अंगुली में डस ले बिया नगनिया …….
– डॉ भावना

सुबह से ही अनमनी थी वह. जेठ का महीना तो जैसे कटता ही नहीं. दिन भी बहुत बड़े होते हैं आजकल. समय तो जैसे पहाड़ हो जाता है. उसे न जाने क्या सूझी, आईने के सामने खड़ी हो गयी. उफ, कितनी सूज गई हैं आंखें. चेहरा कितना निस्तेज हो गया है. जबसे उसका पति किसी दूसरी औरत के प्यार में पड़ा है, उसे नींद कहां आती है. कुछ साल पहले कितनी हसीन थी उसकी दुनिया. वह हमेशा सजी-संवरी, हंसती-खिलखलाती, इधर से उधर फुदकती रहती थी. यूं तो वह दो बच्चों की मां थी, लेकिन खुद भी बच्चों जैसी. कोई चूरिहारिन इस रास्ते से गुजरे और वह चूड़ियां न ले, ऐसा हो नहीं सकता था. लाल, पीली, हरी चूड़ियां पहन कर वह इठलाती, जैसे अभी-अभी ब्याह कर आयी हो. पांव में महावर, हाथ में अलता, मांग में सिंदूर और बड़ी-सी बिंदी. उसका मरद देखता तो अक्सर उसे छेड़ता. इतना बनाव-शृंगार क्यों कर रही हो. कहीं मैं भाग थोड़े ही रहा हूं. वह हंसती हुई कहती, तुम मरद जात का क्या ठिकाना. कब फिसल जाओ. सुशील हंस पड़ता. उसने तो बस मजाक में ये बातें कही थी. ऐसा सचमुच होगा कौन जानता था. उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में आंसू भर आये. जिससे उसकी खुद की तस्वीर धुंधला गयी. आखिर उसका पति उसे किस अपराध की सजा दे रहा है. उसकी फिक्र नहीं है, न हो. बच्चों की ही खातिर सही घर तो आये. कई महीने से बच्चों की ट्यूशन फीस भी जमा नहीं कर पायी है वह. अब तो घर से निकलना भी मुश्किल हो गया है. तगादे ही तगादे आते हैं उसके पास. कभी स्कूल के, कभी राशन की दुकानों के. मायके से कुछ चावल गेहूं आये थे, जिससे गुजारा चल रहा था. तीना तरकारी खाये जमाना हुआ. बच्चे दूसरे को खाते देख सिहाते हैं. पर वह क्या करे. गुलाबो चाची कहती है, ग्राम कचहरी में आवेदन दे दो, उसे चुड़ैल के खिलाफ. जिसने तुम्हारी गृहस्थी को नागिन की तरह डस लिया है. नये सरपंच बहुत नेक हैं. तुम्हारी फरियाद अवश्य सुनेंगे. अब तो ग्राम कचहरी में सरकारी वकील भी रहते हैं, जिनसे सलाह-मश्विरा कर उचित निर्णय लिया जाता है. आशा चुपचाप सुन रही है. गुलाबो काकी आगे कहती हैं, गांव में अब तक कई लोगों की गृहस्थी बच गयी. कई लोगों के खेत-खलिहान के मामले सुलझ गये. आखिर कोर्ट-कचहरी जाने में पैसे भी तो लगते हैं. कहां से लायेगी पैसे. एक बार तू अपनी हालत आवेदन में लिख कर सरपंच साहब को दे दे. तुम्हारे भाग्य में होगा तो तुम्हारा मरद तुम्हारे पास जरूर वापस आयेगा. आखिर गांव-समाज भी तो कोई चीज है. पंच-परमेश्वर होता है. अगर वह पंचायत में आयेगा तो समाज के सामने कुछ न कुछ तो बोलेगा. मान लो वह कुछ न बोला, तब भी पंच तो अवश्य दबाव बनायेंगे. आशा ने कहा, हां काकी तू ठीक कहती हैं. कल ही मैं तुम्हारे साथ सरपंच साहब के यहां चलूंगी. अब मैं और नहीं सह सकती. आशा रात भर जागती रही. पड़ोस में मंगरू चाचा रोज की तरह वही पुराना गीत को अपने शब्द देकर गा रहे थे और वह उस दर्द में कहीं खोती-सी जा रही थी. ‘‘अंगुली में डसले है नगनिया हो, तोरो बिना रहलो न जाये. चैत बीतल, वैशाख बीतल, बीतल जाइय जेठ महीनवा हो, तोरो बिना रहलो न जाए.’’
सुबह-सुबह आशा गुलाबो काकी के साथ ग्राम कचहरी में आवेदन दे आयी. आवेदन की खबर सुनते ही गांव में कानाफूसी तेज हो गयी. सुशील को लोग समझाने लगे. लौट आ तू अपनी मेहरारू के पास, तेरे दो बच्चे हैं, उसकी तो सोच. सुशील कभी अपनी पत्नी आशा व बच्चे के बारे में सोचता तो कभी रामकली के बारे में. वह धर्मसंकट में खड़ा था, करे तो क्या. वह अपने प्रेम को जिंदा रखे या कर्तव्य को. रामकली को वह कैसे भूल पायेगा. क्या रह पायेगा उसके बिना. न…न….ऐसा नहीं हो सकता. लेकिन उसके पांव अनायास घर की तरफ चल पड़े. ऐसा लगा जैसे कोई खींच रहा हो. वह ठिठका. नहीं. क्यों जा रहा हूं मैं.  तभी पत्नी आशा उसे सामने से आती दिखी, उसने भागना चाहा. लेकिन उसके पांव जड़ हो गये थे. आशा ने पति को देखते हुए एक मिनट भी देर नहीं की. उसके हाथ पकड़ लिये. चलो, घर चलो. सुशील यंत्रवत आशा के साथ चलता गया. घर पहुंचने पर गुलाबो काकी उसे समझाने लगी. न जाने कौन सा जादू टोना कर दिया था, उस चुड़ैल ने तुम पर. ऐसे भी कोई अपने परिवार को भुलाता है. बच्चे का हाल देखा है, टंक भर मांस नहीं है, बदन में. सूख के जैसे कांटे हो गये हैं. कल पंचायत में तू अपनी दिल की सुनना. जो दिल करे वही करना. तुम समझदार हो. गांव-घर में डॉक्टरी करते हो.
पंचायत शुरू हो गया था. रामकली पलके नीची कर बैठी रही चुपचाप. लोग बोलते रहे. वह सुनती रही. उसका शरीर जैसे जम गया था बर्फ की तरह. पंचायत भवन के नवनिर्मित भवन में भीड़ उमड़ पड़ी थी. सामने की कुर्सी पर सरपंच, उनके बगल में सलाहकार एवं सचिव बैठे थे. मामला दिलचस्प था सो गांव-जवार के गण्यमान्य लोगों के साथ सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण भी उपस्थित थे. भीड़ इतनी की फर्श पर पांव रखने की भी जगह नहीं. कुछ लोग खिड़कियों की रेलिंग पर खड़े थे तो कुछ दरवाजे पर. सब के मन में एक ही जिज्ञासा थी कि आखिर न्यायपीठ क्या फैसला करेगी. भीड़ धीरे=धीरे शांत हो गयी थी. सरपंच ने कहा प्रतिवादी रामकली देवी न्यायपीठ के सामने अपना पक्ष रखे. रामकली धीरे से उठ कर न्यायपीठ के समक्ष खड़ी हुई. माय-बाप मैं और सुशील एक दूसरे से बेइंताह प्यार करते हैं. मैं जानती हूं कि मेरे पति व दो बच्चे हैं. पर प्यार का उम्र से क्या वास्ता. यह तो बस हो जाता है. …उस वक्त हम दिमाग से कहां सोचते हैं. प्यार करना जुर्म है तो मैं अपराधी हूं. आप जो भी सजा देंगे मुझे कबूल है. न्यायपीठ रामकली की स्पष्टवादिता से हतप्रभ है. सब एक दूसरे से मुंह देखने लगे. तभी सरपंच वादी के पति को बयान हेतु उपस्थित होने का आदेश देते हैं. सुशील अपने बयान में कहता है कि साहब मेरा दिमाग खराब हो गया था, मैं इस औरत से इश्क कर बैठा. अपने परिवार को भुला बैठा. वह देखिये साहब कैसे शोक से गल गयी है मेरी बीबी. टूअर हो गये हैं मेरे बच्चे. मैं अपने प्रेम में कर्तव्य से विमुख हो गया था. मुझसे अनजाने में बहुत बड़ा अपराध हो गया है. अब मैं लौट आना चाहता हूं अपने घर. यह सुनते ही आशा का चेहरा खुशियों से दमक उठा. सुशील आगे अपने बयान में कह रहा था कि करीब डेढ़ साल पहले रामकली से इलाज के क्रम में मिला था. आप सब जानते हैं कि इस पंचायत में मैं अकेला डॉक्टर हूं. रात बेरात तबियत खराब होने पर सभी को दवाएं देता हूं. रामकली के मन में बिजली सी कौंध गयी.
हां, वह भादो की भीषण बारिश वाली रात थी. बारिश कहर बन कर आसमान से टूट रही थी. उसका बदन बुखार से तप रहा था. उसका पति घबरा कर बोरा की छतरी बना कर दौड़ पड़ा था सुशील के घर. बहुत आरजू मिन्नत के बाद सुशील इस बारिश में आने के लिए तैयार हुआ था. उसके घर आते ही रामकली की कलाई अपने हाथों में ले नाड़ी देखने लगा. उसकी नाड़ी बहुत तेज चल रही थी. उफ, इसे तो बहुत तेज बुखार है. जल्दी से उसने अपने बैग से पारासिटामोल की टिकिया निकाली और उसे खाने के लिए दिया. पानी मंगवार कर उसके माथे में अपने रूमाल की पट्टी लगातार देता रहा. सुबह तक उसका बुखार उतर गया था. आंख खुलने पर रामकली ने देखा कि सुशील वहीं कोने पर ऊंघ रहा था. उसकी आंखें कृतज्ञता से झूक गयी. सुशील कह रहा है साहब, मैंने इस पर अभी तक डेढ़ लाख रुपये खर्च किये हैं. कई पॉलिसियों की किस्तों को भरा है. जब-जब इसकी तबियत बिगड़ी है, इलाज किया हूं. उसकी दवाइयों का खर्च भी मैंने उठाया है. रामकली शरम से गड़ी जा रही थी. मैंने तो सारे पैसे इसे दे दिये थे, फिर कौन से पैसे की बात कर रहा है वह. आखिर पैसों की चर्चा कर वह क्या सिद्ध करना चाहता है. उसका शरीर सुन्न होता जा रहा है. आंखों के सामने अंधेरा छा रहा है, प्रेम का यह कौन सा रूप देख रही है वह. क्या पुरुष प्रेम के नाम पर व्यापार करते हैं. क्या हर युग में कान्हा राधा को छोड़ कर रुक्मिणी को ही अपनाने पर विवश है. उफ कितना प्रेम करता था सुशील उसे.
उस दिन के बाद सुशील उसके घर रोज हालचाल लेने आ रहा था. उसकी तबियत भी तेजी से सुधर रही थी. एक दिन सुशील जब उसके घर आया तो वह स्नान कर धूप में बाल सुखा रही थी. काल घने कमर तक लंबे बाल, मांग भर सिंदूर, माथे पर नग वाली बिंदी. सुशील देखा तो देखता ही रह गया. रामकली उसे यूं देखते देख शरमा गयी थी. सुशील ने धीरे से उसकी कलाई पकड़ी, अब तो बुखार नहीं है तुम्हे. यह स्पर्श आम स्पर्श से बिल्कुल अलग था. उसके शरीर में झुरझुरी होने लगी थी. उफ, छोड़ो ऐसे क्या कर रहे हो. नहीं, रामकली हाथ मत छुड़ाओ, ये हाथ पकड़ा है, अब कभी नहीं छोड़ूंगा, यह कहते हुए सुशील उसके और करीब आ गया था. उसके चेहरे पर झुक आई लटों काे हटाते हुए उसने धीरे से उसके माथे को चूम लिया था. रामकली की धड़कन बहुत तेज हो गयी थी. क्या हो रहा था उसे, इससे पहले कई बार उसके पति ने उससे छुआ था, पर यह अहसास…. . वह खोती-सी जा रही थी उसमें. उस दिन के बाद सुशील उसके घर में ही रह गया था, उसका होकर. कई बार रामकली उसे घर जाने को कहती, पर वह कहता, नहीं बाबा मैं तुम्हें छोड़ कर पल भर भी नहीं रह सकता.
जैसे ही सुशील की आवाज दुबारा गूंजी रामकली की तंद्रा टूटी. बयान जारी था, वह कह रहा था रामकली को 25 हजार रुपये और देने को तैयार हूं. वह अपने घर में अपने पति-बच्चों के साथ रहे और मैं अपने घर में पत्नी-बच्चों के साथ. मैं अपने घर लौटना चाहता हूं साहब. रामकली को लगा जैसे किसी ने उसकी आंखों में लाल मिर्च डाल दी हो. भरे पंचायत में उठ खड़ी हुई. हकलाते हुए बोली, साहब…साहब. यह पैसा क्यों. क्या 25 हजार मेरे प्रेम की कीमत है. क्या मैँने इससे प्रेम के बदले व्यापार किया था. पंचायत मौन थी. मैंने इससे प्रेम किया है, सिर्फ प्रेम. फिर किस चीज का मूल्य लगा रहा है. क्या यह मूल्य उन रातों का है, जो मैंने इसके साथ गुजारी है या उन लम्हों का जिसमें बगैर मेरे एक पल नहीं रहने की कसमें खायी थी उसने. जब वह ही मेरा नहीं, जिससे प्रेम किया था तो यह पैसे लेकर क्या करूंगी… तभी पंचायत से एक आवाज आई, चुप बदजात औरत, फटर-फटर बोलती है. गैर मरद को अपने चंगुल में फांस कर शर्म नहीं आयी. अभी बकवास कर रही है. चुपचाप जो पैसे सुशील दे रहा है, उसे रख ले. रामकली अपने धुन में थी. उसने भीड़ में उस आवाज को टोहा. यह पड़ोस के चाचा की आवाज थी. रामकली ने कहा, चाचा, जब यह शरीर ही पवित्र नहीं रहा. दुनिया की नजर में मैं पापी, कुलच्छनी हो गयी हूं और जिसके प्रेम में पड़ कर मैंने यह सब किया और वही मेरा नहीं रहा, तो यह पैसे लेकर क्या करूंगी. मैँ पंच के सामने खड़ी हूं. जो वह न्याय करेंगे, मानूंगी. वे पैसे देकर मेरा मूल्य न लगाएं. एक बार फिर पंचायत में शांति छा गयी. दोनों पक्षों का बयान हो चुका था. वकील ने सुशील से कहा दोनों पक्षों से अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर करा ले. ताकि बाद में वे फैसला मानने में अानाकानी न करे. दोनों पक्षों के अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर के बाद फैसले की घड़ी आ गयी थी. सरपंच न्यायपीठ के चार अन्य पंचाें के साथ विचार-विमर्श के लिए ग्राम पंचायत के कैंपस में टहल रहे थे. लगभग आधे घंटे के सलाह-मश्विरा के बाद पंचायत भवन में बैठक हुई. रामकली का दिल और जोड़ से धड़कने लगा. पिछले कई दिनों से उसने सुशील की खातिर क्या कुछ नहीं झेला था. पूरा गांव एक तरफ और वह अकेली. कल की बात थी कितनी बेचैन हो गयी थी, यह सोचकर कि फैसले के बाद सुशील उसे कभी नहीं मिलेगा. उसने घर से एक चाकू लिया और चल पड़ी थी सुशील के घर की तरफ. उसे लोगों ने जाते देखा तो पीछे-पीछे हो लिये. पर वह अपने पीछे आते लोगों से बेखबर तेज कदमों से भागते हुए जा पहुंची. सुशील के घर. दरवाजे पर ही मिल गया था वह. रामकली ने उसका हाथ जोड़ से ऐसे पकड़ा, जैसे अब कभी नहीं छोड़ेगी. फिर उसने खुद को थोड़ा मजबूत किया और कहा सुशील तुम मुझे अपने घर में दूसरी पत्नी बना कर रख ले. मैं सबकुछ छोड़ कर तुम्हारे पास आ गयी हूं. मैँ नहीं रह सकती, तुम्हारे बगैर. मुझ पर रहम कर. सुशील असमंजस में था.कभी रामकली को देखता तो कभी दरवाजे पर उमड़ आयी भीड़ को. सुशील ने अपना हाथ उससे छुड़ाते हुए कहा, संभाल अपने आप को मैं ऐसा नहीं कर सकता. मेरे बच्चे हैँ, पत्नी है. एक पत्नी के रहते मैँ दूसरी शादी कैसे कर सकता हूं. रामकली बिफर पड़ी. मेरे भी तो हैं. मैं तो सब कुछ छोड़ आयी हूं. तुमने ही कहा था कि ये हाथ पकड़ा है तो जीते जी नहीं छोड़ूंगा. क्या तब पत्नी और बच्चे नहीं थे. फिर अब ऐसा क्यूं. सुशील ने चिल्लाते हुए कहा, हां कहा था, पर मैं होश में नहीं था, तुम्हारे प्रेम में पागल था. अब ऐसा नहीं हो सकता, लौट जाओ. रामकली उसके पैरों पर गिर गयी, रुआंसे स्वर में बोली कहां जाऊं मैं, सब कुछ तो छोड़ आयी हूं. काेई उपाय न देख रामकली ने अपने कमर में खोंसी हुई चाकू निकाल कर उसके हाथ में देते हुए कहा, ठीक है हम जीते जी साथ नहीं रह सकते, साथ मर सकते हैं न. तुम मुझे मार दो मैं जीना नहीं चाहती. कहां जाऊंगी मैं. यह शरीर तुम्हारे बिना बेजान ही तो है. तभी सुशील की पत्नी घर से बाहर निकल आयी. रामकली को बाल पकड़ कर घसीटते हुए कहा, कलमुंही शर्म नहीं आती, मेरे पति को फांस कर रखी है.डायन. न जाने क्या खिला कर इसे अपने वश में कर रखा था. अब यह मेरे पास लौटना चाहता है तो यहां तक चली आयी. भीड़ में से एक ने कहा मारो इसे. यह औरत पूरे गांव का माहौल गंदा कर रही है. लोग पत्त्थर चलाने लगे. तभी रामकली का पति कहीं से भागता हुआ आया. रामकली को जोर से पकड़ कर बोला कौन मारता है मेरी पत्नी को देखता हूं. मैं हूं इसके साथ और हमेशा रहूंगा. रामकली की आंखों में आंसू बह निकले. जिसके लिए घर छोड़ी. बदनामी झेली. वह इतने लोगों की भीड़ में पत्त्थर खाने के लिए छोड़ दिया और जिसे छोड़ कर आयी थी वह हाथ थामने आ गया.
सरपंच ने अपना आदेश सुना दिया है, आज के बाद प्रतिवादी रामकली और वादी का पति सुशील एक दूसरे से नहीं मिलेंगे. न हीं उन दोनों के बीच किसी तरह का संबंध रहेगा. दोनों पक्षों को यह आदेश दिया जाता है कि दोनों अपने परिवार की जिम्मेवारी पूर्ण निष्ठा से निभायेंगे. अगर दोनों पक्षों में से कोई भी पंचायत के निर्णय को नहीं मानेंगे तो दंड के प्रतिभागी होंगे. पंचायत की भीड़ धीरे-धीरे छटने लगी थी. रामकली वहीं फर्श पर बैठी पंखें को देख रही थी, उसे लगा कि उसका सिर भी पंखें की तरह घूम रहा है. उसने जोर से अपने पति का हाथ पकड़ लिया. खेत से लौटते हुए मंगरू चाचा फिर पुराने गीतों को अपने बोल देकर दर्द भरा स्वर अलाप रहे हैं –
‘‘अंगुली में डस ले बिया नगनिया हो……’’

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