कोरोना की चिट्ठी कर्मवीर के नाम
                               – राजेन्द्र श्रीवास्तव
प्यारे भाई कर्मवीर,
कोहराम मचाने वाले कुटिल कोरोना का, दूर-से ही दुआ सलाम, राम राम।
वैसे तो मेरा मन कर रहा था कि खुद ही आकर तुमसे दो बातें करूँ , लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण तुम बीमार हो जाओ। मैं नहीं चाहता कि जाते-जाते एक कलंक और मेरे माथे मढ़ जाए, इसलिए मन मार कर यह चिट्ठी भेजी है।
ध्यान रहे, पढ़ने-से पहले मुँह पर मास्क जरूर लगा लेना और सेनेटाइजर से हाथ भी धो लेना।मेरी शैतान संततियों का क्या भरोसा? चिठ्ठी पर चार-पाँच चिपक कर तुम तक पहुँच जाएँ। और वही अनचाहा हो जाए जो मैं नहीं चाहता। इसलिए तुम्हारे हित की बात कर रहा हूँ।
 हाँ! तो मैं कहना चाह रहा था, कि तुम्हारी यह दुनिया, और यह प्रकृति बहुत खूबसूरत है। तिस-पर तुम्हारे भारत देश की तो बात ही निराली है। मैने सात समंदर और सभी महाद्वीप घूम लिए। लेकिन यहाँ के लोगों की एकता, भाईचारा, जीवटता, मुझसे जूझने का हौसला देखकर दंग रह गया। सच मानो मुझे ललकारने का जो काम मिसाइल, बम, और तोप-तमंचा  न कर सके, वह काम यहाँ की ताली, थाली, दीया और मोमबत्ती ने करके दिखा दिया। सिद्ध कर दिया कि ‘संकट की घड़ी में सचमुच आप सब एक हैं।’
कर्मवीर भाई !  मैं सकल-संसार घूमा, लेकिन यहाँ आकर मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी।  भाई ! यहाँ के देशवासियों में कमाल का धैर्य, प्रशासनिक अमले में गजब का संयम और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों के मन में अद्भुत सेवा-भावना है। जहाँ तक मेरा अनुमान है, मेरी चपेट में भले ही हजारों आ गये हों, लेकिन इस संकटकाल में भी भूख की चपेट में इक्का-दुक्का ही आए होंगे। जिस घर में आठ रोटी बनती थीं वे अट्ठाइस बनाकर बाँट रहे हैं। यहाँ के कोरोना वारियर्स का सेवाभाव देखकर कहीं मेरा ‘हृदय-परिवर्तन’ न हो जाए।  इस सेवाभाव व सजगता पर बार-बार बलि जाने का मन करता है।
मेरी चुनौती से सारा जग घबरा रहा है, लेकिन यहाँ तुम्हारी एकजुटता और प्लानिंग देख कर मेरा दिल घबरा रहा है। मुँह पर मास्क लगाकर जब तुम निकलते हो, तो मेरा दम घुटने-सा लगता है।
वैसे एक बात कहूँ, मैं तो स्वयं ही किसी के पास नहीं जाना चाहता। लेकिन लोग जाने-अनजाने मुझे गले लगा लेते हैं। तुम ही बताओ! इसमे मेरा क्या कसूर? अब अगर आग के पास आओगे तो आँच तो आएगी ही। मेरा मुँह होता तो चिल्लाकर सामने आने वाले को सचेत कर देता कि भैया इस तरफ मत आ। या हाथ-पैर होते तो खुद ही वहाँ से भाग जाता । मेरे हाथ-पैर तुम खुद बनकर मुझे देश-दुनिया में फैला रहे हो, और दोषारोपण मुझ पर कर रहे हो। यह अच्छी बात नहीं है! हाँ नईं तो…… ।
मुझे स्वयं पता नहीं कि मैं किसकी औलाद हूँ।  चीन के चमगादड़ की या वहाँ के किसी चालाक अनुसंधानकर्ता की। मुझे तो यह भी नहीं पता कि मैं किसी प्राणी के पेट से उपजा हूँ,या किसी प्रयोगशाला की परखनली में पनपा हूँ । किसी की भूल या पाप से पैदा होकर मैं जैसे चोरी-चोरी दुनिया में आया हूँ, वैसे ही चुपके-चुपके यहाँ से जाना चाहता हूँ.
            वैसे भी लोगों की जली-कटी सुनकर और उनकी नफरत और  बद्दुआ लेकर मैं अब जीना नहीं चाहता।
मेरी आखिरी इच्छा यही है,कि मैं पैदा कहीं भी हुआ होऊँ, लेकिन मरना भारतभूमि में ही चाहता हूँ। संभव है इस भारतभूमि में अंतिम साँस लेकर अगले जन्म में यहाँ के वैज्ञानिकों, अनुसंधानकर्ताओं के अथक परिश्रम से, किसी एंटी बाॅडी या लाभकारी वायरस का रूप ले सकूँ। जैसे रावण के कुल में विभीषण जन्मा था, तय है वैसे ही मुझे समूल नष्ट करने वाला रसायन या टीका भी मेरे ही कुल अर्थात मेरी  ‘जीन’ के फेरबदल से ही बनेगा।
 मेरी ओर-से भारतवासियों से कहना कि मैं एकांत में अपनी अंतिम साँसे गिन रहा हूँ। सब लोग बस कुछ दिन और सोसल डिस्टेंसिंग बनाए रखें। बाहर भीड़ इकट्ठा कर मुझे फिर से नवजीवन देने की गलती न करें।
चिट्ठी पढ़कर  जला देना, और एक बार फिर सेनेटाइजर से हाथ जरूर धो लेना.
   जाते-जाते फिर दूर से ही राम-राम.
तुम्हारा
कुटिल कोरोना
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