एक उदास सिम्फ़नी
                     – सुशांत सुप्रिय

”रात वह होती है जब तुम सोए हुए हो और तुम्हारे भीतर अँधेरा भरा हो । ”
आजकल मेरे लिए सारे दिन रातों जैसे हैं । भरी दुपहरी है । फिर भी चारो ओर अँधेरा है । आकाश लोहे की चादर-सा मेरे ऊपर तना है । भीतर एक अचीन्हा-सा दर्द है । बाहर एक अनाम-सी उदासी है । मेरी जेब ठंडी है । आँखों में अँधेरा है । सीने में फफोला है । दुख मेरे पैरों से लिपटा है । मेरे सिर पर बेकारी का कँटीला ताज है । बेरोज़गारी की मार मुझ पर भी पड़ी है । मैं सड़क पर आ खड़ा हुआ हूँ । कहीं कोई नौकरी मुझे नहीं तलाश रही । मेरे चारो ओर एक उदास सिम्फ़नी-सा बजता हुआ यह समय है । और इस अनिश्चित समय की उपज मैं हूँ ।
अब मैं भीड़ में अकेला हूँ । अपनों के बीच एक अजनबी हूँ । समय मुझे बिताता जा रहा है । मैं यूँ ही व्यतीत हो रहा हूँ । मेरा होना भी जैसे एक ‘ नहींपन ‘ में बदलता जा रहा है । लगता है जैसे सारे धूसर और मटमैले रंग मेरे ही हिस्से में आ गए हैं और दिन एक बदनुमा दाग़-सा मेरे चेहरे से आ चिपका है । मेरा वर्तमान जीवन के ताल पर फैली हुई काई बन गया है । अब मेरी हर सुबह के भीतर रात की कराहें दफ़्न हैं । मेरे तन-मन में हताशा की गंध है । जैसे समय की आँत में एक फोड़ा उग आया है । जैसे एक ब्लैक-होल है , जिसमें मैं गिरता जा रहा हूँ ।
कुछ माह पहले तक मेरे पास नौकरी थी । जीवन में हरियाली थी । साथ देने के लिए मेरी प्रेमिका छवि थी । अब बीते दिनों की यादें हैं । अवसाद है । और ठंडा पसीना है । अनायास ही ग़ुलाम अली की गाई हुई एक उदास ग़ज़ल याद आ जाती है — ” चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला … । ”
शाम के साये गहरे हो रहे हैं । मैं इंडिया गेट से कुछ दूर घास पर बैठा हूँ । एक सिगरेट मुझे कश-कश पी रही है । मेरी आँखों में बुझ चुके सूरज के कुछ उदास क़तरे जमा हैं । मेरे बगल में दुग्गल बैठा है । उसकी हालत भी मेरे जैसी ही है । हम दोनो एक ही ऑटोमोबाइल कम्पनी में काम करते थे । अब दोनो बेरोज़गार एक साथ सड़क की धूल फाँक रहे हैं । उसे भी मेरे ही साथ कम्पनी से निकाल दिया गया । वजह बताई गई — रिसेशन । आर्थिक मंदी , जिसने हम जैसे सैकड़ों बदक़िस्मत लोगों की नौकरियाँ लील ली हैं ।
” अब कम्पनी सरप्लस-स्टाफ़ एफ़ोर्ड नहीं कर सकती ! ” कम्पनी का सपाट-सा जवाब था ।
” प्रगति मैदान में वर्ल्ड बुक फ़ेयर चल रहा है । ” दुग्गल सूचना देता है । उसे भी मेरी तरह ही पढ़ने-लिखने का शौक़ है । लेकिन हम जानते हैं कि कि हमारी जेबों में किताबें ख़रीदने लायक पैसे नहीं हैं । मैं कुछ नहीं कहता हूँ । दुग्गल सूखे बीज-सी बजती हुई मेरी चुप्पी को सुनता है । फिर उसका बदरंग मौन भी मेरी उस चुप्पी में शामिल हो जाता है ।
हमारे चारो ओर शोकगीत-सा कानों में बजता हुआ झुटपुटा है । हमसे थोड़ी दूरी पर दिल्ली का ट्रैफ़िक बदस्तूर बह रहा है । दिन भर भटकने के बाद अब थकान हम पर हावी है । कुछ देर बाद हम दोनो अपने-अपने दड़बों में लौट जाएँगे । नौकरी के लिए भटकने का यह सिलसिला न जाने कब तक जारी रहेगा । फिर से ग़ुलाम अली की गाई एक ग़ज़ल याद आ जाती है — ” ये दिल , ये पागल दिल मेरा , क्यों बुझ गया , आवारगी … । ” इसी वजह से आजकल मेरा छवि से भी मिलना-जुलना नहीं हो पा रहा है ।
साल भर पहले छब्बे भाई के दफ़्तर में पहली बार मैं तीखे नैन-नक़्श वाली एक पतली-दुबली पंजाबी लड़की से मिला था । पूछने पर पता चला कि उसका नाम छवि मिन्हास था । छब्बे भाई आदिवासी लोगों के कल्याण के लिए एक एन.जी.ओ. चलाते हैं । छवि उसी में काम करती है । छब्बे भाई ने बताया कि उसकी रुचि साहित्य में भी थी ।
”तुमने सुरजीत पातर को पढ़ा है ? ” शुरुआती बातचीत में ही छवि ने मुझसे पूछ लिया था ।
छब्बे भाई ने उसे मेरे बारे में बताया कि ये भी कविताएँ लिखता है ।
” अच्छा ! कभी मुझे भी सुनाना । ” उसने कहा था ।
धीरे-धीरे हम मिलने-जुलने लगे थे । छवि को मेरी कविताएँ अच्छी लगी थीं । ख़ास करके ‘ यह सच है ‘ शीर्षक वाली मेरी यह कविता — ” रसोई के चाकू /से ले कर / परमाणु बम तक / सभी अस्त्र-शस्त्र / बेमानी हैं / प्रतिदिन हम / उपेक्षा से / एक-दूसरे की / हत्या करते हैं । ”
समय बीतने के साथ-साथ हम दोनो एक-दूसरे की ओर आकर्षित होने लगे थे । कई बार छुट्टी वाले दिन छवि मुझसे मिलने लक्ष्मीनगर में मेरे किराए के मकान पर आ जाती । कभी-कभी वह बहुत बढ़िया छोले-पूरी या राजमा-चावल बना कर मुझे खिलाती और मुझे अपनी कुकिंग का दीवाना बना लेती । या हम कभी-कभी कनॉट प्लेस में मिलते । दिल्ली दरबार या वोल्गा में लंच करते । फिर कैवेंडर से अपनी फ़ेवरिट कसाटा आइसक्रीम खाते । और जनपथ पर यूँ ही टहलते रहते । लोग पूरा बाज़ार ख़रीद कर अपनी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में भरकर अपने घर ले जा रहे होते । मैं भी छवि को अक्सर कोई-न-कोई प्यारा-सा गिफ़्ट ख़रीद कर दे रहा होता । लेकिन यह सुखद दिनों की बात थी जब मेरी नौकरी नहीं छिनी थी । हम दोनो कविताओं और कहानियों के बारे में भी चर्चा किया करते । छवि आदिवासियों के कल्याण के बारे में चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में बेहद गम्भीर थी । उसका ज़्यादातर समय अपने एन. जी. ओ. के काम में ही बीतता था । बाक़ी बचे समय में हम एक-दूसरे के चेहरों में अपने लिए आइना ढूँढ़ते रहते और समय का पता ही नहीं चलता …
” चल यार, चलते हैं । देर हो रही है । ” दुग्गल मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहता है । मैं चौंककर वर्तमान में लौट आता हूँ । अँधेरा रात के कोनों को कुतरने लगा है । हवा में ठंड की खनक है । अपने कपड़ों को हाथ से झाड़ते हुए हम घास पर से उठ खड़े होते हैं । इत्तिफ़ाक़ से बस-स्टॉप पर पहुँचते ही मुझे लक्ष्मीनगर की बस मिल जाती है ।
” कल मिलते हैं । ” मैं भीड़ में दबा हुआ अपना हाथ किसी तरह हिला कर कहता हूँ । जवाब में दुग्गल भी अपना ख़ाली हाथ मेरी ओर हिला देता है । जीवन के कैलेंडर के एक और दिन ने मुझे ख़र्च कर लिया है । मेरी आयु में से एक और दिन कम हो गया है । ” … सीने में जलन , आँखों में तूफ़ान-सा क्यों है ? इस शहर में हर शख़्स परेशान-सा क्यों है … ? ” बस में किसी ने अपने मोबाइल फ़ोन पर एफ़. एम. रेडियो लगा दिया है । सुरेश वाडेकर की उदास आवाज़ बस में तैर रही है …
अपने किराए के मकान पर पहुँच कर मैं बिस्तर पर निढाल हो कर गिर जाता हूँ । एक पर-कटे पंछी-सा । तभी बिस्तर पर पड़े मोबाइल फ़ोन पर मेरी नज़र जाती है । अपना मोबाइल फ़ोन मैं यहीं छोड़ गया था । उसमें छवि के दस-ग्यारह मिस्ड कॉल पड़े हैं । ज़हन में स्मृतियों की लहर झनझनाती है । लेकिन छवि से बात करने की हिम्मत नहीं है अभी । बेकारी के इन दिनों में लिखी अपनी ही एक कविता याद आती है । छवि को उसके ई-मेल ‘ minhas_chhavi@gmail.com ‘ पर अपनी वही कविता पोस्ट कर देता हूँ । कविता का शीर्षक है : ‘ डर ‘ — ” तुम डरती हो / तेज़ाबी बारिश से / ओज़ोन-छिद्र से / मैं डरता हूँ / उपेक्षा की नज़रों से / अलगाव की टीस से / तुम डरती हो / रासायनिक हथियारों से / परमाणु बमों से / मैं डरता हूँ / बदनीयती के रिश्तों से / धोखे के सर्प-दंशों से / तुम डरती हो / एड्स से / कैंसर से / मृत्यु से / मैं डरता हूँ / उन पलों से / जब जीवित होते हुए भी / मेरे भीतर कहीं कुछ / मर जाता है ” ।
छवि को अपनी कविता भेज कर मैं आँखें मूँद लेता हूँ । दो मिनट बाद ही मेरे ई-मेल पर छवि का जवाब आ जाता है — ”कहाँ हो तुम इन दिनों ? कल मिलो । और हाँ, ग्रेट पोएम । इसीलिए तो मैं तुम्हारी फ़ैन हूँ , मेरे पोएट-फिलॉस्फ़र ! लव यू । बाय ! ”
मोबाइल फ़ोन रखकर सोने की अधमरी कोशिश करता हूँ किंतु कानों में कई स्वर बजने लगते हैं —
”डोंट यू थिंक , यू आर टू ओल्ड नाउ फ़ॉर अ गवमेंट जॉब ? ”
”आप अपनी कम्पनी के लिए काम के नहीं होंगे तभी तो उन्होंने आप को नौकरी से निकाल दिया ! फिर हम आप को अपनी कंपनी में क्यों रखें ? ”
” मिस्टर प्रशांत , यू आर ओवर-क्वालिफ़ाइड फ़ॉर दिस जॉब । सॉरी ”…
नींद आँखों के लिए अजनबी बनी रहती है । और तब केवल छवि की यादों का ही सहारा बचता है । ज़हन में बीते हुए दिनों की फ़िल्म चलने लगती है …
अलगनी पर फैले धुले कपड़े-सी थी वह सुबह । उस दिन जब छवि

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परिचय : लेखक की कई कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं

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