विशिष्ट कहानीकार : सुशील कुमार भारद्वाज

नंदनी

नंदनी. हां हां. वही नंदनी जो खुद में खोई खोई सी रहती है. अरे वही नंदनी, जिसे राजनीति और राजनेता शब्द से इतनी चिढ़ है कि चर्चा शुरू होते ही तुनककर कह उठती है –“दुनियां का एक लाख दुष्ट मरता है तो एक नेता जन्म लेता है. नेता के लिए न तो कोई आदर्श होता है न ही कोई विचारधारा. इनके लिए यदि कुछ होता है तो वह है सत्ता. सत्ता की भूख. जिसके लिए वह कोई भी सुकर्म या कुकर्म बेझिझक कर सकता है क्योंकि उसे पता है कि सत्ता में आने के बाद उससे बड़ा भगवान इस पृथ्वी पर, इस व्यवस्था में कोई नहीं है. और उसका कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता. जिस अंधे कानून की दुहाई लोग दिन-रात देते हैं वह इनके अँगुलियों के इशारों पर नाचती हैं. सत्ता में आने का मतलब है अपनी हवस रूपी बेतरतीब महत्वाकांक्षा को हासिल करना बगैर यह सोचे कि क्या गलत है और क्या सही? उन्हें तो सिर्फ अपनी लिप्सा को शांत करने की सम्पूर्ण आजादी मिल जाती है. इनका न तो किसी से दोस्ती होता है न दुश्मनी. जो कुछ भी होता है. जो कुछ भी दिखता है. वह सब कुछ महज नौटंकी ही होता है. इनका किसी पार्टी विशेष से कोई मतलब नहीं होता है. हर वह नदी पवित्र गंगा है जहां उनके पाप धुलते हैं या धूल सकते हैं. इसलिए बंद करो इन हरामखोरों की बात. अपनी जिंदगी बनाओ, अपनी जिंदगी.”
लोग मुंह फाड़कर सिर्फ एक सुर में निकलते उसके शब्दों को सुनते रहते. उसके अंदर घुमड़ते बादलों के ताप को मापने की कोशिश करते रहते. और वह वहां से उठ कर चली आती है. जो आमतौर पर गुम्मी ही दिखती है. जिसके जिंदगी के तार कहां कसे हुए हैं? और कहां टूटे हुए हैं? किसी को पता नहीं है. वह किस राग में जिए जा रही है? किसी को मालूम नहीं है. बस चौबीसों घंटे काम में मशगूल रहती है. लगता है जैसे दुनियां के सारे काम उसी के जिम्मे हों. नहीं…नहीं कभी-कभी तो लगता है कि वह गुस्से की आग में झुलस रही है. नफरत की ज्वाला उसे भस्म किए जा रही है. कहीं कोई उसके दुखते नब्ज को टटोल न ले, इसीलिए शायद खुद को व्यस्त रखती है. हो सकता है वह जिंदगी से भागने की कोशिश कर रही हो? जिंदगी के झंझावाती थपेड़ों से वह टूट रही हो? कुछ तो है वर्ना ऐसा नहीं होता! वह सामान्य-सी लग कर भी सामान्य नहीं लगती. कौन जानता है उसके अंदर के उफान मारते तूफान को?
अरे! लेकिन ये क्या? आज तो नंदनी सुबह से ही टीबी खोले बैठी है. चैनल पर चैनल बदले जा रही है. वह भी कोई सीरियल नहीं, कोई प्रवचन नहीं, कोई ज्ञान –विज्ञान नहीं, बल्कि उस चीज के करीब है, जिससे वह वर्षों से भागते आई है. हां हां वही राजनीति का अखाड़ा बना न्यूज चैनल. अपनी बेबाकी और उत्तेजनापूर्ण ख़बरों से सबको उत्तेजित कर देने वाला चैनल. तिल का तार करने वाला चैनल. सारी मर्यादाओं को तार-तार करती चैनल. लेकिन नंदनी क्यों देख रही है यह सब? क्या वह वाकई में राजनीति को ठीक-ठीक समझती है? यदि खुद इसमें रूचि लेती है तो दूसरे को क्यों भरमाती है? आखिर सच क्या है?
अजीब माहौल है. यूं तो ठण्ड के मौसम में सुबह की गुनगुनी धूप किसे अच्छी नहीं लगती? लेकिन आज किसी को इसकी तलब नहीं है. क्योंकि चारों तरफ सिर्फ गर्मी ही गर्मी का एहसास हो रहा है. चारों ओर सरगर्मी जो फैली हुई है. लेकिन लोगों में इतनी बेचैनी क्यों है भाई? अरे भाई, आज विधान सभा चुनाव का रिजल्ट आना है. मतगणना का दिन है. जिस चुनाव में करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए गए, महीनों तक कानफाडू गीतों और नारों से हाई-टेक प्रचार–प्रसार किया गया. दिग्गज नेताओं ने आरोप –प्रत्यारोप के सारे बंधन तोड़ एक –दूसरे को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में जमकर गाली दिए. टिकट पाने के लिए मारामारी और विधवा-विलाप ही नहीं किए बल्कि कितने ही टिकट के आस में घर-बार बेचकर बर्बाद भी हुए. टिकट नहीं मिलने पर कितने ही अस्पताल का बिल भरने चले गए. कितने विवाद हुए? कितने झगड़े हुए? कितनी हत्याएं हुईं? यह सब कुछ हुआ सिर्फ एक कुर्सी की खातिर. जहां से कर सकेंगें सूबे पर शासन. पूरी होगी अपनी बलवती महत्वकांक्षाएं. लोग देखेंगें और दिखाएंगें कि जनता के एक एक वोट के क्या हैं मायने? पता चलेगा कि जातिवाद, सम्प्रदायवाद, विकासवाद और अहमवाद के जंग में किसकी हुई हार और किसकी हुई जीत? किसके माथे पर होगा ताज और किसका चलेगा राज? चैनलों पर भी मारा-मारी… ख़बरों से भी आगे की खबर, सबसे पहले खबर सिर्फ आप तक(?) दावे इतने पक्के की चुनाव लड़ने वाले नेताजी (प्रत्याशी) भी चैनल का मुंह जोहने को विवश. चैनल सब सच्चे बांकी सब झूठे. सरगर्मी के साथ ही बढते एंकरों के उत्साह, उमंग और आवाज. आंकड़ों का ऐसा मकड़जाल जो भारत के प्रथम आम चुनाव से अब तक के हुए सारे चुनावों की ही याद न दिला दे बल्कि कभी राजनीतिशास्त्र का किताब नहीं छूने वाले दर्शक भी संविधान के उन तमाम प्रसंगों का तकनीकी ज्ञान कमोबेश हासिल कर ही लेते हैं जो राजनीति के प्रकांड विद्वानों को भी कभी-कभी ठीक से याद नहीं रह पाता. अपनी-अपनी जीत के लिए ताल ठोकते चैनल के पैनल में बैठे अलग-अलग पार्टियों के नुमाइंदे. उनका साथ देते राजनीतिक विश्लेषक और चैनल के बाहर घर का सारा काम छोड़कर बैठे दर्शक. हड़बड़ी इतनी की असली परिणाम आने तक का किसी को सब्र नहीं. एक्सिट पोल के दावे-प्रतिदावे के बीच भी धींगामुश्ती. एक कुर्सी की आस में अपने ताबड़तोड़ नारों और जीत के दावों के बीच विरोधी पार्टियों के दिए गए लड्डुओं और पटाखों के आर्डर की खिल्ली उड़ाने की भी बाजी नहीं चुकते. कुछ भी नहीं छूटता और इन सब पर होती है दर्शकों की निगाह.
लेकिन नंदनी का इस तरह न्यूज चैनल के आगे बैठने का राज उस समय धीरे –धीरे खुलने लगा जब सत्ताधारी दल की हार और विरोधी दल के बढ़ते ग्राफ को देख उसके चेहरे पर अजीब-सी खुशी छाने लगी. उसके चेहरे खिलने लगे. वह बार –बार मोबाइल पर भी हार –जीत के आंकड़े को देखती और अकेले कमरे में नाच उठती. उसके चेहरे पर पल पल बदलते भाव, कठोर होती भंगिमाएं चीख –चीख कर कह रही थीं कि कहीं कुछ है जो उसे आनंदित कर रहा है. उसके मनोभावों को उद्वेलित कर रहा है. लेकिन क्या? उसका राजनीति से क्या है वास्ता? क्या वह समर्थक है विरोधी पार्टी की? लेकिन राजनीति से कोसों दूर रहने वाली इस लड़की को यह राजनीति का कीड़ा कब लगा? कैसे लगा? नहीं -नहीं. यह नहीं हों सकता. इसके भाव तो कुछ और ही बयां कर रहे हैं. ये तो ऐसे व्यवहार कर रही है गोया उसे ही सरकार बनानी है. वही जीत रही है. ऐसी भावुकता सिर्फ एक समर्थक में! वह भी वैसे इंसान में, जिसे राजनीति से चिढ़ हो! कैसे संभव है? हां, यह सच है कि आज की स्त्रियां काफी मुखर हुई हैं. राजनीति का पाठ भी वह सीख चुकी है. वह घर–परिवार के डर से डरकर या घरवाले के कहने पर वोट नहीं डालती. उसमें भी आंकड़े बता रहे हैं कि इस बार औरतों ने घर के चौखट को लांघकर रिकार्ड वोट किया है. इसी स्त्री, मजदूर और किसान वर्ग का तो सहारा है इस सत्ताधारी दल के पास. लेकिन सत्ताधारी दल का ग्राफ तो उठने का नाम ही नहीं ले रहा है. तो क्या ये बढे हुए मत हैं परिवर्तन के लिए? सामान्य स्थिति में तो संभव है लेकिन जिस सरकार ने लड़कियों के लिए मुफ्त में कपडे बांटे, साईकिल दिए, छात्रवृति दिए, आरक्षण दिए उसी के खिलाफ स्त्रियों का यह मतदान? यह कैसी सजा है? क्या अराजकता और आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे एक पार्टी से हाथ मिलाने की ये सजा है कि लोगों ने वर्षों के विकास के कामों को भुला दिया? जनता है भाई! इसके दिमाग का कोई कुछ नहीं कह सकता. कब किसको सिर पर उठा ले और कब किसको जा कर सीधे बंगाल की खाड़ी में फ़ेंक दे, कहना मुश्किल है.
अरे! अब ये नंदनी को क्या हो गया? उसके चेहरे की रौनक कहां चली गई? वह तो परेशान हो अपने नाख़ून चबाए जा रही है. ओह, वह तो अब टीबी छोड़ मोबाइल में ही कहीं खोती जा रही है. लेकिन वहां भी तो वही आंकड़ा दिख रहा है जो दस बजे के बाद से टीबी पर बदलने लगा है. विरोधी दल का आंकड़ा जिस तेजी से सुबह सुबह चढा था वह आगे बढ़ने की बजाय वहीं का वहीं अटक गया है. कभी कभी तो वह नीचे भी खिसक जा रहा है, जबकि सत्ताधारी दल का आंकड़ा बहुत ही तेजी के साथ सैकड़ा की संख्या पार करता जा रहा है. और इसी के साथ बढ़ता जा रहा है नंदनी का दर्द. उस नंदनी का दर्द जिसे राजनीति से चिढ़ है. राजनेता से चिढ़ है. लो! अब तो नंदनी ने टीबी भी बंद कर दी. लेट गई अपने बिस्तर में और देख रही है छत में लटके पंखे को. उसके दोनों आंखों के कोड़ों से बहने लगें हैं आंसू. आखिर क्यों? ऐसा क्या है? कितने दिनों से रोक रखी थी वह इन आंसुओं को? और अचानक से घूमते हुए कस के एक मुक्का पलंग पर दे मारी और चीख पड़ी- “मैं हार गई. हां हां मैं हार गई. औरत होकर औरत से ही हार गई.” बिस्तर से उठकर वह तेज क़दमों से कमरे में चहलकदमी करने लगी. चेहरे के भाव लगातार बदलते जा रहे थे- कभी काफी सख्त तो कभी उसके होठों पर कुटिल मुस्कान थिरकने लगती. अचानक वह पागलों की तरह ठठा पड़ी और –“औरतें सोचती हैं वो मर्दों से अधिक बुद्धिमान हों गई हैं. मूर्ख को ये नहीं पता कि वह मर्दों के वाकजाल और मकड़जाल से कभी मुक्त नहीं हो सकती. उसे लगता है कि सुंदरता और शरीर उसकी सबसे बड़ी सम्पति है जिसके सहारे किसी को भी वह अपने वश में कर लेगी लेकिन उसे नहीं पता कि मर्द किस तरह से सदियों से उसे अपने इशारे पर लोभ–लालच देकर शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से गुलाम बनाए हुए है. वह जिस शरीर पर इठलाकर, जिसकी आज़ादी की बात कर स्त्री-सशक्तिकरण की बात करती है वह कहीं-न-कहीं पुरुषों को ही लाभ पहुंचा रही है. लेकिन उसे समझाए कौन? बुद्धि हो तब तो कुछ समझे?” एक्वागार्ड से पानी लेकर पीने के बाद- “मर्दों ने औरतों को गाड़ी समझ लिया है… लग्जरियस गाड़ी समझ उसकी औकात बता दी है… जब तक मन करे खुद सवारी करो और मन भर जाए तो किराए पर लगा दो. कुछ न कुछ तो रिटर्न मिल ही जाएगा. लेकिन मर्दों से शिकायत ही क्यों करूँ? जब औरत खुद समझने को तैयार ही ना हो? जब एक औरत ही दूसरे औरत के दर्द को समझने को तैयार न हो तो! … मरो! …और मरो! तुम औरत की इतनी ही औकात है. महिलाओं के लिए कानून बने हैं. महिला आयोग बने हैं. लेकिन सबकी औकात सामने आ जाती है जब मामला सत्ता में बैठे लोगों के खिलाफ होता है. तब तो और मजा आ जाता है जब शिकारी दलित हों”.
नंदनी फिर किचन में एक्वागार्ड के पास गई और गिलास पर गिलास पानी असामान्य रूप से पीते चली गई उसके चेहरे सख्त होते चले गए. आँखें भींच लंबी ठंडी सांस खींच लेती थी जब उसके अंदर का दर्द कराह उठता था. बिस्तर में आकर वह फिर से लेट गई. धीरे धीरे वह शून्य में खोती चली गई. आंखों के सामने छाने लगी वो पुरानी बातें…
बहुत छोटी थी नंदनी, जब वह अपने छोटे भाई के साथ घर-आंगन में धमाचौकड़ी मचाती थी. घर से थोड़ी दूरी पर बने पार्क में मौजमस्ती करती थी. दुनियां की सारी चिंताओं से दूर माँ की गोद में लुढ़क जाना और माँ से एक-से-एक अच्छी कहानियां सुनना ही बस एक मात्र काम था. माँ भी दोनों भाई-बहन को बड़े प्यार से गोद में लिटाकर सिर पर हाथ फेरते हुए कहानियां सुनाती थी. कभी किसी चीज का डर नहीं था. लेकिन उस दिन बाबूजी से बहुत डर गई थी. सामने आने से पहले ही दूर में ही कहीं छिप जाना चाहती थी. जिस दिन वे गुस्सा में घर आए और माँ से उलझ पड़े. कभी अपने किस्मत को कोस रहे थे तो कभी माँ को, और कभी माँ के रिश्तेदारों को. बाबूजी चिल्लाए ही जा रहे थे – “सुन रे लंगड़ी! कहे देता हूं. तेरे घरवालों ने जो धोखा मेरे साथ किया है उसकी सजा तो भगवान भी माफ़ नहीं करेगा. मैं तो खैर इंसान ही हूं….. ये देंगें .. वो देंगें … और दिया कुछ भी नहीं… खुद को कहते फिरते हैं जमींदार घराने के…. और औकात?…. अरे! मैं तो कहता हूं तेरे घर के लोग कोई स्वतंत्रता सेनानी भी नहीं थे… होंगें कोई भिखमंगे, चोर –उच्चके.”
माँ जब शांत करते हुए कहने लगी- “बच्चों के सामने क्या तमाशा कर रहे हैं?” तो वे और तैश में आ गए- “वाह री लंगडी! सच सुनने की हिम्मत नहीं तो तमाशा कह रही है! ….. अरे तमाशा तो तुमने बना दिया मेरी जिंदगी का. ये भी कोई जिंदगी है? ये देखो… न मैं अपने घर में हूं न ससुराल में…. रहता कहां हूं?… तो किराए के मकान में. क्यों? किसकी वजह से? सिर्फ और सिर्फ तेरी वजह से. गांव में नहीं रह सकते. क्यों? राजधानी में पली–बढ़ी है ….. सूबे के सबसे प्रतिष्ठित महिला कॉलेज में पढ़ी–लिखी है… गांव में कैसे गुजर–बसर कर पाएगी?… तो गाँव में शादी ही क्यों की?”
-“अब चुप भी कीजिए, बच्चे सो रहे हैं.”
– “अरे, चुप क्यों रहें? सुनने दो न बच्चे को. उन्हें भी तो पता चले कि उसके ननिहाल के लोग कोई प्रोफेसर, कोई डॉक्टर, कोई पुलिस ऑफिसर है तो उसके माँ की शादी मुझ जैसे गरीब से सुदूर गांव में जाकर क्यों की? क्यों? तुम्हें बताते शर्म आएगी कि तेरी बड़ी बहन दो बच्चे के बाप, एक नीच जाति के नेता टाइप प्रोफेसर की रखैल है? समाज में कोई तुमसे शादी करने को तैयार नहीं था तब तुम्हारे घर वालों ने दूर गांव में जाकर मेरे भोले माता –पिता को झूठे सपने दिखाए और मुझे बलि का बकरा बना दिया. और आज तेरी वजह से मैं अपने माँ–बाप से भी दूर रह रहा हूं.”
-“अब बहुत हों गया. ज्यादे मत बोलिए.”
– “मैं तो बोलूँगा ही. क्यों नहीं बोलूं? डरता हूं क्या? क्या बिगाड़ लेगा तेरा भाई–बाप? यही न किसी दिन मरवा देगा? वैसे ही कौन–सा जिन्दा हूं? मरवा भी दो न? सारा तमाशा ही खत्म हो जाएगा. हां, ये भी अच्छा ही होगा. तू भी निश्चिंत हों के रहना. मुझसे तूझे ही कौन-सा सुख मिला है रे? तू भी तो कहीं-न-कहीं, अंदर-ही-अंदर घूंट ही रही है? तेरे भी तो सपने रहे होंगें? कौन जानबूझकर नरक की जिंदगी जीना चाहता है?…. उड़ जा… उड़ जा पंख लगा के रे उड़ जा! क्या रखा है इस जिंदगी में?” धड़ाम से वह बैठ गया टूटी हुई खटिया पर. और घूरने लगा किराए के मकान में बेतरतीब रखे अपने तंगहाल और हटेहाल सामानों को जो उसकी गरीबी में बीतती जिंदगी की क्रूर सच्चाई बयां कर रही थी. कुछ देर शांत रहने के बाद वह फिर बडबडाने लगा- “चली जा .. हां हां तू चली जा… तू भी किसी नेता की रखैल बन जाना, सुख में बितेंगें तेरे दिन….. महिला आरक्षण का दौर भी चल रहा है न? कुछ ना कुछ तो दिलवा ही देगा. कोई नौकरी मिल जावेगी. नहीं कुछ तो राजनीति में ही कहीं सेटिंग करवा देगा. तू भी थक गई है और मैं भी. अब मैं शांति चाहता हूं शांति.”
और उस दिन के झगड़े के बाद बाबूजी जो घर से निकले तो किसी को पता नहीं चला कि वह कहां गए? बहुत खोजबीन हुई, लेकिन कहीं कुछ भी पता न चला. बाबूजी ने कम्पनी की नौकरी भी छोड़ दी. किसी ने बताया कि अंतिम बार उन्हें रेलवे स्टेशन की ओर जाते देखा था. घर में और कोहराम मच गया कि कहीं कटकर मर गए होंगें. लेकिन माँ इसे कभी सच नहीं मानी. वह अक्सर कहती- “तेरे बाबूजी, इतने कमजोर नहीं हैं. वे परेशान थे, उनके साथ धोखा हुआ था, गुस्से में रहते थे, लेकिन थे नेक दिल. कहीं चले गए होंगें. गुस्सा शांत होगा तो एक दिन लौट आएंगें.”
लेकिन समस्याएं दिन –प्रतिदिन बढती ही जा रही थी. और एक दिन नानाजी सबको साथ में लेकर ननिहाल चले आए. नंदनी अरसे बाद अपने ननिहाल पहुंची थी. सबसे खूब दुलार –प्यार मिलता था. नानी ने दोनों भाई –बहन को गोद में बिठा लिया. नाना– मामा भी रोज कुछ न कुछ लाते ही रहते थे. माँ दिनभर घर में काम करते रहती थी सो मामी को भी आराम मिल गया था. गौरव भैया भी नंदनी के साथ कभी कभी चोरी –छिपे खेल लेते थे क्योंकि मामी उन्हें एक साथ खेलते देख लेने पर बहुत बिगड़ती थी. वहां वह सबसे ज्यादे मामी से ही डरती थी क्योंकि उनकी वजह से ही उसे अक्सर मार भी खानी पड़ती थी.
जिस दिन बिंदु मौसी मिलने आई, उस दिन नंदनी के जीवन का नया अध्याय शुरू हो गया. मौसी ने अपनी बेटी मानते हुए उसके जीवन भर की जिम्मेवारी ही नहीं ले ली बल्कि साथ में ही लेकर चली भी गईं. नंदनी सोची कि मौसी के बच्चों के साथ खूब पढेंगें और खेलेंगें लेकिन घर में पहुंचते ही अवाक रह गयी– घर में दो ही तो लोग थे – मौसा और मौसी. इतने बड़े तिमंजिले मकान में रहने वाला कोई नहीं था. नंदनी स्वछन्द रूप से कभी टीबी देखती, कभी खेलती, कभी पढ़ती, कभी सोती. कोई रोक टोक नहीं था. शुरू में तो थोड़ा मजा आया, लेकिन धीरे धीरे उसके चेहरे पर उदासी घर करती चली गई. मौसा –मौसी भी घर से निकल जाते और वह भी स्कूल चली जाती थी. शाम में कॉलेज से लौटेते वक्त मौसी अपने कार में ही उसे घर ले आती थी. धीरे धीर वह कब बड़ी हो गई पता ही नहीं चला. दसवीं पास करके जब कॉलेज में नाम लिखाई तो मौसाजी अपने साथ ही उसे कॉलेज लाने ले-जाने लगे. नंदनी अब उम्र के एक अलग पड़ाव की ओर मुड चुकी थी. उसका चेहरा, नयन-नक्स और शारीरिक गठन उसमें जितना उन्माद और आत्मविश्वास भर रहा था उतना ही उसका व्यक्तित्व भी निखर रहा था. धीरे धीरे लड़के उससे दोस्ती के बहाने नजदीकी पाने की कोशिश करने लगे, लेकिन उसके प्रोफेसर मौसा की वजह से किसी की भी हिम्मत नहीं हो पाती थी. वही कुछ लड़के उससे बात करने की हिमाकत कर पाते थे जो उसके मौसा के खासम-खास चेले थे.
धीरे –धीरे मौसा से भी वह बहुत खुलती चली गई. अब वह किसी समस्या के लिए मौसी को नहीं कहती थी. बल्कि मौसा ही उसके लिए सबकुछ बनते जा रहे थे वही सारी समस्याओं का भी समाधान कर देते थे. मौसा प्यार देने में भी रत्ती भर की कोताही नहीं बरतते थे. नंदनी का विचार भी मौसा के संसर्ग में धीरे–धीरे बदलता जा रहा था. लेकिन उस दिन नंदनी सकते में आ गई जब मौसाजी हंसते हुए कहे –“नंदिनी, क्या हमलोग बहुत अच्छे दोस्त नहीं बन सकते?” नंदनी के लिए यह पहला और सबसे बड़ा झटका था. वह सोचने लगी कि दोस्ती का क्या मतलब होता है? दोस्ती किससे करनी चाहिए? रिश्ते के अंदर दोस्ती का क्या मतलब होता है? नंदनी मुस्कुराने के सिवा कोई जबाब नहीं दे सकी, लेकिन कई दिनों तक वह परेशान जरूर रही. धीरे –धीरे वह अपने प्रति सतर्क रहने लगी. मौसाजी के छुअन में एक अजीब-सा अंतर महूसस करने लगी. कभी कभी तो वह बहुत असहज भी महसूस करने लगी. लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो करे क्या? कहे क्या और किससे कहे?
गर्मी के उमस-भरी उस रात में नंदनी के जीवन का काला अध्याय शुरू हो रहा था जिस दिन बिंदु मौसी प्रयाग में आयोजित साहित्य समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी. कली फूल बनने से पहले ही मौसाजी के हिष्ट्पुष्ट शरीर के नीचे कुचली जा रही थी. टूट रही थी वर्जनाएं, कलंकित हों रहे थे रिश्ते, दर्द से कराह रहे थे जिस्म और पलट रही थी वर्षों से चली आ रही सामंतवादी परम्परा, जहां आरक्षण कोटि का एक ऐय्याश एक सामंतवादी खून को गन्दा कर रहा था. और राजनीतिक गलियारे में गूंज रहे थे महिला सशक्तिकरण के नारे. नंदनी के पास सिसकियों के अलावे बची थी एक ख़ामोशी. शायद इसके अलावा कोई उपाय भी नहीं था. इस घर में खाए हुए दाने और मिले हुए प्यार का कर्ज उतर रहा था. जिन्दा रहने की जीवटता, अंधकारमय होते जीवन को बचाने की कोशिश और दरकते हुए रिश्तों की दीवार को संभालने के लिए सहनशीलता का परिचय देना ही उसे सही लगा.
मौसी के वापस आते ही वह माँ के पास वापस जाने की जिद्द पर अड गई. मौसी लाख कारण पूछते रह गई लेकिन वह झूठ बोलती चली गई– “माँ की बहुत याद आ रही है.” और हमेशा खिलखिलाते रहने वाली नंदनी जब वर्षों बाद माँ से मिली तो उसके आंसुओं में क्या –क्या बहें यह नंदनी को छोड़ किसी को पता नहीं था.
परीक्षा के समय जब मौसी उसे वापस लाने गई तो वो आने को बिल्कुल तैयार नहीं हुई. जब मौसी कसम पर कसम देती रही और अपने महिला कॉलेज के ही हॉस्टल में रखवा देने की बात कही तब कहीं जाकर वह आने को तैयार हुई. वह परीक्षा देने तो आ गई लेकिन मौसी पूरी तरह से कांप गई, उसे पहली बार एहसास हुआ कि घर के एक कोने से नंदनी के चीखने–चिल्लाने की आवाज आ रही है. नंदनी मौन साधकर भी उस पर थूक रही है. लानत दे रही है. आज उसे एहसास हो रहा है कि दो बच्चों के बाप, विजातीय आदमी से प्रेम–विवाह करके कितनी बड़ी गलती कर दी. जो आदमी अपनी पहली पत्नी का ना हुआ, जिसे अपने बच्चों का प्यार कभी याद न आया वह आदमी मेरे प्रति इतना समर्पित कैसे हो सकता है? मैं आज तक माँ नहीं बन पाई क्योंकि बार-बार गर्भपात करवाने का दबाब रहता था. माँ बन सकने का सामर्थ्य रखने के बाबजूद बांझ का काला धब्बा लगा कर जीवन का बोझ ढोने में उतना कष्ट नहीं मिला जितना आज उसे नंदनी से नजर मिलाने में हो रहा है. वह शर्म से जमीन में धंसती जा रही है कि वह छोटी-सी लड़की शिकायत करना तो दूर उसे गाली देने के लायक भी नहीं समझी. आज उसका सारा साहित्यिक-गैरसाहित्यिक ज्ञान उसकी चुप्पी के सामने रिरियाता नज़र आया. उसे समझ में नहीं आ रहा है इस जिस्मी हैवान पति रामशरण को क्या बोले? मौसी के पेशानी पर इस बात का भी बल पड़ रहा था कि अगर जो किसी दिन नंदिनी मुंह खोल देगी तो क्या होगा? इन्हीं सवालों से मौसी परेशान हो बीमार पड़ने लगी.
इधर परीक्षा समाप्त होते ही हॉस्टल खाली करने का आदेश विश्वविद्यालय से आ गया. नंदनी जब वापस माँ के पास लौटने की बात कही तो मौसी हां या ना कहने की भी स्थिति में नहीं थी. नंदनी जितनी बड़ी जिन्दा लाश बनती जा रही थी उससे भी बड़ी लाश उसकी मौसी बनती जा रही थी. मन-मस्तिष्क में सवालों के इतने जंग छिड़े थे की शब्दों के संवाद दिन–प्रतिदिन समाप्त होते जा रहे थे. चुप्पी ही संवाद का जरिया बनता जा रहा था. और नंदनी अपने माँ के पास चली गई.
अकेलेपन में नंदनी खुद को किताबों की दुनियां में डुबोने लगी. धीरे-धीरे वह एक बार फिर से लोगों से घुलने –मिलने की कोशिश करने लगी. बच्चों को अपने पास बुलाकर पढाने की कोशिश करने लगी. समय के साथ मिले उसके गहरे भावनात्मक जख्म पर पपड़ी पड़ने लगे थे. हंसी की लहर चारों ओर फैलने लगी थी. फिर से वह फुदकने वाली चिडियां बन गई थी. अपने पुराने बिखड़े परिवार को जोड़ने की कोशिश में वह जिद्द करके अपने माँ और भाई के साथ ननिहाल छोड़ राजधानी से कोई सौ किलोमीटर दूर अपने पैतृक गांव पहुंची तो परिवार वालों के खुशी का ठिकाना ना रहा. वर्षों पहले गुस्से में घर छोड़ चले गए बाबूजी भी एक दिन पंजाब से वापस आ गए. शहर की भागदौड़ वाली जिंदगी से दूर, शांति और सौहार्द वाला माहौल उसे भाने लगा था. उधर बाबूजी नंदनी की शादी की बात भी रिश्ते –नातों में छेड़ने लगे थे.
लेकिन यह किसे पता था कि नंदनी के जीवन में अमावश की रात अभी शेष ही है. जिंदगी ठीक से रफ्तार पकड़ पाती उससे पहले ही उसका सामना एक बड़े हादसे से हो गया. सुबह होते-होते पूरे गांव में आग की तरह यह खबर फ़ैल गई कि राजधानी से गांव आई नंदनी को रात में कुछ लड़के घर से उठाकर आम के बगीचे में ले गए और रात भर गिद्ध की तरह उसके शरीर को नोचने के बाद बुरी स्थिति में छोड़ कर भाग गए. वह तो संयोग था कि उन्हीं के घर के एक हलवाहे की नज़र उस पर पड़ी जो मालिक की इज्जत को ढकने के गरज से अपने घर की महिलाओं को बुलवा उसे घर भिजवा दिया. गांव में हुए इस घटना पर जितनी मुंहें उतनी बातें होने लगी. लेकिन एक बात के लिए सब एक मत थे कि शाम से ही एक सुमो गाड़ी गांव के आसपास मंडरा रही थी जो सुबह में राजधानी की ओर जाते हुए देखी गई.
घर के अंदर जितना मातम था उतना ही उसके जीवन को लेकर चिंता भी. नंदनी के शादी की बात तो दूर, घर की दूसरी लड़कियों की भी शादी की चिंता में उसे अपशकुन, कुलक्षिणी, और कुलनाशिनी मानने लगे. कोसने लगे उस पल को जब उनलोगों ने गांव में पहला कदम रखा था. सबके आंखों के आगे अंधेरा छा गया.
इस दुःख की घड़ी में जब गाली, अपमान, और जलालत की अंधेरी जिंदगी में दूर तलक कोई सूर्य की रोशनी नहीं दिखाई दे रही थी, उसी दुःख की घड़ी में नंदनी के मौसाजी फिर से सबो को समझा-बुझाकर अपने राजधानी वाले घर में ले आए, जहां से नंदनी को घृणा हो गई थी. कभी ना वापस आने का कसम खाकर निकली थी. लेकिन समय के बाजी को कौन पलट सकता था? कई बार इच्छा हुई कि आत्महत्या कर ले, लेकिन यही सोचकर रुक गई कि क्या मेरे जीवन का यही अंत है? कब किसकी मौत हो जाएगी कोई नहीं जानता लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि खुद को समाप्त कर लूँ? मैंने कौन-सा अपराध किया है? दूसरे के अपराध की सजा मैं खुद को क्यूँ दूँ? जब जीवन की लम्बाई नहीं उपयोगिता देखी जाती है तो मैं खुद को क्यों समाप्त कर लूँ? जिंदगी की सच्चाई से क्यूँ भागूं? दुनियां बहुत बड़ी है कहीं भी रह कर अपना गुजर बसर किया जा सकता है. और एक दृढ संकल्प के साथ वह जीवन को एक नए सिरे से जीने की कोशिश में जुट गई. समय के साथ वह सामान्य होने की कोशिश करती रही. घर में एक हिचक के साथ ही सही, लेकिन सबों से बात करने लगी. मौसाजी जब सामने पड़ते थे तो पहले वह असहज हो जाती थी और नज़र से बचने की कोशिश करती थी. लेकिन एक ही घर में यह कितना संभव हो पाता और जिंदगी के नाटक में वह एक अच्छी अभिनेत्री की भूमिका में ढलने की कोशिश करने लगी. धीरे धीरे सबकुछ ठीक होता चला गया. फिर से वह कॉलेज जाने लगी.
एक शाम जब वह कॉलेज से लौटी तो बाबूजी दरवाजे पर ही खड़े दिखे, नंदनी पास आते ही पूछी- “आप यहां क्यूँ खड़े हैं?” तो बाबूजी बोले –“कुछ नहीं बेटी, मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था. वो क्या है न कि मौसाजी को कहीं अचानक से बाहर जाना पड़ गया है सो तुम्हारे लिए एक काम बोल गए हैं, तुम जल्दी से फ्रेश हो लो.” नंदनी सोचने लगी ऐसी क्या बात हो गई कि मौसाजी का काम मेरे जिम्मे आ गया है और वह पूछ बैठी – “मौसाजी क्या कहकर गए हैं?”
“तुम नहीं जानती हो बेटी, बहुत खुशी की बात है. मौसाजी किसी आयोग के अध्यक्ष बनने वाले हैं. बहुत जल्द उन्हें कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा मिल जाएगा. वैसे कह रहे थे कि मंत्रीजी ने आश्वस्त किया है कि जल्द ही उन्हें विधान परिषद में भी पंहुचा दिया जाएगा. तुम्हारे लिए बस इतना ही काम है कि अभी एक गाड़ी आएगी उसी में बैठकर तुम मंत्रीजी के घर जाओगी और अंग्रेजी के फाइलों को ठीक से समझकर मौसाजी को समझा दोगी. जानती ही हो कि मौसाजी के बाद तुमसे काबिल इस घर में कोई है भी नहीं, जिसे इसके लिए कहा जाय.”
नंदनी सोच में पड़ गई कि ऐसी कौन-सी बात हो गई कि मंत्रीजी मौसाजी के लौटने तक का इंतज़ार नहीं कर सकते हैं? मुझे राजनीतिक गलियारे में भेजने की ऐसी कौन-सी मज़बूरी आ गई है? और वह चुपचाप तैयार होने लगी. दरवाजे पर गाड़ी के शोर और बाबूजी को अपनी ओर आते देख वह समझ गई कि गाड़ी उसी के लिए आई है. गाड़ी में वह ज्योंहि बैठी कि एक झटका-सा उसे लगा. उसे लगा कि उसने इस ड्राईवर को पहले कहीं देखा है पर कहां देखा है? याद नहीं. गाड़ी तेज रफ़्तार से आरी-तिरछी सड़कों पर भागी जा रही थी. गाड़ी जिस तेज रफ़्तार से भाग रही थी उससे कहीं अधिक नंदनी का दिमाग पुरानी यादों के बीच गोंता लगाते हुए ड्राईवर को खोजने की कोशिश कर रहा था. गाड़ी गली–चौराहा, दुकान–मकान मंदिर सबको पार करते हुए मंत्रियों के आवास की ओर मुड चुकी थी, सरपट भागती गाड़ी में ब्रेक ही नहीं लगी बल्कि नंदनी के दिमाग में भी एक ब्रेक लगा. वह एक दर्द से अंदर तक सिहर उठी और उसके हथेलियों में अजीब से अकड़न होने लगी, चेहरा सुर्ख होता चला गया. हथेली गाड़ी के सीट से जूझने लगी. यही तो वो आदमी है, जो उस रात उसके मुंह को दबाए हुए था जब वह अपने गांव में गर्मी के दिन घर के आंगन में सोई थी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? उसका दिमाग एक साथ कई सवालों से जूझने लगा? उसके साथ क्या हो रहा है? गांव वाली घटना महज एक दुर्घटना थी या सोची समझी साजिश? यह सबकुछ महज एक संयोग है या एक पूरा का पूरा चक्रव्यूह? लेकिन मौसाजी ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? उन्हें मुझे बर्बाद करने और मेरे पूरे परिवार को एक धब्बा देने से क्या मिला? आखिर वे चाहते क्या हैं? कितना मीठा बोलते हैं और इतना कड़वा चरित्र? मैं तो उस रात की घटना को एक भटकाब समझकर चुप्प हो गई थी. मुझे तो लगा उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ होगा. लेकिन नहीं. मैं गलत थी. मेरे चुप्पी का यह सिला मिला? कितने गंदें हैं- जो मुझे अपने नज़रों के सामने रखने के लिए या मैं कभी मुंह न खोल दूँ इसलिए अपने भाड़े के टटुओं के सहारे मुझे तोड़ने की कोशिश की. आखिर क्यों? क्या है मंशा इस इंसान की? कहीं ये पागल हब्शी तो नहीं? कोई आदमी अपने पाप छिपाने के लिए इस हद तक भी गिर सकता है?
“मंत्रीजी का घर आ गया नीचे उतरिए” ड्राईवर की आवाज से उसकी तन्द्रा टूटी. लगा जैसे नंदनी गहरी नींद से जागी हो. पूरी तरीके से सुस्त. जैसे शरीर में जान ही न बची हो. धीरे-धीरे पैर घसीटते हुए गाड़ी से बाहर आई तो ड्राईवर उसे मंत्रीजी के कमरे तक छोड़ आया. मंत्रीजी के कमरे में बैठे सभी लोग बाहर चले गए. मंत्रीजी से कुछ कहने के बाद ड्राईवर भी वापस लौट गया. पीछे से दरवाजा बंद हो गया और नंदनी चुपचाप बैठी रही.
-“तुम्हारा नाम नंदनी है?”- मंत्रीजी पहली बार उससे मुखातिब हुए और वह शून्य में देखते हुए ही सुस्त स्वर में जबाब दी –“जी”.
-“कितना सुंदर नाम है नंदनी!… सचमुच में तुम नंदनी ही हो. नाम के जैसा ही रूपरंग. बहुत सुन्दर. अतिसुन्दर. आओ! सोफा पर बैठो. बेहिचक बैठो. शर्माने –लजाने जैसी कोई बात नहीं है.”
नंदनी चुप ही रही तो गिलास में पानी पीते हुए-“पढ़ती हो! किस बीए में हो?”
-“जी एम.ए. फ़ाइनल में हूँ.”
-“वाह! बहुत अच्छे. क्या विषय है तुम्हारा?”
-“जी, इंग्लिश लिटरेचर है.”
-“बहुत खूब! तुमने तो बहुत अच्छा विषय लिया है. थोड़ी मेहनत भी अधिक होगी? हिन्दी पट्टीवालों के लिए अंग्रेजी थोड़ी खासी मुश्किल होती है. वैसे तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है. हमलोग किस दिन काम आवेंगें? जहां पैरवी-पैगाम की बात होगी. कहना. बस एक कॉल की तो बात ही है. और सुनाओ.”
-“जी, मौसाजी का कोई कागज था आपके पास वही लेने आई हूँ?”
थोड़ा चौकते हुए मंत्रीजी- “क्या बोली?….मौसाजी?”
-“जी, रामशरणजी मेरे मौसाजी हुए.”
थोड़ी देर कुछ सोचने-विचारने के बाद -“रामशरणजी तुम्हारे मौसा हैं? … और उन्होंने तुम्हें इस काम के लिए यहां भेजा है? …….. दुनियां में एक से बढकर एक इंसान है भाई! कोई एक कुर्सी की खातिर इतना गिर सकता है? मैंने कभी अपने सपने में भी नहीं सोचा था….. खैर, एक बात बताओ… तुम अपनी मर्जी से यहां आई हो?”
नंदनी चुपचाप शून्य में ही कहीं खोई रही. थोड़ी देर की चुप्पी के बाद शांति को भंग करते हुए मंत्रीजी –“क्या तुम्हें पता है कि तुम यहां क्यों आई हो?”
नंदनी पूर्ववत ही खोई रही. मंत्रीजी अपने चेहरे का भाव बदलते हुए – “नंदनी… तुम यहां किसी कागज के लिए नहीं आई हो… तुम यहां हमें खुश करने के लिए आई हो… तुम्हारे मौसाजी को जो कुर्सी दी जा रही है उसकी तुम जश्नी सौगात हो!”
नंदनी चुपचाप शांतभाव से सबकुछ सुनती रही. फिर मंत्रीजी- “तुम कह रही हो कि तुम रामशरण की रिश्तेदार भी हो? मैं तो असमंजस में पड़ गया हूँ. खैर, तुम्हें जब आपत्ति नहीं है. रामशरण को आपत्ति नहीं है तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है? मुझे तो आम खाने से मतलब है. और तुम तो नंदनी हो ही. प्यारी नंदनी. चलो अब मुड फ्रेश करो. क्या मंगवा दूँ खाने-पीने के लिए?”
नंदनी चुपचाप जमीन की ओर घूरती रही. उसके दिमाग में क्या चल रहा है सिर्फ वही जानती थी. काफी देर तक यूं ही चुप्पी छाई रही तो मुस्कुराते हुए-“अरे! तुम कुछ बोलती क्यों नहीं? तुम मेरा साथ देने के लिए तैयार हो ना? क्यों दिमाग खराब कर रही हो? जब से आई है मरियल गाय जैसे खड़ी है. कुछ समझे में नहीं आता है कि साला सब किसको-किसको भेज देता है कि अच्छा-खासा मुड भी बिगड़ जाता है.”
नंदनी पूर्ववत ही बनी रही तो खींझकर मंत्रीजी- “देखो! यहां आने के बाद कोई बच के जाता नहीं है. अब भलाई इसी में है कि तुम रजामंदी से तैयार हो जाओ. है ना? मुझे जोर-जबर्दस्ती पसंद नहीं है. और जब तुम आई हो तो तुम्हें तो मालूम ही है कि तुम यहां क्यों लाई गई हो, फिर इन नौटंकियों का कोई मतलब नहीं रह जाता है.” और वे उसके पास आकर बैठ गए. मंत्रीजी के चेहरे का भाव बदल रहा था. होठों पर रंगीन मुस्कुराहट थिरक रही थी तो उनका एक हाथ नंदनी के कंधे और पीठ पर घूम रहा था. थोड़ी देर तक वे यूं ही नंदनी के चेहरे के बदलाव को पढ़ने की कोशिश करते रहे लेकिन किसी तरह का हलचल ना पाकर एक लम्बी साँस छोड़ी और अपना हाथ पीछे से हटाकर उसके ठुड्डी पर ले आए और चेहरा सामने करके –“इतना खूबसूरत जिस्म है. फिर चांद से चेहरे पर गम की यह छाया क्यों?”
वे उसके चेहरे पर हाथ फिराते रहे लेकिन वो पत्थर बनी रही. लग ही नहीं रहा था कि कोई उसके शरीर को छू रहा है. न तो उसमें सहभागिता का एहसास था न ही विरोध की कोशिश. मंत्री जी ने दुपट्टे को कंधे से खींच उसकी छातियों में अपनी नज़रें जमा दी. फिर भी उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं उभरा तो झुंझलाकर मंत्रीजी – “अरे! कुछ तो बोलो! कुछ तो क्रिया-प्रतिक्रिया करो……..”
मंत्रीजी का धैर्य चुकने लगा तो नंदनी ने नज़रें घुमाई और कही -“मैं क्या बोल सकती हूं? एक ने भोजन के रूप में आपके सामने पेश किया है आप भोजन करें. एक निर्जीव की क्या औकात कि वह एक मंत्री के बंद कमरे में कुछ बोले? बोलने का फायदा ही क्या होगा? होगा तो वही जो आपका दिल चाहेगा. मैं तो मिट्टी की मूरत हूँ आपलोग खेलते रहिए.”
मंत्रीजी चुपचाप सुनते रहे और शब्दों के मतलब को समझने की कोशिश करते रहे. दर्द की गहराई और परिस्थिति को समझने की कोशिश करते रहे.
नंदनी फिर बोली –“ये तो अब आप पर है कि आप भोजन करते हैं कि नहीं? मैं तो घर के अंदर भी लुटी और बाहर भी. … चलते –फिरते लाश की भी कोई अपनी इच्छा होती है क्या? … मेरे न कहने से क्या फर्क पड़ जाएगा? करेंगें तो वही न जो आप चाहेंगें… जख्म झेल कर भी चुप रही तो गैंगरेप झेली. यहां आपको न बोलूंगी तो मेरे लाश का भी किसी को पता चलेगा क्या?” पहली बार उसका दर्द उसके शब्दों में झलकने लगा. लगा जैसे कि वह बिल्कुल हार चुकी है. आशा की कोई किरण दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रही है. बस सब कुछ झेलना ही नियति मान चुकी है. क्रिया-प्रतिक्रिया का कोई मतलब नहीं रह गया.
उसके मुंह से निकले शब्दों को सुनते ही मंत्रीजी लगभग चीख पड़े- “क्या …क्या बोली?… तुम्म्म्ह्ह्हारे साथ गैंगरेप हुआ है? कब?… कहां?” माथा ठोकते हुए मंत्रीजी- “हे भगवान, मेरे दिन इतने गिर गए हैं कि अब मैं बासी जूठन खाऊं?… तुम अभी के अभी बाहर निकलों? साला … हरामखोर रमशरणा … रूक तुझे मैं बताता हूं… मेरे ही साथ चाल चल गया. इतना बड़ा धोखा?”
नंदनी चुपचाप बैठी रही, लगा जैसे उसे कुछ सुनाई ही नहीं पड़ रहा हो. कुछ देर तक मंत्रीजी कमरे में तेज कदमों से चहलकदमी करते रहे. अचानक टेबल के पास पहुंच गिलास में रखें पानी को पीने लगे. पानी पीने के बाद बगल में पड़े एक फाइल ले नंदनी की ओर बढ़ाते हुए बोले – “लो, ये फाइल तुम अपने मौसाजी को दे देना… अभी मेरा एक ड्राईवर तुम्हें घर तक छोड़ आएगा… तुम घर जाओ.” मंत्रीजी का चेहरा लाल और सख्त हो चुका था.
नंदनी को कुछ समझ में नहीं आया कि आखिर बात क्या हुई? मंत्री जी के बार बार बाहर जाने के कहने पर वह चुपचाप सुस्त क़दमों में बाहर आ गई. मंत्रीजी के आवाज देने पर एक ड्राईवर आया और वह गाड़ी से उसे घर तक छोड़ आया.
जब वह अपने कमरे में सोने पहुंची तो उसे नींद नहीं आ रही थी? वह सिर्फ सोचे जा रही थी कि आखिर उसके जिंदगी का मतलब क्या है? वह जिंदगी भर जश्नी सौगात या किसी के कुर्सी की सीढ़ी या किसी के हवस की शिकार ही बनी रहेगी? क्या वह कभी इस नरक से निकल नहीं पाएगी? क्यों नहीं इस रामशरण नामक दानव को मार दिया जाए? हां जरूर. अब यही एक मात्र रास्ता है बदला लेने का. लेकिन अगले ही पल उसे लगता उसे मारने से मुझे क्या मिल जाएगा? जहां मैं बदनाम हो चुकी हूं वहां मेरी इज्जत वापस हो जाएगी? मारना बड़ी बात नहीं है लेकिन वह एक राजनीतिक आदमी बन गया है. हत्या होने पर इसके सारे पाप धूल जाएंगें, चौक –चौराहे पर इसकी मूर्ति लग जाएगी, गन्दी राजनीति करने वाले लोग राजनीति करेंगें. जन्मदिन और मरण दिन मनाएंगें. हमेशा हमेशा के लिए यह अजर–अमर हो जाएगा. और मैं तुरंत सलाखों के पीछे. मेरे परिवार के लोग परेशान होंगें सो अलग…. कौन जानता है मेरे जैसी कितनी नंदनी कितने घटिया लोगों और नेताओं के चक्रव्यूह में छटपटा रही होगी? इसका एक ही उपाय है इन सारे लोगों का नाश. जिस्म के सौदागरों का विनाश. मासूमों के जिस्म पर टिके शासनों का सत्यानाश. लेकिन कैसे? राजनीतिक सत्ता से लड़ना इतना आसान है क्या? क्या मैं वह गिलहरी बन सकती हूं जो समुद्र को सुखाने का दृढ निश्चय कर प्रयत्न शुरू कर दी और अंत में समुद्र सुख ही गया, भले ही उसमें एक ऋषि के श्राप ने अहम भूमिका निभाई. लेकिन मुझ अकेले में तो इतनी शक्ति नहीं कि ऐसा कर सकूं. मेरे इस प्रयास में कौन ऋषि आएंगें?… लेकिन मैं हार नहीं मानूंगी. मैं चंडी बनकर सबको बर्बाद कर दूँगी. मैं चाणक्य क्यों नहीं बन सकती? जिसने अपने अपमान का बदला लिया? जिसने एक बड़े साम्राज्य का अंत किया? द्रोपदी ने भी जब दुर्योधन के अंत का प्रण किया तो उसके अपमान का बदला पूरा हुआ ही. फिर मेरा प्रण क्यों नहीं सफल होगा? जरूर होगा? मैं हिंसा से नहीं बल्कि चाणक्य की तरह अपने दिमाग से इन सबकों बर्बाद करके दम लूंगी. हां, हां अब मैं चाणक्य बनूँगी. और तब से नंदनी हर रोज दुआ करने लगी कि किसी तरह इस रामशरण जैसे धरती के बोझ और उसके संरक्षक सरकार का जल्द से जल्द नाश हो जाय.
अचानक मोबाइल की घंटी बजी और नंदनी अपने पुराने ख्यालों से वापस बिस्तर में आ गई. लगा जैसे एक भयानक सपने से वापस लौटी हो. मोबाइल के स्क्रीन पर उसके एक सहेली का नम्बर चमक रहा था और वह बात करने में मशगूल हो गई. थोड़ी देर में न्यूज चैनल खोली तो वही हुआ जिसका डर था – सत्ताधारी दल फिर से जीत चुकी थी. नंदनी के कानों में रामशरण के ठहाके गूंज रहे थे. अपने मंसूबे पर फिरे पानी से निराश हो वह टीबी बंद कर अपने किताबों की दुनियां में खो गई.
……………………………………………………………………….
परिचय : पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों का निरंतर प्रकाशन.
सम्पर्क : सुशील कुमार भारद्वाज, A-18; अलकापुरी, पो- अनिसाबाद
जिला- पटना -800002
email – sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

 

 

Related posts

Leave a Comment