विशिष्ट कहानीकार : डॉ पूनम सिंह

अनुत्तरित प्रश्न

‘‘पापा , हम मम्मी के पास कब चलेंगे , बताइये न पापा ।’’ रिम्मी के जिस सवाल से राजीव बार-बार बचने का प्रयत्न करता है वही सवाल करके रिम्मी अपने स्कूल की हर छुट्टियों में उसे एक कड़वे एहसास से भर देती है । राजीव को पता है, रिम्मी अब बड़ी हो रही है — बहुत दिनों तक अब उसे नहीं बहलाया जा सकता लेकिन वह कैसे कहे उससे कि मम्मी के पास जाने का रास्ता एक अंधेरी सुरंग से होकर जाता है , जिसे वह अपने सुकुमार पैरों से तय नहीं कर पायेगी । वह बेटी के बालों में हाथ फेरता बस इतना ही कह पाता है – ‘‘पापा का साथ क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगता बेटे ?
सात वर्ष की रिम्मी जब छुट्टियों में हाॅस्टल से घर आती है तो इतने बड़े घर का सन्नाटा उसे निगलने लगता है । अपने सहपाठियों से , मम्मी-पापा के प्यार-दुलार के ढ़ेर सारे किस्से जब वह सुनती है , तो उसके नन्हें मस्तिष्क में मम्मी को लेकर अनगिनत सवाल उठ खड़े होते हैं – सबके मम्मी-पापा साथ रहते हैं – मेरी मम्मी , पापा के साथ क्यों नहीं रहती ? क्या पापा के साथ मम्मी की कोई लड़ाई हुई है ? लड़ाई तो मुझमें और स्नेहा में हर रोज हो जाती है – हम एक दूसरे से कुट्टी भी कर लेते हैं – पर थोड़ी देर बाद ही हम एक दूसरे से बोलने लगते हैं । बिना बोले मन ही नहीं लगता । पर मम्मी-पापा की यह कैसी लड़ाई है ? पापा क्यों नहीं कुट्टी तोड़ कर मम्मी को यहाँ बुला लेते हैं ? मुझे बिना मम्मी के यह घर बिलकुल अच्छा नहीं लगता ।
बाल मन का यह अंतद्र्वद कभी-कभी पापा के सामने आक्रोश के रूप में फूटता है – ‘मुझे हाॅस्टल से यहाँ क्यों लाते हैं पापा ? — आप मम्मी को यहाँ क्यों नहीं बुलाते पापा ?’
रिम्मी जब भी इन सवालों के साथ राजीव के सामने खड़ी होती है – उसका संपूर्ण व्यक्तित्व बिखरने लगता है । वह अपनी नन्हीं सी बिटिया को कैसे बताए कि उसकी माँ को महात्वाकांक्षा की आँधी इस घर से ही नहीं , इस देश की सीमा से भी बाहर उड़ा ले गई है – जहाँ से लौट पाना अब उसके लिए संभव नहीं —।
एक साल की भी नहीं हो पाई थी रिम्मी , जब नेहा ने विदेश जाने का निर्णय एक झटके में लिया था । मंुबई के कैंसर रिसर्च इंस्टीच्यूट की तरफ से डाॅ॰ नेहा और डाॅ खन्ना को इंगलैंड जाने का आॅफर दिया गया – रिसर्च के एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए । उस दिन नेहा हाॅस्पिटल से दीवानी होकर लौटी थी । उसने राजीव को आॅफिस से ही रिंग किया था – ‘तुम आधे घंटे में अपने सभी काम छोड़कर घर पहुँचो – बहुत बड़ा सरप्राइज दूँगी ।’
राजीव तब नहीं जानता था – जिस बड़े सरप्राइज को सुनने की खातिर वह भागा-भागा घर पहुँचा था – वह उसके आशियाने पर बिजली बनकर गिरेगी । राजीव ने नेहा को बहुत तरह से समझाने की कोशिश की थी – उसने रिम्मी के प्रति माँ के दायित्वों को लेकर उसे धिक्कारा भी , लेकिन कैरियर के नशे में वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हुई । नेहा ने राजीव पर सीधा आक्षेप किया था – ‘तुम मेरे ब्राइट कैरियार को घर-गृहस्थी का हवाला देकर रौंद डालना चाहते हो – पर मैं अपने फ्यूचर को तुम्हारे इस छोटे से दायरे में कैद कर दफन नहीं करूँगी । मैंने अगर रिम्मी को जन्म दिया है तो उसके सारे दायित्वों को उठाने का सामथ्र्य भी रखती हूँ । मैं अपनी माँ के पास इसे रख जाऊँगी और जब मेरा प्रोजेक्ट वर्क समाप्त हो जायेगा तो मुझे विश्वास है – मैं इंगलैंड में ही सेटल हो जाऊँगी और अपनी बेटी को अपने पास बुला लूँगी । अगर चाहो तो तुम भी वहाँ आ सकते हो – एक इंजिनियर की कमाई यहाँ है ही कितनी ? पर तुम्हें तो कूपमंडूक बनकर जीना पसंद है ।
उस दिन राजीव भीतर तक तिरस्कृत होकर रह गया था । नेहा आया की गोद से रिम्मी को अपनी गोद में लेकर धमधमाती हुई अपने कमरे में चली गई थी ।
फिर एक लंबे समय तक दोनाें के बीच घना कुहासा छाया रहा । राजीव भीतर ही भीतर एक अव्यक्त यातना से गुजरता हुआ अपने आप से पूछता – क्या सचमुच मैं ही दोषी हूँ ? भीतर से कोई कहता – अवश्य , कसूर तुम्हारा है – तुमने उसकी इतनी बड़ी आॅपरच्यूनिटी को कोई महत्व नहीं दिया – वह अपनी प्रतिभा और लगन के माध्यम से पूरी दुनिया में अपने नाम की धूम मचा सकती है – मेडिकल साइंस के क्षेत्र में उसका कितना बड़ा योगदान होगा और तुम उससे नाराज होकर उसे साधारण औरत का दर्जा देना चाहते हो ? घर परिवार और बच्चे का वास्ता देकर बाँध देना चाहते हो ? यह संकीर्णता अच्छी नहीं राजीव – तुम्हारे प्रेम और विश्वास का संबल लेकर अगर वह आगे बढ़ेगी तो उसे कितना सुकून मिलेगा – सोचो तो जरा ।
और उसी दिन राजीव के भीतर का सारा कोहरा तेज प्रकाशपूंज से आलोकित होकर छँट गया था ।
धुंध के उस पार नेहा उसकी बाँहों में एक समर्पित पत्नी और रूठी प्रेयसी की तरह मचल रही थी – ‘मुझे कितना अच्छा लगता राजीव अगर उस दिन ही तुमने मुझे इसतरह दिल से विश किया होता ।’
राजीव ने उसे जोर से भींचते हुए कहा – नेहा ,प्लीज मत दुहराओ उस दिन की बातें । फाॅरगेट इट ।
एक महीने तक नेहा के जाने की तैयारी में राजीव बुरी तरह व्यस्त रहा । बेटी को लेकर उसने नेहा को इस बात के लिए राजी कर लिया था कि तीन वर्ष के लंबे अंतराल को वह रिम्मी के सहारे ही काट सकेगा , इसलिए उसे नानी के पास न रखकर स्वयं संभालेगा । पुराने नौकर बैजू और आया के रहते उसे कोई परेशानी नहीं होगी । उसने नेहा की आँखों में एकटक देखते हुए कहा था – ‘जब तुम नहीं रहोगी तो रिम्मी को कलेजे से लगाकर यही समझूंगा कि हमारा प्यार हमारे पास है।’
नेहा की आँखें छलछला आई थीं । राजीव ने उसे प्रोजेक्ट वर्क समाप्त करके लौट आने के लिए मना लिया था । तब उसे नहीं मालूम था कि समय की तेज धार लंगर से बंधी नाव को खींचकर जब मझधार में ले जाती है तो वह वापस नहीं आती ।
विदेश पहुँच कर आरम्भ में नेहा के फोन और मेल नियमित रूप से आते रहे । कभी-कभी वह अपने पत्रों में इतनी भावुक हो जाती कि राजीव को उसे फोन पर रिम्मी की तुतली बोली सुनाकर संयत करना पड़ता । भावनात्मक डोर से बंधा यह प्रेम राजीव को तब कितना सुखद, कितना मोहक लगता था । काश, यह सुख स्थाई हो पाता ।
पता नहीं कब ? राजीव को ठीक-ठीक याद नहीं – पर नेहा के शब्दों में अचानक भौतिकवादी यांत्रिकता की गंध को महसूस कर वह एकबारगी अपने को नितांत अकेला और पराजित महसूस करने लगा । एक मेल में नेहा ने लिखा था – ‘ राजीव , यहाँ रह कर अब मुझे महसूस होता है कि वहाँ हमारी दुनिया कितनी छोटी सी होती है – बस अपनी ही बाँहों में समा जाने भर । पति , बच्चा , घर-परिवार , हँसना-रोना , रूठना-मनाना यही तो है हमारी जिन्दगी – लेकिन डियर , जीवन एक नशा है , यह मैं अब जान पाई हूँ । मुझे स्वयं आश्चर्य होता है काम के दरम्यान कई दिनों तक मुझे अपनी भी सुध नहीं रहती – रिम्मी का भी
ध्यान नहीं आता और न ही तुम याद आते हो ।’
शायद यहीं से नेहा भावनात्मक डोर से कटकर उन्मुक्त आकाश में विलीन हो गई थी ।
राजीव को याद है , वह रिम्मी की तीसरी वर्षगाँठ थी । राजीव उसे चिड़िया घर से घुमाकर , बाहर से आइसक्रीम और केक खिलाकर बहुत प्रसन्नचित्त मुद्रा में घर लौटा था – एक प्रतीक्षित आशा के साथ कि ठीक सात बजे नेहा का फोन आयेगा । लेकिन फोन बीच रात में आया था , जिसमें बहुत थकी और बोझिल सी आवाज थी उसकी – ‘राजीव , मैं तो भूल ही गई कि आज रिम्मी का जन्मदिन है । यह तो डाॅ. खन्ना ने याद दिलाया । पहले दो बार उन्हीं के साथ रिम्मी के जन्मदिन के प्रेजेन्टस खरीदने मैं शाॅपिंग सेन्टर गई थी । शायद इसी से उन्हें याद रहा होगा । आई एम रियली भेरी साॅरी राजीव , उसे मेरा प्यार कहना । ओ. के. बाय ।’
कितनी देर तक रिसीवर हाथों में थामे राजीव चुपचाप दीवारों की तरफ एकटक देखता रहा । रिम्मी ने सोने से पहले कितना परेशान किया था उसे – मम्मा का फोन कब आयेगा पापा ? मम्मा उतनी दूर क्यों चली गई पापा ? वो कब आयेगी पापा ? मम्मा के आने पर मेला जन्मदिन बहुत धूमधाम से मनाओगे न पापा ?
हाँ बेटा अगले साल तुम्हारे जन्मदिन से पहले मम्मी विदेश से लौट आयेंगी । फिर हम बहुत धूमधाम से मनायेंगे तुम्हारा जन्मदिन , पूरे घर को जगमग बत्तियों से सजायेंगे , तुम्हारे सभी दोस्तों को बुलायेंगे , फिर मम्मी तुम्हें केक कटवायेंगी और हम सब मिलकर गायेंगे – हैप्पी बर्थ डे टू रिम्मी ।’
वह बहुत एक्साइटेड होकर पापा के गले से झुल गई थी – ’वैसा जन्मदिन आज ही मना दो ना पापा, मम्मा को बुला दो न पापा ।’
वह देर रात तक पिछले वर्ष मम्मी की भेजी गुड़िया को गले से लगा कर सुबकती रही । एकांत बचपन े के रीते मन का यह पहला हाहाकार था ।
रिम्मी की इस ऐकांतिक पीड़ा को लेकर राजीव उस दिन अपने को बहुत अव्यवस्थित और असंयत महसूस करने लगा , जिस दिन डाॅ॰ खन्ना अपने शोध कार्य का तीन वर्ष का कार्यकाल पुरा करके भारत लौट आये , पर नेहा को दो वर्ष का एक्सटेंशन और दिया गया । इंगलैंड के कैंसर रिसर्च इंस्टीच्यूट के विभागाध्यक्ष डाॅ॰ विल्सन उसके भीतर की संभावित योग्यता से बहुत प्रभावित थे । एक काॅन्फ्रेंस में वे उसे भी अमेरिका ले गये थे जहाँ उसके रिसर्च पेपर ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था । देश-विदेश के टैलेंटेड डाॅक्टर्स में डाॅ॰ नेहा की अपनी एक अलग पहचान बन गई थी । डाॅ॰ विल्सन ने उसे बाँहों में भर कर कहा था – ‘यू आर ड्रीम आॅफ माई ओपेन आइज । आई विल पुट माई आॅल एफट्र्स आॅन डेस्क टू मेक यू परफेक्ट ।’ (तुम मेरी खुली आँखों का सपना हो । अपना संपूर्ण सामथ्र्य देकर मैं तुम्हें पूर्ण करूँगा ।)
उन्मुक्त आकाश का खुला निमंत्रण वह भला कैसे अस्वीकार करती , जबकि उसके पास उड़ान भरने के लिए समर्थ पंख थे । अपनी धरती , अपना घर , अपने परिवेश का मोह उसे बाँध न सका । नेहा अनंत आकाश के अदृश्य शून्य में विलीन हो गई । राजीव मौसम के हर तेवर को देखता और झेलता रहा ।
चार वर्ष की रिम्मी को उसने कलेजे पर पत्थर रख कर बोर्डिंग स्कूल में डाला था ताकि हमउम्र बच्चों के बीच रह कर वह खुश रह सके । उसके भीतर की शून्यता कोई आकार न ले सके , पर क्या अपना सर्वांग देकर भी राजीव बेटी के उस एकांत को भर सका ? वह जब छुट्टियों में रिम्मी को लाने बोर्डिंग स्कूल जाता तो उसे खुद को बहुत तरह से संयत करना पड़ता था । नादान रिम्मी को क्या पता कि उसके धारदार सवालों से बिंधकर पापा कितने लहूलुहान हो जाते हैं ? दिन, महीने और वर्षों को पार करती रिम्मी कब राजीव की छाती तक पहुँच गई , उसे पता भी नहीं चला , पर उस दिन की घटना ने उसे अहसास दिला दिया कि रिम्मी अब बच्ची नहीं रही , बड़ी हो गई है । उसे याद है – आॅफिस से लौटने में उस दिन उसे काफी विलंब हो गया था । रिम्मी जब भी छुट्टियों में उसके पास होती है , वह भरसक प्रयास करता है कि उसका अधिक से अधिक वक्त बेटी के साथ ही बीते , पर उस दिन नये प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने के कारण उसे देर हो गई थी । बैजू शायद साग सब्जी लाने बाजार गया हुआ था । सारा घर शाम के अंधेरे में डूबा था । राजीव रिम्मी को पुकारता सीधे उसके कमरे में ही गया , जहाँ रिम्मी खिड़की के बाहर पता नहीं शून्य में क्या बुन रही थी ।
कंधे पर पापा के हाथ का स्पर्श महसूस कर उसने पलट कर देखा । उसकी आँखों से बहे आँसू उसके कपोलों पर दो लकीरों की शक्ल में सूख गये थे । राजीव सह न सका । रिम्मी को बाँहों में समेट कर बहुत कातर स्वर में बोला – ‘ साॅरी बेटे , अब कभी देर नहीं होगी । मैं जानता हूँ , अकेला घर तुम्हें काट खाता है । मुझे माफ नहीं करोगी ? प्राॅमिस , आई विल नेवर लीव यू एलोन एनी मोर ।’
रिम्मी अचानक पापा की बाँहों से छिटककर दूर हो गई और भरे गले से बोली -‘पापा ,आप हर काम के पीछे स्वयं को निमित्त क्यों स्वीकार लेते हैं ? कहीं से रत्ती भर दोषी नहीं होकर भी स्वयं को दोषी मान लेते हैं -ऐसा क्यों ? किसकी गलती को आप ढ़कना चाहते हैं पापा ! किसे हर घड़ी बचाना चाहते हैं -बताइए ?’
राजीव पहली बार उसके इस स्वर को सुनकर हैरान और परेशान होकर उसकी तरफ देखता रह गया , जहाँ एक निर्भय सत्य उसे धिक्कार रहा था , इस घटना के बाद फिर कभी राजीव ने रिम्मी के होंठो पर मम्मी को लेकर फन काढ़े हुए किसी प्रश्न को अपनी ओर फुफकारते नहीं देखा, न सुना । शायद उन अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर वह अपने ही भीतर ढ़ूढ़ने लगी थीं ।
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परिचय : डॉ पूनम सिंह
कविता व कहानियों की दस पुस्तकें प्रकाशित. अनेक पुस्तकों का संपादन
संप्रत्ति – प्राध्यापक, एम.डी.डी.एम कॉलेज, मुजफ्फरपुर
मो. – 9431281949

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