विशिष्ट कहानीकार :: सोनाली मिश्र

पहचान

– सोनाली मिश्रा

इस छोटे शहर के इकलौते बड़े होटल में आकाश अपने कमरे में वापस आ गया। हालांकि बारिश का मौसम नहीं था पर बेमौसम बारिश ने उसे भिगो दिया। अपने कमरे में आकर वह गीला ही कुर्सी पर बैठ गया है। लकड़ी की कुर्सी पर बैठा बैठा सामने बालकनी से बारिश को देख रहा था, सब कुछ भीग गया था, और स्वाहा हो रहे थे उसके सपने, उसका कल उसका आज! उसने अपनी पैंट में रखा हुआ कागज़ का टुकड़ा देखा, वह भी लुगदी बन गया था।  और लुगदी लुगदी हो गयी थी उसकी पहचान।  सारी पहचान!

पहचान का जो सिरा लेकर वह अपने घर से यहाँ चला आया था।  उसने फिर से अपनी पैंट में एक बार हाथ डाला और उस कागज के टुकड़े को निकाला, अब उस पर कुछ नहीं शेष था। वह उसी तरह ब्लैंक हो गया था जिस तरह से अस्पताल के रिकॉर्ड। सुबह से लेकर अब तक इस शहर के हर प्राइवेट नर्सिंग होम के दरवाजे पर दस्तक दे चुका था आकाश, पर उसे केवल और केवल निराशा ही हाथ लगी थी। पापा की आवाज उसके कानों में गूंज रही थी, ’क्या करोगे जाकर बेटा? घावों को उधेड़ने से कुछ हाथ नहीं लगता।। …….तुम मेरे बेटे हो, मेरी पहचान हो तुम; पर पापा की किसी बात पर उसे भरोसा नहीं हुआ था। कौन जाने वह कब सच बोलते थे। पूरे चैबीस साल तक तो वह झूठ ही बोलते रहे!

आकाश की आंखें जलने लगी थीं। यह जलन सवालों की थी या बुखार की, वह खुद ही समझ नहीं पा रहा था।  वह सवालों से जूझ रहा था। वह कुर्सी से उठा, अपनी अल्मारी की तरफ गया। वह कपड़े बदलना चाहता था। पैंट से वॉलेट निकालते समय उसका वॉलेट एकदम से नीचे गिर गया। उसके नीचे गिरते ही उसकी मां की फोटो भी झांकने लगी। ओह मां! उसने एकदम से माथा पकड़ लिया और वह उन्हीं गीले कपड़ों में वहीं बैठ गया। उसने अपनी मां की फोटो उठा ली, और देखने लगा! मां की नाक कितनी सुंदर है और उसकी कितनी चौड़ी! उसने फोटो देखकर कहा और फिर से रोने लगा! ’नहीं, नहीं!’ यह नहीं हो सकता! ’मां तुम कह दो कि यह सच नहीं है!’ आकाश को दिल्ली में अपने अपार्टमेंट का वह कमरा याद आ रहा था जिसमें उसके मां-पापा और वह तीनों ही रो रहे थे।

मां उसे सम्हालने की कोशिश में थीं तो पापा मां और उसे दोनों को! कैसा लम्हा था वह! जैसे तीनो के ही जीवन को तहसनहस कर गया! उस लम्हे ने आकाश और उसकी पहचान को दोराहे पर ला दिया था! मां और पापा दोनों ही अपनी बेध्यानी में उन लम्हों की बात कर रहे थे जब आकाश उनकी जिंदगी में आया था, कैसे वह दोनो उसे लेकर दिल्ली चले आए थे!’ ’तो क्या मैं आपका बेटा नहीं हूं?’ आकाश के हाथों से पानी का गिलास गिरने से दोनों ही चैंके थे, और मां को तो लगा कि उन तीनो के जीवन में एक तूफान आ गया। आकाश दरवाजे पर खड़ा था, रोता हुआ!

 

मां और पापा को काटो तो खून नहीं की हालत हो रही थी। जिस राज को अब तक वे दबाए हुए थे और सही समय पर आकाश को बताना चाहते थे, वह इस तरह से आकाश के सामने आएगा उन्होनें सोचा नहीं था। आकाश के हाथों से गिलास छूट गया था और वह कांपते हुए अपने मां और पापा के सामने आया। वह गुस्से और दुख के कारण चीख रहा था ’तो मैं आपका बेटा नहीं हूं? कौन हूं मैं फिर! मैं आप दोनों के प्यार की निशानी नहीं हूं, मैं किस की निशानी हूं!’ आकाश रोता जा रहा था। उसके माथे पर पसीना था और पूरा शरीर कांप रहा था, जैसे कोई उसके टुकड़े टुकड़े कर रहा हो। आकाश के लिए वह लम्हा उस हथौड़े की तरह था जिसने उसकी पहचान को एकदम तोड़ दिया था।

आज तक वह जिस नाम और पहचान के सहारे था, वह तो महज पानी का बुलबुला थी। आकाश उसका नाम नहीं है, तो उसकी मां ने उसके लिए वह सब कुछ नहीं किया जो बाकी मांए करती हैं, जैसे जब बच्चा पेट में होता है तो उसके लिए स्वेटर बनाती हैं, अपने होने वाले बच्चे से पेट में बातें करती हैं! यह सब किसने किया होगा! फिल्मों में वह देखता था कि माएं अपने होने वाले बच्चे के चेहरे का अंदाजा लगाती हैं, अपने पति का चेहरा देख कर उसके जैसे ही अपने बेटे या बेटी का चेहरा चाहती हैं, और पिता भी अपनी पत्नी के पेट पर हाथ रखकर अपने अजन्मे बच्चे से बात करते हैं।  इसका मतलब उसे वह प्यार मिला ही नहीं।

आकाश अपनी मां का चेहरा देखता है! वहां पर आंसू हैं, पर वह आंसू उसे बहला नहीं पा रहे। उसके मन मे गुस्से और दुख के साथ साथ टूटन भी है। उसे याद  है कि वह रोते रोते वहीं पर बैठ गया था, पापा ने उसे उठाने की कोशिश की थी तो उसने हाथ झटक दिया था। ’आप हाथ नहीं लगाइये मुझे, आपने इतना बड़ा सच मुझसे छिपाया। मैं आपका बेटा नही हूं! मैं आपका खून नहीं हूं! मेरी रगों में जो खून बह रहा है वह किसी और का है! ओह पापा, यह आपने क्यों किया?’ आपने ऐसा क्यो किया! आकाश रोते रोते सवाल पूछ रहा था। वे तीनों ही सवालों के एक ऐसे त्रिकोण में फंसे थे जहां से एक एक सिरा तीनों तक जा तो रहा था पर उसका जबाव नहीं था। मां ने आकाश को रो लेने दिया। बीच में रोकने से उसके दुख के बर्फ की तरह जम जाने का खतरा था। जब आकाश रो चुका, तब उसकी मां ने उसका चेहरा उठाया और कहा ’तुम मेरे ही बेटे हो बेटा!’

आकाश जैसे होश में आया था। उसने अपनी मां की आंखों में आंखे डालीं, उसे केवल प्यार दिखता था, अपना सा प्यार! पर आज इस तूफान ने उस प्यार की जगह एक अजनबीपन डाल दिया था। वह उस पहचान को खोज रहा था। पर उसे कोई सिरा नहीं मिल रहा था।

आकाश की आँखों में सवाल थे, ढेरों सवाल! और जबाव में सन्नाटा था।  ’मां, तुम तो मेरी सबसे अच्छी दोस्त थीं, तुम मुझे बता सकती थीं यह बात!’ आकाश ने अपनी मां से आंखों में आंखे डाल कर पूछा!

मां रो रही थी! ’मैं क्या बताती तुम्हें बेटा! जब से तुम्हें अपने घर लेकर आए तब से तुम हम दोनों की जिंदगी बन गए। लोग तुमसे कोई सवाल न करें, और तुम्हारे कच्चे मन में कोई सवाल न डाल दें, इसलिए यहां पर चले आए थे। दूर दिल्ली में!’ मां की आंखें सच बोल रही थीं। आकाश अपनी मां के भोलेपन को जानता है। वह उससे बहुत प्यार करती थी। पर उसे अब यह पता लगाना ही था कि वह आखिर कौन है!

“मां, मुझे तुम्हारे प्यार से कोई शिकायत नहीं! पर यह बात तो मुझे बतानी थी न! मैं…….. मैं……तुम्हारे पेट से पैदा हुआ बच्चा नहीं हूं! तभी सब कहते थे कि मैं न जाने किस पे गया हूं! याद है न कि मैं कहता था कि मां तुम तो इतनी सुंदर हो, पर मैं, मैं इतना काला क्यों हूं! ओह आज पता चला कि मुझे पैदा करने वाली मां ही नहीं चाहती थी कि मैं इस दुनिया में आउं और इस कारण से उसने इतना जहर खाया कि मैं हरा ही पैदा हुआ था। मां, मेरे पैदा होने पर खुशी नहीं दुख मनाया गया होगा कि मैं बच कैसे गया! ओह मां, ओह मां………………’

आकाश का रोना कम नहीं हो पा रहा था। आकाश को यह जानकर और भी सदमा लगा था कि उसकी असली मां ने उसे पेट में ही मारने की हर कोशिश की थी। आकाश आईने के सामने जाकर खड़ा हो गया था। मां उसके साथ ही थी। ’मां, देखो मुझे! क्या मैं जरा सा भी तुम्हारे जैसा हूं! मां, मेरी असली मां ने मुझे मारने की कोशिश क्यों की थी?’ आकाश अपनी बाहों में नसों को देखता और उनके बहते खून को देखकर उसे और भी रोना आता! जब वह पैदा हुआ तो हरा हरा जहर उसकी नसों में था। डॉक्टर्स ने मना कर दिया था, पर न जाने क्यों कई दिनों से अस्पताल में चक्कर काट रहे इन लोगों पर तरस खाकर वह जहर से भरा हुआ हरा बच्चा उनके हाथों में सौंप दिया था।

हालांकि गारंटी नहीं थी कि वह बचेगा। पर आकाश को पाकर उसके यह मां पापा इतने खुश हुए कि चार महीनों तक अस्पताल में ही पड़े रहे और जब तक उसे जहर से मुक्त नहीं करा लिया तब तक घर नहीं आए। उसके बाद मां के कहने पर वह शहर ही छोड़ दिया और यहां दिल्ली चले आए, हर सच से दूर, इस नए सच के साथ कि आकाश उनका ही बेटा है।  पर सच तो सच है कब तक इसे पर्दे में रखा जाएगा, कभी न कभी तो वह आएगा ही! और ऐसा सच जब सामने आता है तो सब कुछ बहाकर ले जाता है।

होटल में बैठा आकाश अब कपड़े बदल कर बैठ गया है। आज सुबह से ही वह हर अस्पताल के चक्कर काट आया है। पापा ने जिस अस्पताल का नाम बताया था उनके पास चौबीस साल पहले का कोई रिकॉर्ड नहीं था। ’अरे साहेब, ऐसे लोग असली  नाम लिखाते हैं क्या!’ जब वह रिकॉर्ड खोजने पहुंचा था तो उसे ऐसे ही जबाव मिले। पर एक खोजी पत्रकार होने के नाते आकाश को सवालों से खेलना आता था। और फिर यह तो उसकी पहचान पर बात थी। इस छोटे से शहर के लगभग सभी पुराने नर्सिंग होम में वह तलाशी कर आया था।

पापा के बताए अस्पताल में जब उसने कदम रखा तो एक क्षण को तो वह चौंक गया था। उसकी निगाहें उन पलंगों की तरफ चली गईं जहां पर गर्भवती औरतें लेटी हुई थीं। तो कहीं पर बच्चों के साथ औरतें लेटी थीं। उसे लगा जैसे एक पलंग पर वह हरा हरा लेटा हुआ है और उसे पैदा करने वाली माँ बस बिस्तर खाली कर रही है। आकाश समय के इस पार से उस पार का दृश्य देख रहा है।

उसके कदम एकदम रुके हुए हैं, उसे पैदा करने वाली माँ ने उसे मारने के लिए हाथ उठाए हैं और तभी उसकी यह माँ बीच में आ गयी है। एक तरफ उससे पीछा छुड़ाने वाली माँ है और दूसरी तरफ उसके जीवन से जहर निकालने वाली माँ। अचानक से उसके कदम डगमगाए और भागकर रजिस्टरों के कमरे में जाकर सारे रजिस्टर खंगालने लगा, पर उसे हाथ केवल जीरो ही लग रहा था। जैसे ही वह कोई रजिस्टर खोलने की बात करता उसके कानों में उसकी मां की आवाज गूंजने लगती ’तुम मेरे बेटे हो, केवल मेरे पेट से पैदा न होने का मतलब यह तो नही कि तुम मेरे बेटे नही हो!’

पर पुराने रजिस्टरों की धूल में वह सारी आवाजें खो जातीं। वह हर रजिस्टर में उस नाम को खोजता जो उसकी मां हो सकती थी, पर हर रजिस्टर में उसकी मां का ही चेहरा दिखने लगता। यह उसे क्या हो रहा था! आकाश को हर तरफ उसकी मां की दिख रही थीं। जब से वह ट्रेन में बैठा, और जब से वह इन रजिस्टरों में उस अनजान नाम की तलाश में है, तब से उसकी आंखों के सामने केवल उसकी मां का ही चेहरा आ रहा है। जहां भी वह जा रहा है, अपने पापा का नाम बताते ही सब उसे एक ऐसी निगाहों से देख रहे हैं जैसे कि वह कोई अजूबा हो।

यह उसके मां और पापा का शहर है, या कहा जाए कि उसका ही शहर है। वह भी है तो यहीं का ही। उसकी असली मां भी रही तो इसी शहर की होगी। या कहीं और से आई होगी? अगर किसी धोखे की शिकार रही होगी तो क्या पता कहीं और से आई हो? जैसे ही आकाश यह सोचता है सिहर जाता है ’धोखा!’ तो क्या वह किसी धोखे से पैदा हुई संतान है? क्या वह बलात्कार की संतान है? अगर हाँ तो कितने? एक या दो या कई? और यह सोचते ही आकाश का पूरा शरीर कांप जाता है। वह अपने हाथ पैरों से उस घिन को छुटाने की कोशिश में है, जो ऊपर से नीचे तक उसके पूरे शरीर पर छा गयी है।

बारिश हलकी हो रही है। और वह भीगा हुआ है, जब वह भीगता है तो उसे छींके आती हैं और मां उसे तुलसी वाली चाय पिलाती है। उसे बीमार नहीं देख सकती है। जब भी वह थकता था तो मां के आंचल में छिप जाता था। सच मां के आंचल से प्यारी जगह कुछ नहीं हो सकती।

बारिश के कम होते ही आकाश एक बार फिर से उन सड़कों पर चल पड़ा है जहां से उसे जरा भी उम्मीद थी कि कुछ मिलेगा। पापा ने कुछ नाम और दिए थे, जैसे भदौरिया मिष्ठान वाले, शुक्ला जी आदि। आकाश को अपने पत्रकार होने का फायदा मिल रहा है। पर जहां जहां वह जा रहा है वह सब पापा के ही गुण गा रहे हैं। ’देवता आदमी हैं, वह देवता! सारे पूजा पाठ किए, कोई मंदिर नहीं छोड़ा, कोई पूजा नहीं छोड़ी, बस एक औलाद मांगते रहे। हीरे में खोट हो सकता है पर उनमें नहीं बेटा!’

शुक्ला जी ने उसके आने का मकसद जानते हुए उसे बताया। ’इतने सालो के बाद यह तो मायने नहीं रखता कि तुम्हारी असली मां कौन है या कौन थी, वह जिंदा थी या मर गई! और अगर जिंदा है तो वह किस हाल में है, जरा सोचो कि अगर उसे तुम्हें अपनाना ही होता तो वह जहर क्यो खाती, और मां का प्यार किसी रजिस्टर का मोहताज नहीं होता!’ उन्होने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे समझाते हुए कहा। ’यह तलाश बंद करो और कोशिश करो कि अपने घर वापस जाओ। जिस आदमी ने केवल तुम्हारे लिए अपना घर, अपनी नौकरी और अपना सबकुछ छोड़कर एक नई जगह से नई शुरूआत की, उसे इस तरह से दुख न दो! बाकी मैं एक पता देता हूं शायद तुम्हें वहां से कुछ पता चल जाए!’

शुक्ला जी उसे समझा रहे थे। समझ तो आकाश भी रहा था। आकाश जहां जहां जा रहा था उसकी मां उसके साथ साथ चल रही थी। जब भी वह किसी से बात करता, वह जैसे उसके कान में मंत्र सा फूंकती! ’मैं ही तुम्हारी मां हूं! मेरा ही खून तुम्हारी रगों में है। तुम तो जहर लेकर पैदा हुए थे, अपने प्यार से मैने इस जहर को खून बनाया है। तुम मेरे ही बेटे हों।’ आकाश जितना अपनी पहचान को लेकर सवाल करता, उसकी मां की आवाज उतना ही उसके कानों में गूंजने लगती! सड़क पर चलता आकाश फालतू ही पत्थरों को मारता हुआ चल रहा है। राज की परत खुलनी इतनी भी आसान नहीं है।

वह जितना खोलने की कोशिश में है, गांठें उतनी ही लग रही हैं। एक गांठ खोलता है दूसरी लग जाती है। उसे लगता है कि काश जिंदगी की गांठें खोलना उतना ही आसान होता जितना उन्हें लगाना आसान होता है। चलते चलते आकाश शहर से बाहर निकल आया है। उसके सामने एक साइकिल जा रही है जिसमें एक बच्चा अपने पिता के साथ बैठा है। सुरक्षा की आंच महसूस करता हुआ! आकाश को याद आया कि वह भी पापा के साथ बजाज के स्कूटर पर इसी तरह बैठता था और पापा हमेशा ही कहा करते थे कि आकाश मेरा नाम रोशन करेगा। साइकिल पर वह बच्चा इसी तरह चिपक गया था जैसे वह अपने पापा के पीछे चिपक जाता था। सच पापा से बड़ा सिक्योरिटी बॉंड कुछ नहीं होता।

बारिश अब बंद हो चुकी है। आकाश अपने पापा के पुश्तैनी घर के बाहर खड़ा है। उसी घर के बाहर जिसमें उन्होंने जन्म लिया था और जिसे वह उसके लिए छोड़कर चले गए थे। उसकी आँखों के सामने अपनी माँ और पापा का वह चेहरा आ रहा था, जब उनलोगों ने यह घर छोड़ा होगा। माँ की डोली इसी घर में आई, इसी घर में उन्होंने सारे सपने देखे होंगे और आकाश के कारण उनकी पहचान गायब हो गयी। शाम का धुंधलका छाने लगा है। आकाश उस घर की दीवारें छू रहा है या कहा जाए वह सवालों के जबावों को खोज रहा है। अजीब बात है, जिसके लिए वह जरूरी नहीं था, उसकी कोख में आया। और अब उसके बारे में इस शहर में कोई नहीं बता पा रहा। वह कहां से आई थी और बच्चा डॉक्टर को थमाते ही कहा गायब हो गई पता नहीं! उसके लिए वह बच्चा कुछ मायने ही नहीं रखता था! और दूसरी तरफ उसकी मां है, जिसके लिए उसकी खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है।

दीवारों पर हाथ फिराते फिराते उसे एक उलाहना सा मिलता है “क्यों, कहाँ भटक रहे हो! हमारी ही बहुरिया तुम्हारी माँ है!” आकाश की आँखों के सामने उसकी माँ और पापा दोनों ही खड़े हो गए हैं।  यह दीवारें और आसपास के लोग बस यही कह रहे हैं’तुम्हें पता, यह शहर तुम्हारे पिता की जान था। वह बार बार कहते थे कुछ भी हो जाए अपने पुरखों का यह शहर छोड़कर नहीं जाने वाला! खूंटा गढ़ा है यहां! नाड़ गढ़ी है! नाड़ तो गढ़ी रह गई पर वह चला गया।!तुम्हाए बाप की जान इसी शहर में हैं आकाश’।

भौंचक्के से आकाश को लग रहा है जैसे उसकी पहचान तो यही शहर है, उसकी पहचान तो उसका वहीं परिवार है जिसकी छांह में वह अब तक रहा है। पापा के पुश्तैनी घर पर ताला लटका है। न जाने कब से कोई यहां आया नहीं है। पापा ने उसे पहचान देने के लिए अपनी पहचान खो दी। सूरज ढलने वाला है, बादलों पर ढलते हुए सूरज का सिंदूरी रंग फैलने लगा है। आकाश ने अपने पैंट में हाथ डाला। लुग्दी हो चुके कागज को दबाया और फेंक दिया। उसे अब पता चल गया है कि उसकी पहचान क्या है और कहां उसकी पहचान मुकम्मल होगी।

भदौरिया अंकल को उसने अपने पापा के पुश्तैनी घर की पुताई कराने के लिए कह दिया है! पुश्तैनी घर की ढहती दीवारों को उसने थाम लिया है और उनसे कहा ’मेरी पहचान आप हैं!’ उसके चेहरे पर पहचान का सुकून है।

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परिचय : सोनाली मिश्र साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिख रही हैं. इनकी कई कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं

पता – सी-208, जी-1, नितिन अपार्टमेंट्स, शालीमार गार्डेन, एक्स-II, साहिबाबाद, ग़ाज़ियाबाद

 

 

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