लॉकडाउन

– डाॅ. सुशांत कुमार

मुनिया के बियाह वैशाख में बा, एहि ख़ातिर एकर बाबू दिल्ली कमाए गेल रहनए बिना दाना.पानी के दू दिन से घर में बंद बारन। पता न का होईए ऊ ठीक से घर आ जैतन त खेतो बेच के शादी हो जाइत। इतना बोलकर बड़की फुट.फुट कर रोने लगी। उसके आंख से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहा था। रोए जा रही थी और सरकार बहादुर को गाली दिए जा रही थी। बीच-बीच में मुनिया को भी अभागिन कहकर दुत्कार रही थी। पाँच क्लास तक पढ़ी-लिखी मुनिया अपनी माँ को दिलासा दिला रही थी, पर, बड़की है कि मानने का नाम ही नहीं ले रही थी।  अपने घर में सबसे बड़ी बहू होने के कारण गाँव-घर के लोग उसे बड़की के नाम से ही बुलाते हैं। घर-गृहस्थी के काम में एकदम निपुण। बहुत मेहनती, लेकिन एक नम्बर की झगड़ालू औरत है। इसके झगड़ा से तंग आकर महंगू कुछ दिन पहले ही दिल्ली कमाने चला गया था। ऐसे महंगू को मालूम था कि मेरे न रहने पर बड़की घर संभाल ही लेगी और कुछ महीने दिल्ली में मेहनत-मजूरी करके कुछ रुपैया-पइसा भी हो जाएगा, जो मुनिया की शादी में काम आएगा। अबकी गेंहूँ का फसल भी बढ़िया है। भगवान चाहे तो उससे भी कुछ खर्चा-पानी निकल जाएगा। चुनुआ और सुनुआ दोनों के पढ़ाई के लिए भी तो चाहिए, नहीं तो जिंदगी भर मेरे जैसे ही हार-तोड़ मजूरी करना पड़ेगा दोनों को। महंगू अपने दोनों बेटे को गांव के ही एक अंगरेजी मीडियम स्कूल में दाखिला करवा दिया है। शाम को दोनों को ट्यूशन के लिए सुरेंद्र के बेटा अनुज के यहाँ भेजता है। अनुज गाँव के बच्चे को ट्यूशन पढ़ाता है। खुद भी गांव के बगल के कॉलेज से स्नातक कर रहा है। इंटरमीडिएट में फर्स्ट डिवीज़न होने के बावजूद आर्थिक तंगी के कारण शहर के कॉलेज में नहीं पढ़ सका, लेकिन गांव में ही रहकर प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी पूरे मनोयोग से करता है। उसके मेहनत व लगन को देखकर ही महंगू अपने दोनों बेटे को उसके पास ट्यूशन पढ़ने के लिए भेजता है। महंगू कहता है कि श्गरीब का दर्द एक गरीब का बच्चा ही समझ सकता है। चुनुआ पढ़ने में कुशाग्र बुद्धि का है, लेकिन थोड़ा आलसी है। वहीं सुनुआ पढ़ाई में औसत दर्जे का है, परन्तु बहुत ही मेहनती। दोनों की जोड़ी हीरा-मोती की तरह है। आपस में खूब प्यार है दोनों भाइयों में। दोनों अपने पिता की आर्थिक हालत को बख़ूबी जानते हैं। इसलिए अनुज से प्रेरणा लेकर खूब मेहनत करते हैं। चुनुआ इस बात को लेकर परेशान रहता है कि उसकी मुनिया दीदी स्कूल नहीं जा पाती है। अपनी अम्मा से बार.बार वह मुनिया को छठे क्लास में नहीं भेजने का कारण पूछते रहता है। बड़की कभी प्यार से समझाती तो कभी झुंझला कर बोलती लड़की पराया धन होती है। पढ़-लिख ली तो इसके लिए पढ़ल-लिखल लईका कहां से खोजेंगे तुम्हरे बाबू, तु दुन्नो के पढ़ावे में ही सब जीवन बीत जाई उनकर। आजकल पढ़ल-लिखल लईका से बिआह करल आसान काम बा का घ् बाप रे! हमरे नैहर में कमलेश भइया के बेटी के बिआह रेल के डालाइवर से ठीक भेलइ त दहेज में दस लाख रूपिया अउर ऊपर से उ भरियका बुलेट मटर साइकिल भी देवे के पड़लइन।

बड़की को इस तरह गला फ़ाड़कर रोते हुए सुनकर दो.तीन टोला से औरत.मर्दए बुढ़े.बच्चे इक्कठा हो गए। कोई समझाता तो कोई ढाँढस बढ़ाता। कोई कहता कि दिल्ली में सबको कोरोना बिमारी हो गया है। आज ही टीवी में बोल रहा था।  सारा दिल्ली को पुलिस घेर लिया हैए सुना है अपने गांव को भी पुलिस घेरेगा। भगवान हो! ये विपदा से अब आप ही बचा सकते हैं प्रभु! बुढ़िया काकी बोली मुझऊसा चिनिया सब देश में अइसन रोग-बलाय फईलवले बाए हमर पोतवा के मोबाइलवा में ई सब देखवइत हई। जितनी मुंह उतनी बात। अपने घर पर भीड़ जमा देखकर चुनुआ और सुनुआ दोनों भाई जो ट्यूशन पढ़कर लौट रहा थाए परेशान होकर दौड़ते हुए अपनी अम्मा के पास पहुँचा। कुछ देर तक अम्मा को दोनों भाई चुप कराते रहाए इस बीच बड़की दोनों  बेटों को गले लगाकर और जोर-जोर से रोने लगी। उसके रोने की आवाज़ सम्पूर्ण ग्रामीण वातावरण को गमगीन किए जा रही थी। गांव की महिलाएँ भी सिसक-सिसक रोने लगी।  मुनिया कभी अम्मा को चुप कराती तो कभी ख़ुद बाबू हो….बाबू, हो….चिल्लाते हुए अपने दोनों भाइयों को गले लगाती। क्यों न रोती वह भलाए कहाँ तो अगले ही महीने रमेश के संग शादी के बंधन में बंधने के हसीन सपने लिए वह आंखें बंद करके भावी वैवाहिक सुख से रोमांचित हुए जा रही थी। आज उसके भाग फुट गएए जब बाबू ही नहीं रहेंगे तो सब सपने किस काम के, बाबू के लिए उसके मन में बहुत सम्मान है। अपनी अम्मा से भी ज्यादा। लेकिन आज अम्मा को इस तरह जार-बेजार रोते हुए देखकर उसका मन अपनी अम्मा के लिए भी पसीज गया है। यद्यपि वह और बड़की महंगू के वास्तविक हालात से अंजान हैए लेकिन अपनो के न होने पर दिल में स्याह भविष्य की कल्पना ने ही उन दोनों के जीवन में भूचाल ला दिया है। चुनुआ अम्मा को चुप कराने के क्रम में खुद भी रो रहा है, लेकिन वह और सुनुआ दिल्ली में बने हालात से परिचित है।  आज जब वह ट्यूशन पढ़ने गया था तो अनुज ने सभी बच्चों को यह कहते हुए कि कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा पूरे विश्व में है। एक-एक मीटर की दूरी पर अलग-अलग बैठाया। इसके बाद में अनुज ने वर्ग के बच्चों को देश में हुए लॉकडाउन का मतलब समझायाए साथ में इससे बचाव के उपाय भी बताए। उसने यह भी बताया कि दिल्ली सहित सभी शहरों में सरकार ने अप्रवासी मजदूरों के लिए खाने.पीने की व्यवस्था भी की है। यहाँ तक कि सरकार ने दिल्ली के मकान मालिकों से भी दो माह का किराया नहीं लेने का अनुरोध किया है। किशोर मन को तसल्ली दिलाने के लिए यह सब काफ़ी है लेकिन अम्मा को और मुनिया दीदी को कैसे समझाए। उसने सोचा अनुज सर को बुलाकर लाते हैं। अम्मा को वही समझा देंगे। तब उसके मन में यह भी ध्यान आया कि सर ने सामाजिक दूरी बनाने की हिदायत देते हुए 21 दिनों की छुट्टी  दे दी है। इसलिए वह अपनी अम्मा को आंगन में ले जाते हुए गांव के लोगों को अपने.अपने घर में जाकर रहने को कहा। कुछ लोग उसकी बात का बुरा मानते हुए उसे भला-बुरा कहते हुए चले गए तो कुछेक ने दयाभाव के साथ अपने घर को प्रस्थान किया। सबके मन में एक ही प्रश्न था महंगू अब घर लौट पाएगा कि नहीं।

अम्मा को समझा.बुझाकर दोनों भाइयों ने चुप कराया। अम्मा को देखकर मुनिया भी चुप हो गई। अपने भाइयों को देखकर उसने अपने मन को समझाया कि बाबू के लिए दोनों कोई न कोई रास्ता निकाल लेंगे।  इधर दोनों भाइयों ने आंगन से बाहर निकलकर अम्मा की मोबाइल से बाबू को फ़ोन मिलाया। फोन पर अपने बेटे का आवाज सुनकर महंगू रोने लगा। बेटा! ठीक से रहनाए मुनिया दीदी को ठीक से रखना। अपनी अम्मा को समझाकर रखना वह बहुत जल्दी परेशान हो जाती है। हाँ, सुनो मन लगाकर दोनों भाई पढ़ाई करना। देखते हो अनुज को कैसे अंग्रेजी बोलता है। वह भी गरीब का ही बेटा है। मैं दिन.रात मुनिया की शादी और तुम दोनों के लिए ही मेहनत-मजूरी करने आया था बेटा, लेकिन, कहते-कहते महंगू का गला भर आया। आवाज भारी होने लगी। चुनुआ बाबू-बाबू पुकारता रहा, पर कोई आवाज नहीं आई। सुनुआ ने जब फोन लेकर देखा तो फोन कट चुका था। उसने फिर फोन किया। दो-तीन बार लगातार घंटी जाने के बाद महंगू ने फोन उठाकर आँसु पोछते हुए बेटा, बेटा…. बोला।  सुनुआ. क्या हुआ बाबू, इतना क्यों घबड़ाए हैं। नहीं, बेटा मैं क्यों घबड़ाऊंगा, उधर से आवाज आयी। बाबू कुछ दिन की बात है आप अभी जहाँ हैं वहीं रहिए। थोड़े दिनों में स्थिति सुधर जाएगी तो घर आ जाइएगा। अपने गांव में भी बहुत काम है। सुनुआ ने कहा। अभी तो ट्रैन, बस सब बंद है। घर से बाहर निकलने पर पुलिस मारती है। ये सब तुम्हे कैसे पता है बेटा, महंगू ने पूछा। आज ही अनुज सर बता रहे थे बाबू। ठीक है अब रखते हैं अपना ध्यान रखिएगा। यहाँ की चिंता मत कीजिएगा। प्रणाम ! यह कहकर सुनुआ ने फोन काट दिया। फिर दोनों भाई आंगन में जाकर अम्मा को समझाने लगे कि बाबू ठीक हैं। वो जल्दी ही घर आ जाएंगे। तुमको चिंता करने की जरूरत नहीं है। अबतक रात के सात बजे गए थे। मुनिया खाना बनाने के लिए चूल्हे के पास बैठकर अम्मा से आराम करने के लिए कह रही थी।

फोन के कट जाने के बाद महंगू बहुत देर तक बड़की मुनियाए चुनुआ और सुनुआ के बारे में सोचते रहा। वह सोच रहा था कि मुनिया की शादी के लिए अब तो सड़क किनारे वाली जमीन ही बेचनी पड़ेगी। अच्छा बेटी की शादी में जमीन बेचने पर कोई शिकायत थोड़े ही है। हाँए चुनुआ व सुनुआ के पढ़ाई के लिए गांव में ही रहकर वह कमाएगा। सुनुआ सही कह रहा था कि अपने गाँव में भी तो बहुत काम है। यह सोचते हुए उसका मन फिर से उचटने लगा। यह सोचकर निराश होने लगा कि आखिर वह कब तक यहां इस हालात में बैठा रहेगा। कहीं वैशाख तक ऐसे ही बंद रहा तब मुनिया की शादी कैसे होगी। एक के बाद एक प्रश्न उसके मन को अस्थिर किए जा रही थी कि बिरजू ने कहा महंगू भैया! सरकार फ्री में बस से बिहार ले जा रही है। सभी आनंद विहार जा रहे हैं बस पकड़ने। क्यों न हमलोग भी घर चलें खाली बैठने से क्या फ़ायदा। आखिर पास में रुपए भी तो नहीं है। फिर पता नहीं कब तक यह फ़साद चलता रहे। चलो भैया अपने घर पर जो जुड़ेगा-मिलेगा उससे ही गुजारा कर लेंगे। अपने घर वालेए बाल-बच्चों के आंख के सामने तो रहेंगे। यहां कुछ हो भी गया तो कौन देखने वाला है हमलोगों का, बिरजू की बात सुनकर महंगू का नैराश्य मन डोल गया। वह घर जाने के लिए तैयार हो गया। एक थैलानुमा बैग जो घर से लाया था जिसमें दो कुर्ता-पायजामाए फटा गमछा, लूंगी और कुछ रुपए थे, उसे लेकर आनंद विहार की तरफ पैदल ही निकल पड़ा। आनंद विहार पहुंचने पर वह ठीक उसी प्रकार आह्लादित हुआ, जिस तरह वैष्णव देवी के दर्शन के लिए जाने वाले भक्त अर्धकुमारी पहुंचकर होते हैं। फिर बस पर सवार होकर धक्का-मुक्की करते हुए मुज़फ्फरपुर पहुंच गया। वहाँ पहुंचने पर सभी यात्रियों की तरह उसकी भी जांच हुई। जांच में कई यात्रियों के साथ वह कोरोना संक्रमित पाया गया। वहीं से सभी को जिला अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में भेज दिया गया जहां किसी को भी उससे मिलने की मनाही थी। अस्पताल के बेड पर उसके जैसे अनेक प्रवासी मजदूर जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे।  महंगू, बिरजू की बात को काल की बात मानकर पछताए जा रहा था, लेकिन अब पछताने और अफसोस करने के सिवा उसके पास उपाय ही क्या था भला! अस्पताल में भर्ती के 13 वें दिन सांस लेने में अधिक तकलीफ की वजह से उसके प्राण पखेरू उड़ गए। थाने के एक सिपाही ने उसके द्वारा दिए गए पते पर यह ख़बर सुना गया कि महंगू की मौत कोरोना से हो गई है। घर में हाहाकार मच गई। सारे गांव में यह बात बिजली की तरह फैल गई। इधर बिरजू भी कोरोना संक्रमण से ग्रस्त हो गयाए अबतक गांव में अनेक लोग संक्रमित हो गए थे। यह संक्रामक रोग महामारी का रूप ले चुका था। बड़की दहाड़ मारकर रोते-रोते बेसुध पड़ी है। मुनिया के आँखों से आँसू रूकने का नाम नहीं ले रहा है। चुनुआ और सुनुआ का भी रो.रोकर बुरा हाल हो गया है। अनुज उन दोनों को संतावना दे रहा है।

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संपर्क – असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, विश्वविद्यालय हिंदी विभाग

बीआरए बिहार विश्वविद्यालय,

 

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