विशिष्ट कहानीकार : ऊमा झुनझुनवाला

पूनम का चाँद

हम चाहे दुनिया के सामने जितने भी बहादुर बनते फिरें मगर असल जगह अपनी बहादुरी ना दिखा पाने का ग़म या फिर कहें कि हमारी कायरता मरते दम तक हमारा पीछा नहीं छोडतीl कुछ ऐसा ही हाल आयशा का था. जैसे ही नवम्बर का महीना शुरू होता है पूरे साल की टीस एक बिंदु पर केन्द्रित होकर ग्लानि भाव से त्रस्त आयशा को उसकी कायरता उसकी आत्मा कोंचने लगती है; लानत भेजती रहती उस पर. उसके मन में ये बात पैठ कर चुकी थी कि दोस्ती की बड़ी बड़ी डींगे हांकने वाली आयशा अपनी सहेली सोनम के लिए कुछ न कर सकी.
सोनम….
सात नवम्बर को उसका जन्मदिन होता है l मृत्यु का दिन कब हुआ, आज तक नहीं पता और कोई पता लगा भी नहीं सका….l हर साल आयशा इसी तरह पूरा नवम्बर तिल तिल कर गुज़ारती है—मर मर कर नहीं—यातना में—कुछ ना कर पाने की यातना…..
ग्रेजुएशन में दाखिले के लिए सुबह से ही लम्बी कतार लगी थी फॉर्म के लिए l जून की गर्मी तपा देने वाली थी l लग रहा था सूरज जिस्म की सारी नमी निचोड़ कर ही शांत होगा l दाखिले के वक़्त कॉलेजों के आस पास की छोटी छोटी चाय की दुकानों पर मेले ठेले की रौनक छाई रहती l सब एक दूसरे से अनजान मगर फिर भी अजनबी से नहीं; एक दूसरे से अपना अपना रिजल्ट बतियाते l किसे कितनी अंको की उम्मीद थी, कम मिले या ज़्यादा, किसे कौन-सा विषय पसंद है, कौन-सा विषय लेकर आगे की पढ़ाई करनी है, कौन कितना परेशान हो रहा है, कॉलेजों में दाखिले को लेकर कैसी कैसी राजनीति चल रही है आदि आदि मुद्दे हवा में बिखरे पड़े थे l सबके चेहरे से यूँ प्रतीत हो रहा था जैसे ज़िन्दगी को फ़तह करने की चाणक्य नीति बनाई जा रही हो l
आपके पास ब्लू पेन है..? एक बड़ी ही दुबली पतली लड़की ने हलके से मुस्कुराते हुए आयशा से पूछा – वो दरअसल यहाँ नाम ब्लू पेन से ही लिखने को कहा है न !
उस लड़की में कोई ख़ास आकर्षण नहीं था लेकिन एक मासूम कशिश थी l आयशा ने मुस्कुराते हुए उसे ब्लू पेन देते हुए कहा – किस स्ट्रीम में एडमिशन ले रही हो..?
जी वो पोलिटिकल साइंस ऑनर्स – धीमे से उसने कहा
क्या आपको राजनीति अच्छी लगती है…?
पोलिटिकल साइंस का राजनीति से क्या सम्बन्ध…? उसने उसी धीमी आवाज़ में मासूमियत से पूछा l
आयशा बिंदास लड़की थी इसलिए ज़ोर से ठहाके मारकर हँसने लगी – अरे राजनीति का सम्बन्ध पोलिटिकल साइंस से नहीं होगा तो क्या एकाउंटेंसी का होगा l वह लड़की झेंप गई l उसके चेहरे पर लेकिन मुस्कराहट मोनालिसा की पेंटिंग की तरह चिपकी हुई थी l आयशा ने उसे फिर छेड़ते हुए कहा – पिकासो की पेंटिंग चलती फिरती अवस्था में दिखेगी कभी, ये तो सोचा ही नहीं था – ये सुनकर सब ज़ोर से हँस पड़े और वो लड़की एक बार फिर झेंप गई l
– अरे मोनालिसा….कैसी हो, पोलिटिकल साइंस और राजनीति में कोई तालमेल हुआ या नहीं; दाखिले के दो महीने बाद कॉलेज में नवांगतुकों के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, वहीँ दोबारा उन दोनों की मुलाकात हुई तो आयशा ने उसे छेड़ते हुए कहा l
– “मेरा नाम सोनम है” और उसके चेहरे पर फिर मोनालिसा मुस्कुराने लगी l उस दिन दोनों में काफ़ी बातें हुई और दोनों पक्की सहेली बन गई l
सोनम अपने घर की इकलौती लड़की थी l तीन भाई थे, दो बड़े और एक उससे छोटा l कहने को सबकी लाडली थी सोनम मगर बस उतना भर ही जितना बाप-भाई को अपनी मर्ज़ी का लाड दिखाना होता था; जैसे सब्जी मंडियों में नाप तौल होता है, कभी ग्राहक को खुश करना हो तो छटांक भर सब्जी ज्यादा और वह भी अहसान जताते हुए कि ये बस आपके लिए है, किसी और ग्राहक के साथ ऐसा नहीं है और जब मन नहीं होता है तो सब्ज़ीवाला रत्ती रत्ती भी नाप का ख्याल रखता है l
आयशा और सोनम के स्वभाव में कोई मेल नहीं था l सोनम स्वभाव से डरपोक थी l कभी कोई फ़रमाइश नहीं, जो मिल जाता उसी मे खुश, किसी बात में कोई आपत्ति नहीं l आयशा के ‘किन्तु-परन्तु’ ख़त्म ही नहीं होते थे, तर्कों का पहाड़ मौजूद रहता था उसके पास | देखते देखते तीन वर्ष गुज़र गए कॉलेज के l आयशा कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ साथ राजनीति में भी सक्रिय हो गई थी l उसके तेवर को देख कर लगता था कोई क्रांति आनी निश्चित है; जैसे ज़िन्दगी उसकी मुट्ठी में क़ैद है; जैसे नए नए तर्क उसके हाथों गढ़े जाने पर इतरा रहे हों; जैसे कॉलेज की लड़कियों का ऑक्सीजन मास्क हो l कॉलेज की राजनीति ने उसकी सोच और विचारधारा को निडरता व मज़बूती देने का काम किया था | उसके तेवर पर कई लोकल नेताओं की भी नज़र थी, अपनी अपनी पार्टी के एक बोल्ड नेता के रूप में सब उसे देख रहे थे |
एक दिन सोनम की आँखें सूजी हुई थी जैसे सारी रात रोते हुए गुजरी हो और मोनालिसा उसी में डूब कर मर गई हो l आयशा के काफ़ी ज़द्दोज़हद के बाद उसने बताया कि वो अब फाइनल्स नहीं दे पाएगी l
आयशा ने तिलमिलाते हुए कहा – तेरी अपनी कोई मर्ज़ी नहीं है क्या ? यार, किस मिट्टी की बनी हो तुम…? भैया ने ये कहा है इसलिए ऐसा करना है; माँ पापा ने ऐसा करने को कहा है इसलिए वो करना है; उसने ये कहा है तो उसने वो ; मैं पक गई तेरी इस तरह की बातें सुन सुन कर l
– ओह्हो आयशा ! तू समझती क्यूँ नहीं, मैं उनकी इकलौती बेटी और इकलौती बहन हूँ… इसलिए मुझसे उन्हें बहुत सारी उम्मीदें हैं l मैं उन्हें दुखी नहीं कर सकती…l वे सब मुझसे बेइंतिहा प्यार करते हैं l
– प्यार…? इसे तू प्यार कहती है…? अगर प्यार करते होते तो तेरी ख़ुशी का ख्याल रखते या तुझे दुखी करके अपनी पसंद तुझ पर थोपते…? वैसे तू फाइनल्स क्यूँ नहीं दे पाएगी ये सुनूँ ज़रा…
– भैया ने कहा है कि मुझे कुकिंग क्लासेज और सिलाई आदि सिखना चाहिए अब…
– क्या….? आयशा को लगा जैसे उसे किसी ने खाई में धकेल दिया हो, दिमाग ख़राब हो गया है क्या उनका…? चल मैं चलती हूँ तेरे घर और बात करती हूँ भैया से कि तुझे ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन और बी.एड. करके स्कूल की नौकरी करना है और…
– नहीं आयशा, मेरी पढाई से उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं है मगर उन्होंने मेरे लिए कोई रिश्ता तय कर दिया है l चूँकि लड़के वाले चाहते हैं कि इसी नवम्बर में ये शादी हो जाए इसलिए मुझे अब ये सब सीखना होगा l
इस बार आयशा को सबसे ज़्यादा हैरानी हुई – और तू अमर को चाहती है उसका क्या…?
– शायद किस्मत को यही मंज़ूर है, ये कहते हुए सोनम नदी में डूबती दुर्गा की मूरत सी लग रही थी जैसे तमाम शक्तियों के बावजूद डूबना ही उसकी नियति है l उसके बाद सोनम का कॉलेज आना बंद हो गया l बीच बीच में दोनों में फोन पर बात होती रहती थी l सोनम अपनी शादी की तैयारियों के बारे में बताती कि उसकी माँ और भाभियाँ उसके लिए क्या क्या खरीद रहीं हैं l आयशा राख में से अंगारा खगालने की बड़ी कोशिश करती – अमर कैसा है? तुम दोनों में बात हुई, क्या उसके बिना तुम खुश रह पाओगी, वगैरह वगैरह l मगर किसी ने जैसे चूल्हे पर भर भर बाल्टी पानी उड़ेल दिया हो, सोनम के भावों की तपिश भी बूझ चुकी थीl जब जब सोनम कहती कि घर वाले उसके लिए जो भी कर रहे हैं अच्छे के लिए ही कर रहे हैं तो आयशा के आँखों के सामने कसाईखाने में जिबह करके टाँगे हुए जानवर की तस्वीर उभर आती l अमर शहर छोड़ कर जा चुका था l अमर में भी वो दम ही नहीं था कि सोनम के घर वालो से उसका हाथ माँग सके l हालाँकि हिम्मत वाली बात में सोनम ज़्यादा कमज़ोर थी; किसी टूटे हुए पत्ते की तरह l शहर छोड़ने से पहले आयशा की अमर से काफ़ी झड़प हुई थी –
-तुम कैसे आशिक़ हो अमर, क्या तुम्हे सोनम की ज़रा भी परवाह नहीं है?
-क्या बकवास कर रही हो आयशा, तुम क्या जानो मेरे दिल पर क्या गुज़र रही है?
-और इसीलिए तुम ख़ामोशी से ये शहर छोड़ कर जा रहे हो…?
– इश्क़ का मतलब सिर्फ़ पाना ही नहीं होता है आयशा l फिल्मों जैसा नहीं होता कुछ भी l
– बकवास, सब बकवास l क्यों नहीं तुम उसके घर जाकर सोनम से शादी की बात कर रहे हो..? किस बात का डर है? ज्यादा से ज्यादा तुम्हारी बेईज्ज़ती ही करेंगे, तुम्हे घर से धक्का मार कर बाहर फेंक देंगे…या फिर शायद ये भी हो सकता है कि तुम दोनों की शादी के लिए राज़ी ही हो जाए… कुछ भी हो सकता है l मगर तुम्हे सोनम के घर वालो से बात तो करनी ही पड़ेगी न l सोनम अपने भाइयों से नहीं कह सकती मगर तुम तो कह सकते हो…
– आयशा, तुम्हे क्या लगता है कि मैं ऐसा करना नहीं चाहता ? सोनम के बगैर मैं एक पल भी नहीं जी सकता l लेकिन सोनम ने मुझे अपनी कसम देकर घर आने के लिए मना कर दिया और कहा कि मैं इसका ज़िक्र भी न करूँ किसी से…
– वाह क्या बात है…सोनम ने तुमसे कहा कि ‘मैं ख़ुदकुशी कर रही है लेकिन तुम्हे मेरी कसम तुम मुझे रोकना मत’ और तुम उसकी कसम की खातिर उसे मरने दे रहे हो…वाह ! ग़ज़ब…
– अजीब तर्क है तुम्हारा आएशा…
– तुम बड़े खुदगर्ज़ हो अमर…अच्छा ही है कि तुम्हारे साथ उसकी ज़िन्दगी का सफ़र यहीं ख़त्म हो रहा है, वरना सिवाए पछताने के उसके पास कुछ नहीं रहता l अभी कम से कम वो इस भ्रम में रहेगी कि तुमने नहीं छोड़ा उसे l
आयशा को प्रेम में चाँद-तारे तोड़कर लाने वाले या साथ साथ जीने मरने वालों की दीवानगी महज दिखावा लगती थी l अगर किसी को प्रेम है तो स्वीकार करे और नहीं है तो फिजूल में उसके बारे में सोच कर या रोकर ज़िन्दगी स्वाह करने को उसने प्रेम कभी नहीं माना l यही वजह थी जब उसने मयूर से अपनी चाहत का इज़हार किया था और उसकी तरफ़ से कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला तो उसने अपनी चाहत को वहीँ दफ़न ही कर दिया. दोनों एक ही कॉलेज में थे; बस विभाग अलग थे | उनकी मुलाकातों की चर्चाएँ बड़ी हसीन होती थी; कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में दोनों की जुगलबंदी विख्यात थी l शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता जब दोनों में नोकझोंक न होती हो l लेकिन पूरा कॉलेज यहाँ तक सारे प्रोफेसर भी यही मानते थे कि ये नोकझोंक ही दरअसल इनका प्रेम है l आयशा को भी ऐसा ही लगा था | इसकी वजह भी थी l एक दिन कॉलेज से सभी पिकनिक पर गए थे l वहां पार्क में आयशा अपनी कक्षा के एक दूसरे लड़के के साथ झूले में बैठ गई l इस बात को लेकर मयूर ने वहां ऐसी तबाही मचाई कि आखिर में आयशा को उससे माफ़ी माँगनी पड़ी कि आइन्दा वह इस बात का ख्याल रखेगी l इस पर भी मयूर कई दिनों तक उससे रूठा रहा l हालाँकि इन मयूर ने कभी भी प्रत्यक्ष रूप से अपनी भावनाओं का इज़हार नहीं किया था इसलिए ग्रेजुएशन के फाइनल्स के बाद कैंटीन में एक दिन आयशा ने उसे एक ख़त दिया l वह जानना चाहती थी उनके रिश्ते के भविष्य के बारे में | उसके एक हफ़्ते मयूर कॉलेज नहीं आया | आयशा कुछ समझ नहीं पा रही थी | एक बेचैनी सी तारी रहने लगी उसपर | मगर जाने क्यूँ मयूर से उसे कोई जवाब नहीं मिला l कुछ दिनों बाद जब मयूर ने अपनी शादी का न्योता सबों को दिया तो सब हकेबके रह गए l
सबने जैसे समंदर को पाताल में धंसते देखा; सबने जैसे पृथ्वी की धुरी को चटकते हुए महसूस किया; सबने जैसे बादलों को सूख कर रेत बनते देखा l और आयशा थी कि बिलकुल सामान्य… सब आयशा को सांत्वना देना चाहते थे l लेकिन आयशा की दीप्तिमान आँखों ने सभी सांत्वनाओं को उलटे पैर लौटा दिया l जिसके साथ पिकनिक में झूले का आनन्द लिया था उसने भी पुचकारने वाला हाथ बढ़ाया था मगर एक संवेदनहीन मुस्कराहट के साथ खाली हाथ ही लौटा.
आयशा जानती थी प्रेम का अर्थ देना पावना नहीं है और ना ही क़िस्मत की आज़माइश का नाम प्रेम है; ना कोई ज़बरदस्ती है और ना ही कोई स्पष्टीकरण है l अगर प्रेम है तो है और नहीं है तो नहीं है l इसलिए किसी और लड़के के साथ झूले पर बैठने पर मयूर का नाराज़ होना मगर प्रेम प्रस्ताव पर ख़ामोशी इख्तियार कर लेना तथा किसी और से शादी करना आदि विरोधी स्थितियाँ होने के बावजूद आयशा के लिए मयूर बेकसूर ही रहा क्योंकि यहाँ मुहब्बत का ऐलान दोनों तरफ से कभी हुआ ही नहीं था, सबने बस मान लिया था l मगर किसी ने प्रेम के दावे ठोके हों और फिर उसे मज़बूरी का जामा पहना कर बेबसी का मुखौटा अपने चेहरे पर लगा ले इस बात से उसे बेहद चिढ थी l और यही वजह थी अमर से उसे बड़ी चिढ हो रही थी और अब प्रेम शब्द के लिए उसके अंतस के किसी कोने में घृणा का एक अनदेखा दरख़्त उग आया था l

(२)
दौड़ते भागते वक़्त ने आयशा को टीवी के एक नामी न्यूज़ चैनेल का पत्रकार बना दिया और इधर सोनम को दो बच्चों की माँ l आयशा की सोनम से अब बातचीत लगभग ख़तम हो चुकी थी l एक तो आयशा न्यूज़ चैनेल के लिए फील्ड वर्क में दिन रात व्यस्त रहने लगी थी और उधर सोनम ने भी ख़ुद को संकुचित कर लिया था l ज़िन्दगी राजधानी की रफ़्तार से दौड़ रही थी कि अचानक सन बिरान्वे में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के कारण देश में साम्प्रदायिक दंगे छिड़ गए l चारों ओर हिंसा, मारकाट, आग़, हाहाकार और अफरा तफ़री मची हई थी l आयशा भी अपने साथियों के साथ रिपोर्टिंग के लिए विभिन्न इलाकों में घुमती रहती l एक शाम जिस इलाक़े में वह और उसके साथी छुपते छिपाते रिकॉर्डिंग में लगे हुए थे, वहां अचानक दंगा भड़क गया था l सभी ख़ुद को बचाने के लिए एक मकान में घुस गए l लेकिन वहाँ पहली मंजिल पर स्थित सभी फ़्लैटो में ताला लगा था; दूसरी, तीसरी, चौथी मंज़िलों पे भी यही दृश्य..l

हाँफते हाँफते पाँचवीं मंजिल पर जब पहुंचे तो एक फ़्लैट के अन्दर से किसी बच्चे की घुटी घुटी सी रोने की आवाज़ आ रही थी जैसे किसी ने बच्चे का मुँह दबा रखा हो l इनलोगों ने दरवाज़े पर कान लगा कर सुनने की कोशिश की तो अंदाज़ा हुआ जैसे घर के लोग ही अन्दर में है l वैसे भी इनके पास कोई चारा नहीं था इसलिए हलके से दस्तक देते हुए मदद की गुहार लगाई | आयशा की आवाज़ से शायद अन्दर वालों को कुछ रहम आया होगा; दरवाज़ा खुला तो एक लगभग सात आठ की साल बच्ची और एक चार या पाँच साल लड़का का नज़र आया l आयशा और उसके साथी कोई पल गवाए बिना अन्दर दाख़िल हो गए और दरवाज़ा बंद कर दिया l दोनों बच्चे बुरी तरह सहमे हुए थे l घर में और कोई नहीं था l आयशा को हैरानी हुई कि इन दो छोटे छोटे बच्चों को छोड़कर घरवाले कहाँ चले गए l लेकिन उस वक़्त कोई भी बातचीत का मौका नहीं था इसलिए सब खामोश रहे l आँखों में मगर जाने कितने प्रश्न जन्म ले रहे थे आयशा के l
बच्चे एक कोने में दुबके हुए थरथरा रहे थे l नज़र दौड़ाने पर आयशा को फ्रीज़ नज़र आई तो उसमे से पानी की बोतलें निकाली, अपने साथियों को भी दिया और पास में ही एक टेबल पर रखे गिलास में पानी निकाल कर उन बच्चों को दिया l बच्चे पहले तो उसे सहमी सहमी आँखों से देखते रहे l आयशा ने जब उनके सर पर हाथ फेरते हुए बिना कुछ कहे पीने का इशारा किया तो शायद उस हाथ की कोमलता ने बच्चों के डर को कुछ कम किया होगा | दोनों बच्चों ने बारी बारी से पानी पीया l
कुछ लम्हे बिल्कुल ख़ामोशी में गुज़रे l आयशा उन बच्चो को लेकर बड़ी फ़िक्रमंद हो रही थी कि आख़िर ये बच्चे कौन है; क्या इसी घर में रहते है; या यहाँ आकर इनलोगों ने भी पनाह ली है; इस घर के मालिक कौन है; घर खुला हुआ कैसे था अगर ये बच्चे इस घर के नहीं है; आख़िर माजरा क्या है कई सवाल एक के बाद एक आ जा रहे थे मगर चूँकि अभी बातचीत करने का मौका नहीं था, भगदड़ ऐसी मची हुई थी कि हलकी सी बातचीत भी ख़तरनाक हो सकती थी l दंगाइयों के लिए प्रेस वाला या टीवी वाले का कोई महत्व नहीं होता l इसलिए सब ख़ामोशी से चारों तरफ अँधेरा करके बैठे हुए थे l कुछ देर बाद सड़क पर पुलिस के सायरन की आवाज़ दौड़ने लगी तब कहीं जाकर इन लोगो ने इत्मिनान की साँसे ली l आयशा के इशारे पर एक रिपोर्टर भाग कर नीचे गया पुलिस बुलाने के लिए और इधर आयशा ने उन बच्चों से बातचीत शुरू की –
– आपका नाम क्या है गुड़िया, आयशा ने लड़की से पूछा तो लड़की ने कहा प्रियंका अग्रवाल
– और आपका बेटे – मगर बच्चे ने कोई जवाब नहीं दिया l आयशा ने फिर बच्ची से कहा – प्रियंका, ये कौन है बेटा?
– मेरा भाई, बच्ची ने सहमते हुए कहा
– बेटे आपके भाई का क्या नाम है ?
– रोहित
-आप लोग घर में अकेले कैसे, बाकी लोग कहाँ हैं? आपके मम्मी पापा..?
– मम्मी खो गई हैं, पापा, ताया जी और दादी सब पुलिस के पास गए हैं मम्मी को लाने | हम टीचरजी से पढ़ रहे थे और दादी ने टीचरजी से कहा कि हमलोग अभी थोड़ी देर में आ जाएँगे l फिर सब चले गए l फिर ज़ोर से बम फूटने की आवाज़ आई तो टीचरजी बोली कि तुमलोग अन्दर से दरवाज़ा बंद करके रहो मैं अभी आती हूँ l फिर नीचे से ज़ोर ज़ोर से आवाज़ आने लगी, पता नहीं क्या हुआ – बोलते बोलते बच्ची ज़ोर ज़ोर से सिसकने लगी l
दोनों बच्चों के चेहरे पर खौफ़ भयंकर तौर पर नाच रहा था l आयशा और उसके साथी हैरान थे, इतने में पुलिस ऊपर आ गई l पुलिस ने इन बच्चों की कही बातों के मुताबिक जब खोजबीन किया तो पता चला कि ये बच्चे सही कह रहे हैं, इनके घरवाले पास के थाने में ही हैं, अचानक दंगा शुरू हो जाने के कारण उन सभी लोगो को थाने के अन्दर ही बैठा लिया गया था l
-लेकिन माँ अचानक घर से कैसे खो गई? आयशा हैरान थी, पुलिस ने बताया इनके घरवालो का कहना है कि चार बजे टीचर आई थी तब इसकी माँ ने ही दरवाज़ा खोला था l फिर साढ़े चार बजे बच्ची अपनी माँ को पानी के लिए आवाज़ देने लगी l मगर कोई जवाब नहीं आया तो बच्ची ने अपनी ताया से जाकर पानी माँगा और तभी पता चला कि इसकी माँ घर पर ही नहीं है l इस मकान में जितने फ्लैट है सबमे खोज लिया उसे मगर वह कहीं नहीं थी l इसलिए सब लोग टीचर के भरोसे ही घबराहट में थाना जाकर उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने पहुँच गए l वहाँ एफ़आइआर कर ही रहे थे कि इलाक़े में तनाव पैदा हो गया l उधर टीचर भी डर से बच्चों को घर में अकेला छोड़ कर भाग गई l
आयशा अभी असमंजस में ही थी, सारी बाते उसे ठीक नहीं लग रही थी l वह बच्चों से अभी कुछ और पूछना चाहती थी कि रोहित अन्दर गया और एक तस्वीर लेकर आया – आंटी, देखिये आपकी जैसी ही एक और आंटी है मम्मी के साथ l
आयशा ने हकबका कर तस्वीर देखी तो उसके पैरो तले जैसे ज़मीन खिसक गई; हलक सूख गया; जैसे किसी ने उसकी आवाज़ बंद कर दी हो; आँखों में हैरत और खौफ़ तिरने लगे l सबने जब आयशा की ये हालत देखी तो घबरा गए और उसके हाथ से तस्वीर लेकर देखने लगे l तस्वीर पर नज़र पड़ते ही सब चौंक गए…| तस्वीर में उन बच्चों की माँ के साथ आयशा थी l और उन बच्चों की माँ कोई और नहीं – सोनम थी l

– तो ये सोनम के बच्चे हैं l आयशा की सोनम से आख़िरी बात उसकी शादी के लगभग कोई पाँच साल बाद हुई थी जब सोनम ने उसे बताया था कि उसे आठवाँ महीना चल रहा है l और कितने बच्चे हैं – पूछने पर उसने बताया था कि एक लड़की है तीन साल की l घर परिवार के बारे में आयशा पूछती रह गई मगर सोनम ने टाल मटोल करते हुए ठीक से कोई जवाब नहीं दिया l आयशा ने जब सोनम से कहा तुझसे मिले कई बरस हो गए, कल तेरे घर आती हूँ, बच्चो से भी मिलना हो जाएगा तब सोनम ने झिझकते हुए उसे आने से मना कर दिया–
– आयशा, एक बात कहूँ बुरा नहीं मानना प्लीज़…तुम्हे मेरी कसम
– पागल लड़की मैं क्यूँ बुरा मानूँगीl क्या बात है, कह तो…l मुझ पर भरोसा नहीं है क्या ?
– नहीं, वो क्या है मेरे ससुराल में तेरे आने से थोड़ी परेशानी हो सकती है..l
– मतलब…? मैंने क्या किया ऐसा….!
– जाने कितनी बातें हैं जो तुझसे करना चाहती हूँ l मगर मेरे ससुराल में सब बड़े कंज़र्वेटिव हैं l मेरी शादी वाले दिन ही उन्होंने कह दिया था – “तुम्हारी इस मुसलमान सहेली के साथ हमें बातचीत पसंद नहीं, उससे अपना रिश्ता बाहर ही रखना l हमारे घर में मुसलामानों के लिए कोई जगह नहीं है” – कह कर सोनम फुट फुट कर रोने लगी थी l एक बार तो आयशा को भी बड़ा बुरा लगा ये सब सुनकर मगर वो अपना तेवर दिखा कर सोनम का घर बर्बाद नहीं करना चाहती थी l उसे पता था सोनम किसी भी स्तर पर किसी बात का विरोध नहीं कर पाएगी l इसलिए आयशा सोनम के घर कभी गई ही नहीं l
और आज जब सोनम के ससुराल अनजाने में ही पहुँची है तो वो ग़ायब…l मगर कैसे ? आख़िर क्या हुआ है…? आयशा का दिमाग बिल्कुल काम नहीं कर रहा था l बच्चों की मासूम डरी सहमी आँखे उसे उद्वेलित कर रही थी l किसी खौफ़नाक आशंका से उसका दिल बैठा जा रहा था . क्या बातें थी जो वो उसके साथ करना चाहती थी, आयशा सोच में थी कि टीवी चैनेल के प्रमुख का फोन आ गया फ़ौरन दफ़्तर लौट आने के लिए | आयशा जाना नहीं चाहती थी मगर कोई इमरजेंसी थी l उसने ड्यूटी पर तैनात पुलिस का फोन नम्बर ले लिया ताकि इस केस की रिपोर्ट ले सके l ये घटना आयशा के लिए अखबार की रिपोर्ट नहीं थी l चैनेल के प्रमुख ने अपने टीवी के चार बेहतरीन पत्रकारों और कैमरामैन को हिदुस्तान के दौरे पर लगा दिया था ताकि दंगे से जुडी छोटी से छोटी ख़बर इनके चैनेल से चुक न जाए क्योंकि इधर खबर चुकी कि टीआरपी नीचे l उन दिनों दंगे की वजह से हिन्दुस्तान के हर शहर के हर मोहल्ले की आँखों में हर पल एक आशंका जन्मती और पनपती रहती कि जैसे हर दूसरा व्यक्ति दुश्मन हो l बाज़ दफ़ा तो ऐसा लगने लगा जैसे बँटवारे के बाद के दृश्य की पुनरावृति हो रही हो l कहीं लोग ठंडे पड़े थे तो कहीं लोग जल रहे थे l मुहल्लों की शिनाख्त हर नए दंगे में स्वाह हो रही थी l उपरवाले के नाम पर इतनी बड़ी तबाही कि उपरवाले की मंशा पर ही शक होने लगा l कई बार आयशा को अपने हिन्दू सहयोगियों को लेकर भी संदेह हुआ था कि उसका मुसलमान होना कहीं इन्हें अखरता तो नहीं क्योंकि मज़हबी ज़हर हवा में व्याप्त होकर लोगो की साँसों में घुलने लगा था l सच और झूठ से परे अब सिर्फ़ घृणा और नफ़रत अपना काम कर रही थी l
खैर, थका देने वाले दिन-रात के दौरों ने भी आयशा के दिमाग से एक पल के लिए सोनम को दूर नहीं होने दिया l वो लगातार पुलिस के संपर्क में थी मगर मोनालिसा की मुस्कराहट वाली उस लड़की का कुछ भी पता नहीं लगा पाई थी पुलिस l चूँकि पुलिस शहर में अमन बहाली के काम में मुस्तैदी से लगी हुई थी शायद इसलिए किसी एक के ग़ायब हो जाने की रिपोर्ट महत्वपूर्ण नहीं थी l दूसरे पुलिस ये भी मान कर चल रही थी कि कहीं वह दंगाइयों के हत्थे तो नहीं पड़ गई l लाशों के ढेर में भी पहचान जारी थी l
दो महीने गुज़र गए l देश के हालत नियंत्रण में थे l आयशा को पुलिस के किसी भी जवाब से संतोष न हुआ और एक दिन वो सोनम के ससुराल अपने रिपोर्टर वाले रूप में पहुँच गई l ससुराल वालों ने ढंग से कोई भी जवाब नहीं दिया | एक अधेड़ उम्र की औरत जो शायद सोनम की सास रही हो कहने लगी – वे सब ख़ुद परेशान हैं सोनम को लेकर | ज़रूर इन हरामजादे मुसलामानों ने उसे मार कर कहीं फेंक दिया होगा हमारी सोनम को, कहते हुए उस अधेड़ उम्र की औरत पर घृणा के भाव ऐसे थे जैसे मुसलमान इस धरती के सबसे घिनौने प्राणी हो l किसी तरह ख़ुद पर काबू करते हुए आयशा ने जब बच्चों के बारे में पूछा तो उसी अधेड़ उम्र की औरत ने जवाब दिया –
– बच्चे अपनी नानी के घर गए हुए हैं
आयशा समझ गई थी यहाँ कुछ नहीं पता चलने वाला l उसने पड़ोसियों से पूछताछ की तो सारी बातों में उसे किसी खौफनाक साज़िश की बू आने लगी l एक पड़ोसी महिला ने कहा –
– पिछले कई दिनों से इनके फ्लैट से झगड़े की आवाज़ आ रही थी l सोनम का पति राजेश लोहे के बाज़ार में दलाली का काम करता है और निहायत ही उज्जड किस्म का आदमी है l उसने, उसकी माँ और उसकी बहन ने सोनम का जीना हराम कर रखा था l उसने फुसफुसाते हुए चौंका देने वाली एक और बात बताई कि – सोनम के ग़ायब होने के तीसरे दिन ही राजेश दूसरी बीवी ले आया l इनलोगों ने दुनिया को बेवकूफ समझ रखा है, कहते हैं मंदिर में सादगी से शादी करके ले आयें हैं दूसरी बहू, बेटा बहुत ज़्यादा डिप्रेशन में है सोनम के चले जाने से l जाने कैसे कैसे गए-गुज़रे लोग हैं; बहू की लाश भी नहीं मिली लेकिन इन हरामियों ने उसे मरा मान कर उसकी बारहवीं भी कर दी l
ये सब सुनकर बड़ा अटपटा लगा आयशा को | वहाँ से वह सोनम के घर गई | मगर सोनम के माँ बाप और भाईयों ने पुलिस में उसकी गुमशुदगी की कोई रिपोर्ट तक नहीं लिखवाई थी और उसे मरा हुआ मान लिया था | आयशा के बेलगाम सवालों का जवाब देते देते सोनम की माँ ने रोते हुए जो बताया वह नज़रअंदाज़ करने वाली बात नहीं थी –
– 10 दिन पहले ही सोनम ने मुझे फोन किया था, मुझे क्या पता था ये आख़िरी बात हो रही है मेरी बच्ची से | कहते कहते कई बार बेहोश हुई सोनम की माँ – उसने जब राजेश की दूसरी शादी की बात बताई तो हमलोगों को विश्वास नहीं हुआ था, मगर वह रो रोकर बेहाल हुई जा रही थी | मैंने उससे कहा, ‘ठीक है मौका देखकर कँवर जी से हमलोग बात करेंगे और फिर दो छोटे बच्चो का हवाला देकर उसे ही खामोश रहने के लिए कह दिया l हमें क्या पता था कि सोनम ग़ायब हो जायेगी फिर – कहते हुए वे जोर जोर से रोने लगी |
– सोनम ग़ायब हो गई या मार दी गई ? गुस्से में आयशा ने पूछा | अपनी बेटी को प्यार करने वाले माँ-बाप और भाइयों के प्रति आयशा के अन्दर घृणा का ज्वार उठ रहा था, उसने तिलमिलाते हुए आकथू करते हुए कहा वह किसी को भी नहीं छोड़ेगी, मामले को मीडिया में लेकर जाएगी l
तब सोनम की माँ ने रोते हुए कहा –
– तुम्हे क्या लगता है आयशा, हमें अपनी बेटी से प्यार नहीं था ? वह हम सबकी जान थी l हम भी चाहते है हमारी बेटी का कुछ पता चले, ईश्वर करे वो सही सलामत हो l मगर हम सब बेबस हैं, उसके ससुराल वालों के खिलाफ़ कोई शिकायत नहीं कर सकते थाने में l सोनम के दोनों बच्चों के भविष्य का सवाल है…
– मतलब…?
इस मतलब का जो जवाब उसे मिला वह अप्रत्याशित ही था l सोनम के ग़ायब होने के दूसरे दिन ही सोनम के ससुराल वालों ने बच्चों को ये कह कर इन के घर भिजवा दिया कि पूछताछ के लिए यहाँ पुलिस आ रही है बार बार, वो लोग नहीं चाहते कि बच्चों के दिमाग़ में कोई डर बैठ जाए, इसलिए पुलिस केस ख़त्म होने तक बच्चे अपनी नानी के यहाँ ही रहेंगे l आयशा हैरान रह गई यह सब सुनकर l कितनी चालाकी से उन कातिलों ने सोनम के घरवालों को पुलिस में जाने से रोक दिया l
आयशा निढाल सी बैठी थी कि तभी एक बच्चा वहाँ आया – अरे आंटी, आप…? आयशा ने देखा ये वही डरा-सहमा सा बच्चा था जिसे पहली बार दंगे के दौरान अपनी बहन से चिपके हुए देखा था | आयशा कुछ कहती उससे पहले ही वह अपनी नानी से कहने लगा – पता है नानी, जिस दिन मम्मी चली गई थी और बहुत सारे बम फूटे थे और हमारी टीचरजी भी चली गई थी, उस दिन यही आंटी आईं थी l फिर रो रोकर आयशा से कहने लगा – आंटी, उनलोगों ने मम्मी को क्यों मारा..? बताइए न ? आप पुलिस अंकल से कह कर उन लोगो को जेल में बंद कर दीजिये न l
– किन लोगो को बेटा, आयशा ने जिज्ञासा से पूछा l उसे लगा इस बच्चे से कोई काम की बात पता चलने वाली है l वह बच्चा दौड़ कर अन्दर से एक पुराना अखबार लेकर आया जिसमे दंगे के वक़्त की उन्माद से भरी एक खौफ़नाक तस्वीर थी l उस तस्वीर को दिखा कर कहने लगा जिसे सुनकर आयशा सकते में आ गई –
दादी ने बताया कि इन लोगों ने मम्मी को मार दिया l ये लोग बड़े गंदे हैं आंटी, मेरी मम्मी को क्यूँ मारा इनलोगों ने l मैं बड़ा होकर इन लोगो को खूब मारूँगा, दादी ने कहा कि ये लोग मुसलामान हैं, पकिस्तान से आएँ हैं, इनसे बच कर रहना, इनसे कभी बात नहीं करना, ये लोग बड़े गंदे हैं – कहते कहते वह मासूम बच्चा जोर जोर से रोने लगा l
सोनम ने जब आयशा को बताया था कि उसके ससुराल वाले मुसलामानों को पसंद नहीं करते तब उसने यह नहीं सोचा था उनकी मानसिकता में इतना ज़हर भरा होगा | सोनम ने ग्रेजुएशन में राजनीति शास्त्र विषय लिया था मगर वह अपने माँ-बाप की, अपने भाइयों और भाभियों की, अपने प्रेमी की, अपने सास ससुर की और अपने पति की राजनीति को भला कहाँ समझ पाई | एक बच्चे के ज़ेहन में किसी कौम के लिए ऐसी नफ़रत पैदा करके लोग किस तरह के समाज का निर्माण करना चाहते हैं, समझ नहीं पाई आयशा | सबने बेबसी का लिबास पहन रखा था l आयशा की आँखों से क्रोध का लावा फूट कर बहने लगा जिसकी तपिश में वहाँ मौजूद सभी ख़ामोशी से ख़ाक हो रहे थे | कहने और सुनने को अब कुछ नहीं बचा था l
आयशा की आत्मा लहुलुहान हो चुकी थी | क्रोध, नफ़रत, दुःख, आँसू लिए आयशा सोनम के घर से निकल गई l रास्ते में गंगा किनारे रुक गई | वह बहना चाहती थी, ज़ार ज़ार रोना चाहती थी | इससे पहले ख़ुद को कभी इतना बेबस नहीं पाया | कमर तक गंगा में प्रवेश कर उसने डूबकी लगाई और फिर अपने दोनों हाथ आसमान की ओर उठाया उस नामालूम ईश्वर से दुहाई माँगने के लिए |
आसमान में पूनम का चाँद किसी मोनालिसा की मुस्कराहट पर किसी इश्किया शाएरी के इंतज़ार में निढ़ाल हुआ जा रहा था और इधर ज़मीन पर किसी मोनालिसा की मुस्कराहट का बेरहमी से हुए क़त्ल के कारण किसी के अन्दर इश्क़ ख़ाक हो रहा था |
गंगा ख़ामोशी से बह रही थी, आयशा भी —
स्याह होते ख़्वाबों ने / उफ़क़ पर चमकते चाँद पर / आख़िरी निग़ाह डाल / जाने क्या कुछ कहा / बादलों का कलेजा मुँह को आया / और आँखों का नमक / रेत के द्वीपों में बदल गया / अब सन्नाटों का शोर है / ढहती आँखों का मलबा है / और तुम्हारी यादें हैं सोनम | ————————————
परिचय : लेखिका वरीय रंगकर्मी व रंग निर्देशक हैं. थियेटर के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम
पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर कविताएं व कहानियों का प्रकाशन
संपर्क : लेक गार्डन्स गवर्मेंट हाउसिंग, 048/4 सुल्तान आलम रोड, ब्लाक – X/7
कोलकाता – 700 033, मो.9331028531

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