विशिष्ट कहानीकार: सुशील कुमार भारद्वाज

निकाह की दावत

 

सुबह से ही पूरा गाँव चहल-पहल में डूबा था. लग रहा था जैसे कि पूरा गाँव ही एक टांग पर खड़ा हो गया हो. हर कोई अपने–अपने तरीके से अपनी सक्रिय सहभागिता दिखाना चाह रहा था. कोई किसी से उन्नीस दिखने के लिए कतई तैयार नहीं था. आखिर हो भी क्यों  नहीं? बेटी की शादी है. और बेटी की शादी में तो अमूमन हर इंसान तहे दिल से मदद करना चाहता ही है. बेटी किसी एक की नहीं होती वह पूरे समाज की बेटी होती है. अपने ससुराल में वह अपने व्यवहार से न सिर्फ अपने वंश-परिवार का परिचय देती है बल्कि पूरे समाज के सभ्यता –संस्कृति का प्रतिनिधित्व भी करती है. और किसी एक की लापरवाही या बदसलूकी ताजन्म दाग की तरह बनी रहती है. कचोटती रहती है. कई बार तो बाराती वाले अपने उन्माद में मर्यादा की हद तक लड़की वालों के धैर्य की परीक्षा लेते हैं.

 

वैसे भी आज मुश्ताक मास्टर साब की दोनों बिटिया की शादी है. जो कि न सिर्फ भले इंसान हैं बल्कि गाँव भर में सबसे ज्यादे पढ़े-लिखे और इस्लाम के जानकार भी हैं. जो अक्सर आयोजित होनेवाले जलसे –मजलिसों में भी शिरकत करते रहते हैं. इस्लाम को धर्म की तरह मानते हैं लेकिन कट्टरता लेश मात्र की भी नहीं हैं. गैर-मुस्लिमों के साथ भी उनका वही अपनापन और सामंजस्य है जो उनका अपनी बिरादरी के लोगों के साथ है. जितना वो कुरान पढ़ते हैं उतना ही गीता और रामायण भी. जितनी समझ उन्हें उर्दू भाषा की है उससे रत्ती भर भी कम समझ नहीं है हिन्दी और संस्कृत की. हमेशा धन को साधन के रूप में माना साध्य के रूप में नहीं. बेटा-बेटी में बगैर कोई फर्क किए उन्हें ऊँची से ऊँची तालीम दिलाने की हर संभव कोशिश की तो अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए भी हमेशा प्रोत्साहित किया. एक प्रगतिशील इंसान के रूप में हमेशा आगे बढ़ते रहे. कभी मुल्ला-मौलबी के चक्कर में दकियानूसी बातें नहीं की. कभी इस्लाम के नाम पर फिजूल की बातें नहीं फैलाई. यही कारण है कि उनकी दोनों बेटी आज कोई बड़ी नौकरी नहीं भी हासिल कर सकी तो भी घर में बैठी नहीं है. परम्परागत सिलाई-कढ़ाई और बीड़ी बनाने की बजाय तालीमी मरकज (टोला सेवक) के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए हुए हैं और सम्मान भी पाती हैं. उनसे पढ़ने वाले सारे बच्चे उन्हें बाजी या आपी ही कहते हैं.

 

और आज सारे बच्चों की जुबां पर एक ही बात चढ़ी हुई है – “आज बाजी का निकाह है. पूरे गाँव को दावत है. कचौरी-बुदिया से मुर्गा-खस्सी तक का इंतजाम है. हिंदू-मुस्लिम सबको दावत है. देखने लायक दावत होगा.”

उधर अफरोज साथियों से कह रहा है- “सुने हैं कि विधायक जी भी आ रहे हैं?”

हनीफ तुरत बोला- “इसमें नया क्या है? विधायक जी तो उनके घर जब-तब आते ही रहते हैं. खास बात तो ई है कि दूर –दूर से मौलाना भी आ रहे हैं. और सबके ठहरने और खाने –पीने की भी विशेष व्यवस्था की गई है.”

जबकि कुछ बच्चे इस चिंता में थे कि – “बाजी चली जावेगी निकाह करके अपने घर तो कल से स्कूल में कौन पढावेगा?”

वे बच्चे अपने भोलेपन में भावुकता में पड़े हुए थे. कुछ बच्चे तो चंदा करके कुछ उपहार भी विदाई में देने के लिए ले आए थे. उन्हें कहां इल्म था कि बाजी नौकरी कर रही है और उसका निकाह से कोई लेना –देना नहीं है. कुछ ही दिनों के बाद उन्हें फिर से इसी गाँव और इसी विद्यालय में यहीं पढ़ाने आना पड़ेगा. नौकरी करना और गृहस्थ जीवन जीना इतना आसान है क्या? यहां तो सबको मशीन की तरह खटना होता है. मेंहदी का रंग ढंग से उतरने तक का इंतज़ार करने का फुर्सत किसी के पास नहीं है? शादी-विवाह की हर रस्म-रिवाज या तो अब बेमानी है या बेमतलब. हर इंसान चाहे लड़का हो या लड़की हर कोई इस भागमभाग वाली गलाकाट प्रतिस्पर्धी दौड़ में कहीं –न-कहीं आहें भर रहा है. अपने सपनों और सच्चाइयों से समझौता कर रहा है. उसके पास कोई विकल्प भी शेष नहीं है सिवाय जीवन की क्रूर सच्चाइयों को स्वीकारने के.

पूरे गाँव में इसलिए भी उत्साह-उमंग है क्योंकि मुश्ताक मास्टर साब जितना सम्मान गाँव वालों का करते हैं उतना ही गाँव वाले भी उन्हें अपना मानते हैं. और उनके हर सुख-दुःख को अपना मानते हैं. और अभी तो बेटी की शादी है वो भी एक नहीं दो-दो बेटी की शादी एक ही साथ. इस बड़े आयोजन को संभालना भी कोई मामूली बात है क्या?

न सिर्फ गाँव के बल्कि कई गणमान्य बाहरी लोगों को ही आमंत्रित किया गया था बल्कि हिंदू-मुस्लिम के लिए भोजन तैयार करने के लिए भी अलग-अलग रसोइए को रखा गया था. शाकाहारी-मांसाहारी सबकी इच्छाओं का ख्याल रखा गया था. खाने के मामले में वे किसी तरह की लापरवाही के लिए तैयार नहीं थे. क्योंकि हाल के दिनों में जिस तरीके से लव-जिहाद और धर्मान्तरण की अफवाह से माहौल बिगड़ा उससे लाख दोस्ती के बाबजूद कई बार मुस्लिम शक के निगाहों से देखें जाने लगे हैं. वैसे लोग तो खासतौर पर जिनकी हिंदुओं से अच्छी-खासी दोस्ती है. वे बिल्कुल नहीं चाहते थे कि इतने बड़े आयोजन को किसी की नज़र लगे और सारी तैयारी अफवाह की भेंट चढ़ जाए. सुनने में तो यहां तक आया कि मास्टर साब ने अपने हिंदू-मुस्लिम हर आमंत्रित साथियों से पूछ-पूछ कर एक लिस्ट तैयार कर ली थी कि कौन मछली –मुर्गा खाना पसंद करेंगें और कौन-कौन खस्सी? किसी भी विवादित चीज को दावत में शामिल करने से परहेज किया गया था. और लगभग सभी मेहमानों को मालूम था कि उन्हें भोजन में क्या परोसा जाने वाला है? सभी अपनी पसंद और सुविधा के अनुसार दावत का लुत्फ़ ले सकते थे.

अतिथियों के स्वागत का सिलसिला सुबह से ही शुरू हो गया था. चाय-नाश्ता के साथ-साथ दोपहर का भोजन तक भी कुछ लोगों को कराया जा रहा था. शाम होते ही बारात आने से पहले ही पूरे गाँव वालों को भोजन कराने की व्यवस्था की जाने लगी. मास्टर साब ने अपने विद्यालय के उन रूके हुए सहकर्मियों को भी भोजन कराकर विदा करने की बात सोची जिन्हें देर रात होने पर लौटने में सवारी की समस्या हो सकती थी. गाँव के मुस्लिम लोग खाकर जा चुके थे अब हिंदुओं की बारी थी. उसी समय मास्टर साब ने अपने चारों बचे हुए सहकर्मियों को भी खाने के लिए बुला लिया और उनके लिए एक अलग व्यवस्था कर दी गई. यूं तो उन चारों में दो हिंदू थे, तो दो मुस्लिम. लेकिन उनके बीच समझ का सामंजस्य कुछ ऐसा था कि उनलोगों के बीच कभी हिंदू-मुस्लिम वाली बात आई ही नहीं. कई बार तो वे लोग एक ही थाली में खाते देखे गए हैं. और कई दावत में वे लोग मुर्गा-खस्सी का लुत्फ़ भी एक साथ उठाते देखे गए हैं. इसलिए उन चारों को एक ही टेबल पर बैठाया भी गया था.

थोड़ी ही देर में टेबल पर प्लेट, गिलास, कटोरी, आदि सज गया. सामने में ही गोपाल कचौरी छान रहा था सो गर्मागर्म कचौरी उनके सामने आ गया. तरह-तरह की सब्जी, बुदिया और रायता परोस दिया गया. चारों खाने लगे लेकिन उन्हें पुलाव और मांस का भी इंतज़ार था इसलिए बार-बार कचौरी लेने से परहेज कर रहे थे. अहमद तो बार-बार नज़रें घुमाकर पुलाव और मांस भी ढूंढता रहा लेकिन देखना क्या सूंघने के लिए भी उसके नाक तरस गए. और परोसने वाले तो अंत-अंत तक कचौरी-सब्जी ही पूछते रह गए. अंत-अंत तक न मिठाई मिला न दही. चारों चुपचाप खाकर वहां से चलते बने.

रास्ते में ज्योंहि आगे बढ़े कि बारात आ गई. न बैंड न बाजा. बिना सजी हुई कार से दो दुल्हे को उतार कर बाइक पर बिठाकर दरवाजे तक ले जाया गया क्योंकि आगे का रास्ता काफी संकीर्ण था. तभी एक बच्चे की आवाज आई – “देखहीं न रे! कैसन लईका हैय… ही…ही..ही..”ही ही की आवाज खत्म होती उससे पहले ही एक बुजुर्ग की आवाज आई – “या खुदा! ऊँची दुकान फिंकी पकवान! … मास्टर साब को कम-से-कम मैंयां (बेटी) की उम्र का लिहाज तो रखनी ही चाहिए थी. कौन हड़बड़ी लगी थी?”

बारात के बैठ जाने के बाद धीरे-धीरे चारों आगे बढ़े तो गपशप का दौर शुरू हुआ. ब्रजेश बोला- “अजीब गाँव है. माना कि ये लोग खुद को वहाबी कहते हैं लेकिन इसका मतलब ये क्या हुआ कि कोई कार सजाकर शादी करने नहीं आ सकता? उनके भी कुछ सपने होते होंगें भाई?”

अहमद- “ई गाँव ही साला खतरनाक है. सुना नहीं है कि वर्षों पहले एक बाराती बैंड–बाजे के साथ आई थी तो किस तरह बारातियों को बगैर खिलाए-पिलाए ही खेतों में दौड़ा –दौड़ा कर पीटा गया था?……… हमको तो यही नहीं समझ में नहीं आता है कि सिर्फ पांचों वक्त नमाज अदायगी और नियम फरमाने से ही क्या होगा गर जो दिन-भर टेलीविजन और मोबाईल की रंगीनियों में ही खोए रहते हों? और दुनियां में अपने व्यवहार से अजूबा दिखते हों?”

ब्रजेश- “भाई, अब ये शिया-सुन्नी वाली बात न छेड़ो. धर्म के पचड़े में मैं नहीं पड़ता. खा लिए ही हो और बस भी मिल ही गई है अब आराम से चलो.”

अहमद – “देखो! बात वो नहीं है. मैं भी इन्हीं लोगों की तरह अंसारी ही हूँ लेकिन इनलोगों का व्यवहार ही अजीब लगता है. अब तुम्हीं बताओ कि एक सप्ताह से ढिंढोरा पीटे हुए थे कि निकाह में ये रहेगा-वो रहेगा और आज खिला दिया- कचौरी-सब्जी और बुदिया. कोई फरमाइश करने गया था कि ये खिलाओ ही? इससे अच्छा तो होता कि खिलाता ही नहीं. ई तो बेइज्जत करने वाली बात हो गई. बताओ दावत में एक मिठाई भी नहीं दे सकता था जबकि नाश्ता में तो खूब मिठाई खिलाया जा रहा था. कभी नहीं भुलेंगें इस निकाह की दावत को.”

शांत करने के लिए मुस्कुराते हुए ब्रजेश –“काहे गरम हो रहे हो भाई? कोई बात हो गई होगी. लड़की की शादी में वैसे भी लड़की वाले कई कारणों से परेशान रहते हैं. लड़की की शादी में भोज की शिकायत नहीं करनी चाहिए. नमक-रोटी भी मिल जाए तो खुश रहना चाहिए….”

अहमद बीच में ही – “ई आदर्श वाली बात हमको ना सुनाओ. ई साला चार घंटा बैठल रहे इहे खाने के लिए? हमको घर में खाने के लिए नहीं मिलता है क्या?”

ब्रजेश- “अच्छा मान लो कि हमलोगों के साथ खाने की वजह से तुम्हें नुकसान हो गया हो. वे खुद तो परोस नहीं रहे थे?”

अहमद- “ई फालतू बात नहीं चलेगा. क्या वे नहीं जानते हैं कि तुमलोग भी मांसाहारी हो?…… क्यों तुम्हें याद नहीं? … फिरोज के घर हम सब ने साथ में ही तो मुर्गा की दावत उड़ाई थी. और मुश्ताक भी उस दावत में हमलोगों के साथ था.”

इन बहसों से तंग आकर अब तक शांत बैठा सुरेश फट पड़ा- “अजीब इंसान हो! तब से मुर्गा… मुर्गा किए हुए हो. चलो अभी तुमको होटल में मुर्गा खिलाते हैं. खाने के लिए क्या कीच-कीच करना?”

अपना बचाव करते हुए अहमद बोला- “यार! बात खाने की नहीं है बात कथनी और करनी की है. बात हमेशा इस्लाम और ईमान की करते हैं. फरेब से परहेज की बात करते हैं और व्यवहार सीधे उल्ट. ये तो अपने पल्टूराम साबित हुए. इससे तो अच्छा होता कि पहले से कुछ बताते ही नहीं. लेकिन ये क्या बात हुई कि पूरे गाँव वालों को पुलाव-मांस खिलाए और हमलोगों को सूखा-सुखी?”

सुरेश- “तुम कन्फर्म हो कि गाँव वालों को मांस-पुलाव खिलाया ही गया है?”

अहमद –“हां भाई! जब मैं एक बार इधर से गुजर रहा था तो गाँव वालों को मैंने खाते देखा था. यदि तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं है तो कल तुम अतहर से ही पूछ लेना कि उन्होंने गाँव वालों के साथ जमात में क्या खाया था? मेरी बात का यकीन करो कि कुछ न कुछ तो गडबड जरूर हुआ है.”

ब्रजेश – “अच्छा भाई, अब बस भी करो. मान लो कि मांस पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाया होगा? रूपया घट गया होगा? अब जो मांस बचा भी होगा तो सिर्फ बारातियों के लिए ही रखा गया होगा? या शनिवार होने की वजह से हमलोगों के सामने नहीं लाया गया हो कि शायद इस दिन हमलोग परहेज करते हों?”

हामी में सिर हिलाते हुए अहमद बोला- “हां, इस बात में दम है. हो सकता है कि ऐसा ही हुआ हो! लेकिन सोचने वाली बात है कि गर जो घटा भी तो साला हमहीं चार लोगों के लिए? खुदा जाने सच क्या है?…. जाने दो इन बातों को. बाल की खाल छिलने से क्या फायदा?”

उसके बाद सभी काफी देर तक चुप रहे. गाड़ी सुनसान सड़क पर सरपट भागी जा रही थी कि अली अंगडाई लेता हुआ बोला- “भाई! आज ये एजाज क्यों मुंह लटकाए घूम रहा था? आज तो खुशी का दिन था. उसके जिगरी दोस्त की बेटी की शादी थी?… कहीं कुछ दाल में काला तो नहीं?”

अहमद को फिर मौका मिल गया दोनों आँख फैलाते हुए बोला- “हां, सच में वो साला कनिया के भी हमलोगों को घूर रहा था.”

बहस में दखल देते हुए ब्रजेश – “घुरेगा नहीं तो बेचारा क्या करेगा? उसकी बेटी की निकाह में तो सब नौ-दो ग्यारह हो गए थे जबकि वो सबको रोकने की कोशिश करता रहा? बार-बार बगैर खाए नहीं जाने की बात करता रहा था. लेकिन किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया था. शायद बेचारा अपमानित महसूस कर रहा होगा?…..”

बीच में ही रोकते हुए अहमद – “अब बात समझ में आई. साला एजजवा अपने अपमान का बदला निकाल लिया. अब यकीन हो गया कि उसी ने कुछ उल्टा-सीधा मुश्ताक का कान भरा होगा. उसमें नेता वाला गुण तो है ही. साला शनिवार की याद दिला दिया होगा या कह दिया होगा कि हिंदू को मांस खिलाओगे तो कहीं जो किसी तरह का अफवाही बबाल हो गया तो गडबड हो सकता है और भयभीत हो मास्टर साब ने पैर खींच लिया हो?….. साला वार्ड पार्षद बन गया तो विद्यालय प्रबंध समिति का अध्यक्ष बन गया लेकिन साला है तो अंगूठा छाप ही ना? ढंग से हस्ताक्षर करे के लूर नहीं है आ जब-तब मास्टरों के बीच में बैठ के पिंगिल झाड़ते रहता है.”

अली- “बात यहीं खत्म करों. लेकिन इतना साफ है कि एजाज ने मुश्ताक को अपनी बातों में फंसाकर बढ़िया से सारे किए धरे पर पानी फेर दिया. पता नहीं अब नालायक रात भर में क्या-क्या गुल खिलाएगा?”

ब्रजेश लम्बी चुप्पी के बाद बोला- “अली की बात में दम है. दुष्ट इंसान कभी भी अपनी दुष्टता से बाज नहीं आता है. अब सिर्फ गाने का मजा लो. और सफर की जवानी लो. मोबाइल से आवाज आने लगी – “सुहानी रात ढल रही है…..”

गाना सुनते-सुनते धीरे-धीरे सभी अपने बस स्टॉप पर उतरते हुए घर चले गए. और निकाह की दावत की बात वहीं की वहीं खत्म हो गई.

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सुशील कुमार भारद्वाज

शिक्षा :- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी, हिन्दी); एवं शिक्षा शास्त्र में स्नातक;

सम्प्रति:- उ० मा० विद्यालय, मुस्लिम राघोपुर, बिहटा, पटना में अंग्रेजी शिक्षक के रूप में कार्यरत.

प्रकाशन :-

  1. जनेऊ (कथा-संग्रह),
  2. लघुकथा, कहानी, समीक्षा, साक्षात्कार, रपट एवं आलेख निरंतर प्रकाशित. Mob: – 8581961719; 8210229414;

Email:- sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

 

 

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