महारानी एक्सप्रेस

तारा को छोटी बहन की बातें याद आ रही थीं।
जब वे गोवा में थे वह वहाँ की औरतों को देखकर चहक उठती थी -‘माँ यहाँ तो बड़ी-बड़ी औरतें भी स्कर्ट पहरती हैं।’ उसने एक बार स्कूल में डाँस में भाग लिया था। उसे साड़ी पहराई गई थी। साडी कभी पैरों में उलझती, तो कभी कमर से फिसलती, कभी सिर का पल्लू गिरता, तो कभी कुछ और………..। उसे पता था कि बड़े होकर साड़ी ही पहरनी पड़ती है। यह सोच वह घबरा जाती कि साड़ी पहरनी होगी। पर यहाँ , गोवा में ! उसने सोचा वह गोवा में ही बड़ी होगी। पर यह संभव न था। कुछ ही दिनों में उन्हे नागालैण्ड जाना पड़ा। तारा बहुत डर गई थी, जब उसे पता चला कि उसका ट्राँसफर नागालैण्ड हो गया है। पता नहीं कैसी जगह है? कैसे लोग? पर छोटी बहन को वह जगह भी खूब भाई। घर में हर कोई कहता लडकियों को घर मे ही रहना चाहिए। बाहर मत जाओ। यह लड़कियों का काम नहीं , वह लड़कियों का काम नहीं…। पर यहाँ नागालैण्ड में! जहाँ देखों वहाँ लड़कियाँ। ठेले पर सामान बेचने वाली से लेकर रिक्शा चलाने वाली तक हर कोई…।
’दीदी यह लड़कियों का शहर है। है न ?’
तारा को लगता कि जिन जगहों को कोई नहीं जाना चाहता वे ही इतनी खूबसूरत क्यों होती है ? उसने छोटी बहन के सिर पर हाथ फेरा । छोटी बहन ने उसकी ओर आतुरता से ताकते हुए कहा-
’अब हम यही रहेंगे। हम नागालैण्ड छोड़कर नहीं जायेंगे।’
उसने भी सोचा था कि नहीं जायेंगे। सच में नही जायेंगे। इसी जगह ही रह जायेंगे जिसे छोटी बहन ‘लड़कियों का मुल्क’ कहती है। पर ऐसा नहीं हुआ । फिर से जाना पड़ा। फिर से, फिर एक नई जगह।
कटनी के रेल्वे स्टेशन पर वह पिछले दो घण्टे से बैठी है। लोहे के बक्से के ऊपर । किनारे होल्डोल रखा है। कुली अभी तक यहीं खड़ा था ,फिर अनमना सा कहीं और चला गया । दूर तक जाती रेल्वे लाईन पर बहुत दूर भाप का इंजन खड़ा है। संकराती रेल्वे लाईन के अंतिम से छोर पर बडी काली बिंदी की तरह दीख रहा है वह। दूर, बहुत दूर। काले गोले में तीन सिरों वाला राष्ट्रीय प्रतीक चमक रहा है, सफेद चमकीला। कभी -कभी धुँये और भाप का बादल इंजन से ऊपर की ओर लपकता है, एक झटके से कुकुरमुŸो की तरह। फिर इंजन के ऊपर फैलता है, धीरे-धीरे घुलता जाता है हवा में फैलकर विलीन हो जाता है। तारा के भीतर कुछ धड़क उठता है। लगता है अभी ट्रेन रेल्वे स्टेशन पर आ लगेगी। वह कुली को ताकती है। वह नहीं दिखता । इंजन यथावत खड़ा रहता है, चल पडने के भ्रम के साथ।
यह ट्रेन अपनी मनमर्जी से चलती है। कटनी से चोपन तक यह किसी का कहना नहीं मानती। कहीं भी धुँआ भाप उगलती घण्टो खड़ी रहती है। कहीं भी सरकती है धीरे-धीरे । कहीं भी ऐसे भागती है मानो कभी रूकेगी नहीं। लगता है, पता नहीं इस ट्रेन के लिए कोई सिग्नल बना भी है या नहीं ? पता नहीं यह कैसी आँख मिचौली करती है? जंगलों -पहाड़ों के बीच से भाप छोड़ती आठ डिब्बों वाली यह ट्रेन कभी भी कहीं भी दिख जाती है, गुजरती हुई , इंतजार करती हुई, धीरे-धीरे रेंगती हुई…………… । तारा को पता नहीं था कि बैढन के लोग इस ट्रेन को ’महारानी एक्सप्रेस’ कहते हैं। यह है भी महारानी। एकदम महारानी। जिसके नाक पर गुस्सा है। गुरूर है। जो खुदमुख्तार है। जब बल खाती घाटियों को पार करती है तो लगता है कितना इतराती है। जब रूठकर रूक जाती है तो कोई इसे मना नहीं पाता। वह खडी रहती है खुद में मगन, रुठी और अनमनी। जब चहक कर चलती है तो पूरी बोगी लचकती है। एक ताल में पहियों की पटरियों पर आवाज आती है। एक सी लय में हवा गुनगनाती है, ट्रेन की खिडकी दरवाजों पर अठखेलियाँ करती है। ‘महारानी एक्सप्रेस’ जब सीटी बजाती है तो जंगल की दुनिया उसे देखती है हठात, एकटक- अरे देखो वह जा रही ‘महारानी एक्सप्रेस’।
पूरी दुनिया रेल्वे स्टेशन पर ’महारानी एक्सप्रेस’ का इंतजार करती है। सिर पर जलाऊ लकड़ी का गठ्ठर रखे आदिवासी औरतें, पोटली लटकाये कोई गँवई, कोई बुड्ढा -बुड्ढी जो बहुत दिन बाद कहीं दूर-पार के गाँव जा रहे हैं, कोई तेंदूपत्ता के बण्डलों के साथ इंतजार करता जंगल का आदमी, मजदूरां का बीड़ी फूँकता झुण्ड, तो कोई ठेकेदार , कोई फड मुंशी, पीले बस्ते में फाइलें बाँधे किसी दूर गाँव के दफ्तर का बाबू , बच्चे को गोद से चिपकाये काली देहवाली गाँव की कोई औरत, कचहरी की पेशी के बाद गाँव लौटता कोई किसान, कोई एकदम अकेला गुमसुम सा नौजवान, काम की तलाश में कोई शहरी कारीगर, कंधे पर होल्डोल उठाये कोई बेचैन नौकरी पेशा शिक्षक…….कितने सारे लोग, तरह -तरह के …….सब महारानी एक्सप्रेस के इंतजार में ।
जब तारा टिकट ले रही थी तो कुली ने कहा था कि टिकट की जरूरत नहीं। ’महारानी एक्सप्रेस’ में टिकट नहीं लगता। हर कोई बेटिकट बैठता है। महारानी एक्सप्रेस हर किसी के लिए है। क्या टिकट वाले और क्यो बे-टिकट? टी.टी.ई. आता है। सवारी की हथेली पर पेन से एक निशान बना देता है । यही निशान टिकिट है। निशान के ऐवज में सवारी उसे कुछ पैसे दे देती है। टी.टी.ई. को पता है कि कौन कितने पैसे दे सकता है। लोगों को भी पता है कि किसे-कितने पैसे देने हैं। कुछ इतने फटेहाल हैं कि पैसे नही दे सकते। टी.टी.ई. उनकी हथेली पर भी निशान बनाता है । बस पैसा नहीं लेता। गरीब आदमी उसे उम्मीद से देखता है। वह उसे देख मुस्कुराता है । कभी कोई गरीब अपनी अण्टी से चवन्नी या अठन्नी निकालता है। टी.टी.ई उससे पैसा लेने से मना कर देता है। बस धीरे से उसके बायें हाथ की हथेली पर एक निशान बना देता है। फिर आगे बढ़ जाता है।
‘बड़ा भला मानुष है महारानी एक्सप्रेस की टी.टी.ई….’ कुली ने कहा। बताया कि एक आदिवासी औरत ने उसके पैर छू लिये थे। यह आठवीं बार था जो उसने उससे पैसे नहीं लिये थे। पर जो दे सकते हैं उससे वह जरूर लेता है । माँगकर लेता है। वह ऐसे लोगों को हड़काता भी है। धमकाता है कि बिना टिकिट पर फाइन कर देगा, पुलिस केस बना देगा। फिर आदमी को पैसा देना पड़ता है। कुछ लोग कम पैसे देने की बात कहते हैं। वह जानता है कि किससे पूरे पैसे लेने हैं और किससे कम। हथेली पर बना निशान आखरी स्टेशन याने चोपन तक काम आता है। कोई भी टिकिट पूछे, चाहे नया टी.टी.ई या पुलिस वाला हर किसी को हथेली का निशान दिखा दो, वह चुपचाप आगे चला जायेगा। जब रेल्वे स्टेशन से बाहर आओ, गेट पर खड़े पुलिस वाले को अपनी हथेली पर बना निशान दिखा दो, वह चुपचाप चले जाने देगा। हर कोई टी.टी.ई की तारीफ कहता है। गरीब लोग उसे बहुत बढ़िया कहते हैं। ‘तो ऐसी है हमारी ’महारानी एक्सप्रेस’’, कुली अपनी रौ में तारा को समझा रहा था। तारा को लगा पता नहीं वह कहाँ आ गई है। नागालैण्ड छोड़कर सिंगरौली आने का उसका यह निर्णय सही भी है या नहीं।
सिंगरौली में एक थर्मल पावर प्लाण्ट बन रहा है। प्लाण्ट की फाउण्डेशन पड़ गई है। पहला साइट ऑफिस बन गया है। प्रधानमंत्रीं ने इसकी आधार शिला रखी है। स्टेज एक का काम शुरू हुआ है। पेपरों मे आया है कि यह भविष्य में देश का सबसे बड़ा थर्मल प्लाण्ट होगा।
तारा के यहाँ शुरू होने जा रहे अस्पताल में स्टाफ नर्स के रूप में काम करने का ऑफर आया है। तनख्वाह अच्छी है। घर के हालात देखते हुए ही उसने यह निर्णय लिया था, कि वह सिंगरौली चली जाये। फिर यह जगह उसके घर के पास है। उसका घर पतरातू से पास है। पतरातू झारखण्ड में है। उसे यह भी लगा कि यह जगह भी ठीक वैसी ही होगी जैसी कि उसका झारखण्ड है। बहुत सी वजहें थीं कि वह चली आई। छोटी बहन और माँ को भी साथ ले आई।
स्टेशन पर ’महारानी एक्सप्रेस’ लग रही है। उसका इंजन धीरे-धीरे सरक रहा है। किसी भीमकाय तपते हुए विशाल काले आकार का वह इंजन धीरे-धीरे सीमेण्ट के प्लेटफार्म को धड़धड़ाता हुआ बढ रहा है। छोटी बहन ने पहली बार भाप का इंजन देखा। नागालैण्ड में ट्रेन नहीं है और जब वह पहली बार ट्रेन से गोवा गई थी तब वह बहुत छोटी थी। लोहे के विशाल पहियों को धक्का मारते पिस्टन और उनमें से निकलते भाप के गुबार को छोटी बहन ध्यान से देखती रही। धड़धड़ाते पहियों पर घूमते लोहे के पिस्टन और विशाल सिलेण्डर के काले आकार को देखकर पहले तो वह खुशी से चीखी पर जेसे ही इंजन ने सीटी बजाई और धुँये और भाप का गुबार छोड़ा वह डरकर तारा से चिपक गई।
…तारा को हर बात याद है। अब न वैसे भाप के इंजन रहे जिन्हे स्टेशन पर घण्टों से इंतजार करते यात्री बड़े इत्मिनान से देखते थे और न रही वैसी फुर्सतें। उन दिनों सिंगरौली में बन रहा यह प्लाण्ट एक अजीब सी दुनिया अपने में समेटे था। स्टेज एक का काम शुरू हुआ था। ट्रक और डोजर जमीन को समतल कर रहे थे। इंजीनियर प्लानिंग में जुटे थे। एक छोटा सा साइट ऑफिर था। टीन की छत वाला। उसके सामने लिखा था ष्ॅमसबवउम जव टैज्च्च्ष्। दो तरफ दरवाजे थे। पीछे पहाड़। लाइट नहीं थी। वे वहाँ रात दिन प्लानिंग करते, डिजाइनिंग करते, नक्शे तैयार करते, बहस -मुबाहिसे करते…। अक्सर देर रात उस बियावान में इस ऑफिस के भीतर से रोशनी आती थी।
…ट्रेन में वह सीट के बीच बैठी थी। छोटी बहन खिड़की पर जमी थी। माँ सामने की सीट पर बैठी थी। माँ छोटी बहन को खिडकी से दूर रहने को कह रही थी। भाप, कोयला और राख के बादल खिड़की तक आ रहे थे। छोटी बहन की आँखें इंजन के धुँये और कालिख से काली हो गई थी। ऐसा लगता मानो काजल लगाया हो। वह बार बार आँख मलती और बाहर देखती। बाहर पीछे सरकते जंगल थे। साथ -साथ चलता आकाश था। बहुत दूर धीरे-धीरे गोल घूमती एक पहाड़ी थी। फूस और खप्पर की छतें थीं, जो आहिस्ते-आहिस्ते पीछे छूट रही थीं।
तारा पल भर को खिड़की के पार देखती । एक अजीब सी आंशका से उसका दिल डूबता जाता । एक किस्म का आजनबीपन उसे घेर लेता । पता नहीं वे कहाँ जा रहे हैं ? हर बार यही होता है नागालैण्ड गई थी तब भी ऐसा हुआ था। पर इस जगह के लिए यह लगा था कि यह झारखण्ड के पास है। उसके अपने घर के पास। पर घर के पास होने का भाव भी कोई सांत्वना न देता था। दिल जोरों से धड़क रहा था। महारानी एक्सप्रेस जांक की तरह रेंगती बढ़ रही थी। घाटियों के बीच से, पथरीले पहाडों के गिर्द और कहीं-कहीं दूर तक फैले छितर जंगलों के बीच से वह बहुत आहिस्ते-आहिस्ते आगे बढ रही थी। कभी जोर की सीटी और तेज छूटती भाप के साथ वह झटके से तेज गति पकडती पर फिर थोडी देर बाद मंथर चाल चलने लगती।
तारा ने अपने आसपास नजर दौड़ाई। ट्रेन की खिड़की से लकड़ी का गठ्ठर बाँधकर लटकाया गया था। दूध के डब्बे और तेंदूपत्ता के बण्डल खिड़की की रेलिंग से बँधे ट्रेन के बाहर लटक रहे थे। साफ सुथरे कपड़े वाले थोडे़ संपन्न लोग सीटों पर बैठे थे। गाँव के लोग, कुछ औरतें और बुजुर्ग और कहीं -कहीं पूरा परिवार डिब्बे के फर्श पर ही बैठा था । एक दो औरतें और चार-पाँच आदमी संडास के पास जमीन पर बैठे थे। लगता था वे किसी एक ही गाँव के रहने वाले थे। कुली ने बताया था कि अगर सीट खाली हो तो भी वे जमीन पर ही बैठते हैं। उनके पैरों में चप्पलें नहीं थी। मैली -कुचैली, फटती और तार -तार होती सांड़यों में कुछ औरतें अपने बच्चों के साथ बैठी थीं। उनमें से कुछ ने लंबा घूँघट किया हुआ था। कुछ बूढी और जवान होती औरतों के चेहरे खुले थे। कुछ आदमी सिर्फ धोती पहरे थे, ऊपर से उघाडे तो कुछ ने बनियान पहर रखी थी। एक आदमी और एक लडका पैण्ट शर्ट पहरे थे । लडके की पैण्ट में बटन नहीं थे और आदमी की शर्ट में। पैण्ट को कमर पर सुतली बाँधकर लडके ने टिका रखा था। पिता की शर्ट बेबटन होने से सामने से खुली थी जिससे भीतर की मैली कुचैली, छिद्रयुक्त और शर्ट के बाहर पैण्ट तक झूलती बनियान दीखती थी। ये दोनों तारा की सीट के पास बीच के रास्ते में उकडू बैठे थे। फर्श पर बैठे ज्यादातर बच्चों के तन पर बहुत कम कपड़े थे। कोई रद्दी पुरानी हाफपैण्ट पहने था और बटन की जगह पिन से लगाई गई शर्ट डाटे था तो कोई बहुत छोटा पूरा तरह से नंगा किसी पुरानी फटी पुरानी कथरी या तार -तार होती चादर में लिपटा फर्श पर लेटा था तो कोई अपनी माँ की देह से चिपका टुकुर-टुकुर देख रहा था।
तारा जहाँ नजर दौडाती उसे साँवले चेहरे देखते। कोई खुशी भी नहीं थी। कोई संताप भी न था। वे चुप थे। भावहीन। पता नहीं वे कहाँ जा रहे थे ? कुछ ऊंघ रहे थे, तो कुछ बेवजह इधर-उधर देख रहे थे और कुछ की आँखें दरवाजों और खिड़कियों के पार गुजरती जाती दुनिया पर एकटक थीं। एक औरत की आँखे क्षण भर को तारा की आँखों से मिलीं। पर जैसे कुछ भी नहीं हुआ। उस तरफ खामोशी थी। उसके काले भावहीन चेहरे पर वह खामोशी अविचल थी। चेहरे पर खामोशी को पढ़ना सबसे आसान होता है । चेहरे पर खामोशी की कोई रेखा नहीं होती।
तारा ने सोना चाहा। पर नींद न आई।
सिंगरौली एक वीरान सा स्टेशन था तब। अब भी कहाँ ज्यादा आबाद हुआ। थर्मल पावर स्टेशन के बहुत से लोग इसे आबाद करते रहे हैं। आबाद करने का एक ऐसा काम जिसमें वे अनवरत लगे रहे हैं। अपने घर और जमीन की तरफ जाने के लिए वे अक्सर यहाँ इकट्ठा होते हैं। वे तमाम लोग भी जिनका जीवन बदला है, इस जगह हुई शुरूआत के साथ। वे अक्सर यहाँ दीखते हैं। दर्जनों -सैकड़ो। सैकड़ो तरह के कामों मे भिडे़ हुए। उन तमाम वीरानियों को भरते हुए जो बरसों से यहाँ डेरा डाले हुए है। जिसे तारा लगातार महसूस करती रही है। बहुत कठिन होता है किसी अनजान निर्जन जगह की वीरानी को भरना, पर बरसों से देश के कोन-कोन से आये लोग यहाँ यह करते रहे। असंख्य बार। उन प्रयासों का कहीं कोई दस्तावेज नहीं। बहुत कम कहानियाँ है जो लोग जानते हैं । उन लोगों की कहानियाँ जो तारा की तरह यहाँ आये। घबराये दिल और एक अजनबीपन के साथ इस धरती पर पैर रखे। एक अजीब से भय और संकोच के साथ इस बियावान में किसी ट्रेन या बस से उतरे और फिर चलते चले गये…और इस तरह यह दुनिया थोडा और आगे बढ गई….और एक दिन पूरे देश का सबसे विशाल थर्मल प्लांट बनी। बनी सैकडों -हजारों लोगों का घर, लाखों की आशाओं और करोड़ां की खुशियां का संसार। इन बातों का कोई हिसाब नहीं। हो भी नहीं सकता। हर जगह तमाम तरह के किस्से, तमाम संघर्ष और जुनून के वाकये जो इस जगह को एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए घटित होते रहे। जिन लाखों -करोड़ों लोगों ने इस प्लांट को खड़ा किया वे सचमुच में बेहद अलग लोग थे। जुनूनी और काम के पक्के। कुछ था, जो इस जगह के बदलने वाला था। कुछ उम्मीदें जो परवान चढ़ रही थीं।
….. दो कमरों का छोटा सा अस्पताल था। एक डॉक्टर एक नर्स, एक वॉर्ड बाय, एक मेहतर , दो कंपाउण्डर और दो चपरासी। यह पूरा अस्पताल था। यहीं पर उसे उस खामोशी के बारे में ठीक -ठीक पता चला था, जो ट्रेन की उस औरत के चेहरे पर उसने पढा था। वह चुप्पी जो महारानी एक्सप्रेस के सवार उन तमाम चेहरों पर बसी हुई थी।
’तुमने हमारी जमीन ली। हमारा घर छीन लिया। देखना एक दिन तुम लोगां को यहाँ से जाना होगा।’
वह मरीज तारा पर चीख रहा था। तारा उसके बाँये हाथ पर पट्टी बाँध रही थी। उसका नाम विशेश्वर था। पास के गाँव का है वह। मुखिया का आदमी। गाँव के दो चार घर उस पर आश्रित हैं। विशेश्वर के दूसरे भाइयों के घर। याने उन सब घरों का खर्च उसके दिये पैसों पर ही चलता है। पहले एक परिवार था पर अब सब अलग रहने लगे हैं। सब बड़े हो गये। शादी हुई। परिवार बढा। अलग होने की जरूरत थी । पर जमीन एक थी। चूल्हा भी एक। फिर एक दिन पता चला कि जमीन भी जायेगी , घर बार भी… कि प्लांट लग रहा है , सब चीज प्लांट की हो जायेगी और बदले में मिलेगा मुआवजा।
जब मुआवजा मिला तब विशेश्वर के मन में लालच आ गया । जब जमीन एक थी तो कोई विभाजन न था। सब काम करते थे। पर पैसा ? पैसा तो बंटता है । झगड़ा इसी बात पर शुरू हुआ। पर विशेश्वर से कोई पंगा नहीं ले सकता था। मुखिया के डर से हर कोई कतराता था। परिवार का हर सदस्य जानता था कि अगर लट्ठ भी चला दो ,गुप्ती-फरसा चला दो या मारपीट भी कर दो तो भी नुकसान खुद का ही है। पुलिस आयेगी, कोर्ट कचहरी होगी। पूरा परिवार तबाह हो जायेगा। फिर विशेश्वर ठहरा मुखिया का आदमी। लडना कठिन था। हक मिलना और कठिन।
एक दिन भाइयों में खूब बहस हुई। घर में कोहराम मच गया। औरतें अपने-अपने आदमियों को समझाती रहीं। वे एक दूसरे के साथ गाली गलौच करते रहे। पूरा गाँव अपने घरों दरवाजे खिडकियों की संद से झाँकता तमाशा देखता रहा। विशेश्वर ने मना कर दिया था कि वह फूटी कौडी न देगा। वे तीन भाई थे। बडा भाई शहर में था और सबसे छोटा वहीं रहता था। विशेश्वर मंझला था। बडा भाई कुछ दिनों के लिए शहर से आया था। उसी ने मुआवजे के पैसे की बात की थी। इसी पर झगडा बढ गया। छोटा भाई बहुत दिनों से खुद को जप्त किये बैठा था। उस दिन उसका गुस्सा फूट पडा। पर जानता था कि मरपीट से उसे ही नुकसान होगा। उसने कइयों के घरों को सिर्फ इसलिए बरबाद होते देखा था, कि वे विशेश्वर जैसों से लड पडे थे। वे अपने हक के लिए लडे थे और इसकी कीमत बेहद खतरनाक थी। पर उस दिन वह आपा खो बैठा था। आखिर खुद को जप्त करने की भी एक सीमा होती है। गुस्से का बाँध टूट गया। उसने पहले तो विशेश्वर का हाथ जोर से पकड लिया और फिर अपने पैने दाँत उसके हाथ में गडा दिये। विशेश्वर दर्द से कराह उठा। घाव कुछ दिनों तक बना रहा ,फिर पक गया।
’दादा हाथ सीधे रखो।’
’भगवान तुम्हें कभी माफ नहीं करेगा। याद रखना।’
विशेश्वर तारा पर गुर्राया।
तारा ने नागालैण्ड में जिस डॉक्टर के साथ काम सीखा था , वह उसे बहुत कुछ बताता था । बताता था कि नर्स वह है जो दर्द को ठीक-ठीक समझती है। जो सिर्फ घाव को या तकलीफ भर को नहीं जानती, पर उसकी वजह भी जानती है। जो ठीक -ठीक जानती है कि क्यों कोई रोता है, क्यों किसी को एकदम से गुस्सा आता है, क्यों कोई एकदम चुप हो जाता है..। इंसान , इंसान को काट खाये यह उसने पहली बार देखा। नागालैण्ड में हत्या और मारपीट आम थी। वे सीधे -सीधे हिसाब किताब कर लेते थे। पर यहाँ का आदमी। कितना मजबूर है । उसका प्रतिकार काटना है। कितना असहाय । खुद को कितना जप्त करने वाला। जो सहता है लगातार, जप्त करता है खुद को हर कदम, उससे भयावर पीड़ा भोगने वाला और कौन होगा….। जो काटने से आगे कुछ भी करने से डरता है। उसने सोचा।
तारा ने कुछ ऐण्टीबायोटिक्स विशेश्वर को दीं। विशेश्वर अब भी उस पर चिल्ला रहा था । तारा ने सोच रखा था वह सब कुछ चुपचाप सुन लेगी। एकदम खामोश। क्योंकी वह नर्स है। वह दर्द की वजह ठीक-ठीक जानती है । विशेश्वर उसके चेहरे पर प्रतिक्रिया के भाव ताडता रहा। वह तलाश में था कि तारा के चेहरे पर गुस्से या प्रतिकार की एक रेखा दीख जाये और फिर वह जी भरकर अपनी भडास निकाल ले। पर वहाँ कुछ भी नहीं था।
’…ये दो गोली सुबह, यह एक शाम को। तीन दिन बाद फिर से आना। ड्रेसि्ांंग फिर से कर दूँगी।’
विशेश्वर ने उसके चेहरे को फिर से देखा। गौर से देखा। फिर जाने लगा। जाते-जाते रुका। उसकी तरफ मुडा । कहने लगा ’हर कोई एक जेसा नहीं होता है। तुम अलग हो।’ तारा ने मन ही मन सोचा कि एक दिन ’तुम सब मानोगे ही कि हम सब अलग हैं। हम सिद्ध करेंगे कि हम और तुम एक ही हैं।कि यह दुनिया तुम्हारी -हमारी दोनों की दुनिया है…।’ उसने क्षण भर को तारा को देखा। वह अब दूसरे मरीज को देख रही थी। फिर धीरे से वहाँ से चला गया।
तारा जानना चाहती थी कि वह कौन था जिसने विशेश्वर के हाथ पर काटा। वह जो लड़ा नही, जिसका प्रतिकार सिर्फ काटना था। कौन था वह?
तीन दिन बाद विशेश्वर फिर आया । तारा ने उसकी ड्रेसिंग की । इस बार वह चुप था। वह कुछ नहीं कह रहा था।
’अब बिल्कुल ठीक हो जाओगे। पर दवा लेते रहना, पूरी लेना बंद न करना।’
विशेश्वर ने उसे दो रूपये जेब से निकालकर देने चाहे। वह मुस्कुरा उठी। उसने पैसे नहीं लिये।
’बहन माफ करना जो हमारी बात का बुरा लगा हो।’
’यह तो मेरा काम है। अक्सर लोग कहते हैं।’
’ क्या ? अक्सर लोग इस तरह का बर्ताव करते हैं..?’
’ करते हैं। कभी -कभी कोई गाली भी देता है।’
’तब तो गुस्सा आता होगा। है न।’
तारा चुप रही। डॉक्टर के पर्चे को देखती रही।
’बहन एक बात बोलूँ।’
’हाँ।’
पर्चा देखकर शैल्फ पर से दवा निकालने के काम में लगे-लगे ही तारा ने कहा।
’मैं छोटा आदमी हूँ। कभी कोई काम हो तो बताना।’
तारा चुप रही।
पता नहीं यह कैसी तो दुनिया है ? बिल्कुल अलग। औरतें हाथ में चप्पल पकड़े नंगे पैर चली जाती हैं। वे आदमियों के सामने चप्पल नहीं पहर सकतीं। उनके आदमी गाँव के बड़े लोगों के सामने चप्पल नहीं पहर सकते। गाँव के बडे लोगों के सामने आदमी और औरतें सिर्फ और सिर्फ जमीन पर बैठते हैं। एक बार एक आदमी गाँव के ठाकुर साहब के सामने कुर्सी पर बैठ गया था। उसे ठाकुर के आदमियों ने बुरी तरह से मारा और घर के बाहर फेंक आये। कुओं पर सिर्फ पण्डितों और ठाकुरों का कब्जा है। वे उन्ही को पानी देते हैं जो उनके लिए काम करते हैं। जो उनके खेतों में , घरों में, खलिहानों में जानवरो की भाँति काम में जुते होते हैं,सिर्फ वे ही पानी पा सकते हैं। एक ब्राहम्ण नौकर कुँये से पानी निकालता है और दूर से उनके बर्तनों में उँडेलता है। उलाहना देता है। कभी पानी देता है , कभी नहीं देता है । कभी किसी पोखर या नदी का पानी वे लोग ले आते हैं। हैजा और पेचिश के शिकार होते हैं। तारा को अचरज होता कि यहाँ इतना पीलिया और पेचिश क्यों होती है? पता चला यह बीमारी पण्डितो और ठाकुरों को नहीं होती। यह सिर्फ उनको होती है, जिनके हिस्से का पानी भी तय नहीं हो पाया है।
कैसी है दुनिया ? जहाँ इंसान को जानवर माना जाता है। उसे डॉक्टर की बात याद आई -’नर्स याने वह जो दर्द को जानती हो।’ तारा को पता है कि दर्द का ठीक-ठीक मतलब क्या है ? उसने सोचा वह यह जगह छोड़कर नहीं जायेगी। कभी नहीं। कभी वह साइट ऑफिस देखती, तो कभी खडे होते प्लाण्ट को। उसका विश्वास और पक्का होता जाता। वह सोचती वह कभी नहीं जायेगी। उसे अस्पताल में उन लोगां का इलाज करना पड़ता जो जहर खाकर आते थे। कई लोग सिर्फ इसलिए जहर खा लेते ताकि उनकी बात मान ली जाये। अपनी बात, अपनी आवाज लोगों तक पहुँचाने वे जहर खा लेते । खासकर सल्फास। घर परिवार के ही किसी सदस्य से लेकर गाँव मोहल्ले के किसी बड़े आदमी को धमकाने, डराने की नीयत से वे जहर खा लेते। फिर अस्पताल में पलंग पर पड़े होते। तारा उनको उल्टी करवाती। सिलाइन चढ़ाती। वे तारा से गुजारिश करते कि वह उसे बचा ले। कि उनके पास कोई और तरीका नहीं था, अपनी बात, अपनी जिद मनवाने का । कि उनका जो हक है, उसकी याद दिलाने उन्हे जहर खाना ही था। न्याय की गुहार लगाने उन्हें जहर खाना ही था। कोई और उपाय भी कहाँ था ? तारा ऐसे लोगों को भौंचक सी ताकती। उसका दिल दुःख और डर से भर उठता। कितनी नृंशस है यह दुनिया, जहाँ अपनी बात मनवाने जहर खाना पड़ता है। कितनी निरंकुश । उसे लगता कि जहर खाने वाले की बात कितनी सच्ची और तर्क संगत है, पर लोग नहीं समझना चाहते । वह धीरे-धीरे बढ़ते पावर प्लाण्ट और उसके आसपास फैले कस्बां को गौर से देखती। उसका यकीन पक्का होता जाता कि वह यह जगह छोड़कर कभी न जायेगी।
’…सर इस आदमी को अगर नौकरी मिल जाये तो पाँच लोगां का यह पूरा परिवार भूखों मरने से बच जायेगा।’
तारा ने एच.आर. के हैड से कहा था। उस आदमी का नाम दीनानाथ था। वही आदमी जिसने विशेश्वर का हाथ काट लिया था। तारा को दीनानाथ की कहानी पता चल गई थी। वह चाहती थी कि उसे प्लाण्ट में नौकरी मिल जाये। जमीन का मुआवजा विशेश्वर ने ले ही लिया था। वह अपने भाई दीनानाथ को फूटी कौड़ी न देना चाहता था। पर तारा को पता था कि परिवार के एक सदस्य को नौकरी भी मिलती है । सो वह सोचती कि यदि दीनानाथ नौकरी पा जाये तो उसके परिवार के कष्टों का भी निदान हो जायेगा। पर ये क्या? एच.आर. के हैड ने उसको बताया कि उसके परिवार के सब सहमत हैं कि दीनानाथ को ही नोकरी दी जाये, पर विशेश्वर रजामंद नहीं है। तारा ने देखा कि फाईल में विशेश्वर ने एक आपत्ति लगा रखी थी। एक दरख्वास्त। जिसमें लिखा था कि दीनानाथ को नौकरी न दी जाये। दरख्वास्त के नीचे विशेश्वर के अँगूठे के निशान थे।
एक दिन कटनी जाते वक्त ’महारानी एक्सप्रेस’ में विशेश्वर तारा को मिल गया । वह नीचे फर्श पर बैठा था। तारा को देख उसने हाथ जोड़कर उसे प्रणाम कहा। मुस्कुराया और फिर दूसरी तरफ मुँह फेर लिया। तारा उससे बात करना चाहती थी। तारा ने उसे सामने की सीट पर बैठने को कहा। पर वह फर्श पर ही बैठा रहा। तारा ट्रेन की खिड़की के पार देखने लगी। पहाड़ , घाटियाँ, जंगलों के दृश्य धीरे -धीरे पीछे सरक रहे थे। उसने आखें बंद की ।अंधेरे में उसे थर्मल पॉवर प्लाण्ट की इमारत दीखी और वह बात फिर याद आई ’वह जो दर्द जानती हो…।’ उसने चौंककर अपनी आखें खोली। विशेश्वर उसकी ओर देख रहा था। वह मुस्कुराया। वह यथावत बनी रही।
’तुमने कहा था कि मैं जो माँगूगी वह तुम मुझे दोगे।’
’हाँ दीदी। बिल्कुल। पर हम ठहरे गँवार , फटीचर । हम क्या दे सकते हैं ?’
’दे सकते हो। अपने लिए नहीं किसी और के लिए चाहिए।’
‘किसी और के लिए?’
‘ हाँ।’
‘ किसके लिए ? कौन है वह?’
महारानी एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म से सरक रही थी। तारा ने उसके धीरे-धीरे सरकते पहियों को देखा जो भाप छोडते पिस्टन के साथ भक्क-भक्क की आवाज करते धीरे-धीरे रेंग रहे थे। पूरी ट्रेन खाली हो गई थी। ज्यादातर लोग स्टेशन के मेन दरवाजे से बाहर निकल चुके थे, बस कुछ आदमियों और औरतों का एक झुण्ड दरवाजे के पास खडा था। एक बच्चा सरकती ट्रेन को देखकर हाथ हिला रहा था।
‘ हम दुनिया की फिकर करते हैं, पर अपने ही नहीं दीखते। अपनों से ही खीजते हैं, नहीं बाँटना चाहते अपना दुःख और अपनी खुशी अपनों के साथ ही।’
विशेश्वर चुपचाप खडा रहा। जाने क्या कह रही है सिस्टर दीदी ?
‘मैं तुम्हारे भाई के बारे में बात कर रही थी। तुम्हारा छोटा भाई दीनानाथ। उसका भी घर है, परिवार है। पाँच पेट लगे हैं उसके साथ। तुम उसकी नौकरी लग जाने दो। अपनी दरख्वास्त वापस ले लो।’
विशेश्वर को झटका सा लगा। उसे तमाम खयाल आये। पहले तो लगा कि हो सकता है दीनानाथ इससे मिल आया हो। हो सकता है दीनानाथ ने इससे कोई साँठगाँठ कर ली हो। वर्ना इसे क्या मतलब ? हो सकता है उस दिन जो मैं इस पर गुर्राया था, उसका बदला ले रही हो। राम जाने क्या है ? क्यों दीनानाथ के पक्ष में है ? वह आज कटनी आया था, दीनानाथ के खिलाफ थाने में रपट लिखाने। एक गवाह भी लाया था। उसे पता चला था, कि हाथ पर काटना भी अपराध है। बस उसी दिन उसने सोच लिया था कि रपट तो लिखवायेगा ही। मुखिया ने भी उसे भरोसा दिया है, कि पुलिस और वकील दोनों से बात करेगा। बस वह रपट लिखवा आये।
‘ मैंने उन औरतों के बारे में सुना है जो एक साडी खरीदती हैं और फिर उसे बीच से काट कर दो कर लेती हैं। एक हिस्सा पहरती रहती हैं और जब वह तार-तार हो जाता है तब दूसरा हिस्सा पहरने के लिए निकालती हैं। वे नदी के किनारे साडी उतारकर पानी में गले तक डूबकर नहाती हैं, क्योंकी जब घर में पहरने को एक ही कपडा हो तो कोई और उपाय कहाँ। उन लोगों को भी जानती हूँ जो सल्फास खाते हैं और उन्हें भी…जो हाथों में काट देते हैं। यह दुनिया सबकी है, सबसे मिलकर बनी है। हम इसीलिए यहाँ हैं, यह प्लाण्ट और इसके लोग ताकि दर्द को जाना जा सके और उसको खत्म किया जा सके।’
तारा ने कहा। विशेश्वर तारा को घूरता रहा। उसे उसकी बात का ओर-छोर समझ नहीं आया।उसने तारा को कुछ नहीं कहा। बस प्रणाम किया और चला गया। रास्ते भर वह तारा के बारे में सोचता रहा। उसने उसकी हर बात सुनी। उसके गुस्से को जज्ब किया। उसे दवा दी। पट्टी बाँधी। जब जब पैसे देकर उसने उसका अहसान उतारना चाहा उसने मुस्कुराते हुए मना कर दिया। पता नहीं क्यों उसे अपनी माँ याद आई जो बचपन में ही गुजर गई थी। वह भी ऐसी ही थी। हर गुस्से को जज्ब कर लेने वाली। पिता उसको मारता था, वह चुपचाप सहती, पर उसने घर को संजोया, कभी हार न मानी। जब वह गुजरी तब वह उसके पास था। छोटा भाई उसके किनारे कथरी में लिपटा पडा था। माँ को तेज बुखार था। कहते थे कि कोई लाइलाज बिमारी थी। माँ ने मरते समय उससे कहा था, कि वह सबसे बडा है। कि सबसे छोटे का ख्याल उसे ही रखना है। तब उसे मरने का ठीक-ठीक मतलब पता नहीं था। जब माँ को जलाने ले गये तब उसने दीनानाथ को अपनी गोदी में सुला लिया था। उसे बडे होने का भी ठीक-ठीक मतलब पता नहीं था। वह उस रात खूब रोया था।
कुछ दिनों बाद एच.आर. वाले अधिकारी ने ही तारा को बताया था कि उस हाथ काटने वाले आदमी को नौकरी मिल गई है। उसके बडे भाई ने अपनी दरख्वास्त वापस ले ली थी। उसे बहुत कुछ याद आया। कितने भी कष्ट हों अंत में हम ही जीतेंगे हर बार। हर बार जीतेगा प्यार। हर बार हारेगा दर्द ही। उसने सोचा।
महारानी एक्सप्रेस अब नहीं चलती। लोग अब ट्रेन के फर्श पर नहीं बैठते। अस्पताल अब इस इलाके की जीवनधारा की तरह है। हजारों लोगों को काम मिला। चीजें बदलीं। तारा यहीं रह गई। उसे कहीं नहीं जाना था।
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परिचय : तरुण भटनागर युवा कहानीकार हैं. इनकी कई कहानियां विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं.
संप्रति – मध्यप्रदेश में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के रूप में कार्यरत।

 

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