वो लड़की 

  • संजीव जैन

यह वैसी लड़की नहीं है, जैसी आमतौर पर जीवन की सतह पर अतराती दिखाई जाती हैं। वो लड़की एक साधारण किस्म की बहुत साधारण लड़की है। छोटा कद। बड़ा माथा। गुलाबी गाल। लंबे बाल। पहाड़ीपन से भरी हुई। चुलबुली पर शांत। सुलगती हुई पर तरल। तो ऐसी ‘वो लड़की’ अचानक एक होटल के रिसेप्शन पर मिल जाती है तो….

अनैतिकता का लिहाफ……

ताज होटल शिमला के रिसेप्शन पर खड़ी हुई वो लड़की निरंतर पहलू बदल रही है। उसके हाथ कम्प्यूटर स्क्रीन पर हैं, ओंठ कुछ बुदबुदाते महसूस हो रहे हैं, मस्तिष्क में कुछ तेज उथल-पुथल चल रही है, जो उसके चेहरे पर धूप छांव की तरह आ जा रही है।

‘एक्सक्यूज मी’ रिसेप्शन पर आये आगंतुक ने उस लड़की का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। मै शैलेन्द्र। मैंने एक रूम बुक किया है। ओह! वेल्कम सर। वो लड़की चेहरे पर मुस्कराहट लाते हुए बोली। जस्ट अ मिनिट। आई डी प्लीज।

शैलेन्द्र ने ड्राइविंग लाइसेंस निकाल कर उस लड़की को दिया।

‘थेंक्यू सर’

आपका रूम 407 …

राजेश ! सर को रूम तक ले जाओ। उस लड़की ने वेटर को आवाज देते हुए 407 की चाबी उसे पकड़ा दी।

चलिए सर ! राजेश शैलेन्द्र का सामान लिफ्ट की ओर ले जाते हुए बोला।

‘आपके पैरों में कुछ तकलीफ़ है क्या?’ शैलेन्द्र ने जाते जाते उस लड़की से पूछा। वो लड़की कुछ चौंकते हुए बोली ‘नो सर! आई एम आल राइट’ पर आपको ऐसा क्यों लगा कि मेरे पैरों में कुछ तकलीफ़ है? उस लड़की ने आगंतुक से सहज होकर और चेहरे पर दर्द भरी मुस्कान लाते हुए पूछा।

शैलेन्द्र, ‘यूं ही’। आपको लगातार पहलू बदलते हुए देखकर लगा कि जैसे आपके पैरों में कोई तकलीफ़ हो। इतना कहकर शैलेन्द्र लिफ्ट की ओर चला गया। वो लड़की असमंजस में खड़ी शैलेन्द्र को जाते हुए देखती रही। लिफ्ट का दरवाजा बंद हुआ तो जैसे उसकी तंद्रा भंग हुई। वो सोच रही थी, कि उसके पैरों के छाले शैलेन्द्र ने कैसे महसूस कर लिए?

यह होटल एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। इस कारण इस होटल के माहौल में शिमला के औसत तापमान से अधिक ठंड रहती है। ठंड अधिक होने से और लगातार खड़े खड़े शिफ्ट करते हुए उसके पैरों की अंगुलियों में छाले पड़ गये थे। जूतों के अंदर पैरों के कसमसाते रहने से छाले मन में कसक की तरह काटते रहते थे। इस कारण वह स्थिर खड़ी नहीं हो पा रही थी। रिसेप्शन पर बैठने की अनुमति नहीं थी। सुबह सात बजे से रात को दस ग्यारह बजे तक लगातार खड़े रहना होता था। बीच में कुछ देर का लंच ब्रेक भर मिलता था। शैलेन्द्र की बात पर उस लड़की के अंदर जैसे कुछ पिघल गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके पैरों को हौले सहला दिया है।

कुछ देर के लिए वह अपनी पीड़ा को भूलकर अतीत और वर्तमान के बीच कहीं खो गई। उसके मां-बाप को उसके पैरों के छाले और थकान से उपजी पीड़ा कभी महसूस नहीं होती। चूंकि उनके सामने जिंदगी के और भी नरक हैं महसूस करने के लिए। ग़रीबी और बेकारी सबसे बड़ी तकलीफ़ है, वे कहते हैं कि दस हजार माह का आ रहा है, इससे कुछ तो घर का काम चल जाता है और अब काम करेंगे तो कुछ तकलीफ़ तो उठाना ही पड़ेगी।

वो लड़की सोच रही है कि जिंदगी कितनी अजीब है, अभी उसकी उम्र पढ़ने और खेलने कूदने की है। उसके साथ की लड़कियां दोस्त बनाती हैं, घूमती फिरती हैं, एंजाय करती हैं और एक वो है जिसके पैरों में छाले पढ़ रहे हैं और पैर शाम तक इतने अकड़़ जाते हैं की रात को बिस्तर से उठकर बाथरूम तक जाने की हिम्मत भी नहीं होती। उसकी उम्र की लड़कियां थकान जानती भी नहीं हैं और एक वह है जो थकने के लिए ही जी रही है। वह महसूस करने लगी है कि विवशता और मजबूरियों का नाम ही जिंदगी है।

अचानक उसे इंटरकॉम पर बजने वाली रिंग ने सुनाई दी। उसकी सोचने की मनोदशा भंग हो गई, रिसीवर उठाया और बोली हैलो सर! मैं आपकी क्या सहायता कर सकती हूं?

दूसरी तरफ से आवाज आई आप थोड़ी देर के लिए बैठ जाइये। आपके पैरों में तकलीफ है। यह आवाज शैलेन्द्र की थी उस लड़की ने पहचान लिया।

थेंक्यू सर! ‘बट माई ड्यूटी इट्स नाट अलाऊ।’ इतना कहते हुए उस लड़की की आंखों में आसूं झलक आये और उसने फोन का रिसीवर रख दिया।

रात दस बजे उसकी ड्यूटी खत्म हुई। वो रिसेप्शन से अपना स्लेग उठाकर बाहर निकली। तेज ठंडी हवा के झोंके ने उसे झिंझोड़ दिया। बाहर ओस गिर रही है। रात कुहासे में घिरी हुई है। चारों ओर सन्नाटा है। देवदारू और चीड़ के पेड़ों से ओस की बूंदें महुये की तरह टपक रही हैं। सुबह तक ये बूंदें जमीन पर उगी हल्की हल्की घास पर जम जायेंगी। वो लड़की बस का इंतजार कर रही है। कुछ और लड़के लड़कियां भी हैं जिनकी ड्यूटी खत्म हुई है, सब इंतजार कर रहे हैं।

इंतजार ही तो है अच्छे दिन आने का। उसके पैरों में चीवन है। नसें कड़क हो रही हैं। लगातार खड़े रहने और ठंड से। उसे लग रहा कि यहीं जमीन पर पालथी लगाकर बैठ जाये। पैर अब और खड़े रहने का इंतजार नहीं कर सकते। अंगुलियों के छाले दूसरी अंगुलियों से रगड़ कर चीख रहे हैं। उसे लग रहा है कि जूते उतारकर फेंक दें और गुनगुने पानी में पैर डालकर बैठ जाये। पर ऐसा कुछ संभव नहीं है। बस आ गई है। अब उसे आधे घंटे का पहाड़ी ढलान का रास्ता तय करना है। बस में बैठते ही वह नींद के आगोश में चली गई। दिनभर की थकान और मन की बैचेनी ने उसे निढाल सा कर दिया था।

होस्टल आ गया था। झटके से बस रुकी तो वह जाग गई। अपने पैरों पर खड़े होने के लिए उसे काफी ताकत लगानी पड़ी। पैर जैसे जम गये हों उठने को तैयार ही नहीं थे। उसने जैसे खुद को धकेल कर उठाया और अपने कमरे कि ओर ले चली। उसकी चाल में थकान और हताश झलक रही थी। ठंड ने उसकी देह को ऊर्जा विहिन कर दिया था। उसे कमरे पर पहुंच कर याद आया कि एक दिन उसे किसी ने कहा था कि रात को दो पैग ओल्ड मोंक रम गर्म पानी में ले लिया करो। ठंड से बचने और थकान उतारने का बहुत आसान तरीका है। पर वह नैतिकता के बंधनों में बंधी इस विचार को अपने से दूर रखें हुए थी। उसका नैतिक मन उसे रम लेने के लिए अनुमति नहीं दे रहा था‌।

उसने सोचा कि सामाजिक नैतिकता उसके पैरों के छाले और थकान की पीड़ा नहीं देखती। इसमें उसे कुछ भी अनैतिक नहीं लगता, पर यदि वह लीक से हटकर चले तो तुरंत नैतिकता उसके रास्ते को रोकती है। नैतिकता नहीं सोचती कि एक एक्कीस साल की लड़की चौदह पंद्रह घंटे खड़े रहकर ड्यूटी क्यों करें? उसने निश्चय किया कि अबकी बार जब आफ मिलेगा तो वह एक क्वार्टर रम का लेकर रखेगी। इस तरह जीने के लिए उस तरह पीना जरूरी है‌। उसकी जिंदगी से चार जिंदगियां जिंदा रहती हैं। भूख और दर्द की कोई नैतिकता नहीं होती। यह सोचते हुए वह बिस्तर तक पहुंच गई। पानी गर्म करके पैर डालने की हिम्मत अब नहीं बची थी। वह वैसी ही अनैतिकता के लिहाफ में घुस गई।

मुक्ति का भय…..

अलार्म की रिंग नियति की डंडे की तरह उसे अपने लिहाफ से बाहर आने को मजबूर कर दिया। अभी सुबह के छह बजे हैं। उदयाचल से सूरज पहाड़ियों के पीछे से झांक रहा है, अभी सुबह ने अंगड़ाई लेना आरंभ किया था। लोग अपने गर्म लिहाफों में इस अंगड़ाई से बेखबर सो रहे थे। पर वह अनमने मन से उस लिहाफ को छोड़ रही थी जिसे उसने रात भर में अपनी देह की गर्मी से गर्म किया था। लिहाफ के साथ उसकी देह की ऊर्जा भी उसमें छूट गयी। वह बिना ऊर्जा के निखालिस देह के ढांचे को लेकर बाहर आ गई।

लड़खड़ाते कदमों से वह बाथरूम में पहुंच गयी। वहां गीजर भी नहीं है। गैस पर पानी गर्म करो तब कहीं बासेपन से बचना संभव हो। अजीब मुसीबत है कि पानी भी गर्म नहीं मिल सकता। उसे सात बजे ड्यूटी पहुंचना है। बस इतना जानती है वह। इतनी ही आजादी है उसे कि इस बाथरूम में कुछ भी सोच ले। इसके बाहर तो सोचने की भी आजादी नहीं है। ‘मैं सोचने से भी डरने लगी हूं।’ वह सोच रही थी। क्या वह इस जिंदगी को छोड़कर भाग सकती है? अचानक उसके मन में ख्याल आया‌। इस ख्याल ने उसे भयभीत कर दिया। एक परिवार की सुरक्षा के हटने के डर से वह कांप गयी। उसकी देह में सैकड़ों चींटियां रेंगने लगीं। पैर जैसे अपनी जगह से चिपक गये हों। मुक्ति के बारे में सोचना भी इतना दहशतशुदा है तो …यदि मैं सच में भाग गई तो क्या होगा?

वह तैयार होकर बस स्टाप पर आ गई और भी साथी स्टाप पर खड़े थे होटल जाने के लिए। बस आई और वे सब यंत्रवत उसमें बैठ गये। वह भी बैठ गई अपने पैरों को अपने साथ लेकर, क्योंकि उन पैरों पर ही उसे रात तक खड़े रहना है, वह अपनी ऊर्जा लिहाफ में छोड़कर आ सकती है, पैर नहीं। वह सोच रही है कि उसने शायद बस में बैठने, उतरने और रिसेप्शन पर खड़े रहने के लिए ही जन्म लिया है। उसकी देह की सार्थकता यही है।

रिसेप्शन पर पहुंचते ही उसका सामना शैलेन्द्र से हुआ। हैलो! कैसी हैं आप? उसने पूछा। वह अपनी प्रोफेशनल मुद्रा में मुस्कराते हुए बोली ‘ आई एम फाइन सर’ ‘हाऊ आर यू? शिष्टाचारवश उसने भी पूछा। शैलेन्द्र बहुत ध्यान से उसके पैरों की ओर देख रहा था। उस लड़की ने यह बात भांप ली थी। शैलेन्द्र का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए उसने कहा आपने चाय ली सर?

ओह! शुक्रिया ! नहीं । शैलेन्द्र ने उससे कहा ‘आप मेरे साथ एक काफी लेंगी।’ शैलेन्द्र ने उससे पूछा। वो लड़की थोड़ी हिचकिचाहट से बोली सर यह हमें अलाऊ नहीं है। शैलेन्द्र ने कहा मैं आपके मैनेजर से परमिशन ले सकता हूं। यदि आपको एतराज न हो तो। ओके। वह शैलेन्द्र के साथ एक खाली टेबिल की ओर बढ़ गयी। उसने एक वेटर को बुलाकर काफी और कुछ स्नेक्स लाने को कहा।

शैलेन्द्र ने उससे कहा, तुम्हें अपनी जिंदगी के बारे में फिर से सोचना चाहिए। अपने आपको इतना कष्ट देने की जरूरत नहीं है। पैरों में तकलीफ है, तो कोई दूसरा विकल्प चुन सकती हो। यदि यह नौकरी तुम्हें सूट नहीं करती तो तुम यह नौकरी छोड़ क्यों नहीं देती?

‘शैलेन्द्र ने कितनी आसानी से यह सब कह दिया था।’ उसने कहा ‘यह सब इतना आसान नहीं है, सर!’ हर जगह हमें अपने आपको ऐसे ही बेचना होता है। हम खुद अपनी कीमत भी नहीं लगा सकते‌। कितनी विचित्र बात है न, सर! की हम जब बाजार जाते हैं तो चीजों को उनके मालिक के द्वारा तय की गई कीमत पर खरीदते हैं, पर इंसान खुद अपनी कीमत तय नहीं कर सकता उसे दूसरों के द्वारा तय कीमत पर खुद को बेचना होता है। हम चीजों से भी गये बीते हैं। इंसान के श्रम की गरिमा कितनी खंडित हो चुकी है, सर! आप क्या सोचते हैं सर! कि हमारी देह और हमारा श्रम अलग चीज है! नहीं सर हम आज भी दासता के युग में ही हैं, जहां श्रम के रूप में मानव देह को खरीदा बेचा जाता है। इतना कह कर वह हांफने लगी।

शैलेन्द्र हतप्रभ था उसकी बात सुनकर। कितनी महत्वपूर्ण बात उसने कह दी थी। उसने कहा; ‘मैं समझ सकता हूं तुम्हारे लिए नौकरी का महत्व।’ इस दासता से मुक्ति का विकल्प भी तुम्हें ही चुनना होगा, जो इससे कहीं बहुत ज्यादा कीमती है। तुम्हारे सामने एक खुला आसमान होगा। संभावनाओं के अनेक रास्ते खुले होंगे। बस मुक्ति के भय से एक बार मुक्त होकर सोचना शुरू करो। हो सकता है तुम्हारे लिए एक नयी दुनिया इंतजार कर रही हो।

‘कोई कुछ नहीं समझ सकता सर!’ आप मेरी तरह कभी रोज अपनी देह को निचुड़ता हुआ महसूस नहीं कर सकते। मैं अनेक स्तरीय चक्की के पाटों के बीच फंसी हुई हूं। एक परिवार है, पिता का। जिसकी जिम्मेदारी मुझ पर है। दूसरी ओर समाज के नियम हैं। तीसरी परत मैं एक स्त्री हूं। स्त्री होना अपने आप में अपराध है, फिर एक निरीह स्त्री हो कर इस आर्थिक विषमताओं से भरे जंगल में जीवित रहना…आप कभी नहीं समझ पायेंगे।

उफ्फ!! शैलेन्द्र ने एक गहरी सांस ली और उसकी आंखों में गुस्सा और नफ़रत के सैलाब को मर्यादा और मजबूरी की दीवारों के बीच मचलते हुए महसूस किया।

‘तुम एक नया विकल्प चुन सकती हो…’ और तुम एक दिन चुनोगी अवश्य। तुम मुक्ति के भय से डरी हुई हो। एक बार अपने आपको इस डर के सारे से बाहर निकालने की कोशिश करो। फिर देखो तुम्हारी दुनिया बदल जायेगी। इतना कह कर शैलेन्द्र ने कहा चलो अब चलें। दोनों उठकर अपनी अपनी जगह चले गये।

बंद पिंजरे की मैना….

वह वहां से उठकर रिसेप्शन पर जाकर खड़ी हो गई। शैलेन्द्र ने उसके अंदर एक भूचाल पैदा कर दिया था। मुक्ति का तूफान उसके अंदर मचलने लगा था। मुक्ति के भय से मुक्त होने के विचार ने उसकी चेतना को बुरी तरह मथ दिया था। वह लड़की अपने पैरों में दृढ़ता महसूस कर रही थी, अब वह जिन पैरों पर काउंटर के पीछे खड़ी हुई वे स्थिर थे। वह खुद अपने पैरों को महसूस कर सकती थी छालों के बिना। मुक्ति का विचार बड़ी से बड़ी दैहिक पीड़ा को विस्मृत कर देता है।

शैलेंद्र ने उस लड़की को अपने पैरों से मुक्ति का रास्ता नापने का अहसास करा दिया था। उसे लग रहा था कि उसके पैरों में पंख लग गये हैं और वह खुले आसमां में उड़ रही है। पैर सिर्फ पीड़ा का अहसास कराने के लिए नहीं थे। पैरों से जिंदगी की संभावनाओं के द्वार भी खोले जा सकते हैं यह अहसास उस लड़की को बेचैन कर रहा था।

वह अपने विचारों में इतनी मशगूल थी कि उसे फोन की रिंग भी सुनाई नहीं दी। जब उसने मोबाइल देखा तो पता चला कि छोटी बहिन के मिसकाल हैं। उसने बहिन को फोन लगाया। घर के हालचाल पूछने के बाद उसकी बहिन ने कहा ‘दीदी पैसे कब भेज रही हो मेरी फीस भरना है और बाबा की दवाइयां भी खत्म हो गईं हैं। उसे याद आया कि उसके पिता को हर महीने दो हजार की दवाइयां लगती हैं। आज चार तारीख हो गई है, उसकी सेलरी नहीं आई है। बहिन के फोन ने उसके अभी अभी उगे पंखों को नोंच कर फेंक दिया। वह अचानक आसमान से जमीन पर गिरा दी गई। घायल पंछी की तरह जमीन पर तड़पने लगी। आकांक्षाओं का समुंदर आंखों में ही सूखने लगा।

उसे शैलेन्द्र की बातें आदर्श लगने लगीं। दुनिया खुली है, पर परिवार और समाज का पिंजरा हमेशा साथ चलता है। इस पिंजरे को तोड़कर आसमां में कुलांचे भरना कम से कम उसके लिए तो संभव नहीं है। वह खुद को एक ऐसे बंद पिंजरे की मैना के रूप में महसूस कर रही है, जो खुले आसमान में लटका है और वह पिंजरे में घूमने फिरने के लिए पूरी तरह से आजाद है। अब उसे लग रहा था कि उसके पैर उसके अपने लिए नहीं है।

सेल्फी और संघर्ष…

शिमला का माल रोड। सैलानियों की भीड़। लड़कियों की बिंदास अठखेलियां। मनमोहक बर्फ से ढंकी पहाड़ियां की दृश्याबली। धुंध में ढंका हुआ जाखू पर्वत। खेलते कूदते बच्चे। आर्केस्टा पर बजती हुई धुनें। नये पुराने गानों के बीच थिरकते युवा जोड़े। यह सब उसके लिए नहीं था जो चौदह घंटे रिसेप्शन पर खड़ी रहती है।

उसके होटल के बाहर भी दोनों ओर गहरी घाटियां हैं। नीचे बादलों के छोने अठखेलियां करते दिखाई दे रहे हैं। होटल में आई लड़कियां इन घाटियों की गहराई के साथ सेल्फी ले रहीं हैं। वे अलग अलग एंगल से अलग अलग मुद्राओं में सैकड़ों सेल्फी ले रहीं हैं। उस लड़की के पास एक ही एंगल था, और एक ही मुद्रा जिसमें उसे पूरे दिन खड़ा रहना होता है। उसे लगने लगा कि वह एक पाषाण प्रतिमा बन गई है और लोग उसके इर्द-गिर्द सेल्फी ले रहे हैं और वह एक कृत्रिम मुस्कराहट ओड़े खड़ी है रिसेप्शन पर।

शैलेन्द्र होटल से बाहर जाने के लिए लिफ्ट से बाहर आया। उसने एक नजर रिसेप्शन पर दौड़ाई। वह बिल बनाने में व्यस्त थी। शैलेन्द्र थोड़ी देर तक उसकी ओर देखता रहा। फिर बोझिल कदमों से बाहर की ओर जाने लगा। अचानक उसकी नज़र उस लड़की के चेहरे पर फिसलने लगी। उस लड़की को शायद यह आभास हुआ कि कोई उसे देख रहा है। उसने नजर उठाकर देखा तो शैलेन्द्र को अपनी ओर देखते हुए पाया। उसके पैर थोड़ी देर के लिए बैचेन हो उठे। पैरों के छाले जैसे मचलने लगे हों कि कोई है जिसे उनकी परवाह है। उसके पैर जूतों से बाहर आने के लिए मचलने लगे, परंतु उसके दिल ने इसकी इजाजत नहीं दी।

शैलेन्द्र होटल से बाहर आ गया और एक नीचे उतरते हुए रास्ते की रैलिंग से टिककर खड़ा हो गया। यह रास्ता एक घाटी की ओर जाता था। दूर तक बादलों और उनके बीच से झांकती पहाड़ियों के शिखर अजीब से लग रहे थे। शैलेन्द्र उन्हें देर तक देखता रहा। जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है। बहुत कुछ सफ़ेद दिखता है पर उसके नीचे अंधेरी खाइयां छिपी होती हैं। वह सोच रहा था कि इन अंधेरी खाइयों के साथ एक सेल्फी कैसे लूं? ऊपर जो दिख रहा है वह सच्चाई नहीं है। इसी बीच उसे वो लड़की और उसका मुस्कराहट भरा चेहरा याद आ गया, परंतु वह उसके छाले वाले पैरों के साथ एक सेल्फी लेना चाहता है उसकी मुस्कराहट के साथ नहीं।

ज्वालामुखी और समुंदर

वह अंदर ही अंदर सुलग रही थी, उसके चेहरे से सब कुछ हरा-भरा दिख रहा था। एक शो-पीस की सी मुस्कुराहट चिपकी हुई थी उसके चेहरे पर। वेल ड्रेसअप। सधी हुई चाल। सजे हुए वाक्य। हाव-भाव चुन चुन कर बनाये गये फूलों के गुलदस्ते की तरह। सब कुछ करीने से सजा हुआ जैसे सैलेड की प्लेट हो। पर शैलेन्द्र ने उसके अंदर कैकट्स के जंगल उगा दिये थे। ऊपर से शांत और सहज दिखने वाली आंखों के नीचे एक पूरा ज्वालामुखी पल रहा था। यह बात सिर्फ वह जानती है या कुछ गर्माहट शैलेन्द्र तक भी पहुंच रही थी।

आज उस लड़की की ड्यूटी जल्दी खत्म हो गई थी। धुंधलका उतर रहा था, शाम रात में बदल रही थी। आसमान सूरज की लालिमा को केंचुली की तरह उतार रहा था। वह होटल के बाहर बस के आने का इंतजार कर रही थी। तभी उसे सामने से शैलेन्द्र घाटी से ऊपर आता हुआ दिखाई दिया। हैलो सर ! आप कैसे हैं? और इस समय कहां से आ रहे हैं? अब ठंड बढ़ने लगी है और रात भी उतर रही है। शैलेन्द्र ने कहा आप मेरे साथ कुछ दूर तक साथ चल सकती हैं? वो लड़की कुछ संकोच में इधर उधर देखने लगी। सर! मेरी बस आने वाली है। यदि बस चली गई तो मैं होस्टल कैसे जाउंगी?

शैलेन्द्र उसकी दुविधा को समझ गया। उसने कहा यदि तुम बुरा न मानो तो हम पैदल ही चलते हैं। नीचे पहुंच कर टैक्सी ले लेंगे और मैं तुम्हारे होस्टल तक तुम्हें छोड़कर वापस आ जाऊंगा। उस लड़की को इसमें कुछ भी अस्वभाविक नहीं लगा तो वह साथ साथ ढलान उतरने लगी। ढलान पर उतरने में थोड़ी सावधानी रखनी होती है कि पैर फिसल न जाये। जीवन में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब ढलान पर उतरते हुए हम फिसल जाते हैं, क्यों? शैलेन्द्र ने उसकी ओर देखते हुए पूछा।

‘पहले से ही गिरे हुए लोग फिसला नहीं करते हैं। फिसलते वो हैं जो दूसरों के पैरों से चल रहे होते हैं, सर!’ उसने कहा और शैलेन्द्र के क़दम से क़दम मिलाकर चलने लगी।

आपने कभी दो अलग अलग भूमिकाएं निभाईं हैं सर! उसने शैलेन्द्र से पूछा।

किस तरह की अलग-अलग भूमिकाएं? शैलेन्द्र ने पूछा।

मतलब आपको कभी लड़की की भूमिका निभानी पड़ती है? जैसे हमें लड़कों की भूमिका निभानी पड़ती है और नैतिकता और नियम लड़कियों के लागू होते हैं हमेशा। यह दोहरी भूमिका नहीं है। दो अलग अलग भूमिकाएं हैं। इस तरह की भूमिकाएं पुरुषों को कभी भी नहीं निभानी होती हैं। यह विसंगति है। इसीलिए आप कभी भी हमारी स्थिति को नहीं समझ सकते। हमारे साथ लड़कीपन और लड़कियों की दैहिक पहचान हमेशा चिपकी रहती है। लड़कों की भूमिका निभाते हुए भी हम इससे मुक्ति नहीं पा सकते हैं।

मैं ‘लड़कों की ही भूमिका निभा रही हूं।’ कितनी विचित्र बात है न सर! कि हमारा नाम लड़कों जैसा, काम भी लड़कों के ही करना है, पर नैतिकता लड़कियों की ओढ़ कर। सब भूमिकाएं बदल गयीं पर नैतिकता वहीं की वहीं है।’

तुम ठीक कह रही हो नीरज। समाज और नैतिकता के दृष्टिकोण को बदलने में बहुत वक्त लग जाता है। पर यह जो बदलाव तुम लोगों की भूमिका में हो रहा हो, यही बदलाव अंततः दृष्टिकोण को भी बदलने की प्रक्रिया आरंभ करेगा। चेतना में परिवर्तन भौतिक जीवन में परिवर्तन के बाद ही आता है। हां यह जरूर है कि तुम्हारी पीढ़ी को शायद इसका लाभ न मिले पर भविष्य की तुम जैसी लड़कियों के लिए जिंदगी कुछ आसान हो सकती है।

तुम जो यह संक्रमण काल को देख समझ रही हो कल की लड़कियां इसका प्रतिफल जियेंगी। हर समाज में कुछ लोगों को ऐसे ही भविष्य के लिए नींव में दफ्न होना होता है।

शायद ऐसा हो ..! उसने कदम से कदम मिलाते हुए कहा। मतलब हमें शांत समुंदर की तरह दिखना है पर अंदर ही अंदर परिवर्तन के ज्वालामुखी को भी जीवित रखना है।

बिल्कुल सही कहा तुमने। बस यही बात ध्यान रखना है कि ऊपर से सहज शांत दिखते रहने में अंदर के लावा को ठंडा नहीं होने देना है। नैतिकता का समुंदर तुम्हारे अंदर के ज्वालामुखी को रोक नहीं सकेगा। सही वक्त का इंतजार करो।

हम दोनों शाम के इस झुटपुटे में, इस सुनसान रास्ते पर एक साथ चल रहे हैं। क्या यह सही वक्त नहीं है? नीरज ने कहा। शैलेन्द उसे आश्चर्य से देखने लगा। शैलेन्द्र ने उसका का हाथ अपने हाथ में लिया तो उसे लगा कि जैसे उसका पूरी देह सुलग रही है। शैलेन्द्र ने उसे अपने आगोश में ले लिया। उसका चेहरा धधक रहा था। बाहर ठंड थी। पर उसके अंदर का ज्वालामुखी फटने को तैयार था। शैलेन्द्र ने आसपास देखा तो उसे एक टेक्सी आती हुई दिखाई दी। उसने टेक्सी को हाथ के इशारे से रुकने को कहा। वह उसे उसके होस्टल ले गया। उसे आराम करने को कह कर वापस आ गया।

शैलेन्द्र रास्ते भर सोचता रहा कि वह कितनी अकेली और बैचेन है। शायद उसने बहुत अरसे के बाद अपने चेहरे को मुस्कुराहट के नकाब के बिना महसूस किया था। यह नकाब ही है जो व्यक्ति की वास्तविक अनुभूतियों और अहसासों के ज्वालामुखी को दबा कर रखता है।

कांटों भरी राह पर उठते कदम

सुबह जब उसकी आंख खुली तो सामने खिड़की से गुनगुनी रोशनी अंदर आ रही थी। उसे लगा जैसे वह लंबी नींद से जागी है। वह अपने अंदर एक ताजगी के सरोवर को महसूस कर रही थी। वह उठकर खिड़की पर आ गई। आज सूरज की रोशनी नीरज के तन मन को अंदर तक उर्जस्वित कर रही थी। उसने एक अंगड़ाई ली और कल के सफर के बारे में सोचने लगी।

सुरक्षित कांक्रीट के रास्तों पर चलने की आदत हमें कितना कमजोर और भययुक्त बना देती है। जीवन के बीहड़ में खुद खतरे उठाकर रास्ता बनाने की कल्पना करना भी आज असंभव है। उसके जीवन में कठिनाईयां बहुत हैं। पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। दो बड़ी बहनों की शादी हो चुकी है। अभी एक छोटी बहिन और भाई है। पिता को केंसर है। पहाड़ी गांव में कोई आय का स्रोत नहीं है। आलु और मटर की फसल से एक दो माह का घर का खर्च चल जाता है, पर सालभर की जरूरतों के लिए उसको अपने जीवन की आहूति देनी पड़ रही है।

वह जानती है कि यह आहूति भी पर्याप्त नहीं है। उसे इतनी देर तक खड़े रहकर दूसरे काम के बारे में सोचने की भी फुर्सत नहीं मिलती। वह आगे पढ़ना चाहती है। अच्छी सरकारी नौकरी करना चाहती है ताकि अपने माता-पिता के परिवार को ठीक से संभाल सके। परंतु तात्कालिक समस्याओं ने उसके भविष्य की राह में कांटों के जंगल खड़े कर दिये हैं। वह काम न करे तो परिवार का पेट कैसे पलेगा? अजीब सी दासता है। जीवन में कुछ ठोस अच्छा करने के लिए स्वतंत्र समय चाहिए, आर्थिक विसंगतियों से मुक्ति चाहिए। पर वह जानती है कि उसे ऐसे ही कांटों की राह पर कदम बढ़ाते जाना है। यह रास्ते उसे किसी नये चौराहे पर खड़ा कर सकते हैं किसी दिन।

विश्वास और घात

शैलेन्द्र ने उसको अपने पैरों के प्रति जागरूक किया था। उसके अंदर भरोसा पैदा किया था। उस यह अहसास दिलाया था कि पैर ही हैं जो उसे चौदह पंद्रह घंटे खड़े रहकर काम करने की ताकत देते हैं। अब धीरे धीरे उस को भी यह बात समझ आने लगी थी कि पैर ही हैं जो उसके जीवन के घातों को संभावनाओं में बदल सकते थे। पैर उसे इस दुनिया से बाहर ले जा सकते हैं। अपनी स्थितियों को बदलने के लिए जिस ताकत और गति की जरूरत है वह पैरों से ही पैदा होती है।

एक दिन उसने पैदल ही होटल से होस्टल तक जाने की सोच। उसका होस्टल लगभग दस किलोमीटर दूर था। पहाड़ी रास्ता अपने आप में भुलभुलैया जैसा होता है। हर एक फर्लांग के बाद दो रास्ते फूटते हैं एक घाटी की ओर तो दूसरा शहर की ओर जाता है। इन रास्तों पर कोई साइन बोर्ड नहीं लगा है। वह अपनी धुन में पैदल चली जा रही है। वह अपने में इतनी खोई है कि उसे लग रहा है कि वह मालरोड़ पर चल रही है।

कितनी दूर निकल आई उसे होश ही नहीं था। जब पैरों ने उठने से मना कर दिया तब उसे अहसास हुआ कि वह सुरक्षित रास्ते को बहुत पीछे छोड़ आई है। अब वापस जाना संभव नहीं। शैलेन्द्र उसके अंदर मचल रहा था। जब तक रास्तों ने उसके कदमों के साथ घात नहीं कर दिया। वह चलती जा रही थी। रास्ता एक सघन जंगल में उसे ले गया। पर उसे सही

रास्ता ढूंढ लेने का विश्वास था अपने पैरों पर।

वह बहुत देर तक भटकती रही, जब रास्ता नहीं मिला तो फिर उसने होटल फोन लगाकर शैलेन्द्र का नंबर लिया और उसे अपनी स्थिति के बारे में बताया। शैलेन्द्र ने उसे वहीं रुकने को कहा और उसकी लोकेशन के अनुसार उसे खोजने निकल गया। होटल की कार थी‌‌। ड्रायवर साथ था जो उन रास्तों से कुछ कुछ परिचित था। थोड़ी देर में नीरज एक पुल की मुंडेर पर बैठी नजर आ गई। शैलेन्द्र ने दौड़कर उसके बीच की दूरी तय की। क्या हो गया तुम्हें? तुम ठीक तो हो। चलो बैठो कार में। परंतु वह कुछ और ही सोच रही थी। बोली, तुम मेरे साथ इस जंगल में यूं ही बेसबब भटक सकते हो? कार को वापस भेज दो शैलेन्द्र। मैं अब जिंदगी के तमाम रास्ते खुद अपने पैरों के भरोसे ही तय करूंगी चाहे पूरी दुनिया मेरे साथ घात करती रहे। तुम भी चाहो तो वापस कार में जा सकते हो।

शैलेन्द्र ने उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में लेकर सीने से लगा लिया। नीरज तुम्हारे लिए यह जंगल और जीवन दोनों ही भरोसेमंद नहीं है। अभी मेरे साथ चलो। कल तस्सली से बात करेंगे। जिंदगी के इतने दुर्गम फैसले इतनी हड़बड़ी में नहीं लिये जाते।

वह अपनी जगह पर उसी तरह बैठी रही। शैलेन्द्र असमंजस में था कि ऐसी स्थिति में वह क्या करे? वह भी उसके पास बैठ गया। उसके हाथ को अपने दोनों हाथों में लेकर उसके अंदर मचल रहे तूफान को महसूस करने की कोशिश करता रहा। फिर धीरे से बोला बताओ क्या चाहती हो? मैं तुम्हारे साथ पूरी रात क्या पूरी जिंदगी भी ऐसे ही भटक सकता हूं। पर यह कोई तरीका नहीं है जिंदगी से जूझने का। अभी बहुत रात हो चुकी है तुम्हें निर्णय करना है कि इसी तरह जंगल में बैठे रहना है या घर वापस चलें फिर भटकनों को अर्थ देने के लिए वापस आयेंगे इन्हीं जंगलों में।

उसके अंदर का तूफान कुछ कम हुआ। वह थोड़ी सहज होते हुए कार की तरफ चल दी। अब वह वो लड़की नहीं थी जो होटल के रिसेप्शन पर खड़े रह कर मुस्कुराहट का नकाब ओढ़े रहती। उसके अंदर की कमजोर लड़की इस जंगली रास्ते पर कहीं छूट गई थी। अब वह खुद के अलावा किसी भी विश्वास और घात से डरने वाली नहीं थी। उसके पैरों में दुनिया को नाप लेने की ताकत महसूस हो रही थी।

आंख, दवाई और चश्मा

सुबह अभी पूरी तरह से घटित नहीं हुई थी। घटने की तैयारी कर रही थी। आसमान में सूरज की लाली लद्दाखियों के गालों की लाली की तरह झलक मार रही थी। ठंडे इलाकों की सुबह कुछ ज्यादा ही ठंडी होती है। सूरज भी जैसे चांदनी में नहाकर आ रहा हो ऐसा लगता है।

इस ठंडी सुहानी सुबह की झलक देखने जैसे ही उसकी आंख खुली, उसे पता चला कि रात में आंख में इंफेक्शन हो गया है, क्योंकि आंख खुलने को तैयार नहीं थी। दांयी आंख के दोनों पलक एक दूसरे से दो प्रेमियों की तरह चिपके थे। उसने उठकर गुनगुने पानी से आंखें साफ की तो आंख में दर्द महसूस हुआ। आंख बिना गुस्से के ही लाल हो रही थी। आंख से पानी पहाड़ी दरारों से रिसने वाले पानी की तरह रिस रहा था।

वह जैसे तैसे तैयार होकर होटल पहुंच तो गयी, परंतु रिसेप्शन पर खड़ा होना उसके लिए संभव नहीं था और ठीक भी नहीं था। उसने होटल मैनेजर को अपनी आंख दिखाई। वैसे नहीं जैसे पत्नी अपने पति को दिखाती है। मैनेजर कुछ भला आदमी टाइप का था। उसने अपनी कार से उसको डाक्टर के पास भेज दिया।

डाक्टर ने आंख का मुआयना किया ठीक वैसे जैसे पटवारी इलाके का करता है। फिर उससे पूछा पहले भी कभी ऐसा हुआ है? हां सर, एक साल पहले भी आंख में ऐसी ही प्राब्लम हुई थी। तब डाक्टर ने क्या कहा था? उसने पूछा। उसने कुछ संकोच में .. सर स्पेक्स लगाने को बोला था। ‘फिर तुमने लगाया? डाक्टर ने सवालिया निगाहों से उसको घूरा। ‘नहीं सर’ … उसने संक्षिप्त सा जबाव दिया।

डाक्टर, देखो तुम्हारी आंखें वीक हैं। यदि स्पेक्स नहीं लगाओगी तो इन पर और दबाव पड़ेगा तो डेमेज बढ़ता जायेगा। तुम आज ही आंखें चेक करवा कर नंबर निकलवाओ और स्पेक्स बनवा लो। अभी के लिए ये ड्राप और दवाईयां लिख रहा हूं। पांच दिनों तक इन्हें नियमित लेना। मगर चश्मा नहीं बनवाओगी तो यह रिपीट होता रहेगा।

थेंक्यू सर! कहकर वह बाहर आ गई। वह कैसे बताती डाक्टर को कि उसके पास दवाइयां लेने के लिए भी पैसे नहीं हैं, चश्मा कैसे बनवायेगी? ग़रीबी सबसे बड़ी बीमारी है। जब उसका इलाज नहीं है तो आंख, नाक, कान, गला या छालों का इलाज कैसे संभव है?

अभी कुछ दिन पहले ही उसने टिप्स में मिले पैसों से जूते लिये थे। पुराने जूतों में उसे छाले पड़ गये थे। वह सोच रही है कि हमारी टिप्स अब सरकार लेने लगी है जीएसटी के रूप में। अब तो टिप्स भी कभी कभार ही मिलती है।

आत्ममुग्धता के बिना

वह अक्सर देखती है कि शिमला में आने वाली लड़कियां अपने आप में मस्त रहती हैं। मेकअप, मिडी, मोबाइल, और मंचूरियन उनकी पसंद हैं। वे हमेशा तरह तरह से सेल्फी लेती हैं। ब्रेकफास्ट में ही दस पंद्रह सेल्फी, फिर होटल से बाहर निकलते हुए दस पंद्रह। फिर कार में बैठते हुए। मतलब कोई एक पल ऐसा नहीं जिसे वे लेल्फी में नहीं उतारना चाहती हों। वह सोचती है इन लड़कियों का जन्म ही मानो सेल्फी लेने के लिए हुआ है। ये दुनिया से बेखबर हैं। क्या हो रहा है दुनिया में इन्हें लेना देना नहीं है। कितनी लड़कियों के साथ बलात्कार हो रहे हैं, कितनी खुद को बेच रहीं हैं, कितनी ग़रीबी और अभाव में पिस रहीं हैं। इन लड़कियों को कोई मतलब नहीं है। खाना प्लेट में छोड़ देना इनके लिए आम बात है। इन्हें न खाना बनाना न कमाना। इसलिए ये खाने का मूल्य नहीं समझतीं। फेंके हुए खाने का मूल्य पैसे से चुकाया जा सकता है? या किसी की भूख से? ये लड़कियां कभी नहीं सोचती होंगी कि पैरों में छाले पड़ने का मतलब क्या होता है? या आंखों से लगातार पानी क्यों बहता है?

ऐसी ही लड़कियों से बड़े बड़े होटल चलते हैं। ऐसी ही लड़कियों ने खाने की चीजों को इतना मंहगा करवा दिया है कि उस जैसी लड़कियां कभी इस जैसे होटल में जाकर खाना नहीं खा सकतीं हैं। उसके एक माह के वेतन में दो दिन भी वह खाना नहीं खा सकती है इस होटल में। ये लड़कियां इतनी डूबी हुई हैं अपने में कि सेल्फ, सेल्फी, फेसबुक के अलावा भी जिंदगी है इन्हें पता ही नहीं है।

ऐसे ही एक दिन उसके होटल में सात लड़कियों का ग्रुप आया। वे शिमला घूमने आईं थीं। पांच दिन वे इस होटल में रुकीं। वह रोज ही उनसे हाय हैलो करती थी। एक दिन उसने उनसे पूछा आप लोग क्या करती हैं? कोई जाब या बिजनेस? वे लड़कियां उसे अचरज से देखने लगीं!! उनमें से एक बोली हमें काम करने की क्या जरूरत है? हमारे पास पैसे की कोई कमी नहीं है। खर्च करने की भी कोई लिमिट नहीं है। हमारा काम है जिंदगी को फुली एंजाय करना। ओह! मतलब आप लोग परजीवी हो। उसने कहा और धीरे से होंठो में बुदबुदायी पृथ्वी पर बोझ हैं ये लोग। फिर उसने बात बदलते हुए उनसे कहा कि अच्छा ये बताइए आपने कभी अपने लिए कुछ अर्जित किया है? कभी एक कप चाय अपनी मेहनत की कमाई से पीने की कोशिश की है? आपको ये होटल का खाना अच्छा नहीं लगता है न। नीरज ने पूछा। तो एक लड़की बोली बहुत अच्छा लगता है। हम तो रोज ही फाइव स्टार होटल में खाते हैं।

‘यदि आपको ये खाना अच्छा लगता है तो आप रोज प्लेट में आधा खान क्यों छोड़ देती हैं? उसने कहा। मैं तो कभी भी कुछ भी प्लेट में नहीं छोड़ती जबकि मेरे पास सादा खाना होता है। अब वे लड़कियां एक दूसरे का चेहरा देखने लगीं! वह समझ गई कि उनके पास इसका जबाव नहीं है। तो वह बोली मेडम मैं बताती हूं। आप रोज रोज इतना सारा खाना आर्डर करती हैं और आधे से ज्यादा इसलिए छोड़ देती हैं कि आपको इस खाने का मूल्य खुद नहीं कमाना होता है। आप खुद मेहनत करके जब खाना खायेंगी तो कभी इस तरह आधा खाना नहीं फेंकेंगी। आपको खाने का मूल्य पता नहीं है। आप पिता के बैंक बलेंस से बिल अदा करके समझती हैं कि आपने कीमत चुका दी है खाने की।

‘सारी ! माफ़ कीजिए मैं कुछ ज्यादा ही बोल गयी।’ उसे होटल का एम्पलाई होने का अहसास हुआ तो उसने माफी मांग ली। वे लड़कियां वैसी लड़कियां नहीं थीं जो उसकी बात समझ पातीं। भूख और श्रम का संबंध उन्हें नहीं पता था। वह लड़की आत्ममुग्ध नहीं थी, उन लड़कियों की तरह। इसलिए वो यह सब कहने का साहस कर सकी।

कविता से पेट नहीं भरता

शिमला सैलानियों के लिए आदर्श जगह थी। यहां बहुत ज्यादा ठंड और बर्फ नहीं पड़ती। गर्मी भी अधिक नहीं होती। अधिकांश मौसम रहने लायक होता है कुछ दिनों को छोड़कर। यहां अक्सर साहित्यकार, कवि, दार्शनिक, प्रोफेसर, रिसर्चर टाइप के लोग आते रहते हैं। कुछ लोग महीनों रुक करके अपनी कहानी, उपन्यास, कविता या रिसर्च का काम करते हैं। उसका व्यवहार काफी मानवीय है तो वह सबसे बोलती बात करती रहती है। वह जीवन को संबंधों के बीच महसूस करती है। कभी कभी कुछ लोग स्थाई रूप से जीवन में जुड़ जाते हैं।

अबकी बार एक कवि-साहित्यकार होटल में अकेले ही आये हुए थे। वे कवि ज्यादा थे साहित्यकार कम। ब्रेकफास्ट, लंच या डिनर के समय उनकी टेबिल पर यदि कोई बैठ जाये तो फिर वे खुद को कवि होने से रोक नहीं पाते थे। उस बेचारे को नाश्ते में टोस्ट, आमलेट, इडली सांभर इत्यादि के साथ दो चार कविताएं भी पेट में डालनी पड़ती थीं और बेस्वाद होते हुए भी तारीफ करना होती थी।

एक दो दिन से कवि महोदय को कोई ब्रेकफास्ट, लंच या डिनर पर मिला नहीं था कविता सुनाने के लिए। उन्हें बदहजमी हो चली थी‌‌। उनके दिमाग में मरूर टाइप का कुछ उठने लगा था‌‌। आज वे ब्रेकफास्ट करके सीधे रिसेप्शन पर आ गये और उस लड़की से उसका नाम और परिचय लेने लगे। वह अपनी प्रोफेशनल शिष्टता से उन्हें जबाव देती रही। फिर वे बोले मैं कुछ दिनों से तुम्हें रोज देख रहा हूं तुम काफी अलग हो।

मैंने तुम्हारे लिए एक कविता लिखी है। आज सोचा सुना ही दूं। जी! सर। पर मुझमें ऐसा कुछ नहीं है जिसके लिए कविता लिखी जाये। उसने कहा‌। पर वे कब मानने वाले थे। उन्होंने अपने दिमाग की जेब में हाथ डालकर कविता निकाल ही ली। और सुनाने लगे‌। शिष्टाचारवश उसे कविता सुनना पढ़ी। कविता में उसकी आंखों, लंबे बालों और सादगी के स्थूल रंगों की तारीफ की गई थी। कविता सुनकर उसने शुक्रिया अदा किया। कवि महोदय की भूख अभी शांत नहीं हुई थी। वे कुछ और सुनाना चाहते थे।

नीरज ने उनसे पूछा कि आपको मेरी आंखें झील सी दिखाई दीं? पर उस झील से बहने वाला पानी नहीं दिखाई दिया। आपको मेरे काले लंबे बाल दिखाई दिये पर मेरे पैरों के छाले जो पंद्रह घंटे खड़े रहने से अक्सर हो जाते हैं, वे नहीं दिखाई दिये। सर जी, आपकी कविता से मेरा पेट नहीं भर सकता। आपके पेट का दर्द अलबत्ता मुझे सुनाने से ठीक हो गया होगा।

कवि जी को कविता और जीवन के संबंध के बीच का अंतराल समझ आ गया था। दूसरे दिन वे अपना बोरिया बिस्तर उठाकर चले गये।

खुद से इरिटेड होती वो लड़की

शैलेन्द्र को गये हुए काफी वक्त गुजर गया था। इस बीच उससे कोई संपर्क नहीं हुआ। वो लड़की सोचती की उसे करना चाहिए पहले फोन…..बार बार शैलेन्द्र के नाम तक पहुंची हुई अंगुलियां और डायलिंग के बीच नीरज का अहम आ जाता और नंबर डायल नहीं कर पाती। बहती नदी के रास्ते में चट्टान भी आ जाये तो नदी का प्रवाह इसे काट देता है। प्रेम यदि प्रवाह नहीं है तो वह जड़ हो जायेगा और धीरे-धीरे सड़ने लगेगा। नीरज और शैलेन्द्र के बीच भी स्वाभिमान नाम का पहाड़ खड़ा हो गया और नीरज चाहते हुए भी आगे नहीं बढ़ सकी।

नीरज खुंखारियत की हद तक खुद के प्रति निर्मम और खड़ूस होती जा रही है। उसके अंदर जीवंतता के कोई लक्षण नहीं थे। जैसी कोई फीलिंग उसके पास नहीं बची थी। खाने-पीने के प्रति अत्यधिक उपेक्षा। जो सामने जैसा कुछ मिल गया खा लिया न कोई पसंद, न कोई स्वाद। ऐसे ही पहनने के प्रति भी कोई पसंद और न पसंद नहीं। कुछ भी कैसा भी उठाया और पहन लिया। उसकी फ्रेंड्स उसे टोकने लगीं थीं। ‘आजकल क्या करती हो तुम’; ‘कहां रहता है तुम्हारा ध्यान।’ तुम इतनी बेस्वाद क्यों होती जा रही हो इन दिनों? इस तरह के सवाल भी उस को किंचित भी उत्तेजित नहीं करते।

एक दिन वह मोटा मोटा काजल लगाकर, दो चोटी करके माथे पर बढ़ी सी हरी बिंदी लगाकर और सलवार के ऊपर टाप पहनकर आ गई। होटल में वह एक अजूबा की तरह दिखाई दे रही थी। पर उस लड़की का ध्यान इस ओर था ही नहीं कि लोग उसे ही घूर रहे हैं। वह इस दुनिया में थी ही नहीं। वह तो अपने आप से भाग रही थी। वह खुद से इतनी इरीटेड हो चुकी थी कि अपने दिखने वाले आकार-प्रकार को उसने इस तरीके से मोड़ लिया कि कोई अब उसमें रुचि नहीं लेता था।

शैलेन्द्र की यादें भी गर्म तवे पर गिरे हुए पानी की तरह आतीं रहीं। घर और समाज तो जैसे उसके लिए गधे के सिर से सिंग की तरह नदारद थे। अब उसने नियमित रम पीना शुरू कर दिया था। होस्टल में उसकी रूम पार्टनर उसके अंदर आये इस परिवर्तन को महसूस कर रहीं थीं। पहले वह कभी कभार लेती थी। लेते समय कुछ संकोच भी होता था पर आजकल बिंदास बिना हिचक के लेती है।

‘तुम्हें कुछ दिनों के लिए छुट्टी लेकर अपने घर या किसी दोस्त के पास चले जाना चाहिए।’ उसकी पार्टनर ने कहा। वह उसे कुछ देर तक घूरती रही। फिर बोली जिनसे छुटकारा पाने के लिए मैं यहां घुल रही हूं, तुम उनके पास जाने को बोल रही हो.…..क्या है परिवार? कौन है असली दोस्त इस दुनिया में। सब जीने के लिए हर पल मर रहे हैं। मृत्यु, बदनामी और अनैतिकता के नाम पर इतना डरते हैं ये लोग कि इससे तो अच्छा हो कि एक बारगी मर जायें, या बदनाम हो लें या अनैतिकता की चरम स्थितियों को जी लें तो शायद ज़िंदगी भर सुख चैन से सो सकेंगे।

भय से मुक्त प्रेम

उसे आजकल अपने चारों ओर भय के अदृश्य तार बिछे हुए महसूस होते हैं। वह कहीं भी अपनी मर्जी से हाथ पैर चलाने की सोचती है कि उसके हाथ-पैर इन अदृश्य तारों में उलझ जाते हैं। क्या करूं मैं? अचानक उसके अंदर एक तूफान सा उत्साह पैदा होता है। विवशता के जंजाल ने उसके अंदर विद्रोह की चेतना भर दी थी। आज उसने एक नई बात सोची।

उसने फोन उठाया और शैलेन्द्र को काल किया। दूसरी तरफ देर तक रिंग बजती रही। फिर शैलेन्द्र की आवाज आई हैलो ! कैसी हो? उसने बिना किसी औपचारिकता के कहा। ‘मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूं। कब तक यहां आ सकते हो?’ शैलेन्द्र इस तरह की स्थिति के लिए तैयार नहीं था। उसने पूछा क्या हुआ ? कुछ बताओ तो…..उसने कहा मैं तुम्हारे साथ एक बीहड़ यात्रा करना चाहती हूं। बिना किसी प्लानिंग के, बिना तयशुदा मंजिल के, बिना बने हुए रास्तों पर, अंधेरी, अनपरखी, अनजानी खाइयों और पहाड़ों की ऊंचाइयों की यात्रा और तुम ‘न’ नहीं कहोगे।’

दूसरी ओर कुछ देर चुप्पी छाई रही। वह भी इंतजार करती रही। वह जानती है कि शैलेन्द्र भी एक बने बनाये सांचे के जीवन का आदी हैं। पर वह एक आदमी के साहस और स्वतंत्रता की फीलिंग को जीना चाहती थी। उसे विश्वास था कि शैलेन्द्र यह साहस कर सकेगा। उधर से आवाज आई मैं कल तक पहुंच रहा हूं। तुम तैयार रहना यात्रा पर चलने के लिए। इतना कहने के साथ फोन रख दिया गया।

उसे अपने विश्वास पर थोड़ा गुमान होने लगा। शैलेन्द्र बिना किसी सवाल के तैयार हो गया यह अचरज भरी बात थी। उसकी शैलेन्द्र से बहुत कम मुलाकात थी। दोनों एक दूसरे के बारे में कुछ नहीं जानते थे पर दोनों ने एक दूसरे की गहराई ठीक से अनुभव कर ली थी।

उसने अपने लिए आवश्यक सामान एक बैग में भर लिया। कुछ कपड़े और कुछ बहुत जरूरी चीजें। दवाइयां, खाने पीने का सामान। दो तीन बाटल पानी और चाय काफी के पाउच। तीन चार मोजे और एक अतिरिक्त शूज भी बैग में रख लिए। गर्म कपड़े और मास्क रखना भी वह नहीं भूली। पहाड़ी रास्तों पर जिन चीजों की जरूरत थी उसने वे सब रख लीं। उसने कुछ भी नहीं सोचा था कि कहां जाना है। वह बस इस माहौल से दूर जाना चाहती थी। इस यात्रा में वह अपने आपको परखना चाहती थी।

दूसरे दिन शैलेन्द्र लगभग सात बजे शिमला पहुंच गया। शिमला के बस स्टाप पर उसने उसको बुला लिया। वहां उन्होंने गर्मागरम पुड़ी और आलू छोले की सब्जी का नाश्ता किया। चाय पी और सामने खड़ी किन्नौर जाने वाली बस में बैठ गये। किन्नौर जिला सतलज और स्पीति नदी के किनारे बसा हुआ एक बीहड़ सौंदर्य का साक्षी है। किन्नौर का मुख्यालय रिकांगपिओ है जो ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों, गहरी घाटियों और औषधीय वनस्पतियों से समृद्ध है।

किन्नर कैलाश शिव जी का शीतकालीन निवास माना जाता है। शिव अपने श्मशानी सौंदर्य और अराजक प्रेम के लिए जाने जाते हैं। बस्पा घाटी किन्नौर की सबसे सुंदर घाटी है। यहां से जंस्कार पर्वत श्रृंखला के दर्शन भी आरंभ हो जाते हैं। शिमला से लगभग दो सौ पचास किलोमीटर दूर किन्नौर मुख्यालय तक पहुंचते पहुंचते शाम हो गई। नीरज और शैलेन्द्र ने एक काटेज में रात गुजारने का निश्चय किया। ठंड बहुत तीखी होती जा रही थी। बस से उतरकर दोनों ने काफी पी और कुछ स्नेक्स लिए। इसके बाद वे काटेज की तलाश में निकले। द अल्पाइन नेस्ट नाम के एक छोटे से होटल में दोनों ने रुकने का फैसला किया।

यह होटल एक छोटी सी पहाड़ीनुमा चोटी पर बना था। तीन तरफ ऊंची ऊंची बर्फ से ढंकी पर्वत श्रेणी दिखाई दे रही थी। पास में एक पहाड़ी झरना बह रहा था। उनको इसका नीरव सौंदर्य बहुत पसंद आया। शाम ढलने लगी थी और वे दोनों भी थके हुए थे तो दोनों ने रात का खाना जल्दी ही खा कर आराम करने के बारे में सोचा। पर कल की यात्रा कैसे और किस दिशा में आरंभ की जायेगी इसके बारे में कुछ भी अंदाजा नहीं था। इसलिए शैलेन्द्र ने उससे कहा तुम कुछ देर आराम करो मैं आसपास के इलाके के बारे में कुछ जानकारियां जुटाकर आता हूं तो उसने कहा मैं भी साथ चलूंगी। हम कोई हनीमून मनाने नहीं आये जो तुम अकेले मेरे आराम के साधन जुटाओ।

वे दोनों वहां के स्थानीय निवासियों से मिले और किन्नौर की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक जानकारी लेते रहे। आसपास के ट्रेकिंग के रास्तों के बारे में भी पूछते रहे।

यहां आकर उस लड़की के अंदर का ज्वालामुखी कुछ समय के लिए शांत हो गया। भौगोलिक और भौतिक स्थितियों ने उसकी मन:स्थिति को बदल दिया था। उसने शैलेन्द्र से कहा कि हमारा जीवन अपनी भौगोलिक और भौतिक स्थिति से कितना गहरे तक जुड़ा है यह बात आज समझ आई।

किसी एक सज्जन ने उन्हें बताया कि बस्पा घाटी के अंतिम गांव छितकुल में देवी माथी के तीन मन्दिर हैं। ये आम देवी मंदिरों से अलग हैं। यहां जाना चाहिए। दोनों ने छितकुल की यात्रा पैदल करने की सोची। रिकांगपिओ से छितकुल लगभग पैंसठ किलोमीटर दूर है। परंतु यह आसान रास्ता नहीं है। मुख्यालय से लगभग एक हजार मीटर की उंचाई पर जाना था। उसके लिए यह यात्रा स्वर्ग कि यात्रा की तरह थी‌।

शैलेन्द्र ने पूरी यात्रा को तीन चरणों में चार पांच दिन में पूरा करने की योजना बनाई। पहला स्टाप करछम पर होना था जो राजमार्ग 22 का अंतिम पड़ाव था। दूसरे दिन सुबह उन्होंने सुबह आठ बजे यात्रा आरंभ करने का तय किया और एक लंबी कठिन और अजूबी यात्रा के रोमांच से भरे वे दोनों नींद के आगोश में समा गये।

उन दोनों के बीच भी एक यात्रा चल रही थी जिसकी दूरी बहुत नहीं थी पर जिसे पार करने में अभी वक्त लगना तय था। छितकुल की प्राकृतिक यात्रा उनके लिये सिर्फ भौगौलिक यात्रा नहीं थी। यह एक नये जीवन की खोज के लिए की गई यात्रा बनने वाली थी।

गहरी नींद और उसके बाद की एक खूबसूरत सुबह ने दोनों को एक नयी ताजगी से सराबोर कर दिया। होटल की बालकनी में सूरज का आगमन मानो गहरे अंधेरे से निकलकर बाहर की रोशनी से परिचय करा रहा था। उसने कहा आह! सूरज इतना आकर्षक भी हो सकता है ऐसा पहली बार महसूस हो रहा शैलेन्द्र। हां ! यह अद्भुत सुबह है मेरे जीवन की। कितना सहज कितना मनोरम, कलुषता और विषाद की कोई रेखा नहीं आज की इस सुबह में। तुमने जिंदगी का एक सर्वथा नया परिप्रेक्ष्य उजागर कर दिया। कैलाश और शिव के संबंध को समझ पाना अब बहुत आसान है। पार्वती की भय मुक्त प्रेम की आकांक्षा ने शिव को आकर्षित किया था और कैलाश जैसे विशाल व्यक्तित्व का धनी शिव पार्वती के निष्कलुष निर्भ्रांत प्रेम के आगे नतमस्तक हो गया।

‘क्या यह सिर्फ दैहिक आकर्षण हो सकता था?’ उसने शैलेन्द्र से पूछा। शैलेन्द्र ने इस बात का उत्तर दिये बिना ही कहा चलो अब हमें यात्रा आरंभ करनी चाहिए। हो सकता है इस यात्रा के दौरान तुम्हारे सवाल का जबाव मिल जाये। फिर दोनों तैयार होकर बाहर निकले। नाश्ता तैयार था। दोनों ने हल्का फुल्का नाश्ता किया और रास्ते के लिए परांठे और आलू की सब्जी पैक करवा ली। एक थर्मस में चाय भी ले ली। दोनों ने अपने ट्रैवलिंग बैग पीठ पर कस लिये और निकल पड़े अनजान रास्तों पर अनजानी मंजिल की ओर…..

रिकांगपिओ से वे करछम के रास्ते पर राजमार्ग की ओर चल पड़े। उसने साथ साथ चलने के लिए शैलेन्द्र के हाथ में अपना हाथ ले लिया। अब वे दो नहीं थे। एक ही थे। जैसे रास्ता दो किनारों के साथ एक ही होता है। अब रास्ता चल रहा था। वे तो बस खोये थे एक दूसरे को अपने अंदर महसूस करते हुए। राजमार्ग पर इक्का दुक्का कारें और बसें निकल रहीं थीं, परंतु वे बेखबर थे दुनिया की मौजूदगी से। यही वह चाहती भी थी।

कुछ दूर चलते रहने के बाद एक पुल आया। पुल के नीचे कल-कल करता हुआ झरना बह रहा था। वे थकान महसूस करने लगे थे। उसने शैलेन्द्र का हाथ राजमार्ग से झरने की तरफ खींचा। शैलेन्द्र उसका इशारा समझ गया। लगभग दस बज रहे थे। धूप में थोड़ी तेजी आ गई थी। वे दोनों पगडंडी से झरने की तरफ उतर गये। झरने के किनारे ऊबड़-खाबड़ पत्थर पड़े थे‌। वह एक पत्थर की ओर बढ़ गई। उस पत्थर पर बैठकर झरने के प्रवाह का आनंद लिया जा सकता था। शैलेन्द्र भी उसके साथ साथ उस पत्थर पर बैठ गया। दोनों ने अपने जूते मोजे उतारकर किनारे पर रख दिये और जींस को ऊपर चढाते हुए पैरों को पानी में मुक्त छोड़ दिया।

झरने का ठंडा पानी उसके पैरों को छूता हुआ शैलेन्द्र के पैरों को भिगोता हुआ आगे बढ़ रहा था। यह स्पर्श शैलेन्द्र के लिए अनौखा था, क्योंकि उसके पैरों से होती हुई धारा उसकी गर्मी को शैलेन्द्र तक पहुंचा रही थी। शैलेन्द्र ने कहा पानी में कुछ गुनगुनापन महसूस हो रहा है? और उसकी ओर देखने लगा। वह कुछ समझी नहीं। तो वह आश्चर्य से शैलेन्द्र की ओर देखने लगी। नहीं शैलेन्द्र; पानी तो काफी ठंडा है। मेरे पैर तो शून्य होने लगे हैं। उसने सहज भाव से कहा। शैलेन्द्र ने उसके पैरों को पानी से निकाल कर अपनी हथेलियों के बीच रख लिया। इन्हें उष्मा की जरूरत है। अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है। उसकी चेतना में उष्मा की धाराएं बहने लगीं। उसकी देह में एक विलग सा रोमांच का तूफान उठ चला। किसी के हाथों में इतनी ऊर्जा कैसे हो सकती है। उसके बर्फ की तरह ठंडे पैरों में रक्त का संचार बढ़ गया था।

शैलेन्द्र बहुत होले होले से उसके पैर के तलुओं में हाथ की गद्दियों को रगड़ रहा था। जैसे तत्काल जन्में बछड़े को गाय अपनी जीभ से सहलाती है। उसको दैहिक स्पर्श का इतना सुखद अहसास कभी नहीं हुआ था। वह बोली शैलेन्द्र …! बस करो मेरी चेतना का दावानल धधक रहा है। रुको…. शैलेन्द्र रुको …. मैं समझ गई की पार्वती और शिव का संबंध क्या था?

शैलेन्द्र ने अपने हाथों के आगोश से उसके पैरों को मुक्त किया और उसकी आंखों में उस ऊर्जा को महसूस किया जिस ऊर्जा को उसने अभी अभी उसके तलवों में प्रवाहित किया था। उसने अंजुलि भर कर ठंडे पानी से आंखों को भिगोया। चेहरे को प्रक्षालित किया और बालों में ठंडे पानी से भीगे हाथों को फिरोया। शैलेन्द्र मेरा मन हो रहा है कि इस झरने में कूद जांऊ। यह मेरे मन की ही नहीं तन की भी मांग से शैलेन्द्र। मैं इस उष्मा के ताप की ताशीर को पूरी शिद्दत से जीना चाहती हूं।

हमें बहुत दूर की यात्रा करनी है। अभी आगे चलते हैं। यह कहते हुए शैलेन्द्र ने उसके जूते उठाकर उसकी ओर बढ़ा दिये और खुद भी जूते पहनने लगा। वह समझ गई की शैलेंद्र वक्त की नजाकत को समझता है। शैलेन्द्र शिव नहीं है एक इंसान हैं।

शैलेन्द्र को याद आया कि थर्मस में चाय रखी है। उसने बैग खोलकर थर्मस निकाला और उसके ढक्कन में चाय निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दी। नीरज ने चाय ले ली। फिर शैलेन्द्र ने भी उसी ढक्कन में चाय पी और वे ऊपर राजमार्ग पर आ गये। यहां से करछम दस किलोमीटर के लगभग था। वे एक दूसरे में खोये हुए आगे बढ़ गये।

वह इतनी गहरे उतर चुकी थी कि उसे खुद का भी होश नहीं था। वह शैलेन्द्र के हाथ में हाथ डाले हुए यंत्रवत चली जा रही थी। शैलेन्द्र को महसूस हुआ जैसे वह गहरी नींद में चल रही हो। उसने उसको झिंझोडा। कहां खो गईं हो,? वस बेहोशी से होश में आते हुए इधर उधर देखने लगी।

कुछ सहज होते हुए उसने कहा शैलेन्द्र तुमने मेरे पैरों के छाले बिना देखे महसूस किये थे उस दिन होटल के रिसेप्शन पर। आज तुमने मेरे अंदर गहरे दफ्न छालों पर अमृतजल छिड़क दिया। मेरे अंदर न जाने कितने घाव और छाले बर्षों से पनपन रहे थे। आज जो शीतलता मैं महसूस कर रही हूं वह अद्भुत है। तुम इतना प्रेम कैसे कर सकते हो ? इतनी उन्मुक्त ऊर्जा का प्रवाह बिना अदम्य प्रेम के संभव नहीं है।

यह जो अनुभूति की तपिश हम महसूस कर रहे हैं यह परिवेश और परिस्थितियों की जकड़न से मुक्ति के बिना संभव नहीं है। हम अपनी भौतिक परिस्थितियों और सामाजिक परिवेश की गहरी जकड़न में जब होते हैं तो हम भयभीत होते हैं, डर हमारी चेतना में प्रवाहित होता रहता है। हर समय, हर जगह हम सचेत चौकन्ने और सजग रहते हैं। यह जो सजगता है वह हमारे अंदर के डर के कारण पैदा होती है। अब देखो न यहां हम बिल्कुल बेपरवाह हैं। न यहां की भौतिक परिस्थितियों का भय हमारे बीच हैं न सामाजिक परिवेश की अमूर्त नैतिकता की काली छाया हमारे आसपास है। इसलिए हम यह अप्रतिम अनुभूति को महसूस कर पा रहे हैं।

वह भय से मुक्ति का मतलब समझ रही थी। यह भय से मुक्ति उस परिवेश में संभव नहीं जिसके कारण हम भयभीत रहते हैं। उसने कहा, शैलेन्द्र तुमने शिव की सार्थकता का औचित्य सिद्ध कर दिया। शिवत्व याने मुक्ति के अनुभव के बिना सौंदर्य का कोई अर्थ नहीं है। प्रेम भी सौंदर्य का ही एक अनुभव है।

रास्ता चल रहा था। यात्रा जारी थी। अंदर भी बाहर भी। पहाड़ चढ़ उतर रहे थे। झरने अपनी नियत गति से बह रहे थे। पत्थर, पेड़, पशु, पक्षी सब अपनी नियति में बंधे इस यात्रा के साक्षी बन रहे थे। जंगल अपने यौवन में मस्त था। हर तरफ एक स्वर रहित संगीत गूंज रहा था। संगीत के समस्त यंत्र अपनी निजता को खो चुके थे। मौन पर चंचल गतिमान संगीत चारों तरफ प्रवाहित होने लगा था। उसका अंतर्मन शैलेन्द्र के अनिंद्य स्पर्श से वीणा की तरह झंकृत हो रहा था।

शैलेन्द्र के अंदर कुछ और ही चल रहा था। शैलेन्द्र रास्ते के पत्थरों और निर्जनता की ठोस जमीन पर चल रहा था। उसे उसकी स्थिति का भान था पर वह जीवन के कठोर पथरीलेपन की ओर से मूंह नहीं मोड़ सकता था। उसने उस लड़की को वास्तविकता का अहसास कराना उचित समझा।

शैलेन्द्र ने कहा हम करछम के नजदीक आ गये हैं नीरज। मुझे भूख लग रही है। खाना खिलाओ यार। इतना कहकर बह एक चट्टान की ओर बढ़ गया। चट्टान काफी बड़ी थी। शैलेन्द्र उस पर लेट गया जैसे दिनभर काम करके घर आने पर पलंग पर खुद को ढीला छोड़ देता है। नीरज भी उसके पास आकर सीधी लेट गई। उसने घड़ी पर नज़र डाली तो दो बज रहे थे। सूरज सर के पार निकल गया था और पहाड़ों के बीच लुकाछिपी कर रहा था। मौसम में ठंडक घुलने लगी थी। उसने अपना बैग खोलकर परांठे और सब्जी निकाल कर प्लेट में रख दी। उठो शैलेन्द्र खाना लगा गया है। उसने शैलेन्द्र को हिलाते हुए कहा। शैलेन्द्र की झपकी लग गई थी। वह उठ कर सीधा बैठ गया और नीरज के साथ पराठें खाने लगा।

तीन बजे के आसपास वे लोग करछम पहुंच गये। नीरज को लगा कि वह किशोर अवस्था में प्रवेश कर गयी। वो लड़की अपने बचपन से बाहर आ गई थी। अब जो यात्रा थी वह अल्हड़ किशोर पहाड़ी नदी की तरह उछलती कूदती शोर मचाती हुई दिख रही थी। वह पूर्णतः स्वच्छंद उन्मुक्त होकर बहने को तैयार थी। अब किसी भी भय, डर, संकोच, नैतिकता की चट्टानें उसे रोक नहीं सकतीं थीं। वह अब वो लड़की नहीं थी जो पैरों में छाले होने के बावजूद रिसेप्शन पर खड़ी रहे। अब वो अपने नाप के जूते चुनना और पहनना सीख चुकी थी।

चट्टानों को तोड़ती वो लड़की

करछम में एक दिन रुकने का फैसला किया उन्होंने। करछम प्राकृतिक छटाओं से भरा स्थल है। यहां से छितकुल के लिए रास्ते अधिक जोखिम भरे हैं। ऐसा करछम के लोगों ने बताया। आज का पूरा दिन वे स्थानीय लोगों से मिलते जुलते रहे। वहां के रहन-सहन, खान-पान और कठिन समय में जीने की तहजीब के संबंध में बहुत कुछ सीखते रहें। एक बुजुर्ग दम्पत्ति जो छोटा सा ढावा चलाते थे, ने बताया कि उनका परिवार लगभग दो सौ सालों से यहां रह रहा है। उन्होंने किन्नौर से बाहर की दुनिया सिर्फ बाहर से आने वाले सैलानियों के द्वारा सुनाये गये अनुभवों से ही देखी है। वे कभी शिमला भी नहीं गये। परंतु उन्हें इसका कोई मलाल नहीं है। यहां उनका जीवन सुखद और शांति से भरा है। यहां की भौगोलिक परिस्थितियां ही उनके इस सुखद जीवन का राज है। वे कभी बीमार नहीं हुए। कभी किसी तरह के अपराध को होते हुए उन्होंने नहीं सुना। उन्हें किसी तरह का भय नहीं लगता। यहां न जानवर आदमखोर हैं न आदमी। सब मजे में मिलजुल कर रहते हैं। जब ज्यादा बर्फ पढ़ती है और सैलानियों का आना-जाना बंद हो जाता है तो जिंदगी बहुत आराम से कटती है। वे कभी इस स्वर्ग से बाहर नहीं जाना चाहते।

यहां अधिकांशतः स्त्रियां ही कामकाज सम्हालती हैं, पर यह उनका शोषण नहीं है। पुरुष सभी स्त्रियों का सम्मान करते हैं। उनकी गरिमा को बनाये रखते हैं। उनकी बात को सम्मान देते हैं और एक आदिम मनुष्य की नैतिकता उनके जीवन में कूट कूट कर भरी है‌। आदिम सभ्यता मतलब जब वर्ग भेद नहीं था। जब पुरुष वर्चस्व की समाज व्यवस्था नहीं थी।

वे दोनों ही जिस दुनिया से परिचित हो रहे थे वह उनके लिए अभूतपूर्व थी। यहां के लोग विकास की अंधी दौड़ में शामिल होकर पशु नही बने। चीजों का महत्व जीवन से बढ़कर नहीं था। धर्म, संस्कृति अभी मानवीय जीवन के ऊपर एक संस्थागत रूप में हावी नहीं हुई थी। वह उनकी भौगोलिक प्राकृतिक शक्तियों की तरह जीवन का अनिवार्य हिस्सा थी। पैसे भी जरूरत भर के लिए चाहिए थे।

करछम का यह दिन जीवन के लंबे अनुभवों से भी अधिक विशाल और गहरा था। वे एक दिन में यहां के जीवन का हिस्सा बन गये थे‌। शाम तक उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे वे वर्षों से यहां रह रहे हों। अपरिचय का कोई संकेत नहीं था। सब गहरी मानवीय संवेदनाओं से भरे थे। हम उनके लिए कोई अजनबी नहीं थे। न वे हमारे लिए अपरिचित थे। इतनी समरसता इतना अपनापन और इतना भरोसा इनके अंदर कहां से आया? वे दोनों यह बात कर रहे थे तभी एक लड़के ने आकर कहा साब जी आपको नीचे बुलाया है।

वे दोनों नीचे पहुंचे तो देखते हैं। एक छोटे से ड्रांइग रूम में शानदार कालीन बिछा है। बीच में एक सेंटर टेबल रखी है। यह स्थानीय कलाकारों द्वारा बनाई गई सुंदर नक्काशी युक्त टेबिल थी। कमरे में तीनों तरफ कालीन पर गद्दे बिछे हुए हैं और दीवारों के सहारे मसनद लगी हैं। जब उन्होंने उस कमरे में प्रवेश किया, तो दोनों को ऐसा लगा जैसे किसी शाही महल में उनका स्वागत किया जा रहा हो। उनके बैठने पर सबसे पहले गर्मा गर्म स्थानीय चाय उनके लिए पेश की गईं। फिर थोड़ी देर में टेबिल पर स्थानीय व्यंजनों की प्लेट सज गईं। उन व्यंजनों के नाम पूछने पर पता चला, जैसे कि तुदुकि भथ(पुलाव का एक प्रकार), माश दाल(काली दाल), बाबू, चना मद्रा, भै (मसाले दार लोटस तने) और नान तथा रोटी। इन सभी व्यंजनों का अपना अलग स्वाद था। इनके स्वाद को सिर्फ अनुभव किया जा सकता था परिभाषित नहीं। दोनों ने छककर खाना खाया। इस तरह से भोजन करना उनके लिए राष्ट्रपति के भोज से ज्यादा मूल्यवान था। उन्होंने बहुत हिम्मत करके खाने का बिल पूछा। यद्यपि यह उन लोगों का अपमान था। पर वे सैलानी थे और हम सैलानियों से ही उनकी आजीविका के साधन जुटाये जाते थे। शैलेन्द्र ने खाना परोसने वाले लड़के से धीरे से बिल लाने को कहा तो उस घरेलू होटल की मालकिन बहुत विनम्रता से बोली कि आज का यह खाना हमने अपने बच्चों के लिए बनाया था। जब भी हमारे बच्चे शहर से आते हैं तो हम उनकी पसंद का खाना बनाते हैं। तुम दोनों हमारे बच्चों की तरह हो। अब कुछ भी कहने सुनने का अवसर नहीं था। वे दोनों अपनी जगह से उठे और मां के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लिया।

अगले दिन उन्हें राक्छम की ओर रवाना होना था। राक्छम करछम से लगभग पच्चीस किलोमीटर की दूरी पर बसा है‌ पहाड़ी रास्तों पर चलकर वहां पहुंचा जा सकता था। यह चट्टानों पर से होकर गुजरना था। इसलिए उन्होंने इसके बीच में एक बहुत छोटे गांव में रात रुककर अगले दिन की यात्रा करने का प्लान बनाया। एक तरफ खड़ी चट्टानें और दूसरी तरफ बस्पा नदी की गहरी घाटी। बहुत पतले सकडे रास्ते से होकर दोनों चल रह थे। बीच-बीच में एक्का दुक्का कार और लोडिंग वाहन गुजरते रहे। वह जिंदगी में इतनी निर्भय कभी नहीं हुई थी। जहां चारों तरफ सुरक्षित जीवन था वहां सबसे ज्यादा भयभीत रहती थी। अब यहां शैलेन्द्र के साथ इस बीहड़ में कुछ भी सुरक्षित नहीं है, पर अंदर भय का लेशमात्र भी नहीं। अब उसने जीवन की अमूर्त चट्टानों को चटकाने के बारे में सोचा। कुछ दूर चलने पर बस्पा नदी एक दम पास आ गई थी। वह शैलेन्द्र को नदी की पतली धार की ओर खींच ले गयी। नदी में घुटनों तक पानी था। नीरज ने जल्दी से जूते उतारे और लेगी को घुटनों तक फोल्ड किया और नदी में उतर गई। उसने शैलेन्द्र को भी बुला लिया। नदी के इस ठंडे पानी में कंपते हुए ओंठ उसने शैलेन्द्र के होंठों पर रख दिये। देर तक वे अपने अंदर नदी का वेग महसूस करते रहे। एक नदी बाहर थी और एक उछलती कूदती शोर मचाती नदी उनके अंदर प्रवाहित हो रही थी। दोनों ही नदियां निर्बाध प्रवाहित हो रहीं थीं। पैरों का रक्त प्रवाह इस बर्फीले पानी में जमने लगा था। यद्यपि दोनों की देह में ऊर्जा का प्रवाह करंट की तरह दौड़ रहा था तथापि पैरों ने उन्हें वहां से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया।

वे बाहर रेत पर आ गये और एक दूसरे के आगोश में समाये रहे। उसके अंदर की एक विशाल चट्टान टूटकर नदी में बह गयी। वह अब वो लड़की नहीं थी जिसके अंदर नैतिकता का डर चट्टान की तरह बैठा था। अब वो एक नदी की तरह प्रवाहित सहज प्रेम के जल में डूबने उतराने वाली लड़की थी।

दूसरे दिन वे राक्छम पहुंच गये। राक्छम जनजातीय बहुल गांव था। यहां के स्थानीय रीति-रिवाज और खान-पान से वे भाव विभोर होते रहे। नीरज और शैलेन्द्र को अपना घर परिवेश छोड़े हुए काफी वक्त गुजर गया था। इस बीच उन्होंने किसी भी तरह से वहां सम्पर्क नहीं किया था। स्थानीयता की जकड़नों से मुक्ति के इस अनुभव ने दोनों को पिछले समय की तिक्तता को पूर्णतः विस्मृत करा दिया था। यह एक विराट भौगोलिक परिवेश था। यहां तमाम तरह की भौतिक कठिनाईयां थीं, परंतु कठिनाई से जूझने की स्वतंत्रता थी। उन भौगौलिक और परिवेशगत कठिनाईयों को जिया जा सकता है, अपने जीवन का हिस्सा बनाया जा सकता है, और उनके साथ एकमेक होकर ही उनसे परे जाया जा सकता था। फर्क यह था कि जीने या न जीने की विवशता यहां नहीं थी। कोई दबाव नहीं था कि इन्हें नकार नहीं सकते। उसने इन स्थितियों को सहजता में जीने का निर्णय किया और उतर गई उनके बीहड़पन में बिना किसी डर के।

वे दोनों एक मुक्त बंधन में बंधे थे। न कोई प्रतिबद्धता का दिखावा, न कोई साथ साथ जीने का वायदा, न सह जीवन की विवशता, न नैतिकता और अनैतिकता का कोई मूल्य उनके बीच था। दरअसल वे उन चट्टानों की सीमाओं से बाहर आ चुके थे, जिनके कारण व भय के साये में जीने को मजबूर थी। अब न सीमायें थीं और न उनसे भागने या बचने का कोई विकल्प उनके बीच था। वे क्षितिज रहित पृथ्वी के उस भाग में थे जहां दिशा बोध और उतार चढ़ाव का बोध ही खत्म हो जाता है। भयमुक्त प्रेम के चुम्बकीय आकर्षण के केंद्र में जहां तमाम तरह की सीमाएं इल्यूजन का शिकार हो जाती हैं।

आज उनकी मुलाकात एक बेहद उम्रदराज महिला से हुई। उस महिला को इस गांव की सबसे उम्रदराज व्यक्ति माना जाता था। उनके सामने पांच पीढ़ियां थीं। वे दोनों उनके पास पहुंचे तो सबसे पहले प्रणाम किया और फिर दोनों ने उनके पैरों को स्पर्श किया। नीरज को ऐसा महसूस हो रहा था कि ये पार्वती हैं। चेहरे पर एक गंभीरता। इतना लंबा जीवन जीने का गौरव और स्वाभिमान का भाव उनकी आंखों से झलक रहा था। वे स्थिरचित्त और इतनी स्वस्थ्य थीं कि नीरज अंदाजा नहीं लगा पा रही थी कि उनकी उम्र शताब्दी को पार कर चुकी है।

वे दोनों उनके पैरों के पास बैठ गये। उन्होंने दोनों के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। शैलेन्द्र खुद को अति भाग्यशाली समझ रहा था। दोनों ने एक दूसरे को देखा और उनके आशीर्वाद को पार्वती के प्रसाद की तरह ग्रहण किया।

दोनों को साथ साथ खुश रहने का आशीर्वाद मिला था। परंतु वे जानते थे कि यह संभव नहीं है। दोनों ने नजरों ही नज़रों में यह तय किया कि वे उन्हें सच्चाई बतायेंगे। नीरज ने कहा हम दोस्त हैं पति-पत्नी नहीं हैं। हमने एक साथ जीने मरने की कोई कसम नहीं खाई है। हमें इसी तरह के जीवन के लिए आशीर्वाद दीजिए।

उनकी अनुभवी नजरों ने दोनों की आंखों में रिश्ते की गहराई को पढ़ लिया था। वे बोलीं ‘तुम जीवन भर ऐसी ही यात्रा में साथ साथ चलते रहो।’ शिव की इस भूमि पर तुम दोनों जीवन की नई परिभाषा अंकित करो यह मेरा आशीर्वाद है। मैं अपने जीवन के लंबे अनुभवों से यह कह सकती हूं कि हम जिस भी रिश्ते में हों उसके प्रति वफादार और ईमानदार रहें, एक दूसरे के तन-मन का सम्मान करें और दूसरे की गरिमा को खंडित न होने दें, यही इंसानी जरूरत है।

शैलेन्द्र ने उठकर प्रणाम किया और कहा हम आपके आशीर्वचन को अपना जीवन दर्शन बनाने की कोशिश करेंगे। उसने शैलेन्द्र का हाथ पकड़कर वृद्ध मातृत्व की गोद में दोनों के हाथ रखकर अपनी आंखों से लगाया और उठकर चल दिए।

उसको महसूस हो रहा था कि उनकी अंतरात्मा उसमें प्रवेश कर गयी है। उसने निश्चय किया कि वह एक बिल्कुल अलग तरह के इंसानी रिश्तों को जीने की कोशिश करेगी। सुनो शैलेन्द्र ..उसने कहा! “हम आज चांद की सैर करेंगे।’ आज की रात हमारे जीवन की अविस्मरणीय रात होनी चाहिए।

वह कैसे? शैलेन्द्र ने पूछा। हालांकि वह उसके अंदर की ठंडी तपिश को महसूस कर रहा था। वह बोली रात होने दो तुम्हें पता चल जायेगा। आज एक बड़ी चट्टान जो सदियों से जमी है मेरी चेतना पर वह छार छार होकर बिखरने वाली है।

शैलेन्द्र के मन में कौतूहल लहरों की तरह उछल रहा था। पर एक अज्ञात डर भी पनप रहा था। वह क्या करने वाली है? उसकी कल्पना जिस दैहिक मिलन की चारदीवारी में दौड़ सकती थी, उसको इसका अंदाजा लगाना कठिन था। उसके पास रात होने का इंतजार करने के सिवाय कोई चारा नहीं था।

दोपहर हो चुकी थी। शैलेन्द्र ने खाना खाने की इच्छा जताई। उसको तो जैसे भूख का अहसास ही नहीं था। वह तो रात के लिए ताना-बाना बुनने में व्यस्त थी। शैलेन्द्र के कहने पर उसने कहा हां ठीक है। चलो किसी रेस्तरां में चलते हैं। वे दोनों पास के ही सामान्य से होटल पर गये। रोटी सब्जी और दाल चावल तैयार था। दोनों ने पेट भरने के लिए खाना खाया और आराम करने अपने रूम में आ गये। कुछ देर में शैलेन्द्र की नींद लग गई। पर उसकी आंखों में नींद दूर दूर तक नहीं थी। वह उठी और बाहर निकल गई। बाहर उसने ‘अंगुरी’ और ‘घंटी’ की दो बोतल लीं। कुछ खाने के लिए स्नेक्स और ड्राइफ्रूट्स लिये। डिस्पोजल और नमकीन चाय पैक करवायी। सारा सामान उसने बैग में रखा और वापस आ गयी।

शाम उतरने लगी थी। अब नीरज ने शैलेन्द्र को उठाया। उसे नमकीन चाय का प्याला भर कर दिया। नमकीन चाय बर्फीले इलाकों में शरीर को गर्म रखने के लिए पी जाती है। इसे सत्तू के साथ भी लिया जाता है। ऐसा विशेषतौर पर वे लोग करते हैं जिन्हें स्नो ट्रेकिंग पर जाना होता है। यह रात की तैयारी थी। शैलेन्द्र को इसका तनिक भी आभास नहीं था। उसने सत्तू खाया और नमकीन चाय पी। उसे लगा जैसे उसके शरीर में हीट पैदा हो रही है। अजीब सी सरसराहट उसे महसूस हो रही थी।

उसने कहा अब तैयार हो जाओ कहीं चलना है। शैलेन्द्र आज्ञाकारी बच्चे की तरह तैयार हो गया। उसने एक सामान्य पुलोवर पहन लिया। वह जब तैयार हुई तो उसने ठीक से गर्म कपड़े पहने हुए थे‌। शैलेन्द्र ने कहा अरे इतना तैयार क्यों हो? कहां जाना है? उसने कहा चुपचाप ठंड से जूझने के लिए तैयार हो जाओ। मैं बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूं।

बाहर आकर उसने एक टार्च भी ले ली। जैसे ही शैलेन्द्र बाहर आया उसने अपना पिट्टू बैग उसे पकड़ा दिया और टार्च लेकर एक ऊंची बर्फ जमी पहाड़ी की ओर चल पड़ी।

शैलेन्द्र उसका हाथ पकड़े हुए चल रहा था। कुछ तो बताओ हम कहां जा रहे हैं? उस ने हाथ का दबाव बढ़ाते हुए कहा ..’आज हम दोनों बर्फ में सुहागरात मनायेंगे।’ ऊपर वह चोटी देख रहे हो…उस तक पहुंचने में एक घंटा लगेगा। वहीं आज हम अपने जीवन की अनौखी रात गुजारेंगे। बर्फ की ठंडक और हमारी निर्भीक ऊर्जा के बीच एक जंग है देखें कौन विजयी होता है? उसके खतरनाक इरादे शैलेन्द्र को एक बारगी तो कंपकंपा गये। फिर उसे नीरज की दृढ़ता और पक्के इरादे और हिम्मत का ख्याल आया। वह बिल्कुल निर्द्वंद आगे बढ़ रही थी। उसके अंदर कोई डर या आशंका नहीं थी। उसका चट्टान सा इरादा शैलेन्द्र को समझ आ गया।

शैलेन्द्र ने अपने आपको तैयार किया और अब शैलेन्द्र ने उसके हाथ को थाम लिया। अब शैलेन्द्र उसी पहाड़ से हौसले के साथ उसका साथ दे रहा था। कुछ देर में वे एक समतल से मैदान तक पहुंच गये। रास्ते के दोनों ओर बर्फ जमी थी। उसने एक छड़ी से बर्फ की मोटाई नापी जगह जगह छड़ी बर्फ में घुसा कर देखी की कहीं बर्फ पोली तो नहीं है। इसके बाद उसने बैग से एक चादर निकाली और बर्फ पर बिछा दी। टार्च और मोबाइल की रोशनी की जरूरत नहीं पड़ी चांदनी रात और सफेद बर्फ की चादर ने रात के अंधेरे को दूधिया बना दिया था।

चादर पर वह जूते उतारकर बैठ गये। उसने शैलेन्द्र को अपनी गोद में सुला लिया। कुछ देर तक अपने बालों से शैलेन्द्र का चेहरा ढंके रखा। उसके चेहरे को चांद की रोशनी से छिपा लिया था उसने। शैलेन्द्र तुमने जिस तरह मेरा साथ दिया है यहां तक। यह मेरे पूरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मुझे आज अपने होने पर गर्व हो रहा है‌।

शैलेन्द्र ने धीरे से उसके गालों को अपनी ठंडी हथेलियों के बीच ले लिया‌। उसका चेहरा तप रहा था। लगभग शून्य से नीचे तापमान होगा। पर नीरज के चेहरे पर उसका कोई असर नहीं था। वह शैलेन्द्र को अपने आगोश में लिए किसी दूसरी दुनिया में खोई हुई थी।

तुम ठीक तो हो। शैलेन्द्र ने उसे झिंझोड़ा। वह बाहर आई। अब उसे ठंड का अहसास हुआ। उसने शैलेन्द्र को गोद से अलग किया और बैग से अंगूरी और घंटी की बोतल निकालीं। गिलास निकाले। प्लेट में स्नेक्स और ड्राइफ्रूट्स रखने लगी। शैलेन्द्र हतप्रभ था। नीरज यह सब क्या है? शैलेन्द्र आज हमारी अनौखी सुहागरात है। मुझे अपने कमरे को महकाने दो। अंगुरी और घंटी देशी शराब थी। यह किन्नौर में ही बनती थीं। पता है शैलेन्द्र अंगूरी काले अंगूरों से बनाई जाती है और घंटी सेब और खुमानी से बनाई जाती है‌। यह औषधीय शराब है आज हम इन्हीं के साथ इस बर्फीली सुहागरात का आगाज करेंगे। उसने गिलास शैलेन्द्र की ओर बढ़ाया और चियर्स किया। दोनों देर तक अंगूरी और घंटी का आनंद लेते रहे। उनके अंदर अनौखी ऊर्जा का संचार हो रहा था।

उसने शैलेन्द्र को अपने आगोश में लिया। आज पहली बार उसने शैलेन्द्र के रूप में किसी पुरुष को इस तरह अपने अंदर समाहित किया था। नीरज ….शैलेन्द्र, शैलेन्द्र…. नीरज एक दूसरे में ठीक वैसे ही एकमेक हो रहे थे जैसे चांदनी और बर्फ। पता ही नहीं था कि चांदनी कहां है और बर्फ कहां है? चांद बादलों की ओट में आ गया। कुछ देर के लिए अंधेरे की चादर ने दोनों को ढंक लिया।

देर रात तक चांद लुकाछिपी करता रहा। चांदनी भी अंधेरे के आगोश में जाती आती रही। धीरे धीरे सुबह हुई वे दोनों बर्फ की चादर ओढ़े हुए थे। दोनों के शरीर में प्रेम की ऊर्जा प्रवाहित हो रही थी। गर्म लहू ने बर्फ की ठंडक पर विजय पा ली थी।

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परिचय – संजीव जैन वरीय लेखक हैं.

 

 

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