुढ़ापा
और होश में हो जवानी

यह उदास समय है

यह उदास समय है
याकि हम भयभीत हैं
बेतहाशा डर बेखटके दौड़ रहा नसों में

अब समय बीहड़ है
या समय पर बुढ़ापा चढ़ गया
सही सलामत पैर हैं
पर वैशाखी भी है हाथों में

दीदी-बुआ-काकी सब परदेश में है
अब याद आ रहीं
इस दशहरा मिल पाऊंगी यकीन नहीं

माँ चिंतित है
भाई लौट नहीं पा रहा
पोती से मिलने वह रोज सपने में रेलगाड़ी बैठ रही
पर रेलगाड़ी किसी दिन खुली नहीं

प्रत्यक्ष ही सब लील जाएगा
या कुछ बचा रहेगा
एक बच्चा हँसते हुए भी उदास है
उनकी हँसी पर प्रतिबंध है

प्रकृति का यह खेल है
या कोई क़यामत

पुरखा भी जमीनी मोह छोड़ देगा
लाठी रख चुका वह ज़मीन पर
जाते हुए रख छोड़ना दरवाजे पर एक लोटा पानी
कोई लौटेगा प्यासा फिर यहाँ

उदासी करवटें लेंगी
एक बच्चा हँसते हुए उदास फिर कभी नहीं होगा
ना होगी उनकी हँसी प्रतिबंधित ।।

 

तुम्हारे प्रेम में जाना 

प्रेम एक मकोय फल है
या है मरीचिका
या है मरूभूमि पर खिला
इकलौता लाल फूल

फ़रवरी प्रेम का मांगलिक महीना है
या है सुदूर बैठे प्रेमी के लिए
मन मसोसने का महीना

तुम्हारे प्रेम में जाना
प्रेम माधुर्य मादक पेय है
या है तुम तक पहुंचने का माकूल ज़रिया।।

[मकोय- एक स्वादिष्ट फल।]

 

एक बरगद उग आया है भीतर

इन दिनों
एक बरगद उग आया है भीतर
गहरी जड़े लिए
तन कर खड़ा
फैला रहा छाँव
तले जिसके सुकून है बहुत
मरुस्थल में किसी हरे-भरे द्वीप- सा
भटके पंछी- सी मैं
उसके पीठ पर सुस्ता रही हूँ
कुछ देर से

हाँलाकि
नक्शे पर वह बरगद कहीं नहीं है
पर नक्शे पर
मरुस्थल हमेशा से रहा
………………………………………………………………………………………
परिचय :: ज्योति रीता शिक्षण कार्य से जुड़ी हैं. प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविता और समीक्षाएं प्रकाशित होती रहती हैं.
संपर्क :: ग्राम- रानीगंज, पोस्ट- मेरीगंज, अररिया, (बिहार)

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *