इकलसूमड़े

हम सब हैरान थे । वर्मा दम्पत्ति का सदा उजाड़ और फीका सा रहने वाला मकान इस वक्त हमारे कस्बे के सबसे चतुर ठेकेदार की देख-रेख में अपना श्रृंगार कर रहा था। आज बड़े भोर चार मजदूर अचानक प्रकट हुए थे और वे बिना किसी हुकुम के इंतजार के स्वतः ही इस मकान में उगे झाड़-झंकाड़ उखाड़ने में जुट गए थे। फिर इससे फुरसत पाते ही तुरंत उनने झाड़ू उठाके मकान के छत, दीवारों से लेकर लॉन के पेड़ों पर तक जमा हो गई धूल की परत और जाले-झोंसेे हटाना शुरू कर दिया था। चारों ओर गर्द ही गर्द छा गई थी उस वक्त। गर्द के गुबार के बीच-बीच में इधर-उधर भटकते बूढ़े वर्माजी की आकृति भी झांक जाती थी ।
दस बजते बजते एक नई नकोर वाइक वर्माजी के दरवाजे पर आकर ठिठकी। गाड़ी के ब्रेक लगने का अहसास पूरे मुहल्ले को ‘कांटा लगा…’ की उस रिदम से हुआ जिसकी दर्दनुमा सिसकारी ब्रेक लगते ही वाइक में से गूंज उठती थी। हम सब खिड़कियों से झांकने लगे-इस तनहा और वीरान मकान के सामने रूकने की ज़ुर्रत और ज़रूरत भला किसको हुई !
मकान को टटोलती निगाहों से ताकता एक नौजवान वाइक को स्टैण्ड पर खड़ा करके वर्माजी के अहाते में प्रविष्ट हो रहा था, जिसे वर्माजी ने आगे वढ़ कर रिसीव्ह किया था और अब अपने साथ भीतर ले जा रहे थे । बाद में निगम साब ने बताया यही है हमारे कस्बे का नया और चतुर ठेकेदार-वरदान कपूर ।
वरदान कपूर घूम-घूम कर वर्मा साब का मकान देखने लगा। दूर से दिखाई दे रहा था कि वह वर्माजी से लगातार डिस्कस भी करता जा रहा है।
मोहल्ले की औरतों में उत्सुकता बढ़ी। कई घरों के फोन बजे।
बाहर कई महिलाऐं इकट्ठी हुईं तो उनकी खुसर-पुसर आरंभ हुई ।

घर लौट कर सत्या बोली-‘ सुना है इनके अमरीका वाले बेटे आ रहे हैं ।‘
मेरा भी ऐसा ही अनुमान था, लेकिन सुना तो महिलाओ की भीतरी बातचीत का तन्त निकालने की गरज से पूछा-‘ वे तो हर दो साल में आते हैं । लेकिन इधर झांकते ही कहां है ? उधर दिल्ली और भोपाल में रहके लौट जाते हैं ।‘
‘सुना है इस दफा घर पर ही रूकेंगे। कई दिन के लिए आ रहे हैं , सो यहीं कस्बे में रहेंगे और अपने बचपन के संगी-साथियों केे बीच फुरसत में बैठ के दुख-सुख की बातें करेंगे।‘
हर कस्बे की तरह हमारे कस्बे में भी घरेलू औरतों का सूचना तंत्र बड़ा सशक्त और विश्वस्त है, ऐसा अदृश्य और अनचीन्हा कि वे चाहे घर से भी न निकलें, लेकिन दुनिया जहान की सारी बातें घर बैठे उन्हे पता चल जाती हैं ।
सांझ तक इस ‘ गृहणी संचार सेवा ‘ की बदौलत कई बातें पता चलीं।….अमेरिका में रहने वाले दोनों बेटे पन्द्रह दिन के लिए इस बार अपनी जनम भूमि में रहने का विचार बना के आ रहे हैं !…मकान की मरम्मत और रंग रोगन कराने का निर्देश बड़े बेटे ने ही दिया है ।…..कहा है बताते हैं कि पूरा घर एयरकंडीशंड करा लो ।……एकोमोडेशन कम हो तो जितनी जल्दी हो सके, दो चार नये कमरे बनबा लो ।….खर्च के लिए एडवांस पैसा भेज दिया है-डॉलरों मेे ।
निगम भैनजी ने सूचना विस्फोट की शृंखला में बताया था कि एक डॉलर के बदले पूरे उनचास रूपया आते हैं, अमरीका से अगर पांच हजार हजार डॉलर भी भेजे गये होंगे तो इंण्डिया आकर पूरे दो लाख पैंतालीस हजार रूपये हो गये होंगे ।
सूचनाऐं तो और भी थीं । मसलन-
….इतनी जल्दी नये कमरे बनाने की मना करदी है ठेकेदार ने ।
…रूई की जगह डनलप के गद्दे खरीदे गये हैं हर बिस्तर पर ।

….पाखाने में पानी की टोंटी की जगह कागज के रौल लगवा रहे है वर्माजी , क्योंकि उनके विदेश में जनमे नाती-नतोलों को पानी लेने की आदत नहीं है ।
….घर में विदेशी पद्धति के बाथटब और लेटिन पॉट लग रहे हैं ।
….पता लगा कि पूरा घर बाहर से भीतर तक पैन्ट-वार्निस से पुत रहा है ।
कॉलोनी में हम सब लोग मध्यवर्गीय वित्तीय स्थिति वाले थे। सबके हौसले थे कि अपनी तो जैसे-तैसे गुजरी , आगे की पीढ़ी तनिक ठीक से पढ़-लिख कर कोई ऊंचा रोजगार ढूढ़ ले तो जिंदगानी सुधर जाए। इस कारण दर्जन भर लड़के कोटा में रहकर आईआईटी के लिए कोचिंग कर रहे थे और दो दर्जनसे ज्यादा लड़के-लड़कियां पीएमटी की कोचिंग के चक्कर में दिल्ली मे ंबालिश्त भर के कमरों में रहते सात सौ रूप्ये माहवार की टिपन सेवा की बेस्वाद और बासी रोटी निगल कर अपनी और मां-बाप की आंखों में पलते सुनहरे सपनों के सच होने के इंतजार में थे ।
रजनीश का आगमन हम सबके मन को हरषाने वाला बन के आया । हम सबने सुन रखा था कि अमेरिकी सरकार ओर वहां का फोर्ड फाउण्डेशन भारत वर्ष के प्रतिभाशाली किशोरों को छात्रवृत्ति देकर अपने देश में तालीम दिलाता है और बाद में नौकरी भी। हमने सोचा-चलो रजनीश जी से इस बारे में कुछ और जानकारी ली जाय, शायद उनका कही कोर्इ्र परिचय हो तो
अपने बेटे-बेटियों में से किसी के भाग जाग जायें और भविष्य में उनकी बदौलत हम भी उस सुख को भोगें जो वर्मा दादी और वर्मा बब्बा भोग रहे हैं आज ।
वर्मा बब्बा का सुख !
यह याद आते ही बहुत कुछ याद आया। हम तब नये-नये इस कॉलोनी में आये थे, तो सबसे दीन-हीन आदमी लगे थे वर्माजी। न ढंग का खुला, चौड़ा, लिपा-पुता मकान न साफ उजले कपड़े। सब कुछ पुराना घिसा-पिटा और जीर्ण-शीर्ण। इकलसूमड़ा सा वास था उनका। न कोई आता न जाता। वे भी किसी के यहां न जाते। मोहल्ले के ब्याह-शादी निकल जाते, तीज-त्यौहार बीत जाते, लेकिन वर्मा लोगों का घर भला और वे दोनों भले-न ऊधो का लेना न माधो का देना !
बाद में किसी से पता लगा कि जैसे दिखते हैं, वैसे गरीब और निराश्रित नहीं है वे दोनों। तीन संतानें हैं-तीनों विदेश में हैं। सुना कि हर महीने दोनों बेटे इतना पैसा भेजते है कि चाहंे तो राज के राम करें बुढऊ ! लेकिन शुरू से कॉलेज के प्रोफेसर रहे सो सादा जीवन उच्च विचार का फार्मूला अपनाया उन्होने, आज भी वही अपनाए हैं। अपनी पैन्शन से गुजारा करते हैं, बेटों का धन छूते तक नहीं। फिर भी मन में तमाम प्रश्न थे-ऐसे आदमी के घर उस जमाने में ऐसे दूरदर्शी बेटे कैसे जनम गये ? जो न केवल प्रतिभाशाली थे, बल्कि अपने कैरियर के प्रति भी इतने जागरूक थे कि प्रोफेसनल कोर्स पूरा करते ही विदेश का रास्ता पकड़ गए। किसने सिखाया होगा उन्हे विदेश जाने के मौकों की जानकारी करना, ऐसे दुर्लभ मौकों पर टकटकी लगाए बैठे रहना और सही वक्त पर अवसर पहचान कर अपना ठांव छोड़ के हवा में छलांग लगा देना ।
हवा ! हां हवा में ही तो छलांग लगाना होता था यह। जहां कल का पता न हो, जहां रिश्तेदार-गोतिया तो दूर रहे जाति-विरादरी का भी कोई आदमी न हो, और न हो कोई हितू पड़ौसी। पूरी जिंदगानी का खतरा उठाए ,पीठ पर बिस्तर बांध कर यूरोप भर में बदनाम अमरीका के लिए अपना घर छोड़ गये थे वे दोनों भाई ।
अपने प्रश्नोें के अनेक उत्तर भी मिले थे हमे तब। कोई कहता था कि मां-बाप की कंजूसी और पढ़ने के लिए उन पर की जाने वाली दिन रात की सख्ती से उकताए बच्चों को अपना कस्बा और प्रदेश ही नहीं देश छोड़ जाना अच्छा लगा ; तो किसी का कहना था कि बच्चों ने जब अपने मां-बाप को संतान की तालीम की खातिर तपस्वियों की तरह हर स्वाद, हर सुख, हर मनोरंजन और हर लालसा को दबा देने के लिए इतना समर्पित देखा तो उन्हे खुद ही ऊंचा और ज्यादा ऊंचा उठने की प्रेरणा मिली और वे ऊंचे उठते गए और उस देश , उस नौकरी और उस स्टेटस पर जा बैठे , जहां पहुंचने की हर बेटा ख्वाहिश करे, हर मां-बाप प्रार्थना करे ।
हमारे सामने ही एक बार ऐसा मौका आया कि बूढ़े-बुढ़िया के लिए बेटों ने बीजा लेकर भिजवा दिया । अब समस्या यह थी कि ऐसे अविश्वासी आदमी लोग अपना मकान किस के भरोसे छोड़ें…? बहुत सोच-विचार हुआ तब एक नौकर को घर की चाभी देकर वे लोग परदेश जाने को तैयार हुए । हम सब उनके विदेश जाने के एक दिन पूर्व उन्हे विदा देने घर पर गये तो उनने खड़े-खड़े ही बात की न किसी से बैठने को कहा न कोई आवभगत की। बातचीत के दौरान जब हमने उनके त्याग और तपस्या की सराहना की तो उनने हम सबको कम शब्दों में अपनी संघर्षगाथा सुना डाली। पता लगा कि जिस दिन से वर्माजी के बेटांे ने पांचवीं कक्षा पास की, उसी दिन से वर्माजी के घर से मनोरंजन के सारे साधन हटा दिये गए थे। घर मंें न कोई अखबार आता था, न बेकार बात करने वाला कोई आदमी या वर्माजी के कॉलेज का छात्र। वे कॉलेज से पढ़ा कर लौटते तो सब कुछ भूल जाते । कभी किसी मेले-ठेले में नहीं गये वे उन दिनोें। मंदिर और पूजा पाठ से भी दूर हो गये थे वे उन बरसों में। अपना प्रिय टांजिस्टर भी वर्माजी ने अपने एक दोस्त को दे डाला था। उनके घर में सिर्फ पढ़ाई का माहौल था,…पति-पत्नी भी आपस में बातें करते थे तो बच्चों की किताबों में आने वाले प्रश्न और उत्तरों के बारे में । बच्चों के साथ दोनों जन सुबह चार बजे उठ जाते और बैठे-बैठे अपने बच्चों को पढ़ता हुआ देखते , मानों उन्हे भी कोई इम्तहान देना हो। गल्ती से कभी कोई रिश्तेदार आ जाता तो वर्माजी की पत्नी उसे जल्द से जल्द टरका देती, समय खराब न हो इस चिन्ता से कभी किसी ब्याह-शादी तक में नहीं गये वे उन दिनों । बच्चों के भविष्य के लिए हर रिश्ता-नाता, हर शौक और सारी पूजा-रचा तक बलिदान कर दी उनने और कभी इस बात की चिन्ता नहीं की कि इस तरह वे धीरे-धीरे सबसे कटते जा रहे हैं…और तब से ऐसी आदत पड़ गई है कि सारे शौक-अहबाबोें से मुक्त रह कर अकेले रहने में ही अच्छा लगता है । खुल कर बोले वर्माजी कि अब चाहे लोग हमे कंजूस कहें , चाहे एकाकी रहते भूत-परेत।
उस दिन हम लौट आये , इतना और जान कर कि उनके बड़े बेटे का नाम डॉक्टर रजनीश है, जो कि न्यूजर्सी में किसी अस्पताल में चिकित्सक है और वहीं उसकी बीवी भी गायकोनोलॉजिस्ट है, जबकि छोटा बेटा मनीष कनाडा में साइकिटिक है जो अपनी स्वतंत्र सलाह ऐजेंसी चलाता है ,और उसकी पत्नी वहां एक कॉलेज में प्रोफेसर है। अब जा रहे हैं तो मां-बाप दोनों बेटों के पास छैः-छःै महीने रूकेंगे और जम गया तो हमेशा के लिए वहीं रमजायेंगे । रह गया यह मकान सो वे जिस दाम में बिका इसे तत्काल बेच देंगे, क्योंकि अमेरिका तो स्वर्ग है, जहां न धूल-धक्कड़ है न कोई वायरस या वैक्टीरिया…, दुनिया की हर बुरी और दुख दायी चीज नदारद है वहां से।
लौटते में हम सब मन-ही-मन वर्मा साहब के मकान की कीमत का अनुमान लगा रहे थे, कि कदाचित उनने यह मकान बेचा और हमको मौका मिला तो हम कितने में खरीद सकते हैं ।
तीन महीनों में ही बूढ़े-बुढ़िया घर लौट आये तो हम सब चकित थे। इन तीन महीनों में नक्शे बदल गये थे उन दोनों के । बदन गदरा गये थे और चेहरे पर चिकनाई के साथ एक सुर्खी सी उभर उठी थी यकायक ।
हम सब मिलने गये तो वर्मा बब्बा हमेशा की तरह बाहर ही उठ आये और बाहर खड़े-खड़े ही उनने हमे अमरीका के अनुभव सुनाना शुरू कर दिया….कि कैसे वहा एक डॉलर में पांच लीटर फ्रूट जूस मिलता है……कि वहां कैसे हर आदमी की अपनी कार है…..कि वहां कैसे सूखे और हरे मेवो की डलिया की डलिया माटी के मोल कॉलोनी के हर नुक्कड़ पर बिकती है । भारत से नया और अलग बताने के जोश में वे यह भी बताते चले गए कि किस तरह वहां बूढ़े लोगों की अलग बस्ती है, जिसमें सण्डे के सण्डे बेटे-बहुऐं अपने घर के बड़े-बूढ़ों से मिलने आते रहते हैं …..कि कैसे वहां ज्यादा दिन तक किसी भी उमर के आदमी को बेकार नही बैठने दिया जाता……कि कैसे उनके बेटे-बहू सुबह से लेकर देर रात तक व्यस्त रहते हैं और वीकएण्ड के अलावा उनसे मिलना-बतियाना हो ही नहीं पाता था…कि कैसे उन्हे कुछ दिन बाद ही अपने देश की याद आने लगी और कैसे घर लौटने की इच्छा प्रकट करने पर बेटों ने सहज भााव से उनके लौटने की व्यवस्था कर दी थी।
अलबत्ता वे तब से अपने देश की संयुक्त परिवार प्रथा के गुण गाने लगे हैं । कभी कोई भूला-भटका उनके घर पहुंच जाए या पैन्शन लेने को निकले वर्माजी से स्टेट बैंक में बतियाने लगे तो वे मशवरा देते थे कि बच्चों की खातिर काहे को अपनी जिन्दगी कुर्बान कर रहे हो, उमर बीत जाएगी तो दुनिया का हर सुख तुम्हारा मुंह चिढ़ाएगा और तुम जिनके लिए ये सब कुछ कर रहे हो वे लोग अपने घर-गृहस्थी में रम जाऐंगे। ये पंछी जिस दिन उड़ना सीखेंगे हर समझदार परिन्दे की तरह अपना घोंसला अलग बना लेंगे-दुनिया का यही चलन है! तुम बुढ़ापे में तकलीफ भोगोगे, जवानी में तो भोग ही रहे हो कम खाकर, कम सोकर और मोटा-सोंटा पहन कर, और ऐसे में हम जैसे लोग द्वंद्व में पड़ जाया करते हैं कि बच्चों की खातिर अपना वर्तमान स्थगित कर देना सही है या अपने सुखो ंके साथ सहज तरीके से बच्चों का पालन-पोषण करना ।
लेकिन जब हमने वर्माजी के दोनों बेटों के ऐसे ठाठ देखे तो हम फिर उस आकर्षण में बंध गये जिसमें हमारे जमाने का हर बाप बंधा हुआ है ।

अकूत सामान से भरी तीन नई नकोर कारें वर्मासाहब के द्वार पर आकर रूकी ंतो मोहल्ले भर के दरवाजों-खिड़कियों पर लोग लद आये ।
कारों सेें जेवरों से लदी प्रौढ़ वय की तीन खाई-अघाई, औरतें निकलीं और अपनी जगह पर ही खड़ी होकर एक अभिमान भरी अदा से मोहल्ले के सारे मकानों पर नजर डालने लगीं । महिलाओं ने गौर किया कि उनमें से दो ने तो अपनी साड़ी के पल्लू खींच कर माथे पर रख लिए थे जब कि तीसरी वैसी की वैसी खड़ी रही और उसका पल्लू टाइट ब्लाउज के बीचों बीच से होता हुआ कंधे से होकर पीछे बेध्यानी लटकता रहा। उनके पीछे तीन जैंटलमैन उतरे और अजनबियत भरी निगाहो ंसे चारों ओर ताकने लगे । कार में से निकले किशोरावस्था के पांच छै बच्चे कुछ अजीब सा शोरगुल करते वमोजी के अहाते का दरवाजा खोलकर घर में जा घुसे थे, और मोहल्ले के लोग अंदाजा लगा रहे थे कि इकलसूमड़ी सी रहती वर्मा दादी इस शोरगुल से उत्तेजित होकर अभी नाराज होती बाहर निकलेंगी ।
लेकिन सबके अनुमानों को ध्वस्त करते वर्माजी क्षण भर बाद ही अपने चेहरे पर ढेर सारी खुशी लादे अहाते के दरवाजे को तेजी से पार करते बाहर आते दिखे , जिनके पीछे लगभग दौड़ती हुई सी वर्मा दादी आ रही थीं । कार से उतरे तीनों जोड़ों ने वर्माजी के पांव छुए । माताजी के पांव छू कर वे सब भीतर चले गए ।
खिड़कियों से झांकती महिलाओं के परस्पर इशारे हुए । प्रश्न उछले । उत्तर न जानने का संकेत देते कंधे उछले । आंखें सिकुड़ीं । फिर एक-एक करके वे सब अपने द्वार खोलकर बाहर निकलने लगीं । पुरूष लोग भी उदासीन से बने बाहर आये तो बातों का दौर चल पड़ा । किसी ने बताया कि इन महिलाओं में सिर पर पल्लू लेने वाली दोनों औरतें बहुऐं हें और तीसरी वर्मा जी की बेटी है । तीनों स्टेटस् में रहती है । इन सबके ही आगमन की प्रतीक्षा थी इतने दिनों से । इन्ही के लिए वर्माहाउस तैयार हो रहा था । कल सुबह दिल्ली आकर उतरे होंगे और नई कारें खरीद कर कल सांझ ही चले होगे ये सब दिल्ली से ।
यकायक जाने क्या हुआ कि तीनों पुरूष वर्माजी के घर में से बड़बड़ाते हुए बाहर निकल आये थे, जिनके पीछे तीनों महिलाऐं भी थीं और सबके पीछे घबराए से वर्माजी चले आ रहे थे । उनकी बात पर किसी न कोई ध्यान नहीं दिया, वे हताश से कुछ ककहते रह गये और बच्चों के बैठते ही तीनों कारें उनके मुंह पर धूल उड़ाती हुई चली गई ं।
सचाई को समझ पाने में असमर्थ मोहल्ले की औरतों को गुन्नो का इंतजार था जो भीतर से सच्ची खबर लेकर आती और उन सबकी उत्कंठा मिटती ।
सांझ को गुन्नो ने सुनाया कि दोनों बेटे और बेटी अपने जीवनसाथियों के साथ रहने को ही आये थे लेकिन उन सबने वर्माजी की कंजूसी देखी तो उन सबका पारा चढ़ गया ।…दरअसल इस छोअे से मकान में कुल मिलाकर पांच कमरा थे जिनमें से किचेन और भीतरवाले कमरे में तो वर्माजी किसी को घुसने ही नहीं देते, बाकी कमरों मेंसे एक बैठक है और तीन कमरे जो अभी संवारे गये थे इतने बड़े नही थे कि इतने बच्चों समेत तीन फेमिलियां ठहरतीं सो सब के सब गुस्सा हो कर चले गये । रजनीस भैया बहुत नाराज थे कहते थे कि इसी वजह से पहले ही कहला दिया था कि चार-पांच कमरे नये बनबा लो जिनमें ए.सी. लगे हों, लेकिन यहां बुढ़िया की सलाह पर चलने वाले वर्माजी ने कोई कमरे नही बनबाये न कहीं ए.सी.लगवाये सो परदेशी पंछी जैसे आये थे वैसे ही बाप का घर छोड़कर इसी कस्बे में रहने वाले दीगर रिश्तेदारों के यहां चले गए । हमे सहसा ही याद आया कि रिश्तेदार यानी कि छोटे बेटे की ससुराल वाले ।
गुन्नो अपनी खबरें सुना कर बाहर ही निकली थी कि वर्माजी की संतानें फिर से उनके दरवाजे पर खड़ी दिखीं । हम सब चौंके । निगम भैनजी के पति आत्मीयता दर्शाते उनकी ओर वढ़े- ‘आओ रजनीश भैया, हमारे यहां बैठ लें, कुछ चाय-वाय हो जायें ।‘
रजनीश जी ने उनकी दावत को घुमा-फिरा के नकारा-‘ निगम साब, आपके यहां तो कल सुबह चाय पियेंगे, अभी तो हम वो पीछे वाले गुप्ता लोगों के गेस्टहाउस में शिफ्ट कर लें ।‘
‘गुप्ता जी का गेस्ट हाउस …?‘
‘ हां, वे लोग अपना ए.सी. वाला पोरशन गेस्ट हाउस के तौर पर किराए पर उठाते हैं न ! हमने आठ-दस दिन के लिए वो ही किराए पर ले लिया । अब घर में एकोमोडेसन भी कम था और उतना अच्छा भी न था कि बच्चे ठीक से रह पाते, बच्चों की सुविधा के लिहाज से उसी में जाना ठीक लगा हमे।‘
निगम भैनजी ने अपने पति के साथ हुए रजनीश भैया के संवाद में कुछ चीजें और जोड़कर कॉलोनी वाली सखियोंको बताईं-‘ रजनीश भाई साहब कह रहे थे कि भले ही बाउजी ने घर में जरूरत के मुताबिक नया कंस्टक्शन नहीं कराया , लेकिन अपना घर और अपना मुहल्ला छोड़कर किसी बाहर वाले के यहां काहे को ठहरें ? इतनी दूर से हम लोग आये ही इसलिए हैं कि यहां एक कारज संपन्न करें, जिसमें अपने लंगोटिया यारों, कॉलोनी के पड़ौसियो ंसे लेकर अमेरिका के उन साथियों को भी बुला सकें जो इन दिनों इंडिया आये हैं । ‘
‘कारज‘ शब्द ने चौंकाया सबको । कारज माने क्या…? ब्याह-सगाई लायक तो उनके कोई बच्चे दिखते नही हैं ! फिर…? कारज माने क्या करेंगे वे ! ऐसा तो नहीं कि तीरथ-बीरथ हो आये हों और गंगभोज या भण्डारा करक रहे हों….! या फिर श्रीमदभागवत का सप्ताह कराने का विचार आ गया हो…! ल्ेाकिन अमेरिका वासियों को तीर्थयात्रा और भागवत सप्ताह में भला कहां से आस्था होगी..? जरूर कोई बड़ा कारज कर रहे होंगे। सब के मस्तिष्क उन सब संस्कारों पर घूमने लगे जिन्हे भारतीय समाज में कारज कहा जाता है ।
कारज शब्द का सही अर्थ कॉलोनी भर के लोग तीन दिन तक तलाशते रहे पर टैण्ट वाले के साथ हुए इक्कीस हजार रूप्ये के पण्डाल लगाने के करार और ग्वालियर से बुलाए गए कैटरिंग वाले से एक सौ पचास रूप्ये प्लेट के हिसाब से बना हजार प्लेट वी आई पी भोजन देने के समझौते के अलावा किसी को कोई पता न चल सका ।
चौथे दिन का सूर्य उगा तो वर्मा जी के घर के इर्द-गिर्द का मैदान रंग-बिरंगे पण्डाल से घिर चुका था । आम रास्ता बंद कर बड़ी शान से ‘शुभागमन‘ और ‘ वर्मा परिवार आपका स्वागत करता है ‘ के बैनर लगे प्लाइबुड के बने गुम्बद और मेहराबों से सजे मध्यकालीन शासकों के किलों में बनाये जाने वाले महाराजा गेट लगाए जा चुके थे । सात बजते-बजते माईक चालू हो गया और उस बाकायदा लोगगीत गूंजना शुरू हो गये थे । पता नहीं कौन स्त्रियां कहां से आई थीं जो ठेठ देहाती अंदाज में गा रहीं थीं-आज दिन सोने को महाराज!
कस्बे के मीडिया के लिए एक एक्सक्लूसिव स्टोरी थी यह ।
‘ सात समंदर पार से आया यहां के एक नामालूम से रिटायर्ड प्रोफेसर का बेटा, अपने पुत्र का शास्त्रीय विधि-विधान से यज्ञोपवीत कर रहा था, और कहता था कि हमारी परंपराओं के मुताबिक यज्ञोपवीत यानी जनेउ का बहुत महत्व है, इसका मतलब है कि हमारा बेटा ब्याह योग्य हो गया इसकी धूमधाम से की गई सार्वजनिक मुनादी ! और यह संस्कार ब्याह से कुछ कम नही होता, वहां विदेशों में भी हाई स्कूल कर लेने वाले लड़के के अचीवमेंट भी कुछ इसी तरह सेलीब्रेट किया जाता है । आम के हरे पत्तों से आच्छादित किये गये मण्डप के नीचे बाकायदा तीन यज्ञ वेदियां बना कर जीवन के बचपन,युवावस्था और वृद्धावस्था के लिए तीन हवन किये जाते है, बालक का मुण्डन होता है और वह अपने अभिभावकों से मोह तोड़कर बटुक वेष में भिक्षाटन करता है ।‘
सांझ का समय था । पूजा और हवन संपन्न हुये और दावत की तैयारी थी। कस्बे के तमाम संवाददाता और पत्रकार इकट्ठा हो चुके थे । चूल से न्यौते गये ; सपरिवार बुलाये गये द्ध हम सब कॉलोनी वाले लोग पण्डाल में बड़े वर्माजी को घेर कर जाहिराना तौर पर यह प्रदर्शन कर हे थे कि बेटों के बिना वे निराश्रित नहीं है-हम हैं न ! इस दावत में जिले के कलेक्टर और एस पी से लेकर थाने के छोटे दरोगा तक को आमंत्रित किया गया था, कस्बे के धन्ना सेठ से लेकर पंचन जोड़ने वाले घनश्याम सिंधी तक को सादर न्यौता गया था ।
इसी क्षण गेट पर कलेक्टर की कार की लाल बत्ती चमकती दिखी तो कुछ लोग उधर ही लपके ।
हम सबकी नजरें उधर ही थीं ।
इन दिनों कलेक्टर की सीट पर एक युवा महिला विराजमान थी ,जिसका तेज देखते ही बनता था। चालीस की उमर । गोरी सुचिक्कन देह। मेक अप से पुता मुहांसेदार लम्बोतरा चेहरा । बदन पर कीमती बनारसी साड़ी । ब्लाउस के नीचे पेट पर चरबी से मुटाती खाल की तीन सलवटें। खूब चौड़ी कमर । लेकिन गजब की फुर्ती । वे तेजी से नीचे उतरीं तो विंहसते हुए उस डिप्टी कलेक्टर को आगे चलने का इशारा किया जा इन दिनों ज्यादा मुंहलगा कहा जाता था ।
अमरीका पलट रजनीसजी एक ग्रुप से बातचीज कर रहे थे और बराबर यह अभिनय कर रहे थे कि उन्हे यहां के कलेक्टर का क्या महत्व ? लेकिन इधर-उधर से मंड़राती उनकी निगाहें बार-बार वहीं जाकर रूकती थीं जहां कि शामियाने के गेट से कलेक्टर ने अभी अभी प्रवेश किया था और मेहमानों मेंसे तमाम लोग उन्हे आदाब-नमस्कार करते झुके जा रहे थे ।
वे बीच पंडाल में आकर खड़ी हुईं और चारों ओर का जायजा लेने लगी ।
किसी ने पूछा-‘आप रजनीश जी से मिली मैडम !‘
‘ नहीं ! कहां हैं वे ?‘
पूछने वाले ने आवाज लगाई-‘ अरे रजनीश जी, इधर आइये, आपका परिचय कलेक्टर मैडम से करायें ।‘
चेहरे पर औपचारिक मुसकान लाते हुए रजनीशजी आगे बढ़े-‘ हैं…हैं……हैं, आइये मेम ! सॉरी मैं आपको देख नहीं सका । आपका ही इंतजार हो रहा था यहां -वेलकम माय होम !‘
वे भी मुसकराईं-‘ अरे आपके लिए हमारा क्या महत्व ?‘
फिर वे बोलीं-‘ उस बच्चे से तो मिलवाइये, जिसका यज्ञोपवीत आई मीन जनेऊ हो रहा है! दैटस अ गुड एन कल्चर्ड बॉय । ही इन अवर प्राउड गेनर ।‘
रजनीशजी अपने पुराने कस्बाई अंदाज में ही चीखे-‘ अरे जनार्दन बेटे,…..इधर आओ ! मैडम आपसे मिलना चाहती है ।‘
अब तक अमरीकी कल्चर में पला-बढ़ा और इस वक्त यज्ञोपवीत संस्कार की अनिवार्यता के चलते या जाने किसी पश्चिमी फैशन के चलते अपना सिर घुटा लेने वाला जनार्दंन अपने घुटनों तक लम्बे कुर्ते और लड़कियों जैसे दुपट्ठे में इतराता घूम रहा था । पापा की पुकार सुन कर वह वहीं से अमरीकी लहजे में चिल्लाया-‘ व्हाट इज हैपन्स डैड ! हू वांट टू मीट विद मी ।‘
रजनीशजी के चेहरे पर जनार्दन के इस वाक्य ने गर्व के भाव उभार दिये ।
उनके इशारे पर जनार्दन ने झुक कर मैडम क पांव छू लिए तो वे गदगद हो गईं-‘ रहने दो बेटे ं‘
फिर देर तक कलेक्टर और रजनीशजी कनबतियां करते रहे ।
बाद में निगम साब से पता लगा था कि कलेक्टर मैडम अपने छोटे भाई को पढ़ने के वास्ते अमरीका भेजना चाहती हैं, जिसके लिए न्यूयार्क की एक यूनिवर्सिटी से एडमीशन फॉर्म लेकर पहंुचाने का वायदा रजनीश जी ने किया है ।
कलेक्टर ने वह घर और वो कमरा देखने की इच्छा व्यक्त की, जहां रजनीशजी का बचपन बीता और जहां अब ( निराश्रित सा जीवन बिताते) उनके बूढ़े मां-बाप रह रहे हैं ।
बड़े उत्साह से अपने साथ रजनीशजी उन्हे घर के भीतर ले चले तो बीच में खड़े मेहमान उन्हे रास्ता देने के लिए इधर-उधर खिसकने लगे । पत्रकारों का हुजूम उनके पीछे-पीछे था ।
‘ मैम, ये है मेरा स्टडी रूम !‘
‘ हाउ, इतना छोटा !‘
‘ हां मैम, उस वक्त टेबल लैम्प भी नहीं था मेरे पास । बस एक बल्ब जलता था छत के बीच मे ंऔर उसकी रोशनी में ही हम दोनो भाई पढ़ते थे ।
‘ दोनों भाई ….!‘
‘ अरे मैडम ,आपको पता नहीं, मेरा एक भाई कनाडा में है-साइकिटिक है वहां ।‘
‘ इन गव्हर्नमैण्ट जॉब !‘
‘ नो ! ही इज प्राइवेट प्रेक्टिशनर ।‘
‘ ओ…….!‘
‘ मैडम , ये है हमारा सोने का कमरा ।‘
‘ हूं..‘
‘ मैडम ये है हमारा किचेन….‘ कहते रजनीश जब किचेन में घुसे तो अचानक बदबू का एक झोंका साउनके नथुनों में घुसा । वे तिलमिला उठे । देखा वर्माजी ने अब तक किचेन न तो साफ कराया है न धुलवाया है ।
तब तक कलेक्टर अंदर आ चुकी थीं-‘ लगता है यहां कुछ बदबू जैसी….‘
‘ नो मैडम, दावत के लिए दही यही जमाया गया है, उसकी गंध….-
‘ अच्छा ….‘ कहती मैडम मुड़ीं ।
‘ आइये मैडम, मैं आपको अपना बचपन का सबसे प्यारा रूम दिखाऊं । पढ़ाई से थक कर मैं यहीं छुपकर बैठ जाता था ।‘ कहते रजनीश भीतर वाले कमरे में घुसे ।
बचपन की आदत थी उन्हे , सो अंधेरे में ही ढूढ़कर स्विच दबाया और कमरे में भक से उजाला छा गया ।
पूरा कमरा रोशनी से नहा उठा । लेकिन सब चौंके-कमरा क्या था, जाने कहां कहां का कवाड़ इकट्ठा था वहां । धूल की मोटी परत के नीचे फटे-पुराने कपड़े, जूते, टेड़े-पिचके पीतल और तांबे के बर्तन, पुराने अनुपयोगी हो चुके मिटटी के बर्तन, टूटा बेकार फर्नीचर, सड़े नीबू और टमाटर तथा जाने कब बनाये गये गौरैया के घांेसले ,उसमे ंसे गिरे तिनके और फूटे अण्डों के अलावा एक कोने में एक मांस-पिण्ड सा रखा था एक कोने में । बदबू का एक असह्य भभका फूटा वहां से ं
‘ ओक..!‘ कलेक्टर मैडम को उल्टी सी आई तो वे घबरा के एकदम पीछे मुड़ गईं , शर्मिन्दा से होते लाईट बुझाते रजनीशजी उनके पीछे पीछे ही बाहर की तरफ चले आये ।
बहुत निहोरे करने पर भी मैडम ने कुछ नहीं लिया, बल्कि वे तुरंत ही जाने की इजाजत मांगने लगीं । उनकी कार का दरवाजा पूरे अदब से बंद करके लौटते रजनीश जी की आंखों मे अंगारे सुलग उठे थे ।

मैं , निगम साब और दूबे जी की तिकड़ी आहिस्ता से वर्माजी के अहाते में घुसी ही थी कि बंद खिड़की-दरवाजों से गूंजते रजनीश के स्वर ने हमारे पांव जकड़ लिए ‘ तुम लोग भुक्खड़ और भिखमंगे बन कर ही रहना जानते हो। झूठ बोलते हो कि हमारे भविष्य के लिए तुम लोग परेशान और चिंतित रहे। बच्चों के लिए काहे को चिंता करोगे तुम लोग! तुम्हारे तो स्वभाव में कंजूसी है…कंजूस ही नहीं, गंदे और बदबू से भरे हुए हो तुम दोनों । मैंने महीना भर पहले जो रुपया भेजे थे वे कहां खरच कर दिये तुम लोगों ने ? अपनी पैन्शन कहां गाड़ देते हो तुम लोग । और…..और उस भीतर वाले कमरे में इतनी गंदगी काहे को इकटठा कर रखी है तुमने……‘
‘ बेटा हमारी पुरानी चीजें…..‘ शायद वर्माजी रिरिया कर कुछ कहना चाह रहे थे ।
‘ अरे घूरे पर फेंको अपनी पुरानी चीजें। मेरी नाक कटादी तुम लोगों ने कलेक्टर और सारे मीडिया के सामने।….मैंने जब फोन पर जब क्लियर कर दिया था कि पूरा घर साफ करवा लेना ,और चार-पांच नये कमरे बनबा लेना, लेकिन नही करवाया तुमने यह सब…मैं पूछता हूं कि कहां गया हमारा रूपया ?
‘ पूरा रुपया और डालर बचा के रखा है बेटा!‘ भीतर के कमरे से वर्माजी की पत्नी की लाढ़ में भरी आवाज आई-‘ हम तो इसलिए ऐसे रहे कि घर में रूपया रुक सके और तुम सब सुखी-संपन्न रहो, ।
कहते हुए सहसा उन्होने कबाड़ के बीच में गढ़ा किसी धातु का एक पुराना सा पात्र निकालकर अपने हाथ में ले लिया। बदबू के तेज भभके ने रजनीश सहित हम सभी को पीछे हटने को मजबूर कर दिया ।
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’ अकेला रहने वाला जंगली सुअर । लोक मान्यता है कि सुअर मारके गाड़ देने से धन की वर्षा होने लगती है।
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परिचय : कई पुस्तकें प्रकाशित, म0प्र0हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी पुरस्कार एवं
सुभद्राकुमारी चौहान पुरस्कार
संपर्क : एल आय जी 19 हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी दतिया, दतिया म0प्र0 475661

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