विशिष्ट कहानीकार :: सिनीवाली शर्मा

अफसर की बीबी

मोबाइल की घंटी बजते ही रसोई से भुनभुनाती हुई कामिनी निकली, ” कितनी बार कहा इनसे एक नया मोबाइल ले लो, लेकिन हर महीने कहेंगे अगले महीने ! पता नहीं वो महीना कब आएगा !” उसकी उंगली यंत्रवत मोबाइल के घिस चुके बटन पर चली गई।
” हलो ”
” पहचानी !”
” आं—नहीं—कौन—?”
” मैं साँवली ”
” सां…वली…तुम !”
उसकी आवाज सुनकर कामिनी के भीतर खुशी की लहर दौड़ गई।
” इतने दिनों के बाद ?”
” तुम तो मुझे भूल ही गई पर मैं तो तुम्हें हमेशा याद करती रहती हूँ।”
कामिनी समझ नहीं पा रही थी, ये कहकर साँवली उससे प्यार जता रही है या उसे ताना मार रही है। वो कुछ बोलती कि इससे पहले फिर साँवली की उधर से आवाज आई, ” बड़ी मुश्किल से तुम्हारा नंबर मिला है। खैर छोड़ो, आज तुम्हारी बहुत याद आ रही थी !”
” मेरी याद ! कोई खास बात है क्या, आज ?”
” तुम तो भूल ही गई, मैं ही बता देती हूँ, आज मेरा मैरेज डे है !”
” हाँ याद आया !”
आश्चर्य करते हुए कामिनी बोली, ” कितने साल बीत गए, लगता है जैसे कल की ही बात है !”
” शादी के शुरुआती दिनों में तुम चिट्ठी जरूर लिखा करती थी, अब पता नहीं कहाँ खो गई, एक ही गाँव के हैं हमदोनों लेकिन एक दूसरे से मिले, हालचाल जाने कितने बरस बीत गए !” साँवली बीते दिनों को याद करने लगी।
” पहले ये बता घर परिवार सब कैसे हैं ? पति ?”
बोलते बोलते कामिनी को याद आया, शादी के समय साँवली का पति बी ए में पढ़ ही रहा था। इसलिए झिझकते हुए बोली।
साँवली को जैसे इसी सवाल का इंतजार था, फिर क्या था, शुरू हो गई !
” क्या कहूँ, इनको फुरसत कहाँ ! बड़े अफसर जो बन गए हैं ! मैं तो इनसे जी भर बात करने के लिए भी तरस जाती हूँ।”
कामिनी भौचक्की रह गई।
” अफसर !” उसके मुँह से अनायास ही निकल गया फिर संभलती हुई बोली, ” वाह ! तेरी किस्मत तो बहुत अच्छी है, किस विभाग में काम करते हैं ?”
” तुम तो जानती हो, मैं तुम्हारी तरह कौलेज तो गई नहीं, विभाग उभाग समझ में नहीं आता। अफसर हैं इतना ही जानती हूँ। वो एन जी ओ—कुछ होता है न—उसी में हैं।”
साँवली ने भी उसके पति की थाह लेनी चाही और सवाल की सूई कामिनी की ओर घुमा दी।
” मैं तुम्हारे ब्याह में आ नहीं सकी थी। तू बता, वो कैसे हैं ? क्या करते हैं, घर परिवार कैसा है ?”
बताना तो कामिनी भी चाहती थी अपने बारे में पर उसके आगे अपने को छोटा नहीं दिखाना चाह रही थी, कहाँ उसका पति अफसर और कहाँ इसके पति ! समझदारी से बात बदलते हुए बोली, ” पहले ये तो बता तुम्हारे देवर की शादी तो हो गई होगी ?”
” मेरे देवर, अभी तक याद है !”
” हाँ, तुम्हारी शादी में मैंने उन्हें बहुत परेशान किया था।”
” उसकी शादी हुए चार साल हो गए, दो साल का एक बेटा भी है।”
” तो देवरानी के साथ कैसी निभ रही है ?”
कामिनी बातों बातों में उसके घर गृहस्थी का ओर छोर पकड़ना चाह रही थी। साँवली पहले से ही इसका अंदाजा लगाए बैठी थी, इतराते हुए बोली, ” जिसका पति ज्यादा कमाता है, राज तो उसका ही चलता है घर में ! बस समझो राज कर रही हूँ।”
बेटे को आवाज देती हुई साँवली बोली, ” राज, जरा एसी चला देना, बड़ी गर्मी लग रही है।”
एसी का जिक्र करते ही साँवली की आवाज में ठंडक आ गई और कामिनी की देह तपने लगी। साँवली बात आगे बढ़ाती हुई बोली, ” क्या बताऊँ, इनको इतना मना किया मैरेज डे पर गहने नहीं चाहिए। अभी जन्मदिन पर ही तो लिए थे लेकिन ये नहीं माने। वो तीन मंजिल वाला झुमका ले ही आए और साथ में सिल्क की साड़ी भी ! सिल्क साड़ी इन्हें बहुत पसंद है। तीन चार हजार से सिल्क साड़ी शुरू ही होती है। ओह ! इस गर्मी में जेवर और जरी वाली साड़ी पहनना—! पर इनका मन भी तो नहीं दुखा सकती।”
साँवली बिना रुके बोले जा रही थी उधर कामिनी की आँखों के सामने अपनी शादी के समय से ही संजोकर रखे दो तीन सिल्क की साड़ियाँ घूमने लगी। कब से सोच रही है एक नई सिल्क की साड़ी लेने की वो भी ब्लू रंग की, पर—!
फिर वो अपनी पहनी हुई साड़ी की सिलवट देखने लगी पर अपनी आवाज में वो सिलवट नहीं पड़ने देना चाहती थी।
” आजकल तो मैरेज डे पर पार्टी भी दी जाती है, तुमने भी तो दी होगी ?”
” सोचा तो था पर इन्होंने कहा कि हर साल तो देते ही हैं इस बार मिठाई ही बाँट दो। मुझे भी लगा ठीक ही तो कह रहे हैं।”
इधर कामिनी को याद आने लगा कि कैसे कई दिनों पहले से ही उसके पति मन ही मन जोड़ने लगते हैं कि कैसे कम से कम खर्च में मैरेज डे मना लिया जाए। एक साँवली है कि, पर उसे ये सुनकर अच्छा लग रहा था कि इस बार साँवली ने मिठाई ही बाँटी। आश्वस्त होने के लिए उसने फिर पूछा, ” अच्छा तो मिठाई ही बाँट दी ?”
” हाँ, पर देखो तुरंत ही बगलवाली चली आई कहने कि ये तो तुमने अच्छा नहीं किया ! इतने बड़े अफसर की बीबी होकर खाली मिठाई ही बाँट दी ! ओफ्फ ! अफसर की बीबी होना भी कम झंझट वाला काम नहीं है। सबकी नजर मेरे ही ऊपर टिकी रहती है, क्या पहना ? कौन सा नया जेवर बनवाया ?”
कामिनी अपने गले में पड़ा हुआ मंगलसूत्र अनायास छूने लगी, जैसे उसके गले का मंगलसूत्र, उसकी हैसियत बता रहा है। उसे लगा, अधिक देर चुप रहने से कहीं वो उसके बारे में खोजबीन न शुरू कर दे। झट से अपनी सोच को मन की पिटारी में बंद करते हुए बोली, ” बेटा तो अब बड़ा हो गया होगा !”
” हाँ, वो तेरह साल का हो गया। बेटी भी दस साल की हो गई पर क्या बताऊँ, आजकल के बच्चे भी न !”
” हाँ, वो तो !”
साँवली अपनी धाराप्रवाह बातों के बीच कामिनी की बातों का रोड़ा हटाते हुए बोली, ” इन्हें घर का खाना तो पसंद ही नहीं। हम तो कोई बड़े शहर में रहते नहीं, जहाँ माँ बाप ने ब्याह दिया, वहीं हैं। ये अलग बात है कि आज चार पैसा हाथ में आ गया है परन्तु ये छोटा शहर तो नहीं बदला। यहाँ हर चीज नहीं मिलती। हमेशा होटल का खाना ही पसंद करता है। फल और ड्राई फ्रुट्स तो घर में रखा रखा खराब हो जाता है पर बच्चे हाथ ही नहीं लगाते।”
ड्राई फ्रुट्स का नाम साँवली के मुँह से सुनते ही उसकी आँखों के सामने अपनी रसोई में रखे छुहारे घूम गए। ये काजू, किशमिश से सस्ता रहता है इसलिए वो खरीद लेती है। कभी कभी किशमिश भी खरीद लेती है ताकि उसके बच्चों को ना लगे कि उसके यहाँ ये सब नहीं रहता है।
ड्राई फ्रुट्स बोलने पर उसका स्वाद भी बढ़ जाता है और वो अधिक मँहगा भी लगने लगता है। पर उससे भी मँहगी उसे ये बात लगी कि साँवली तो मैट्रिक भी पास नहीं है, हिन्दी भी ठीक से नहीं बोल पाती थी और वो आई ए पास है, हिन्दी तो क्या अंग्रेजी भी काम भर समझती है पर वो आजतक किशमिश को किशमिश ही बोलती है और वो झाड़कर ड्राई फ्रुट्स बोलती है, समय समय की बात है।
” अच्छा तू बता वैसी ही है या देह पर कुछ मांस चढ़ा ?”
मोबाइल कान से सटाए कामिनी अपने आप को निहारने लगी। मांस तो देह में तब चढ़े जब सांस लेने की फुरसत हो। दूसरे ही पल बोली, ” मैं तो ठीक हूँ, इन्हें मैं दुबली ही अच्छी लगती हूँ, इसलिए अपना ध्यान रखना पड़ता है ताकि मेनटेन रह सकूँ, तुम बताओ !”
” अरे क्या बताऊँ, देखोगी तो पहचान नहीं पाओगी, खाते पीते घर की लगती हूँ। ये तो कहते हैं बस ऐसे ही बनी रहो। आजकल गर्मी बहुत पड़ने लगी है। सोच रही हूँ कुछ दिनों के लिए शिमला चली जाऊँ। अभी बच्चों की छुट्टियां भी चल रही हैं पर बच्चे कहीं और जाना चाहते हैं। देखो क्या होता है ?”
कामिनी अपने घूमते पंखे को देखकर सोच रही थी कि वो कब से कूलर लेने का सोच रही है।
मित्रता की नदी किनारे दोनों बातें तो कर रही थीं पर कामिनी हीनता की लहरों में डूबने लगी, मन किया फोन काट दे पर अच्छा नहीं लगता, वो कहीं ये न समझ ले मैं उससे बचना चाहती हूँ। तब तक साँवली के मोबाइल से आवाज आई, मम्मी ! मम्मी !
सुनकर कामिनी को राहत मिली। ” लगता है बेटी बुला रही है।”
” अभी तो जी भरकर बात भी नहीं हुई कि मम्मी, मम्मी !”
कामिनी तपाक से बोली, ‘ फोन पर बात करने से संतोष नहीं हो रहा। कुछ ही दिनों में मैं तुम्हारे ससुराल के रास्ते ही गुजरने वाली हूं। सोचती हूं तुमसे मिलती जाऊं।’
सांवली संभलते हुए बोली, ” बहन, पैसा हो जाने से क्या होता है ! हमारे ससुराल का चाल-चलन मोटा है। उन्हें इस तरह आना-जाना पसंद नहीं है। कभी नैहर आओ तो बताना, वहीं मिल लूंगी।”
साँवली की बेटी लगातार पुकार रही थी।
” हाँ हाँ अभी रखती हूँ फिर बात करूँगी।”
फोन काटते ही वो अपनी बेटी पर गुस्सा करने लगी, ” कितनी बार कहा है जब फोन पर बात करुँ तो पीछे से मत चिल्लाया करो, इसीलिए मैं बाहर आई थी बात करने।”
” लेकिन मम्मी, तुमने उन से झूठ क्यों बोला ?”
” दुनियादारी की बातें तुम नहीं समझोगी !”
बोलती हुई वो अपने हाथों में घिस चुके बटन वाले मोबाइल को संभालते हुए अपने पुराने से घर के भीतर चली गई।

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परिचय : एक कहानी-संग्रह प्रकाशित. पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाें का निरंतर प्रकाशन
संपर्क सूत्र : siniwalis@gmail.com
माे. 8083790738

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One Thought to “विशिष्ट कहानीकार :: सिनीवाली शर्मा

  1. Smita Shree

    हमेशा ही की तरह सहज भाव से रची अच्छी कहानी
    वाह!

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