एक और दीपा

  – गीता पंडित

सुनीता कहाँ हो ? कब से फोन की घंटी बज रही है, उठाती क्यों नहीं ? लेकिन सुनीता शायद बाहर बगीचे में कपड़े सुखाने चली गयी थी इसलिए सुन नहीं पायी | बाथरूम से बेड तक भागते हुए निवेदिता ने तेज़ी से मोबाइल उठाया

“हेलो”
“ओहो, तो मेम साहब आ गयीं |
फोन उठाने में भी घंटों लगाती है | क्या यार |”
“ओह!!!! अच्छा तो ये तू है |
मीतू की बच्ची फिर शुरू हो गयी |”

“और किसको एक्स्पेक्ट कर रही थीं मैडम |
हाहा हाहा, अब क्या हमें भी अपोइन्टमेंट लेना पड़ेगा बात करने के लिए |”
“हट, अच्छा काम की बात कर, क्यूँ फोन किया इतनी सुबह सुबह ?”

“लो जी दस बज रहे हैं और मैडम की अभी भी सुबह नहीं हुई |”

“नौ बजे आयी हूँ सत्रह घंटे की ड्यूटी करके |
यार पांच डिलीवरी ओपरेट कीं जिसमें से दो बड़ी कोम्प्लीकेटिड थीं |
बड़ी मुश्किल से माँ और बच्चे की जान बचा पायी |
बहुत तनाव में थी | तू तो जानती है | तू भी तो एक डॉक्टर है | खैर !!! ये तो रोजाना की बात है | तू बता ?”

“कुछ नहीं यार, जल्दी आजा दिल्ली, ‘तेरे बिना जिया लागे ना’”

“नॉट बेड … अच्छा गा लेती है |”

“यार, तुझसे मिलने को बहुत मन कर रहा है |
कल से तेरी याद बहुत आ रही थी इसलिए सुबह-सवेरे फोन कर दिया |”

“अच्छा किया | मुझे भी तेरी और घर की बहुत याद आती है मीतू |
जल्दी प्रोग्राम बनाती हूँ |”

“ये हुई ना बात डॉ साहिबा | और सुन वो तेरी कजिन है ना”
“कौन…. अपरा ….”

“हाँ वही….. उसके रिश्ते की बात चल रही है |”

“क्या? अभी से, ऐसी भी क्या जल्दी है | अभी उसकी उम्र ही क्या है |
फिर अपरा ने तो ग्रेजुएशन भी नहीं किया |”
मैं चिंतित हो गयी |

“अच्छा चल…
मैं मुम्बई से जल्दी आ रही हूँ तब बात करूँगी आंटी से |
अभी शादी कैसे की जा सकती है, बिलकुल नहीं |”

“अरे!!! सुन तो ये नहीं पूछेगी किसके साथ ?”
“हाँ, हाँ !!!! बता ना”

“तेरे बेस्ट फ्रैंड के साथ”
“मेरे ? मेरा तो एक ही बेस्ट फ्रैंड है और तू उसे अच्छी तरह जानती है |”

“हाँ !!! वही राजीव के साथ”

“क्या?
ओह!!!
नहीं …
उससे तो मैं …
अरे !!!
वो तो उससे लगभग दस वर्ष बड़ा होगा |”

“हाँ, लेकिन रुतबे और पैसे के सामने उम्र शुम्र कौन देखता है मैडम | बस अब तू जल्दी आजा,
नहीं तो…”

नहीं तो क्या ? मैं पूछना चाहती थी लेकिन शब्द गले में अटक गए |

“ओके… बाय…बाय … टेक केयर …सी यू सून |”
“ओके..”

बाय कहकर मैंने फोन तो रख दिया लेकिन मीतू के ये शब्द ‘नहीं तो’ हथौड़े की तरह मेरे दिमाग पर प्रहार करते रहे | सारी रात की जगी हुई थी तो सोना जरूरी था लेकिन मीतू की बातें सुनकर नींद आँखों से गायब हो गयी |

क्या कह रही थी मीतू !
‘राजीव से अपरा की शादी की बात चल रही है | “

यह कैसे मुमकिन है ?
नहीं.. नहीं!!!!!! ऐसा नहीं हो सकता | ऐसा हो ही नहीं सकता |

सोचते-सोचते मैं अब से लगभग दस वर्ष पीछे चली गयी |

“हाय !!!
आई एम राजीव …
राजीव कपूर एम बी बी एस फर्स्ट ईयर
एंड यू”

“मी,
निवेदिता …
निवेदिता शर्मा ,, सेम ईयर”

“ओह नाइस…
ग्लैड टू मीट यू”

वह आवाज़ अभी भी मेरे कानों में गूँज रही थी | यह राजीव के साथ मेरी पहली एक साधारण सी मुलाक़ात थी जो लखनऊ मेडिकल कालिज के पहले-पहले दिन कैम्पस में हुई थी |

अगले दिन मैं वाशरूम जा रही थी और राजीव वाशरूम से आ रहा था | कुछ सीनियर्स भी उधर से आ रहे थे बस हम दोनों को सीनियर्स ने देख लिया | वे छ थे तीन बोयज और तीन गर्ल्स |

“ए कम हीयर “
“मैं”
“हाँ तुम
और तुम भी”

मैं तो घबरा ही गयी थी लेकिन राजीव का वहां होना मुझे ढाँढस बंधा रहा था

“नए हो यानि फर्स्ट ईयर …
नाम बोलो”

“निवेदिता”
“राजीव”

“क्यूँ बंक मारने का इरादा है क्या ?
यहाँ क्या कर रहे हो ?”
“वो वाशरूम …”

शब्द जैसे हलक में अटक रहे थे |

रैगिंग के नाम पर आये दिन टी. वी. और अखबारों में इतना देखा और पढ़ा था कि डर लग रहा था | जाने क्या करवाएंगे ? कैसा व्यवहार करेंगे ?

हाल ही में रैगिंग के कारण एक इंजीनियर स्टूडेंट की मृत्यु का दृश्य आँखों के सामने घूमने लगा |

“अच्छा अभी जाओ अपनी क्लास में |
और क्लास के दौरान बाहर घुमते हुए अगर नजर आये तो तुम्हारी खैर नहीं |
ओके….”

“जी….”
हम दोनों के मुँह से एक साथ निकला | उससे पहले कि हम जाने के लिए मुड़ते फिर से उनमें से एक सीनियर ने आवाज़ दी –

“राजीव !”
“जी!”

“शाम को क्लास के बाद कैंटीन में मिलना कुछ नोट्स हैं उनकी कॉपी करनी है |
कर लोगे ना ?”

“जी सर”

“और हाँ !!!
अगर कुछ समझ ना आये, एंड यू नीड अस तो हमारे पास सीधे चले आना नि:संकोच किसी भी समय |”

“जी, सर ”

“और तुम निवेदिता यही नाम बताया था ना तुमने”
“जी ..”
“ओके..

रात को डिनर के बाद गर्ल्स हास्टल में फोर्थ फ्लोर के रूम नं 444 में चली जाना | कपड़े धुले रखे हुए हैं उन्हें आयरन (स्त्री) करनी है |
आती है ना स्त्री करनी |”
“जी, आती है |
मैं चली जाउंगी |”

मैंने धीरे से अपने आप को संयमित करते हुए कहा

“और हाँ अगर तुम्हें भी कभी भी किसी भी समय कोई परेशानी आये तो ये ऐना मेम उसे चुटकियों में सोल्व करा देंगी |
इनके पास जादू की झप्पी है | कभी भी इनके पास जा सकती हो |”

“जी..”.

“ओके… अब भागो क्लास में |”

और हम दोनों सरपट दौड़ लगाने लगे इस डर से कि कभी फिर आवाज़ ना दे लें

लेकिन उनके व्यवहार पर भी हम आश्चर्य कर रहे थे और रात को वहां जाने की चिंता भी | क्लास के बाहर पहुंचकर हम दोनों ने एक लम्बी साँस ली यह कहते हुए कि बच्चू आज तो बच गए |

फिर एक दूसरे की तरफ़ मुस्कराकर देखा और क्लास में चले गए |

इस तरह गाहे-बगाहे किसी न किसी घटना की वजह से हमारी निकटता बढ़ने लगी |

और यह निकटता प्रगाढ़ दोस्ती में परिवर्तित हो गयी जब अगले साल केवल एक दिन कॉलेज लेट पहुँचने के कारण हमें हॉस्टल नहीं मिल पाया तो मेडिकल कालेज के पास मैं मीतू राजीव और अनुजा हम चार दोस्तों ने एक चार कमरों का फ्लैट रेंट पर ले लिया जहाँ पूरे चार साल हम साथ रहे |

क्यूंकि इंटर्नशिप भी हमने वहीं से की थी | इसके बाद पुणे के सेम कालिज से हमने पी.जी. किया मैंने गाइनिक में और राजीव ने ओर्थोपेडिक्स में | यहाँ हम लगभग साढ़े तीन साल लिविंग रिलेशनशिप में रहे |

नजदीकियां बढ़ गयी थीं | सेक्स वगैहरा से कोई परहेज भी नहीं था लेकिन मैं मानती थी कि विवाह के लिए कोई क्रेज़ ज़रूर बची रहनी चाहिए और तुम इस बात के लिए तैयार हो गए |

मगर मानसिक बंधन में इस तरह जकड़ गए थे कि एक साथ खाना पीना, पढ़ना, घूमना-फिरना, रूठना मनाना, मूवी जाना, शौपिंग करना, एक दूसरे की छोटी से छोटी जरूरत का ख्याल रखना, यानि हमें एक दूसरे की आदत हो गयी इसीलिये जब पी.जी. करने के बाद मुझे मुम्बई में और तुम्हें दिल्ली में जॉब मिला तो हम दोनों को अच्छा नहीं लगा | एक अधूरापन साथ में था |

तुमने फोन पर कहा भी था |

“ये क्या हो रहा है निवी ? तुम मुम्बई में और मैं दिल्ली में |

सुनो, मैं दिल्ली छोड़कर जा नहीं सकता क्योंकि यहाँ हमारा अपना हॉस्पिटल है लेकिन तुम्हारे साथ तो ऐसा कोई बंधन नहीं है |”

“हाँ, तो …?”
“तो फिर यहीं दिल्ली आ जाओ ना |
देखो मुझे तुम्हारे बिना रहने की आदत नहीं है |”

उसकी आवाज़ लरज रही थी |

कहीं ना कहीं मुझे अच्छा लग रहा था कि वह मेरे बिना रह नहीं सकता |

दूसरी तरफ मैं उसके दर्द से दुखी भी हो रही थी |

मैं फोन पर ही रो देती लेकिन बड़ी मुश्किल से मैंने अपने आपको सँभालते हुए कहा

“मुझे भी तुम्हारे बिना रहना अच्छा नहीं लग रहा |
मैं ज़ल्दी आ जाऊँगी दिल्ली…
यहाँ सरकारी हॉस्पिटल में एक साल के लिए ही तो जॉब कर रही हूँ और तुम भी दिल्ली में लालबहादुर शास्त्री अस्पताल में एक साल के लिए जॉब कर रहे हो जो अनिवार्य है हमारे लिए |”

“हाँ वो तो आवश्यक है |”
“बस इसके बाद इस विषय पर सोचते हैं |”

और जब सोचने का समय आया तब तुम्हारे विवाह की चर्चा |
ओह!!!! यह नहीं हो सकता |
यह नहीं होना चाहिए |
यह हो भी कैसे सकता है ?

अभी कल ही तो राजीव से बात हुई थी | सब कुछ नोर्मल था |

अगर ऐसी कोई भी बात होती तो क्या राजीव मुझे बताता नहीं ?

उसकी बातों का वही पुराना अंदाज़ था जिस पर बरसों पहले से मैं फिदा थी |

क्या करूं ?
राजीव को फोन करूं क्या ?
नहीं !!! उससे पूछना शायद अच्छा न लगे
और फिर वह जाने क्या सोचेगा |
कहीं से गाने की आवाज़ आ रही है

‘ये धुंआ सा कहाँ से उठता है’

सचमुच एक घुटन थी जिसमें श्वास लेना भी मुमकिन नहीं था |

मैं निरंतर अंतर्द्वंद में फँसती जा रही थी |
लेकिन मैं इस बात को इतना तूल क्यों दे रही हूँ ?

क्या मुझे राजीव पर विश्वास नहीं है ? मैंने अपने आप से कहा ..

विश्वास ना होता तो इंटर्नशिप करते हुए लिविंग रिलेशनशिप में कैसे रहते |

फिर मेरे मन में ये उथल-पुथल क्यूँ है ?
मैं अपने आपसे प्रश्न कर रही थी |

समय निरुत्तरित था जैसा कि वह हमेशा होता है, अडिग निरीह प्राणी सा चुपचाप मेरे सामने घुटने टेककर पड़ा था |

मैं भी धीरे-धीरे चलती हुई जाने कैसे और कब ड्राइंगरूम तक आ गयी और अपने घुटने सिकोड़कर सोफे में धंस गयी |

क्या आंटी को फोन करके पूछना उचित होगा ?

नहीं उनसे भी नहीं पूछ सकती | वह जाने क्या समझेंगी | फिर क्या करूं तो ?

तभी मोबाइल की घंटी घनघना उठी |

“हेलो…”!

नमस्ते आंटी …” (अरे ये तो टेलीपैथी है | मैं अभी आंटी को ही याद कर रही थी |)

“नमस्ते”
“कैसी हैं आप ?”
“पुतर यहाँ तो सब चंगा है |
तू दस कैसी है ?”

(दिल्ली वाले मिक्स भाषा बोलते हैं हिन्दी और पंजाबी इसलिए मैंने भी ऐसा ही किया |)

“मैं भी चंगी हूँ आंटी |
कोई काम था क्या ?”

“हाँ !!! पुतर तेरे साथ लखनऊ में एक लड़का पढ़ता था राजीव”

मेरे कान खड़े हो गए |

“जी…..”.
“बस उसी के बारे में कुछ पूछना था”
“क्या ?”

“वो कैसा है ?
उसका चाल-चलन कैसा है ?”

अब क्या जवाब दूं समझ नहीं पा रही लेकिन झूठ भी तो नहीं बोल सकती |

“बहुत अच्छा लड़का है आंटी |
लेकिन आप क्यों पूछ रही हैं ?”

मैंने आख़िर पूछ ही लिया।

“वो अपनी अपरा है ना बस उसी के लिए देख रहे हैं |”

“लेकिन अपरा तो बहुत छोटी है आंटी | बारहवीं पास करने के बाद उसका मेडिकल में अभी-अभी एडमीशन हुआ है | पहले उसे एक अच्छा डॉ बनने दीजिये और फिर राजीव को तो पी. जी. किये हुए भी एक साल होने वाला है | दोनों की उम्र में कम से कम दस साल का अंतर है |”

“पुतर सीरत के आगे सूरत कौन देखता है यह कहावत तो तूने सुनी है ना |

लड़के का अपना हॉस्पिटल है यहीं दिल्ली में | उम्र का क्या है ? अपरा राज करेगी राज | वैसे भी वह हमारी इकलौती बेटी है | हमारे पास भी पैसे की कमी नहीं | वो सब भी तो उसी का है | यह बात राजीव के पिता जी अच्छी तरह जानते हैं इसी लिए रिश्ते की बात हो रही है |”

“जी… लेकिन एक डॉक्टर होने और बड़ी बहन होने के नाते मैं इतना अवश्य कहूँगी कि वह अभी अट्ठारह वर्ष की यानि बालिग़ भी नहीं हुई है | उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए तो यह अहितकर है ही उसके जीवन के विकास के लिए भी बाधक सिद्ध हो सकता है | बारहवीं पास करते ही उसे मेडिकल में लकीली एडमिशन भी मिल गया है | अभी तो उसे केवल पढ़ना चाहिए |”

“ना पुत्तर, ऐसा बिलकुल नहीं होगा | वह डॉक्टरी ज़रूर करेगी | वो पूरा परिवार डॉक्टर्स का है | क्या वो अपरा के साथ कुछ भी ऐसा होने देंगे जो उसके जीवन के लिए परेशानी का कारण बन जाए और हम भी तो उसका बुरा नहीं चाहेंगे ना | मैं जानती हूँ तू  उसे बहुत प्यार करती है इसलिए तेरी चिंता भी सही है | पर पुत्तर चिंता ना कर वाहे गुरू सब महर करेंगे |”

“जी आंटी | राजीव से आपने बात की क्या ? वह क्या कहता है ?”

“नहीं पुत्तर… अभी केवल उसके पापा से बात हुई है | मैंने सोचा पहले तेरे से पूछ लूँ क्योंकि वह तेरे साथ पढ़ता था तो तू उसे अच्छी तरह जानती होगी |”

मैं चुप थी और परेशान भी | कुछ कह नहीं पायी |

“अच्छा, अब घर कब आ रही है पुतर ?
बहुत दिन हो गए तुझे देखे हुए |
अब तो तेरा एक साल पूरा होने वाला होगा |”

“जी …

इसी हफ्ते आज गुरूवार तो हो ही गया है |”

“आजा पुतर आजा |
मिलकर ढेर सारी बात करेंगे |
अच्छा रखती हूँ फोन | जिन्दी रह |”

मेरा माथा घूम गया |

ये आज सुबह-सुबह से कैसा मज़ाक हो रहा है मेरे साथ | मैंने राजीव के विषय में इतनी शिद्दत से कभी सोचा भी नहीं क्योंकि सब कुछ बिलकुल नॉर्मल था |

कभी ज़रूरत महसूस नहीं हुई |
आज कैसी बेबसी महसूस कर रही हूँ |
राजीव के बिना तो मुझे जीना भी नहीं आता |

सच बात तो यह है कि महफूज़ चीज़ के विषय में सोचना भी क्या |

यह तय था कि हम प्यार करते हैं और एक दूसरे के साथ जीवन व्यतीत करना चाहते हैं |

हम अब इस एक वर्ष के जॉब के बाद मिलकर तय करने वाले थे कि आगे क्या करना है |

कैसे करना है |

मैं दिल्ली में शिफ्ट हो रही थी कि यकायक ये अपरा नाम का बवंडर कहाँ से आ गया और वो भी जो मेरी अपनी कजिन है |

कुछ कह भी तो नहीं सकती लेकिन इस उम्र में उसका विवाह ये तो अपराध है |

रोकना तो होगा ही |

मन भी एक पागल प्राणी है | हमेशा बात-बेबात पर प्रश्न करता रहता है | अपरा के विवाह रोकने की बात आयी तो उसने फिर प्रश्न दाग दिए |

कहीं इस वजह से तो रोकना नहीं चाह रही कि उसके विवाह की बात राजीव के साथ चल रही है |
नहीं बिलकुल नहीं | अपरा की जगह कोई भी इस उम्र में विवाह करता तो मैं वहां रुकावट ज़रूर खड़ी करती |

मुझे फिर से वही घटना याद आ रही है जो आज भी मुझे पीड़ित करती है |

मेरी एक मित्र थी जिसका नाम दीपा था पढ़ाई में अव्वल और बेहद सुंदर | लाख मना करने पर भी उसका विवाह बी. ए. करते ही एक डॉक्टर के साथ कर दिया गया जब वह केवल उन्नीस वर्ष की थी | विवाह के दो वर्ष उपरान्त वह एक बेटी की माँ बनी और पांचवे वर्ष में एक बेटे की | बेटी करीब तीन की और बेटा छ महीने का था तभी उसके पति को पीलिया हुआ और उनकी मृत्यु हो गयी |

दीपा जैसे पगला गयी | अगर उसको पढ़ने दिया जाता और असमय विवाह ना हुआ होता तो दीपा की ज़िन्दगी एक अलग कहानी कह रही होती |

यह पीड़ा दीपा जैसी हजारों लाखों दीपाओं की है | पढ़ लिखकर अपने पावों पर खड़े होना हर लड़की का अधिकार है और ज़रूरत भी |

ये माँ बाप इस बात को समझते क्यों नहीं ?
मैं चुप रहती और अंदर ही अंदर सोचा करती |

आज की बेतहाशा भागती हुई ज़िंदगी में जीवन का यूँ रुक जाना असहनीय था | मैंने उस समय अपने आप से प्रतिज्ञा की कि इस तरह के विवाह को भरसक रोकने का प्रयास करूँगी और यही अब करना है |

मेरे अंदर अब भी मंथन बराबर चल रहा है |
अपरा को मैं दीपा बनते हुए नहीं देखना चाहती |
मेरी कजिन अपरा तो मुझसे भी नौ दस साल छोटी है

और फिर जिसे मैं चाहती हूँ उसके साथ इसके विवाह की बात कैसे संभव है ?

क्या मुझे अपने प्रेम का त्याग कर देना चाहिए ?

नहीं बिलकुल नहीं | वह तो राजीव को जानती तक नहीं जबकि राजीव और मैं एक दूसरे से बेहद प्रेम करते हैं | यह तो अपने साथ ही नहीं राजीव के प्रति भी अन्याय होगा और तीनों की जिंदगी त्रिशंकु बन जायेगी जो मुझे नहीं होने देना है |

अब समझ पा रही हूँ कि मैं राजीव को कितना प्यार करती हूँ | असल में कभी सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ी लेकिन आज उसके खो जाने का भय मुझे सोचने के लिए मजबूर कर रहा है |

मैं उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती |

सच बात तो यह है कि राजीव के बिना मैं अपने अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सकती |

ओह!!!! यह कैसा दर्द है जो जिगर के पार उठता है |

मेरी आँखें मुंदती चली गयीं और मेरी देह निढाल होकर सोफे पर पड़ गयी | मैंने आँखों पर हाथ घुमाया तो पाया कि वे तो बरसाती नाले की तरह बह रही हैं | मेरा मन किया कि मैं फूट-फूटकर रो पडूँ |

तभी मेरे मन ने कहा – नहीं !!! नहीं … यह समय आंसू बहाने का नहीं है | मुझे कैसे भी करके आज ही दिल्ली जाना होगा |

यही ठीक रहेगा | नहीं तो बाद में हाथ पैर मारने से कोई फायदा नहीं होगा सारी ज़िंदगी रोने से अच्छा है कि प्रयास किया जाए और जाना जाए कि आख़िर माजरा क्या है ?

( व्हाट’स यूज टू वीप ओवर द स्पिल्ट मिल्क )

राजीव ऐसा कर ही नहीं सकता मुझे विश्वास है |
हो सकता है उसे पता ही ना हो |

रात की फ्लाईट का टिकिट नहीं मिला | सुबह की फ्लाईट से दिल्ली पहुँचने की सूचना राजीव को दे दी थी | एयरपोर्ट पर मुझे देखकर राजीव की खुशी का ठिकाना नहीं था |

कुछ क्षणों तक वह मुझे एकटक देखता रहा और फिर दौडकर उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया यह कहते हुए

“आख़िर तुम आ ही गयीं |”

हम दोनों निढाल से एक दूसरे की बाहों में झूल गए। अब हम दोनों की धडकनें आपस में बात कर रही थीं | वे गा रही थीं एक ऐसा जाना पहचाना गीत जो मीलों की दूरी पर भी मेरे अंदर हमेशा बजता रहा है |

बेसुध जाने कितनी देर तक हम यूँ ही खड़े रहे |

कितना सुकून था राजीव की बाहों में | कुछ समय के लिए सब कुछ थम गया | मैं स्वयं को भूल गयी | भूल गयी अपरा से रिश्ते की बात, वो फोन कॉल्स जो मेरे दर्द का कारण बनीं |

मैं चाहती थी कि ये पल, ये घड़ी बस यहीं रुक जाए |

लेकिन ऐसा कहाँ होता है |

अंत में मैंने फुसफुसाकर कहा-

“राजीव ! चलना नहीं है क्या |” वह हँस पड़ा |

उसकी हँसी की खनक ने मेरी सारी बेचैनी दूर कर दी | गाड़ी ड्राइव करते हुए वह लगातार बोलता रहा | मैं सुनकर भी नहीं सुन रही थी | बस एक बात व्याकुल किये हुए थी कि राजीव तो बिलकुल वैसे ही व्यवहार कर रहा है जैसे पहले करता था फिर …

“अरे !!!
मैं ही बकबक किये जा रहा हूँ
तुम भी बोलोगी कुछ
और ये बार-बार कहाँ खो जाती हो ?“

“नहीं … कुछ नहीं |
दिल्ली आकर अच्छा लग रहा है |”

“हम्म्म्म
दिल्ली आकर या मुझसे मिलकर”

जवाब में मैं मुस्करा दी |

“ठीक है मत बताओ लेकिन अब बचकर कहाँ जाओगी”

उसके शब्द आश्वस्ति दे रहे थे फिर भी मैं आश्वस्थ नहीं हो पा रही थी |

अच्छा चलो पहले घर चलकर नाश्ता करते हैं फिर मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़कर होस्पीटल चला जाऊंगा दो आपरेशन करने जरूरी हैं | इसके बाद शाम को डिनर पर मिलेंगे | खूब सारी बातें भी तो करनी हैं |

ओके…

घर पर पापा राजीव का इंतज़ार कर रहे थे | जहाँ तक होता है नाश्ता दोनों साथ करते हैं | मुझे देखकर पल भर को चौंक गए तभी राजीव ने तपाक से कहा

“पापा! ये है निवेदिता | हम दोनों पी. जी. तक एक साथ पढ़े हैं |”

“वैरीगुड”

“कल ही आप मुझसे विवाह के विषय में मेरा अंतिम फैसला जानना चाहते थे |”
“हाँ”
“तो लीजिये आपके सामने हाजिर है वो लडकी |”

पापा पल भर के लिए अवाक खड़े रह गए वह सुबह-सुबह ऐसी किसी भी बात की अपेक्षा नहीं कर रहे थे | उन्हें केवल इतना भर ज्ञात था कि राजीव किसी दोस्त से मिलने एयरपोर्ट गया है |

“ओके…

चलो अभी तो ब्रेकफास्ट करते हैं मुझे हास्पिटल में राउंड पर जाना है |

पहले ही देरी हो चुकी है |
इस विषय पर बाद में बात करेंगे |”

राजीव को पापा के इस बर्फीले जवाब की आशा नहीं थी |

उसके चेहरे की बेचैनी साफ-साफ देखी जा सकती थी | निवेदिता ने इसे भांप लिया था | वह तो पहले से ही बेचैन थी | दोनों के इस वार्तालाप को सुनकर और बेचैन हो गयी |

उसे याद आया कि आंटी ने फोन पर भी कहा था कि राजीव के पापा से बात हो गयी है |

“अरे !!!
आओ निवेदिता बेटा, बैठो नाश्ता ठंडा हो रहा है |”

अभी तक निवेदिता को विश करने का भी अवसर नहीं मिला था |

“जी …
गुड मोर्निंग अंकल |
थैंक्स…”

राजीव ने आगे बढ़कर निवेदिता के लिए चेयर बाहर की तरफ खींच दी | निवेदिता ने मुस्कराकर राजीव को देखा और थैंक्स कहकर चेयर पर बैठ गयी |

तीनों नाश्ता कर रहे थे लेकिन नीरवता दूर तक पसरी हुई थी | तभी राजीव की मम्मी गुड मोर्निंग कहती हुई डाइनिंग रूम में दाखिल हुईं |

“निवेदिता तुम आ गयीं |
सौरी !!!

एक ओपरेशन करना जरूरी था इसलिए थोड़ी देरी हो गयी |”

“इट’स ओके आंटी मैं समझती हूँ |”

“तुम इसे जानती हो |” अंकल जी ने अचरज के साथ पूछा
“हाँ !!!! बहुत अच्छी तरह |

राजीव ने कई बार इसके फोटो दिखाए हैं मुझे |

ये तो हमेशा इसकी बातें करता है | मैंने इसके विषय में इससे इतना सुना है कि लगता है मैं इसे बहुत पहले से जानती हूँ |”

निवेदिता अपनी जगह पर खड़ी हो गयी उन्होंने आगे बढ़कर उसे गले से चिपका लिया यह कहते हुए

“अब तुम आ गयी हो तो सदा के लिए आ जाओ |
यह घर तुम्हारी राह देख रहा है |”

तभी राजीव के पापा ने कहा

“और मैं …
मुझ से भी तो पूछो |”

तीनों ने उन्हें एक साथ देखा
तभी आंटी ने हँसकर कहा

“क्यूँ ?
आपकी शादी है क्या …”

सभी हँस पड़े | माहौल थोड़ा सा हल्का हो गया |

“अरे भई, आप भी तो राजीव की खुशी चाहते हैं
और राजीव की खुशी अब ये लड़की है निवेदिता |”

यह कहते हुए उन्होंने मुझे फिर से अपनी बाहों में भर लिया |

पलभर में धरती पर छाई धुंध गायब हो गयी और उदास सुबह का चेहरा मुस्कराहट से भर गया |

लेकिन यह मुस्कराहट क्षणिक थी |

अभी तो अपरा सामने थी जिसका हल भी मुझे ही ढूँढना था |

जब एक बार सोच लिया अपरा के विवाह के विषय में फिर राजीव नहीं तो घरवालों को कोई और मिल जाएगा लेकिन वह किसी भी कीमत पर ऐसा होने नहीं देगी |

फिर से एक और दीपा का जन्म नहीं होगा, यह तय है |

………………………………………………………………………………………………

परिचय : लेखिका शलभ प्रकाशन की संपादक हैं.  इनकी कहानी, उपन्यास  व काव्य-संग्रह  की 12 पुस्तकें  प्रकाशित हो चुकी है.

पता : वैशाली ,गाज़ियाबाद (उ ॰ प्र ॰)

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