विशिष्ट कहानीकार : संजीव जैन

लालबत्ती

एक दूसरी कहानी यह भी मेरी जिंदगी अंत से आरंभ हो रही है। मैं हमेशा आरंभ के लिए करता रहा कोशिश पर अंत हमेशा पहले आता रहा और अब मैंने पहली बार अंत से आरंभ करना आरंभ किया है।
…….. अंततः इस आरंभ ने जीवन के उस आरंभ को सामने लाकर खड़ा कर दिया जो छब्बीस साल पहले घट चुका है मेरे साथ। मैं इस हिसाब से किसी भी उम्र का हो सकता हूं चालीस, तेतालीस या तिरेपन या …….. कुछ भी ………उम्र मेरी चारसौ बीस साल की भी हो सकती है या दो सौ पैंतीस साल की भी……..मैं जो निरंतर चलता रहा हूं समय के आगे आने की कोशिश में……समय हमेशा पीछे छोड़ता रहा मुझे……तुम तक पहुंचने से पहले।
अब जबकि मैं समय को पीछे छोड़ते हुए तुम तक पहुंच गया हूं तो तुम वहीं क्यों रुकी हो जहां मैंने तुम्हें चौबीस साल पहले छोड़ा था। ….!!! तो क्या मैं अपने उस अनजिये समय को पकड़ने में सफल हो गया…….!!!! यह कैसे हुआ?
यह कहीं स्वप्न तो नहीं.…….”.तुम मुझे छुओ तो जरा ……… तुम्हारे हाथ का वह स्पर्श जो एक दिन तुम्हें टेम्पो में बिठाते हुआ मेरी हथेली पर टंकित हो गया था; अभी तक वैसा ही जिंदा है……!!!! वह बता देगा कि हां, तुम सचमुच वही हो……….! वैसी ही हो……!!! जैसा मैं या तुम मुझे छोड़ गयीं थीं……।”
आह….!!!!!! एक सुप्त ज्वालामुखी भभक उठा मेरे अंदर……….कितनी तपिश …….!! कितनी गर्माहट ……!!! सदियों तक लावा बनता रहता है धरा के अंदर कितना दबाव झेलता है अपने ऊपर तब कहीं सागर को भी उबाल पाने की ऊर्जा पैदा कर पाता है….। मैं भी अपने अंतःकरण में आंखों की आग को ऐसे ही दबा कर रख सका हूं जो अब लावा बनकर फट रहा है तुम्हारे इस स्पर्श से।
सुधा …….!!! तुम ही हो ……!!!!!! लावा जो चौबीस सालों से दबा था मेरी चेतना की गहराई में……आज वह मुहाना पा गया ……..। देखो मैं बह रहा हूं समय के इतिहास में पीछे की ओर …… मैं फिर से आरंभ कर रहा हूं यात्रा …….. तुम साथ चलोगी……???
पूरा शहर बदल गया है……..सब कुछ कितना आगे बढ़ गया……अब मेट्रो है….फ्लाई ओवर हैं….. मल्टीप्लेक्स हैं…… मोबाइल है……..यह वह शहर नहीं है जहां हम पैदल घूमते थे और तुम टेम्पो में घर से विश्वविद्यालय तक आती थीं…… कुसुम और तुम…..। मैं डिपार्टमेंट की सीढ़ियों पर तुम्हारा इंतज़ार करता था …..!!! याद है सुधा जब तुम नहीं आती थीं तो कोई साधन नहीं था तुम्हारे बारे में जानने का सिवाय दूसरे तीसरे चोथे दिन या.….. तुम्हारे आने तक सीढ़ियों पर या फुटपाथ पर इंतज़ार करने के अलावा….काश मोबाइल चौबीस साल पहले आया होता तो मुझे इतने टिल्ले नहीं खाने पड़ते…. सड़कों पर बेसबब घूमते हुए…….।
शहर सिर्फ चीजों से ही नहीं बदला है …….सुधा..! यह अपने मिजाज में भी बदल गया है…..। अब शहर के अंदर कई शहर बन गये हैं ……परत दर परत……। याद है जब हम साथ साथ केंपस में घूम रहे होते थे तो तुम अक्सर चौकन्नी रहती थीं अपने आस पास के माहौल से कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा …….!!! अब देखो इस शहर को ….कितना बिंदास है …… किसी की किसी को कोई परवाह नहीं रेस्टोरेंट, मल्टीप्लेक्स, बीयर बार, माल सब जगह लड़के लड़कियां साथ साथ बेफिक्र घूमते खाते पीते नजर आ जायेंगे।
पता है सुधा, जब शहर अपना मिजाज बदल लेता है तो हमारी चेतना का मिजाज भी बदल चुका होता है । घटनाएं घटित नहीं होती दौड़ती भागती हैं। मेट्रो की तरह । पहले शहर चौराहे पर एक दूसरे के लिए कुछ समय के लिए रुकता था….। लालबत्ती और हरी बत्ती जीवन में भी काम करती थी। पर अब सब वायपास और फ्लाईओवर से बिना रुके चल रहा है। यह जीवन भी ऐसे ही वायपास हो गया कोई किसी के लिए नहीं रुकता।
“लालबत्ती अब लोगों के जीवन में नहीं है…….।” सुधा ने कहा….! और धीरे से मुस्कुरा दी…..। उसके इस तरह मुस्करा देने के पीछे छिपी पीड़ा को मैं बखूबी समझता हूं । हमने पूरी जिंदगी इस लालबत्ती के साथ बिताई है। जब साथ थे तब भी लालबत्ती हमेशा बीच में होती थी। और आज भी लालबत्ती साथ है।
सुधा गुमशुम सी चल रही थी साथ साथ । एक पूरा युग, जो हमारे बीच से नहीं गुजरा मगर हमारे कदमों को बोझिल बना रहा था अब तक, हमारे साथ था। हम उस अभाव को पाटने की कोशिश कर रहे थे जो चौबीस साल से हमारे बीच एक खाई की तरह विद्यमान था।
अब तक हमने एक दूसरे से औपचारिक पूछताछ नहीं की थी। कैसे गुजरा यह अभावों से भरा समय? कभी एक दूसरे की जरूरत को नकारा तो नहीं हमने…..? मैं पूछना चाहता था कि तुमने जो निर्णय उस समय बिना मुझे बताए लिया था और चल पड़ीं थीं मेरे बिना ही यात्रा पर? ऐसा क्यों किया था ……सुधा…………??
मैं सुधा को उत्तर देने या ना देने की उलझन में नहीं डालना चाहता था……। इस सवाल का कोई अर्थ भी अब नहीं रहा था । बहुत से सवाल नहीं पूछे जाने के लिए ही होते हैं।
“तुमने बहुत देर कर दी थी……… कितना इंतजार किया था मैंने उन दिनों …….!!” हर रोज कुसुम से पूछती थी कि कोई खबर आई क्या तुम्हारी…….डर हमेशा समाया रहता था कि तुम नहीं आये तो क्या होगा? सुधा ने ऐसे कहा जैसे मेरे मन की बात महसूस कर ली थी। वह लगातार शून्य में चल रही थी….. । दरअसल हम दोनों ने न चाहते हुए भी एक दूसरे के जीवन में एक शून्य भर दिया था। यह शून्य ही हमारे बीच आज भी बैठा था।
सुधा चलते चलते रुक गई …….। हम लोग राजमहल पैलेस होटल के बाहर फुटपाथ पर चल रहे हैं। होटल की बाउंड्री की ओर बड़े बड़े पेड़ लगे हुए हैं जिससे फुटपाथ पर छाया का शेड बना है। हम इस प्राकृतिक शेड में सड़क के ट्रेफिक से बेखबर हैं। सुधा के रुकने का मतलब था वह कुछ कहना चाहती है ………! पर जो चौबीस साल का एकांत अंदर है उसे कैसे कहे? यह उलझन उसे परेशान कर रही थी।
मैंने सुधा का हाथ अपने हाथ में लिया……और कहा कि सुधा कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है। तुम्हारे हाथ के स्पर्श ने गुजरे हुए जीवन की तमाम हलचलों को मुझ तक पहुंचा दिया है। तुम सिर्फ आज में जियो। इस चंद कदम के रास्ते को हम एक दूसरे के कदमों से चलकर पूरा करें। यही तो चाहते थे हम……..। बोलो न सुधा…….? क्या हम एक दूसरे के कदमों से चलकर जीवन के पथरीले रास्ते पार करना नहीं चाहते थे?
“हां……!” सुधा ने कहा और अपनी झील बनी आंखों को सीमायें तोड़ कर बहने से रोकने का प्रयास करने लगी। फिर मेरे हाथ पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए बोली तुमने इतनी देर क्यों कर दी थी………? मैं आज भी उसी दरवाजे पर खड़ी हूं……. जहां तुम्हारा इंतज़ार करती थी । वह दरवाजा था जो मुझे दो हिस्सों में बांट रहा था न मैं अंदर जा सकती थी और न तुम्हारे बिना बाहर ही जा सकती थी। मैं रुक गई वहीं ……..उस दिन से आज तक वहीं रुकी हूं।
मैं आया था सुधा .…..हां पर कुछ देर हो गई थी। तुम्हारे लिये इस दुनिया में कुछ जगह बनाने में जरूरत से कुछ ज्यादा ही समय लग गया। मैं तुम्हारे साथ तंग और बंद तहखानों में रहने की कल्पना से भी डरता था। एक खुला और साफ सुथरा स्पेस चाहता था जिसमें हम अपनी तरह से जीवन को जी सकते। मगर ……….जब तक जगह बनी तब तक समय का पहिया कुछ ज्यादा ही घूम चुका था। अब देखो न मैं उस खुली जगह में बंद हूं तब से अब तक तुम्हारे इंतज़ार में।
“यह कैसी विडम्बना है कि हम जी तो रहे हैं पर दूसरों की जिंदगी……अपने लिए एक निर्णय भी हम नहीं ले सके जो सिर्फ हमारे लिए होता….” सुधा ने कहा और फुटपाथ पर पड़े पत्थर को फुटबाल की तरह ठोकर मारी। मुझे ऐसा लगा मानो सुधा ने हमारी पूरी सामाजिक संरचना को ठोकर मार कर दूर धकेल दिया हो।
इतनी नफ़रत और कठोरता कहां से आई सुधा? मैंने पूछा…….और उसके चेहरे पर उग आईं वक्त की लकीरों को पड़ने की कोशिश करने लगा। सुधा की आंखें तरल थीं, उनमें गर्म पानी के सोते लहरा रहे थे। मुझे हमारी मुलाकात का वो दिन याद आया जब विश्वविद्यालय में एडमिशन लेने के बाद पहली कक्षा लगी थी । सुदेश बत्रा मेडम उपन्यास का पीरियड लेने आईं थीं। एम ए पूर्वाद्ध में हममें से लगभग सभी छात्र छात्राएं को-एड सिस्टम में पहली बार पढ़ रहे थे तो कक्षा में एक ओर छात्राएं और दूसरी ओर हम छात्र बैठे थे । मानो दो ध्रुव अलग अलग हों।
बत्रा मेडम ने सबसे पहले स्वयं का परिचय दिया और हमें जीवन का पहला सबक दिया। उन्होंने कहा तुम लोग अब स्कूली सोच के दायरे से बाहर आओ। एक दूसरे से परिचित होने के लिए एक साथ मिक्स होकर बैठो। इसके बाद सबसे परिचय लिया। इसी परिचय के दौरान मैंने देखा कि एक लड़की पिंक कलर का सलवार सूट पहने सारिका के जैसे फेसकट और कंजी आंखों को लिए अपना नाम बता रही थी सुधा जैन……। वह पहला क्षण था जब सुधा को ध्यान से देखा और अंदर से एक आवाज आयी थी कि अब ये लड़की कम से कम दो साल तक मुझे परेशान करेगी।
मेरे अंदर से उठी यह आवाज मेरे जीवन भर का सच बन जायेगी यह मैं नहीं जानता था।
सुधा की आंखें किसी को भी अपनी ओर खींच सकती थीं। उनमें नीलापन मानसरोवर की तरह लहराता था। गहरी और विशाल झील की तरह की आंखों में जितना डूबने का मन नहीं होता उससे अधिक किनारे बैठकर उसकी तरलता और ठंडक को महसूस करना अच्छा लगता है। परंतु आज उन आंखों में एक जड़़ता थी मानो झील जम गई हो और अंदर ही अंदर पूरा पानी लावा बन गया हो।
सुनो ….. जिंदगी अभी खत्म नहीं हुई है सुधा……! मैंने कहा और सुधा के जबाव का इंतजार करने लगा। सुधा स्थिर और शांत फुटपाथ को घूरे जा रही थी। फिर धीरे से बोली “चलो आज हम डिपार्टमेंट की उन सीढ़ियों पर चलकर बैठते हैं जो हमारे मिलने की एक मात्र साक्षी हुआ करतीं थीं।” हो सकता है कुछ यादें उन पत्थरों पर अंकित हों जो हमें इस शून्य को हटाने में सहयोग कर सकें।
हमने टैक्सी ली और राजस्थान विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के उस गेट पर उतरे जहां से हम अक्सर आया जाया करते थे। लगभग चार बजे का समय था। डिपार्टमेंट खाली था स्टूडेंट्स जा चुके थे। स्टाफ के सदस्य मुख्यद्वार की ओर आफिस में होंगे। ये सीढ़ियां पीछे की ओर थीं। इस वक्त सीढ़ियां निर्जन थीं। हम दोनों अपनी अपनी सीढ़ियों पर बैठ गये। सुधा हमेशा ऊपर वाली सीढ़ी पर बैठती थी और मैं उसके नीचे वाली सीढ़ी पर उसके घुटनों पर हाथ रखकर बैठा करता था। इसी तरह आज भी जाकर बैठ गये। सुधा के घुटनों पर हाथ रखते हुए मैंने कहा कि आज तो सिर रखकर रोने का मन कर रहा है सुधा। इजाजत हो तो रो लूं………।
सुधा ने मेरा सिर अपने हाथ से अपने घुटनों पर रख लिया और अपनी चुन्नी से मुझे अपने आंचल में छिपा लिया। मैं भूल गया कि मैं कौन हूं एक छोटे से बालक की तरह मैं सुधा के आंचल में दुबक गया। हमारे अंदर उम्र का हर गुजरा हुआ लम्हा विद्यमान रहता है। वह बीतता कभी नहीं है। न जीवन कभी उन लम्हों से रीत पाता है। आज मैं उम्र की तीनों अवस्थाओं को एक साथ जी रहा था। सुधा का आंचल उम्र की त्रिवेणी का संगम बना हुआ था। सुधा मेरे लिए सम्पूर्ण जीवन को एक साथ जीने का लम्हा लेकर आई थी। काश! मैं भी सुधा को इस तरह अपने आगोश में समा पाता…..!
“उसे भी तो अपने पूरे जीवन को फिर से एक साथ जीने का हक है।”
हमारे बीच जिये गये दो ढाई साल के समय की साक्षी थी ये सीढ़ियां। ये सीढ़ियों भी हमारे स्पर्श से जीवंत हो उठी हैं। चौबीस साल के दौरान न जाने कितने पैरों ने इन्हें रौंदा होगा। धूप-छांव ठंड और बारिश कभी पुलिस की ठोकरें कभी हुड़दंगियों के जूते और अनेक प्रेमी जोड़ों की सरसराहट इन पर से गुजर चुकी हैं। परंतु हमारे बैठते ही ये तमाम रूखापन भूलकर नरम गद्दे की तरह बिछ गईं थीं। ये बतियाने लगीं थीं आपस में। उनकी खुसफुसाहट हमें महसूस हो रही थी। वे खुश थीं हमारी तरह ही।
सुधा एक अबूझ पहेली सी गुमसुम मुझे अपने आंचल में समाए बैठी थी। उसके चेहरे की ताजगी, खिलापन और खिलंदड़पन न जाने कहां गायब हो गया था। पहले जब मैं सीढ़ियों पर इंतज़ार करता था और जब दूर से सुधा आती हुई दिखाई देती थी तो पूरा केंपस जैसे महक उठता था आसपास के पेड़ों पर पक्षी चहचहाने लगते थे और खिले हुए फूल और ज्यादा खिल जाते थे। उसकी नजरें भी मुझे ढ़ूढती थीं और जैसे ही हमारी नजरें मिलती थीं उसके चेहरे की रंगत गुलाबी हो उठती थी।
आज सुधा के चेहरे पर वक्त की छेनी के उकेरे गये निशानों ने अपनी गहरी छाप अंकित कर दी है। जीवन के नामुराद इरादों ने न जाने किस बात की सजा दी है सुधा को।
“ प्रेम करना इतना संगीन अपराध क्यों है?” सुधा ने अपने आंसुओं को होंठों तक आने से रोकते हुए कहा। हमने उस वक्त लालबत्तियों की इतना परवाह क्यों कि? समाज, परंपरा, नैतिकता, परिवार, मूल्य ये सब हमारे बीच रेड लाइट बन कर आते रहे हम एक अच्छे नागरिक के होने की जिम्मेदारी से बंधे रहे। क्या मिला हमें इन लालबत्तियों का सम्मान करने के बदले? सुधा अपनी रो में बोल रही थी। हमें साहित्य में पढ़ाया गया प्रेम करना सबसे अच्छी बात है। प्रेम के तमाम किस्से कहानी प्रेम करने के मूल्य को सर्वश्रेष्ठ मूल्य बताते रहे। यथार्थ जिंदगी में प्रेम करना अपराध है। यह विरोधाभास जिंदगी की विडंबना बन जाता है।
सुधा यह कहते कहते हांफ रही थी, जैसे मीलों पैदल चलकर आ रही हो…। मुझे लगा सुधा चौबीस साल के गेप को भरने की कोशिश में हांफ रही है। हम दोनों ही यह महसूस कर रहे थे कि हमारे बीच का अधबना पुल अबकी बार यह पुल हम नहीं बना पाये तो जिंदगी फिर मौका नहीं देगी।
सुधा तुम्हें याद है जब मुझे अचानक शहर से जाना पड़ा था और तुम मिलने नहीं आतीं थी तो तुम्हारे एक मात्र खत के साथ मैंने हम दोनों का एक फोटो जो फेयरवेल के समय का था, उसके टुकड़े टुकड़े करके लिफाफे में बंद करके तुम्हारे लिए छोड़ दिया था। जब तुम्हें वह खत और टुकड़े टुकड़े जिंदगी मिली तो तुम ने क्या किया था?
सुधा की आंखों में हल्की सी चमक आई और वह कहने लगी की मैंने उस टुकड़े टुकड़े जिंदगी को तुम्हारे पास वापस भेजा दिया था। पत्र में यह लिखकर कि इस टुकड़े टुकड़े जिंदगी को अब तुम ही जोड़ोगे।
हां सुधा……….!!! तुम ने यही लिखा था ………! पर मैं उस जिंदगी को अबतक नहीं जोड़ पाया। यह मेरी नाकामी है। मैंने ही अपने हाथों से तुम्हारी जिंदगी को तबाह किया है। तुम मुझे जो चाहे सजा दे सकती हो।
सुधा मेरे बालों में देर तक अंगुलियां चलाती रही। फिर धीरे से बोली चौबीस साल की यह सजा क्या कम है जो हमने भोगी है? चौबीस साल ………..! एक दूसरे को अपने अंदर दफन किए रहे सिर्फ आज इस दिन के लिए। इतने लंबे समय में तो पत्थर की लकीरें भी घिस जाती हैं यदि उन पर निरंतर आवाजाही चलती रहे। तुम तुम बने रहे जमाने की ठोकरों और वक्त की वक्रताओं के बावजूद तुम निखालिस वैसे ही मेरे पास हो जैसे हम अलग हुए थे। यह अपने को बचाकर रखना कितना मुश्किल काम था यह मुझ से बेहतर और कौन जान सकता है।
तुम भी तो अपने को बचाकर रख सकीं…….वरना यह क्रूर जमाना खुरच खुरच कर सब निकाल लेता है। यह कैसे संभव हुआ सुधा कि हम एक दूसरे के लिए वैसे ही बचे रहे। क्या तुमने कभी ऐसा सोचा था कि हम कभी इस तरह उसी जगह फिर से मिल सकेंगे? जहां हम एक-दूसरे से पहली बार मिले थे और जीवन भर साथ चलने का खुद से ही वायदा किया था…….?
“यदि यह एहसास नहीं होता न तो तुम्हारी यह सुधा कब की घुल गई होती …..लोग मुझे घोलकर पी गये होते और अमर हो गये होते ……! और मैं नफरत और घृणा के विष से भर कर खत्म हो गई होती।” सुधा ने कहा।
“ तुम पुरुष हो तुम्हें स्वयं को बचाकर रखने में वैसी जंग नहीं लड़नी पड़ी होगी, जैसी मुझे लड़नी पड़ी है। पता है शादी की पहली रात से हर रात मैं पलंग पर पहुंचते ही स्वयं को एक जिंदा लाश में तब्दील कर लेती रही हूं। यह उतना मुश्किल नहीं जितना मुश्किल था इस बात का एहसास सामने वाले को न होने देना।”
मैं तुम्हारी ‘सुधा’ को बचाकर रखने के लिए रोज विष पीती रही। एक दिन जिंदगी जीने के लिए रोज मरती रही। इस एक दिन के लिए कितनी बार मरी हूं……….! तुम इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते हो……!!!! यदि आज हम नहीं मिलते तो शायद मेरा रोज-रोज का मरना सच में बहुत जल्द मरने में बदल जाता। अब जीना मरना छोड़ दूंगी। जीवन को इस देह में धारण करते रहने का यही एक मात्र उद्देश्य था…..तुम्हें यह बता सकूं कि मैं अपनी मर्जी से नहीं गयी थी। उस रास्ते जाना मेरी विवशता थी मजबूरी थी..। तुम से बेवफ़ाई मेरी जिंदगी का अंत है। चैन से जीना तो नसीब में नहीं था पर अब चैन से मर तो सकूंगी।
सुधा….. हमारे प्यार में बेवफ़ाई का कोर्इ सवाल नहीं था…….. तुम जानती हो कि हमने एक दूसरे से कभी कोई वायदा नहीं किया था…..बस इंतजार किया था हर पल हर दिन…. तुम्हारे आने का। यही तब किया था जब हम कभी कभी मिल लिया करते थे….. कुसुम हमारे तमाम जिये गये पलों की गवाह है…..। फिर अचानक तुम ने शादी कर ली …..न तुमने बताया, न कुसुम ने न संजय या निर्मल ने । मैं तो नौकरी लगने के बाद सीधा तुम्हें बताने इंदौर से आया था। तब तक तुम्हारी शादी को तीन माह हो चुके थे। जब मुझे बताया गया कि तुम जा चुकी हो…… कैसे सुन सका था मैं यह वाक्य? मेरे हाथ में मिठाई और एक गुलाब का फूल था जो मैं तुम्हें देना चाहता था तुम्हारे घर पर मम्मी पापा के सामने। मैं तुम्हारे पापा से तुम्हें अपने लिए मांगने आया था……। मेरे हाथ से मिठाई और वह गुलाब सड़क पर ही गिर गया था…..। मैं जड़ हो गया था ….। चेतना शून्य। निर्जीव। जब होश आया तो लगा कि जिसके लिए एक मुकम्मल नौकरी खोज रहा था…..अब वही नहीं है तो नौकरी का क्या करूंगा? कुछ देर के लिए सब कुछ व्यर्थ लगने लगा था। तुम से कोई शिकवा-शिकायत नहीं की थी और मुझे याद है वह क्षण कि मेरे अंदर एक ही बात थी कि तुम्हारे सामने क्या परिस्थितियां रहीं होंगी जो तुम्हें यह निर्णय लेने के लिए मजबूर होना पड़ा होगा?
सुधा क्या हम आज की इस वास्तविकता को पूरे जीवन की तरह नहीं जी सकते? तुम चाहो तो हमारी चौबीस सालों की तपस्या को एक सार्थकता दे सकती हो……।
०२
“ जिंदगी एक घेरे में जीने के लिए हमें तैयार किया जाता है। अपने आसपास अलग अलग रंग और तहों के घेरे हम बना लेते हैं। बस उन घेरों और रंगों में ही उछल कूद करते रहकर समझते हैं कि हम जी रहे हैं।”
क्या तुम्हें नहीं लगता कि हम बहुत औपचारिक किस्म की बातों और कामों में स्वयं को उलझाए रखकर जीवन गुजार देते हैं? सुधा ने यह कहकर सवालिया निगाहों से मेरी ओर देखा……?
‘तुम सच कह रही हो ….!’ परंतु सोचो सुधा; हम जैसों के लिए यह अलग अलग रंगों और तहों के घेरे कितने जरुरी हैं। यदि ये नहीं होते तो हम टूटकर बिखर भी तो सकते थे। इन घेरों ने ही हमें आत्मविध्वंस करने से रोका है।
तमाम व्यर्थताओं को हम अपने ऊपर से गुजरते हुए देखते हैं, महसूस करते हैं, परंतु अपने दूसरों को यह एहसास नहीं होने देते कि हम उनके साथ व्यर्थता महसूस कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में हम कितनी किरचों में कितनी बार टूटते हैं…. परंतु किसी को चुभन नहीं होने देते। खुद ही लहुलुहान होते रहते हैं।
हम दोनों हाथ में हाथ डाले केंपस में टहल रहे थे। हमारी उम्र हमारा साथ दे रही थी। कोई हमें शक की निगाहों से नहीं देख रहा था। हम सामाजिक संरचना के रिश्तों की तहों में बंधे हुए दिखाई दे रहे थे। केंपस में घूमते हुए लड़के-लड़कियां और हमारी उम्र के लोग हमें घरेलू समझ रहे थे।
“ इस केंपस में हमारे बीच एक पौधा अंकुरित हुआ था जिसे हमने जीवन के छोटे छोटे अनुभवों से सींचा था। तब इसे हम जमाने की धूप हवा पानी से बचाकर रखते थे। आज जब यह जमाने के तमाम थपेड़ों को सहकर एक वृक्ष बन गया है तो हम कितने बेफिक्र हैं। आज खुली हवा में स्वतंत्रता का एहसास कितना सुखद है। लोगों की नजरों की परवाह नहीं है और वे नजरें भी सोच रहीं होंगी की एक पूरी उम्र जीने के बाद भी इनके बीच की केमेस्ट्री कितनी सुखद है।”
सुधा का यह दृष्टिकोण कितना अलग है। मैं उस आजाद समय का अनुभव कर रहा था जिसकी दरकार हमें चौबीस साल पहले दिन। सुधा के चेहरे पर एक निश्चिंतता और संतुष्टि का भाव तैर रहा था। वह बिल्कुल हड़बड़ी में नहीं थी। नदी जैसे पहाड़ से उतरकर पहली बार मैदान में बहती है तो जो स्थिरता और सहजता का प्रवाह दिखाई देता है वही सुधा के चेहरे पर दिखाई दे रहा था। उसने जीवन की विषमताओं के पहाड़ों के उबड़-खाबड़ पन को लंबे समय तक भोगा है। हजारों बार नंगे पैरों से पथरीले रास्ते पार करना पढ़ें होंगे। आज एक मुकम्मल और निजी स्वतंत्र समय और साथ उसके जीवन में मिला है तो वह तमाम थकान को सहजता से उतार देना चाहती है।
सुधा कैसी हो तुम……….? मैं ने बहुत ही औपचारिक सा प्रश्न किया तो सुधा कुछ कदम चुपचाप चलती रही और आसपास के परिवेश को दोनों और लगे पेड़ों को, विश्वविद्यालय की बिल्डिंग को देखती रही। फिर बोली तुमने इन रास्तों और अपने डिपार्टमेंट की दीवारों और उन सीढ़ियों से नहीं पूछा की वो कैसी है? उनसे भी तो चौबीस साल बाद ही मिल रहे हो…..!
सुधा से इस तरह के जबाव की उम्मीद नहीं थी। पर बात ठीक थी। सुधा …….ये सब जड़ चीजें हैं इनके साथ को महसूस कर सकते हैं हम पर .……….! मेरी बात पूरी नहीं हो पाई थी कि सुधा बीच में ही बोली ……बस यही समझ लो कि मैं भी इनकी तरह ही जड़ बनी रही हमारे अलग होने के दरम्यान। मौसम का प्रभाव तो इन चीजों पर भी होता है, अब देखो न यह पुस्तकालय (हम इस वक्त सेंट्रल लाइब्रेरी के दाहिने ओर से गुजर रहे थे) पहले से कुछ ज्यादा ही उम्र दराज दिखाई नहीं दे रहा? ये अशोक के पेड़ भी अपनी ताजगी और जवानी को खो चुके हैं। ये तमाम चीजें अब वही होते हुए भी वैसी नहीं हैं।
इनकी तरह मैं भी मौसम की मार से पूरी तरह बचा नहीं सकी स्वयं को। परंतु इनके बीच हमें एक मुखौटे विहीन परिवेश का अनुभव हो रहा है। मगर हम जिस परिवेश में सांस लेते हैं वहां इतने मुखौटे पहन रखे हैं लोगों ने कि वास्तविक पहचान तक पहुंच सकना असंभव है। परत दर परत, परत दर परत समझ ही नहीं आता कि कब तक खुरचो उन मुखौटों को….?
दिक्कत सिर्फ यह नहीं है कि पूरी दुनिया मुखौटों में बंद है, सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वह किसी को भी मुखौटे के बिना नहीं रहने देती है। हम बिना मेकअप के ओरिजनल चेहरे के साथ रहना चाहें तो नहीं रह सकते। मुझे हर वक्त लड़ना पड़ा है इस बनावटी को न अपनाने के लिए। इसकी सजा यह मिली मुझे कि मैं हमेशा जमाने के बीच स्वयं को अनफिट महसूस करता रहा। शुरू शुरू में एडजस्ट करने में बहुत परेशानी हुई। फिर धीरे धीरे मैं ने अपने आपको उन जगहों से हटाना आरंभ कर दिया जहां बनावटी पन से या बाहर की चीजों से मेरी पहचान की जाती थी।
मेरे पास अपने निजी पन के साथ रहने का यही एक मात्र रास्ता था। इस निजी पन में बस तुम होती थीं साथ । तुम तो मेरे अंदर मेरे अस्तित्व की तरह समाई हुई हो इसलिए मुझे कभी भी बाहर किसी की जरूरत महसूस नहीं हुई।
शाम का धुंधलका आसमान से उतर रहा था। हल्की हल्की ठंडक महसूस होने लगी थी। हम लगभग तीन घंटे से एक साथ थे और इस बीच हमें पानी तक की जरूरत महसूस नहीं हुई थी। मुझे ख्याल आया कि सुधा को भूख लग आई होगी। मैं सुधा का हाथ पकड़े हुए एक दूसरे रास्ते की ओर मुड़ने लगा। यह रास्ता केंटीन की ओर जाता है।
“ क्या हम कैंटीन जा रहे हैं?” सुधा ने पूछ। अरे वाह! तुम्हें याद है यह रास्ता। कैंटीन जाने का यह रास्ता कम चलता था। हम डिपार्टमेंट से प्राय: ही इसी रास्ते कैंटीन जाते थे। इस रास्ते पर कोई टकराता नहीं था। हमें लोगों की नजरों से बच कर कम चलना पड़ता था।
सुधा तुम्हें कैंटीन के बारे में कुछ और याद है? मैंने जिज्ञासा वश पूछ लिया। हालांकि यह सवाल सुधा की याददाश्त पर सवालिया निशान लगा सकता था। सुधा और मेरे बीच जिस पौधे ने जन्म लिया था वह पहली बार इसी कैंटीन में जमीन तोड़ कर बाहर आया था।
सुधा चलते चलते रुक गई और बोली वापस चलो……! अरे, नहीं तुम्हें नाराज करना मेरा उद्देश्य नहीं था। बस मन में आ गया तो पूछ लिया। चलो कुछ खा लेते हैं। देखें जिंदगी की तरह कैंटीन के स्वाद में कितना बदलाव आया है। सुधा के मन में मेरे सवाल ने थोड़ा सा कड़वा पन भर दिया था।
“सुधा ……….मेरा मतलब तुम्हें ठेस पहुंचाने का नहीं था।” देखो तुम नाराज़ हो गयीं तो मैं जी नहीं सकूंगा। मैंने सुधा के हाथ को ढ़ीला छोड़ दिया….! इस बीच सुधा ने स्वयं को सम्हाल लिया था। उसने वापस हाथ को कसकर पकड़ लिया…..।
“तुम भी न” ………इतनी सी नाराजगी नहीं झेल सकते हो मेरी …….। अगर तुम्हारे पल्ले पड़ जाती तो जीवन भर कैसे झेलते मुझे……..” सुधा ने माहौल को हल्का बनाने के लिहाज से मजाकिया अंदाज में कहा। पर उसके हाथ की पकड़ तेज होती जा रही थी। ऐसा लग रहा था कि सुधा कह रही है कि “एक बार छोड़कर चले गये थे और मैं ने भी ढीला छोड़ दिया था।” इसकी सजा चौबीस सालों से भोग रहे हैं हम। अब मैं यह गलती नहीं करुंगी।
“ वह दिन तो इतना ताजा है आंखों में कि मरने के बाद भी तुम पढ़ सकोगे। “ सुधा ने कहा और मेरी ओर पहली बार इतने प्यार और शिद्दत से देखते हुए कहना जारी रखा। “दोपहर के लगभग डेढ़ बज रहे थे। मैं तुम और कुसुम तीनों केंटीन गये थे। फ़रवरी का महीना था। दोपहर में धूप में गर्मी होने लगी थी। कैंटीन के बाहर पत्थर की बेंचों पर हम बैठे थे। पता नहीं कि कुसुम को कैसे यह एहसास हुआ कि वह हमेशा हमारे साथ होती है तो हम कभी भी व्यक्तिगत बातें नहीं कर पाते। उस दिन वह उठी और बोली कि मैं थोड़ी देर में आ रही हूं। यह कह कर वह चली गई। हम शायद पहली बार अकेले थे……!
“और ….…! तुम ने ….. मेरे अंदर एक अबूझ स्वप्न भर दिया था…! मुझे, हमारे जीवन की सतह पर फैले रेगिस्तान के नीचे बहने वाले अमृत निर्झर का अहसास तो था, पर उस दिन तुमने उस निर्झर के छींटें मेरे वदन पर छिटक कर मुझे एक जिंदा अहसास में बदल दिया था।”
एक अद्भुत अहसास …… मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं हिमालय की ऊंची चोटी पर खड़ी हूं और चारों तरफ खुला नीला आसमान है….! मैं धीरे धीरे आसमान में उड़ रही हूं। तुम मुझे दूर से देख रहे हो एक टक लगातार …… मैं हूं कि ऊंचे और ऊंचे उड़ती जा रही थी। पूरी दुनिया मेरे लिए अदृश्य हो गयी थी अस्तित्व हीन……बस तुम और मैं सीमाहीन आकाश में चील के पंखों पर सवार उड़ते जा रहे थे।”
मुक्ति और प्रेम के पहले जीवंत एहसास को कोई भूल सकता है भला…….? बंधनहीन, पहचान विहीन होना कितना सुखद होता है……! अब आज ही देखो न यहां हमें किसी के द्वारा पहचान लिए जाने की चिंता नहीं है तो कुछ घंटों का साथ एक पूरे जीवन का अहसास करा गया।”
मैं सुधा के चेहरे को लगातार पढ़ रहा था। ऐसा लग रहा था कि एक मासूम बच्ची बहुत मीठा स्वप्न देख रही है और उसका चेहरा उस स्वप्न को आइने की तरह प्रतिबिंबित कर रहा है।
सुधा एक दम रिक्त हो चुकी थी, यह कहने के बाद। हम केंटीन पहुंच चुके थे। पत्थर की वह बेंच अपनी जगह उपस्थित थी। अलबत्ता उसके आसपास की घांस और झाड़ियां अब नहीं थीं। एक रूखापन माहौल में था। केंटीन चालू थी। सुधा उस बेंच की ओर बढ़ गई। मैं केंटीन में गया और समोसे चटनी सहित और दो गर्म काफी ले आया। सुधा समोसे देखकर चहक उठी…… उसने झट से समोसे लिए और खाने लगी। सुधा हमेशा समोसे ऐसे ही खाती थी काफी के साथ।
पहला कौर तोड़ कर मूंह में डालने के लिये जैसे ही उसने हाथ आगे बढ़ाया उसे कुछ ध्यान आया…….तो अचानक उसका हाथ रुक गया और उसने मेरी तरफ देखा……! मैं समोसे का एक पीस उसकी ओर बढ़ा रहा था……. मुझे याद है उस दिन मैंने पहली बार सुधा को अपने हाथ से समोसा खिलाया था। सुधा को भी वही बात याद आ गई थी इसीलिए वह रुक गई थी।
उसने अपना हाथ मेरी ओर बढ़ा दिया। हमने एक-दूसरे को समोसा खिलाया फिर काफी की चुस्कियां लीं। कुछ देर अपने जीवन के चौबीस साल के अंतराल को भरने की कोशिश करते रहे। परंतु अतीत वर्तमान में अपने तरीके से मौजूद रहता है। हमारे बीच भी अंतराल का अतीत अपनी तरह से मौजूद था। सुधा के चेहरे पर कुछ अनमने से भाव तैरते नजर आने लगे।
लालबत्ती फिर हमारे बीच जलने लगी थी। हम साथ थे पर हमें ऐसा लग रहा था कि हम एक-दूसरे से विपरीत रास्तों पर हैं। जैसे ही लालबत्ती हटेगी हम अलग और विपरीत दिशाओं में भागने को मजबूर हो जायेंगे और फिर कभी जिंदगी के किसी चौराहे पर नहीं टकराएंगे।
सुधा अंधेरा गहराने लगा है। आगे क्या प्रोग्राम है…..? वैसे तुम चाहो तो हम यूं ही केंपस में घूमते-टहलते इस अंधेरे को जी सकते हैं। यह अंधेरा ही है जो हमें शून्य को भरने में मददगार हो सकता है। इस अंधेरे में हम पहचान मुक्त साथ को जी सकते हैं। इस अंधकार में लालबत्तियां भी परेशान नहीं करती हैं।
सुधा बिना कुछ कहे उठी और मुझमें समा गई जैसे रेगिस्तान में सरस्वती विलीन हो गयी हो।
…………………………………………….
परिचय : परिचय : लेखक वरीय साहित्यकार हैं. इनके आलेख स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं.

Related posts

Leave a Comment