वो चालीस मिनिट
– मधु सक्सेना

तेजी से चला जा रहा था थ्री व्हीलर । उतनी ही तेजी से मीठी के विचार ।आज साथ मिला कितने दिनों के इंतज़ार के बाद ।
कनखियों से मितान को देख रही थी ।उसके कठोर हाथों को देखकर सोच रही थी इतनी कोमल कविताएं कैसे लिख लेता है वो । कुछ तो बोले मितान …जाने क्या सोच रहा ..खुद में डूबा हुआ ।मीठी इंतज़ार ही करती रही ।आखिर झटके से थ्री व्हीलर रुका तो मितान तेजी उतर गया अपना सामान लेकर । मीठी भी धीरे से उतर गई दूसरी तरफ से ।
प्लेटफार्म टिकट लेकर मितान और मीठी स्टेशन पहुंचे तब पूरे चालीस मिनिट शेष थे ट्रेन आने में ।मीठी का दिल तेज धड़कने को आतुर था । कब मितान उसे छुए और वो सचमुच सिंहर जाए ।ख्यालो में तो कई बार ऐसा हो गया कि मितान ने उसे छुआ और वो सिंहर उठी ।दिल धड़ से धड़क उठा…।
सर्दियों के दिन यूँ भी छोटे होते है । धूप उतरने लगी थी ।किरणें खम्बों और छत से गले मिल कर विदा मांग रही थी ।मीठी चाह रही थी पकड़ ले कुछ किरण और रोक ले ।पर किसी के रुके कोई रुकता कहाँ ?
मीठी कब से ऐसे किसी मौके का इंतज़ार कर रही थी कि मितान के साथ एकांत मिले और बातों -बातों में इशारा कर दे कि ……..धत्त ..…खुद ही शरमा गई मीठी । कैसे कह दे मुँह खोलकर की मितान उसे बहुत अच्छा लगता है ।उसने मितान की ओर देखा, वो नज़रे घुमा कर बैठने की जगह खोज रहा था ।अचानक उसने कहा –
‘चलो वहां बैठते है ‘
‘कहाँ’ ?
‘अरे वो दो बेंच लगी है ना एक साथ ‘
मीठी ने सहमति से सिर तो हिला दिया लेकिन उसे वो सीट पसन्द नही आई । दो बेंच के कोने में जगह थी दोनों बेंच के बीच मे काफी जगह थी । उन दोनों के बीच थोड़ी दूरी हो रही थी । मीठी चाह रही थी कि एक ही बेंच पर साथ -साथ सट कर बैठे ।
खैर ….बात तो शुरू हो ..मितान कुछ कहे तो सही ।क्या है उसके मन मे ?
कभी तो खूब बात करता है कभी एकदम ही गायब । । मीठी को याद आ रही थी मितान से पहली मुलाकात । एक ही बिल्डिंग में उनका आफिस ।अक्सर लिफ्ट में मुलाकात होती । शुरू में तो अजीब सा लगता था मितान ।लम्बा चेहरा …गोरा रंग और उल्लू की तरह गोल आँखों को कंचे की तरह घुमा के बात करता । कोई आकर्षण नही ।वो होठों से कम आँखों से ज्यादा बात करता था । मीठी ने कभी इतना ध्यान नही दिया उस पर । पर आज संसार का सबसे सुंदर पुरुष लगता है ।वो ध्यान देती भी नही अगर उस दिन वो घटना नही होती ।
बचपन से ही मीठी को किताबें पढ़ने का चस्का लगा हुआ था । घर में पूरा परिवार पढ़ने का शौकीन । सबके लिए हरेक की उम्र और पसन्द के अनुसार पत्रिकाएं घर मे आती थी । धीरे धीरे मीठी लिखने भी लगी कभी छोटा मोटा कोई लेख या कविता ।पर वो सब उसकी डायरी तक ही सीमित रह गया था ।जल्दी ही शादी हो गई ।नोकरी भी लग गई ।बच्चे ,परिवार ,नोकरी में कलम छूट गई ।उसे भी ज्यादा शिकायत तो नही थी पर कभी कभी अपनी कविताएं खो जाने का दुख भी होता पर अगले ही पल किसी न किसी काम में उलझ जाती और सब भूल जाती ।
हाँ तो घटना यूँ थी की मितान और मीठी लिफ्ट में जा रहे थे तो उसने मितान के हाथ मे कुछ किताब देखी ,तब तक वो मितान का नाम नही जानती थी । चोरी से उसने किताब का नाम जानना चाहा ।किताब का नाम आवर्त ( काव्य संग्रह ) था और नीचे लिखने वाले का नाम मितान था ।तभी लिफ्ट रुकी और लिफ्ट से बाहर निकलते हुए मितान के हाथ की किताब गिर गई ।मीठी ने तेजी से किताब उठाकर मितान को पकड़ाते हुए भी रचनाकार का फोटो देख अचरज से भर गई। फोटो मितान का ही था ।
‘ओहो तो जनाब कवि है ? ‘देखने मे तो उल्लू लगते है । ,मीठी मन ही मन मुस्कराई ।
अगले ही दिन मीठी ने मितान को फेसबुक में खोज निकाला नाम -मितान अहमद ।शहर भोपाल । रहा नहीं गया तो पढ़ने के ‍लिए मांग ली किताब । घर आकर शुरू किया पढ़ना तो पढ़ती ही चली गई ।ओह इतनी सुंदर सधी हुई कविताएं । प्रेम कविताये भी थी । जीवन की सहजता थी तो कठोरता भी ।गति थी तो ठहराव भी । जीवन के सब पहलू उन कविताओ में शिद्दत से उपस्थित थे …..
जीवन प्रेम का पेड़ है
छुपा देना नफरत की कुल्हाड़ी ..
पेड़ कटा तो कट जायेगें रिश्ते
सूख जाएगा पानी
बन्द हो जाएगी हवा
सांसो का चलना भी बंद
एक बार कटने के बाद
फिर कितना भी पुकारो ।
सिर पटको
नही उगेगा पेड़ ……
और भी बहुत सी कविताएं ।देह, प्रेम , संबंधों के ताने बाने को सहज भाषा मे पिरो दिया हो ज्यों । कुछ ही दिनों में उन दोनों की अच्छी बातचीत शुरू हो गई । कभी कभार लिफ्ट में भी भेंट हो जाती ।मुस्कराहट का आदान प्रदान हो जाता ।समाज ,परिवार ,जीवन के बारे में अद्भुत विचार थे मितान के । कब वो बहुत अच्छा लगने लगा समझ ही नही पाई ।
‘ मितान अहमद !! ये क्या नाम ?’ पूछ ही लिया एक दिन मीठी ने।
उसने बताया कि वो पहले बिलासपुर में रहते थे ।अब्बा के मित्र थे जगदीश चाचा । एक शरीर दो प्राण । चाचा के परिवार और मितान के परिवार में अलग कुछ नही था । हर त्योहार एक साथ मनाते ।कई बार तो लोग समझ नही पाते कि किस घर का कौन सा सदस्य है । उसके जन्म से ही वे इसे मितान कहते जिसका अर्थ छत्तीगगढ़ी में मित्र ,सखा, साथी होता है । घर मे भी सभी उसे मितान कहते ।अब्बू ने भी स्कूल में उसका नाम मितान अहमद ही लिखवाया । उसे भी अपना नाम बहुत पसंद है ।सब पूछते है तो मुस्करा कर गर्व से जगदीश चाचा और अब्बू की दोस्ती का ज़िक्र करता ।
सच मितान ही है वो सच्चा मित्र ,अच्छा मित्र ।
किसी भी तनाव में हो मीठी , परेशान हो ..मितान की सहज तर्क पूर्ण बात से मीठी सब भूल जाती ।
‘चाय पियोगी ‘ मितान पूछ रहा था उससे ।
‘हाँ ,जरूर ‘
मीठी ने अपने सिर को झटका ।कहाँ पहुंच जाती है वो भी । मितान के साथ स्टेशन पर वो उससे एकांत में बात करने ही तो आई थी ।मितान से भी झूठ बोला उसने की स्टेशन से होकर ही उसका घर है । इसी बहाने साथ रह लेगी वो कुछ देर मितान के ।पर भिखारने बार बार आ परेशान कर रही ।एक जाती तो दूसरी आ जाती ।
तभी बगल में एक महिला आकर बैठ गई उसके हाथ में लगभग एक साल की बच्ची थी । बच्ची ने खुश आँखों से मीठी की तरफ देखा और मुस्करा दी । वो बच्ची गन्दी सी फ्रॉक पहने हुए थी जो उससे काफी बड़ी थी बाल भी बिखरे हुए थे । माँ मजदूरिन लग रही थी । मीठी के मन मे विस्तृष्णा उतपन्न हुई ।उफ्फ …ये यहां क्यों आ गई ? मन ही न उसे बहुत बुरा लग रहा था ।
मितान चाय ले कर आ रहा था उसको दूर से ही निहारने लगी मीठी ….. मन हुआ एक फोटो लेले उसका पर संकोच हावी हो गया। सेल्फी नही ली उसने ।
मितान बगल में आकर बैठ गया और एक चाय मीठी को पकड़ा दी । कनखियों से मीठी मितान को ही देखती रही ।उँह कितना निर्लिप्त सा बैठा है तभी मीठी के हाथ की चाय छलक गई ।वो बच्ची उसे छूना चाह रही थी ।उसने हल्के गुस्से से बच्ची और उसकी माँ को देखा। माँ ने बच्ची को डांटते हुए दूर हटा लिया …पर बच्ची थी कि उसकी घड़ी छूना चाह रही थी ।कभी उसका पर्स कभी उसकी चूड़ी ।
‘सम्हालो इसे ‘
मीठी ने बच्ची की माँ को घुड़का धीरे से ।
माँ बच्ची को लेकर खड़ी हो गई ।
मीठी ने सोचा चलो बला टली….. उसने फिर अपना सारा ध्यान मितान की तरफ केंद्रित किया । ये तो कुछ बोल ही नही रहा ।मुँह में दही जमा कर आया लगता है ।चलो बात तो शुरू करे । मीठी ने मीठी सी आवाज में पूछा – ‘ तुम्हारा बेटा कौन सी क्लास में है ?
‘पांचवी में’ मीठी को पता था फिर भी बात करने के लिए पूछ लिया । यूँ तो इस पर पहले ही बात हो चुकी थी ।एक साल हो गया था उन्हें बात करते हुए । इतने दिनों में मीठी ने भी अपनी कलम उठा ली थी और कविताएं लिखने लगी थी ।
वो अपनी लिखी कविता सबसे पहले मितान को बताती । मितान के फंडे क्लियर थे । कभी कोई दुविधा नही । कविता पर उसकी जानकारी और गहराई देखकर अचंभित होती मीठी ।
अब मीठी सारा ध्यान मितान पर केंद्रित कर रही थी ।अब तक 20 मिनिट हो गए थे कोई बात ही नही हो पाई ।
कुछ याद आते ही मीठी ने बात का सिरा अपने हाथों में लेते हुए
कहा .- ‘ तुमने जो तस्वीर भेजी थी कल उनमें कौन कौन है ?
अरे वो …..मेरे अब्बू ,चाचा ,बड़े भाई और भाभी और पीछे …
मुझे पता है …तुम हो ..तुम को तो करोड़ो में पहचान लूँगी ‘
बात को अपने मतलब के करीब लाते हुए मीठी ने बीच मे ही टोक दिया ।
मितान उत्साह से बताने लगा ….’ मेरे अब्बू बिलियर्ड बहुत बढ़िया खेलते है । आफिस का काम भी देखते है ।पांचो वक्त की नमाज भी …….’
‘और तुम ?’
सुविधानुसार चलता मेरा हर काम ।(मुस्कराते हुए )
‘मुझे नही आता ये खेल । नौकरी से फुर्सत नही । दुनिया जहान के काम बने रहते हैं। अम्मी की तबियत भी ठीक नही रहती तो उनकी देखभाल भी करनी होती है। बच्चो को खुद ही पढ़ाता हूँ …कभी कभी कविता लिख लेता हूं । बस यही ….’
तुम बहुत अच्छी कविता लिखते हो…. वो तुम्हारी कविता है ना.. मन से मन की राह और देह की पगडंडी वाली..’.
मितान ने अपनी गोल आँखों को घुमा कर मुस्कराते हुए कहा ‘चर्चा करेंगे किसी दिन इस विषय पर ‘
तभी मीठी को धक्का लगा । वो औरत जिसके हाथ मे बच्ची थी फिर मीठी के बगल में आकर बैठ गई।बच्ची फिर परेशान कर रही थी ।समय बहुत कम बचा था । मीठी का दिमाग भिन्ना रहा था ।यूँ भी इतने शोर के बीच हम बात नही कर पा रहे उस पर ये फिर आ गई । मन ही मन बहुत गुस्सा आ रहा था ।साथ ही भिखारन बार बार आकर खड़ी हो जाती मांगने । उफ्फ ये लोग भी ना ….क्या करे मीठी ?
उसने फिर से बात शुरू की ।
‘अब कब वापस आओगे ?’
6 महीने की तो ट्रेनिग है ही उसके बाद कहाँ पोस्टिंग पता भी तो नही ?”
तुम्हारा परिवार ?
अभी तो सब बनारस शिफ्ट हो रहे फिर अगले सत्र पर ही निर्णय लेगें ।
अब कभी मिलना होगा तुमसे ?
कह नही सकता
मीठी उदास होने लगी ।समझ नही आ रहा ये कैसा लगाव हो गया उसे मितान से । अपना घर परिवार ,उसका घर परिवार सब तो ठीक ठाक चल रहा फिर ये कैसा लगाव की बिछुड़ने की बेचैनी होने लगी ।एक स्पर्श की चाह ।
ट्रेन आने वाली थी डिस्प्ले होने लगा ।बच्ची फिर उसके पर्स को छूना चाह रही थी ।मन ही मन चिढ़ गई पर मितान के कारण बोल नही पा रही थी ।
मितान उठ खड़ा हुआ ।उसकी नज़र डिस्प्ले पर थी ।
‘आगे आएगी बोगी ‘ कहता हुआ वो अपनी आने वाली बोगी के स्थान पर खड़ा हो गया ।मीठी भी उसके पास आकर खड़ी हो गई ।कितना कुछ कहना था उसे ।अपने अहसास ,अपनी खुशिया सब बताना था ।अब तो कुछ कहने का समय ही नही बचा ।उफ्फ क्या करे मीठी ?
तभी धड़धड़ाती हुई ट्रेन प्लेटफार्म पर आ गई । मीठी निराशा से भर गई । अचानक मितान ने उसे कंधों से पकड़ कर गले लगाया और उसका माथा चूम लिया । ‘ अच्छा चलता हूँ अपना ध्यान रखना ‘ कहता हुआ मितान अपनी बोगी में चढ़ गया ।
मीठी तो जड़ हो गई मानो ।जिस स्थिति में उसे मितान ने छुआ उस स्थिति को बदलने का ही मन नही हो रहा था उसे ।लग रहा था कि सदियों तक ऐसे ही खड़ी रहे जब तक कि मितान खुद आकर उसे न छुए ।
थोड़ी ही देर में ट्रेन चलदी ।ट्रेन की गति के साथ ही मीठी की चेतना लौटी । ये कैसा आनन्द . …? मन इतना प्रफुल्लित तो कभी नही हुआ ।संसार को भर ले अपनी बाहों में । मीठी को लग रहा था हल्की हो गई है और उड़ रही है ।सब सुंदर लग रहा था । बत्तियां …शाम का धुंधलका ,ये शोर …. ।
अचानक वो बच्ची जो मीठी का सामान खींच रही थी घुटने चलते हुए उसके पास आ गई । उसकी माँ सहमी सी दौड़ी बच्ची को उठाने तभी मीठी ने बच्ची को गोद मे उठाया और उसके गाल पर जोरदार चुम्बन लिया और बच्ची उसकी माँ को थमा कर आगे बढ़ी ही थी कि एक भिखारिन हाथ फैला कर मीठी के सामने खड़ी हो गई ।मीठी ने पर्स में हाथ डाला जो भी नोट हाथ मे आया उसे भिखारिन को सौंपा और मस्ती में आगे बढ़ गई । भिखारन और बच्ची की माँ अचरज से मीठी को देख रही थी ।
मीठी को अपने बच्चे ,पति याद आये ।आज घर जाकर सबकी पसन्द का मटर पनीर बनाउंगी मीठी ने सोचा । रास्ते से पनीर लेना है । गोलू के लिए चॉकलेट भी ।
स्टेशन के बाहर आकर उसने मोबाइल निकाला और टैक्‍सी सर्च करने लगी ।
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परिचय : लेखिका की कई कहानियां विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित है

 

मधु सक्सेना

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