विशिष्ट कहानीकार

किवाड़ों का पसीजापन

उसका रुकना जैसे एक गजब हो गया था। न जाने वह क्यों रुक गयी थी? क्या भुला दिए गए लोगों को ऐसे रुकने का अधिकार होता है? पर वह रुक गयी थी? ये घर किसका था? वह उसी मकान के सामने अनाथों की तरह खड़ी थी जिसमें उसका बचपन बीता था। जिसमें उसने अपने सपने देखे थे। जिससे उसकी डोली उठी थी और जिसमें उसने तमाम शिकवे गिले किए थे। आज उनके कदम उस मकान में घुसने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। कभी यह भरा पूरा मकान तमाम तरह की हंसी से गुलज़ार रहता था। आज वह गिरी हुई छतों में उस हंसी के क्षण खोज रही थी। बार बार उसके कानों में एक वही हंसी आ रही थी जैसे उर्दू में लिखी मसनवियों के हंसी कभी गूंजती थी। उसे बहुत पसंद थी मसनवी को पढ़ना। खो जाती थी, वह उर्दू की जादूगरी में, और उसे भाषा की ख़ूबसूरती सुन्दर लगने लगती।
उसे लगता कि भाषा के साथ मटरगश्ती करते हुए न जाने कितनी दूर चली आई है।
वह छू रही थी उसी दीवार को जिसके कोने लगकर वह मसनवियत नल दमन पढ़ा करती थी।
उस कमरे की हर ईंट उससे मानो एक शिकायत कर रही थी।
पिछले तीन सालों से उसके पैरों को अन्दर जाने की इजाजत नहीं थी। पर वह इतनी पराई कैसे हो गयी थी? आज वह क्यों इस जमीन के टुकड़े पर खड़ी है। वह चाहे तो दूर जा सकती है, पर अब कहाँ जाएगी? इस घर पर तो जैसे हथौड़े चल गए!
उसे तो मसनवियों की तरह भुला दिया गया।
लाल आलते में सजे पैरों को लेकर जब वह इस घर से जा रही थी तो सबने कहा था “बिटिया इस घर के भाग ले के जाय रही है।” और उसकी सास ने नज़र उतारते हुए कहा था “जे बहुरिया हमार मौड़ा के लएं बहुत भाग्साली। देखो तो जाके इत्ते लम्बे लम्बे बाल, कारे स्याह है, जे हर बुरी नजर से बचाय के रखियें।”
मगर उसका मन क्या था? उससे न इस घर को मतलब था और न ही उस घर को!
एक घर के भाग्य लेकर वह दूसरे घर जा रही थी। एक घर के रंग लेकर वह दूसरे घर जा रही थीं। पर उसके अपने रंग क्या थे? क्या उनके रंग थे भी या नहीं? या कभी देखने का मौक़ा न मिला? सुन्दरी देवी के वैसे बहुत सपने नहीं थे। वैसे भी छोटे शहर में बड़े घरों की लड़कियों को अपने मन से सपने देखने की अनुमति होती नहीं थीं। और वह तो खुद को किसी रंग में रंगी थीं क्या? छोटे शहरों की लड़कियों को अपने मन से शायद सांस लेने का भी अधिकार नहीं होता है तो रंग चुनना तो बहुत ही दूर की बात.
ऐसा नहीं था कि सुन्दरी देवी बहुत दुलारी थी और बहुत दुत्कारी जाती रही हों, ऐसा भी नहीं था।
बस सामान्य सा जीवन था।
पर साधारण ही असाधारण हो जाता है। उसे क्या पता था कि उसकी साधारण ज़िन्दगी में इतनी असाधारणता आएगी कि शादी के बाद जब वह आएंगी तो उसका घर उसे ईंटों का ढेर मिलेगा। खुसरो को गाती गाती कब वह असाधारण हो गईं थीं, उसे भी पता नहीं चला था।
प्रेम भाटी का माधवा पीलायके
प्रेम भाटी का माधवा पीलायके,
मटवारी कर दीनी रे, मो से नैना मिलायके।
गोरी गोरी गोरी बैयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ,
बहियाँ पकड़ हर लीनी रे, मो से नैना मिलायके।

शादी से पहले पढने लिखने का शौक रहा, बाबा ने रोका नहीं। पर बाबा बेचारे किस्मत के मारे थे। खूब दुलार कर रखने की चाह तो थी, पर एक मुकदमें में ऐसे फंसे कि अपने मरने से पहले उसे लाल जोड़े में देखने की चाह में उसे इस घर में ब्याह गए। कुछ ज्यादा नहीं देखा, बस देखा इतना कि इतने बड़े घर में उनकी प्यारी बेटी को एक कोना मिला रहेगा।
और इस तरह वह उस मकान से टूटकर तिवारी निवास का हिस्सा बन गयी थीं।
तिवारी निवास उसे मकान कम चिड़ियाघर अधिक लगता था। सुंदरी देवी का सपना एक सरल ज़िन्दगी बसर करने का था, जैसी वह उर्दू पढ़ा करती थी। लोगों की जबान, जिसे मुंह में रखते ही चाशनी सी घुल जाए। उर्दू जिसके हर शब्द में उसे मिठास लगता था। कहकशां से किताबें उधार लेकर उसने न जाने खुसरो से लेकर क्या क्या पढ़ लिया था। ग़ज़ल उसे अपनी ओर खींचती, मगर उसे ग़ज़ल से ज्यादा मसनवी पसंद थी। कितना मिठास होता है मसनवी में, और कहकशां और वह दोनों मसनवी सत्यवान-सावित्री पढ़तीं और बहुत हंसती थीं जब उसमें प्यार जताते हुए सावित्री कहती थीं
“वो जर हो कि कौल हो कि दुख्तर, वापस लेता है कोई देकर,
देखा जब उन्हें समझ के शौहर, रिश्ता मिरा हो चुका मुकर्रर,
रिश्ता है ये मेरी जान के साथ, मैं बिक चुकी सत्यवान के हाथ
व्याहूँगी किसी को तो उन्हीं को, उम्र उनकी ज्यादा हो कि कम हो।

और वह दोनों ही खिसखिसा कर हंस पड़ती। कहकशां तो अपनी चुन्नी सिर पर डालकर एकदम सावित्री बनकर इन लाइनों को पढ़ती। और बाद में वह दोनों ही अपने अपने सत्यवान के सपने देखतीं। अपने मन में भरोसा पैदा करती कि कहीं न कहीं वो भी अपने सत्यवान से इतना ही प्यार करेंगी। और वह दोनों अपने अपने सत्यवान के सपने देखने लगतीं।
कहकशां के साथ सुन्दरी देवी का साथ कक्षा बारह से बीए तक था। बीए में वे दोनों अपनी सपनीली दुनिया में खोई रहती थीं, और खुसरो, ग़ालिब, मीर की इश्क की गजलों और मसनवी में अपना प्यार खोजती रहतीं। वह समय अपने हिसाब से प्यार करने या सत्यवान खोजने का नहीं था। वह समय तो सत्यवान के रूप में पिता की पसंद पर चुपचाप उसके साथ चले जाने का था।
वे दोनों अपने कॉलेज में बाहर वाले ग्राउंड में बैठकर बातें करती, खूब करतीं। हंसती, अपने सत्यवान के सपने देखती। पर क्या सब कुछ इतना सहज था?
नहीं, नहीं! उन दोनों के उजले दुपट्टे पर कौन सा रंग कब चढ़ेगा यह तो केवल उनके घर वाले ही जानते थे।
पर यह उसे सपने देखने से तो नहीं रोक सकता था न?
वे सपने देखने के लिए तैयार थीं! वे दोनों अपने सपने अपने दुपट्टे के साथ बन लेती। और उसकी गाँठ में वे सपने बाँध लेती जो कभी उनके दिलों में छाते होंगे। पर ऐसा क्या हो सकता था कि वे अपने मन से बुने हुए सपनों का दुपट्टा ओढ़ सकती?
कभी उनके मन में भी नहीं आता था।
इसी बीच सुन्दरी देवी को प्यार होने लगा था। प्यार होने लगा था, यह तो सही था। पर उसे प्यार किससे हो रहा था, सवाल यह था। अब उर्दू पढ़ते पढ़ते उसकी जुबान में मिठास तो हो ही गयी थी और तिस पर अट्ठारह बरस की बाली उमर। ये बाली उमर होती ही है ऐसी। हुआ यूं कि दिवाली के बाद कॉलेज खुलने की बाद एक गुनगुनी दोपहर में उर्दू में वह पढ़ रही थीं नल दमयंती का किस्सा, उसमें स्वयंवर चल रहा था,
सब राजा व राव आरज़ू में, मशगूल दमन की गुफ्तगू में,
क्या जानिये दर्श कब दिखावे, अब कौन पसंद उसको आवे,
वह खोई हुई थीं इसी स्वयंवर में, जहाँ तमाम राजाओं की भीड़ लगी हुई है, सब के सब योग्य, सब के सब कुशल, किसी में कोई भी दोष नहीं। सबके पास अकूत धन है। सबके पास सेना है, सबके पास रूप है। वैभव की गंगा बह रही थी, और सबके मन में धक धक चल रहा था। क्या होगा, क्या होगा वह किसके गले में वरमाला डालेगी?
तभी एकदम से शोर मचा, अरे वह शोर किताब में नहीं, कॉलेज में मचा था। किसी लडकी को छेड़ने पर बवाल हुआ था। सामने कई लड़के इकट्ठे हो गए थे। कहकशां और वे दोनों ही हडबडा गईं। कुछ सोच न सकीं कि क्या करें? वे दोनों ही अपने दुपट्टे से खुद को कसे जा रही थीं।
“डरिये नहीं, कुछ नहीं होगा” एक बुलंद आवाज़ उन लड़कों से ही आई। कौन रहा होगा? कौन है? कौन है? ये कौन है? उनदोनों का दुपट्टा फिर से कंधे पर हो गया।
भीड़ में से अकरम मियाँ निकल कर आ रहे थे। काली शर्ट और सफेद पैंट में अकरम मियाँ सुन्दरी देवी को ऐसे लगे जैसे स्वयंवर में राजा नल आ गए हों। और उसका दुपट्टा बन गया वरमाला। उसने मन ही मन उस दिन को याद किया था जब वह अकरम मियाँ से पहली बार टकराई थीं। उसी दिन नारंगी कुरते और सफेद चूड़ीदार पजामी में वे बाज़ार में ईद की खरीददारी कर रहे थे और वह भी दिवाली के लिए अपना कुर्ता सिलवाने डालने गयी थीं। उस साल इत्तिफाकन दिवाली और ईद साथ साथ पड़ी थी। वैसे तो शहर शांत था, मगर शरारती तत्वो को तलाश तो रहती ही है। हां, तो उस दिन वह पहुँच गईं थी बाज़ार में अपने लिए कुर्ता सिलने डालने। उनके बाबा साल में दो ही बार तो नया जोड़ा दिलाते थे। एक होली और और दीवाली। कहकशां को भी जाना था ईद की खरीददारी करने, तो दोनों सहेलियां पहुँच गईं। बाज़ार सजा हुआ था, एक तरफ दीवाली के पटाखों की दुकानें थीं तो दूसरी तरफ ईद की सिवइयों की रेडियाँ थीं। कितना गुलज़ार था बाज़ार उस दिन। ऐसा लग रहा था जैसे परियां शहर के बाज़ार में उतर आई हैं। हर तरफ लाल, पीली, नीली परियां। सुन्दरी देवी भी लाल रंग का कुर्ता पहनकर एक परी ही लग रही थीं। पूरे बाज़ार में लाल, नीली, पीली और हरी किरन की पट्टियां सजी हुई थीं। सुन्दरी देवी कहकशां के साथ न जाने किस बात पर खिलखिला कर हंस रही थी कि तभी उसकी नज़र सिंवई की दुकान पर खड़े हुए उस लड़के पर पड़ी जो उसे एकटक देख रहा था। उसे लगा जैसे उनके अन्दर कुछ अजीब सा हो रहा है। ये उन्ही दिनों की बात है जब वह सत्यवान सावित्री वाली मसनवी की जद में थीं। वह उसकी पकड़ में थीं, वह सोचती थीं कि आखिर क्या खास रहा होगा सत्यवान में कि एक राजकुमारी रीझ गयी। उसकी ज़िन्दगी में कब आएगा कोई ऐसा? जिसकी आँखों में आँखें डालकर वह सब कुछ भूल जाएँगी? पर उसके लिए तो बाबा ही खोजकर लाएंगे, कौन सा उसकी मर्जी चलेगी। हां, बाबा ही तो खोजकर लाएंगे? पर उसे लगा कि मासूम आँखों का जोड़ा उसे बहुत देर से देख रहा है। जब से वह माला लेने के लिए इस दुकान पर चढ़ी हैं। दरअसल कुर्ता तो उसने खरीद लिया था, मगर उससे मैचिंग माला नहीं खरीद पाई थीं। छोटे शहर के इस बड़े बाज़ार में छोटी छोटी दुकानों पर बहुत भीड़ थी। मगर उसमें भी परियों की हंसी खूब खुलकर आ रही थी। परियों की मांग पर लाल, नीले, हरे मोती सब खुद को भाग्यशाली मान रहे थे। इस समय सुन्दरी देवी भी किसी परी से कम नहीं लग रही थीं। वह अपने बाहर पहनने वाले कुर्तों की बहुत देखभाल करती थीं। पता था कि बाबा तो साल में दो ही जोड़ा दिलाएंगे तो जो पुराने कुरते हो जाते थे उन्ही की बाजू में कुछ काटछांट कर कुछ अलग डिजाइन बना लेती। जबकि कहकशां के साथ ऐसा कुछ न था। शहर के सबसे बड़े व्यापारियों में से एक की बेटी थी। वो तो अब लडकी की शादी के लिए उसका बीए पास होना बहुत जरूरी होता था, इसलिए उनके अब्बा जान बीए करा रहे थे। घर में भरपूर पैसा था, उसी पैसे से वह सुन्दरी देवी को नई नई किताबें खरीद कर दिला देती थीं। कभी खुसरो, कभी ग़ालिब तो कभी कुछ और किताबें और वह इन किताबों के साथ एक रिश्ता बना लेती। कहकशां के परिवार में पैसे की कोई कमी न थी। और इसी संपन्नता में से वह अपनी सबसे प्यारी सहेली सुन्दरी देवी के दिल की अधिकतर इच्छाएं पूरी कर देती थीं।
“किसे घूर रही है” कहकशां ने कोहनी मारी
“किसी को भी तो नहीं”सुन्दरी देवी ने अपनी निगाहें वहां से हटा लीं
“वो अकरम भाई हैं। मेरे पड़ोस में रहते हैं। हमारे ममाजात भाई हैं। और बताऊँ, ये देखना बंद कर दे, आपा से इनकी बात चल रही है” कहकशां एक सांस में बोल गयी।
“चल हट! मैं किसी को नहीं देख रही थी। पर मामाजात भाई तो भाई ही हुए न! हमारे यहाँ तो ऐसा नहीं होता!”उसने थोडा आश्चर्य से कहा
“हां, यार पर हमारे यहाँ ये सब चलता है” कहकशां ने जबाव दिया
“मतलब बचपन से ही तय कि कहाँ जाना है और बाद में अगर प्यार हो जाए तो?” सुन्दरी देवी ने सवाल किया
“अरे यार, तुम्हारे यहाँ तो बचपन में तय नहीं होता, फिर भी क्या मन से हमसफर चुनने की आज़ादी मिलती है?” कहकशां ने सवाल दागा
“सही कह रही हो, हम यहाँ रहें या वहां होना तो वही है जो बड़े चाहेंगे!” उसने माला ली और रिक्शा करके घर आ गयी।
उस दिन बाज़ार में उसे अपना पीछा करती हुई दो आँखें लगी थीं। वह उन आँखों से पीछा नहीं छुड़ा पाई थी। ऐसा क्यों हो रहा था। घर आई। माँ ने पूछा भी “बहुत देर हो गयी, तबियत तो ठीक?”
वह हां बोलकर बिस्तर पर पसर गयी थी। उस दिन रोटी खाने भी नहीं उठी। खिड़की पर उसे दो आँखें अपने खुद को घूरती हुई लगीं। बहुत देर तक वह सकपकाती रहीं। कि क्या करें? उसका घर बहुत पुराना था। किसी न किसी कमरे की छत से पानी चूता ही रहता था। बाबा के पास जब पैसे होते तो उतनी जगह पन्नी पड़ जाती थी नहीं तो सब पूरी बरसात एक ऐसे कोने में पड़े रहते जहां पानी न आए। पर खिड़की से हरसिंगार की बहुत ही अच्छी खुशबू आती थी और बरसात के बाद उनके उस बड़े से टूटे पुराने घर में सोने में बहुत मजा आता था। जब हर खिड़की से छन छन कर हरसिंगार की खुशबू के साथ हवा आती थी। वह खिड़की खोल देती थीं, कभी कभी लालटेन जलाकर कहकशां से जो किताबें लातीं वह पढ़ने लगती थीं। उस दिन उसका मन उचाट था। लग रहा था जैसे बहुत कुछ खो आई हैं वह! पर क्या खोया था? और जो खोया था क्या उसे पाया जा सकता था?
अकरम है वह अकरम? कोई संतोष, विजय या सुन्दरदास नहीं! अकरम! और वह भी कहकशां की बहन का होने वाला दूल्हा!
अकरम नहीं, नहीं, मेरी पीड़ा और न बढ़ाओ! तुम चले जाओ!
तभी उसे लगा जैसे कोई खिड़की से झाँक रहा था। उनके मकान की बाउंड्री की दीवार बहुत ही छोटी थी, उसे आसानी से फ्लांगा जा सकता था। कोई कठिन न था, उसे कूदना। मगर मैदान मे बहुत झाड़ झंकार थी, जो बरसात में और भी बढ़ जाती थी। दीवाली पर बाबा कटाते थे। कल आएगा माली काटने। आज रात में कौन है। बहुत ही हिम्मत करके वह उठीं। खिड़की पर गईं।
अरे, ये तो वाकई में कोई है? कोई है जो उसे घूर रहा है! वह डर गईं और एक बार तो सोचा कि माँ को बुला लें। पर वह लालटेन लेकर खुद ही खिड़की पर गईं। सुबह की मासूम आँखें बाज़ार से घर तक आ गईं थीं। वह उसे उसी तरह घूर रही थीं जैसे वह सुबह घूर रही थीं। उन आँखों में एक याचना सी थी। बहुत कुछ था
“अरे कौन है? कौन घुस आओ हैं बँगला में” माँ चीखती हुई आईं
“कोई नहीं है माँ!” वह डर गईं,
“कैसे नहीं है कोई! अरे, अभी आबाज़ सुनी हमने!”
“न माँ! सच में कोई नहीं है!” वह उन आँखों की मासूमियत को बचाने में लग गयी थीं, क्योंकि उसे पता था अगर वह पकड़ में आ गया तो क्या होगा?
अकरम था वह! और अकरम से प्यार नहीं हो सकता! अकरम से तो दोस्ती भी नहीं हो सकती। माँ को तो कहकशां से भी दोस्ती पसंद नहीं थी।
“अरे बे लोग तो अपईं बहन्न को न छोड़ें, तो पराई औरतन की तो बात ही का” माँ भुनभुनाती थी। पर पिता जी इस मामले में खुले विचारों के थे और कहकशां के आने या उसके उनके घर जाने पर कोई रोक न थी।
पर उस रात गजब हो जाता। उस रात अगर वह आँखें कोई देख लेता तो दोनों ही घरों में न जाने कितने दिनों तक चूल्हा न जलता। सुन्दरी देवी का अकरम के साथ क्या मेल? सुन्दरी देवी को इन आँखों को अनदेखा करना ही था। तब तक बाउंड्री में लोग पहुँच गए थे।सुन्दरी देवी एक तरफ खडी खड़ी मुंह मुंह में न जाने कितने मन्त्र पढ़ गयी थीं। उसे पढ़ना ही था। उसे उन आँखों की मासूमियत को बरक़रार रखना ही था। उसे जीने देना था उन आँखों को!
अगले दिन उसका सर भारी था, उसका मन तो था कि न जाएं कहीं पर या कुछ न करें पर दीवाली पर पचासों काम होते हैं और उनके पुराने घर में तो सफाई में ही पूरा एक हफ्ता लगता था।
उस दिन अपने कमरे की सफाई करते हुए एक बोरा कूड़ा इकट्ठा करते करते वह पिछले दिन की उन आँखों को भूल गयी थीं। उसे ध्यान न रहा था कि कल रात अँधेरे में कोई दो आँखें उनके घर तक आई थीं। उसे पता था कि इन आँखों को देखकर कुछ होना ही नहीं है तो फालतू में याद करने से क्या फायदा!
वह बोर की मिट्टी फेंकने जा ही रही थीं कि चौंक गईं। अकरम मियाँ तो उनके पोर्टको में पड़े कोच में बैठे थे। गुलमोहर के पेड़ से उनपर पत्तियों की बरसात हो रही थी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उन पर पेड़ जानबूझ कर पत्तियों की बरसात कर एक शरारत कर रहा है। उनके हाथ से बोरा गिरते गिरते बचा!
“अरे सुंदरिया!” बाबा ने आवाज़ लगाते हुए कहा
“जरा दो गिलास पानी तो लाना”
“जी पिताजी” और वह बोरा जमीन पर रखकर भागी थी।
रसोई तक पहुँचते पहुँचते उसे ऐसा लगा जैसे वह न जाने कितनी दूरी तय करके आई है। वह पसीने में नहा गयी थी।
बहुत ही डरते डरते वह पहुँची थीं, बाहर तक! बहुत हिम्मत कर! वह उन आँखों का सामना नहीं करना चाहती थीं। पर जब तक वह पहुँची तब तक बाबा
अकेले थे।
अकरम जा चुके थे। उसे ऐसा लगा जैसे मानो वह उसे ही देखने आए थे।
“अरे, उसके पैरों में चोट थी, चल नहीं पा रहा था तो पांच मिनट बैठ गया था। अपनी कहकशां का भाई है!” बाबा ने कहा था।
वह फिर से उन आँखों को अपने ऊपर महसूस कर रही थी।
जो गिलास अकरम के लिए था, वह उसने पी लिया। उसे ऐसा लगा जैसे उसने अकरम को ही छू लिया हो, अकरम को ही ओढ़ लिया हो।
उसमें हिम्मत नहीं बच रही थी अपने कमरे तक जाने की! पर जाना तो था ही।
दीवाली बीत गयी। वह उस जोश के साथ दीवाली न मना पाई, हर समय उसे दो आँखें घूरती रहीं। माँ ने पूछा, वह कुछ न बोलीं।
उसका मन हो रहा था कि इस समय बारिश हो जाए और वह खूब भीगें! उसे भीगना था। अकरम के साथ, उनके शरीर पर उस दिन बाज़ार में जो आँखें चिपकी थी, वह उसे छुटा कर उनके साथ भीगना चाहती थी। पर बेमौसम बरसात होती है क्या?
कितना प्यारा लिखा गया वह गाने लगी थीं
“घटा सावन की कारी जब पडी झूम, मिरे जी बीच बिरहा आ करे धूम,
अकारत जाए है मेरी जवानी, पिया परदेस, ये क्या जिंदगानी”
पर अकरम पिया नहीं हो सकता था! अकरम की आँखों को यूहीं खुरच कर मिटा देना था।
पर क्या अकरम के अलावा कोई और नहीं हो सकता था? बाबा बहुत उदार विचारों के थे, वह कहकशां के घर जाने पर कोई रोक नहीं लगाते थे। पर क्या वह अकरम को अपना दामाद मानेंगे?
नहीं, नहीं अकरम, तुमने क्यों देखा?
दीवाली के बाद वह बहुत ही अनमने मन से कॉलेज जाने लगीं।
कहकशां भी आने लगी थी। उस दिन वह उसे कुछ उखड़ी उखड़ी लगी। मगर कुछ कहाँ नहीं था। दोनों ही किताब लेकर बैठ गईं थीं अपनी मनपसन्द जगह पर, जहां वह अधलेटी भी हो सकती थीं। तभी शोर मचा था और कहीं से अकरम मियाँ प्रकट हो गए थे। ओह, वह जिन आँखों को भुलाने में शिद्दत से लगी थी, वह तो सामने आ गयी थीं।
उन दोनों को सामने देखकर वह भी सकपका गए थे।
“आप लोग घर जाएं”
अकरम ने इधर उधर झांकते हुए कहा। अकरम मियाँ ने सुन्दरी देवी के दुपट्टे को देखा। शायद वह अपनी आँखें वही चिपकाना चाह रहे थे। इधर सुन्दरी देवी का दुपट्टा कहीं चिपका जा रहा था। सुन्दरी देवी अपना दुपट्टा सम्हालते हुए कुछ सोच रही थीं। सुन्दरी देवी का दुपट्टा भी शायद यही सोच रहा था कि अकरम ही क्यों? अकरम की ही आँखें क्यों चुभ गयी हैं?
अकरम की आँखें क्यों टिक गयी हैं?
इधर कहकशां ने उसे टोका
“क्या हुआ घर नहीं जाना?”
“हां जाना तो है” उसने किताबें समेटीं
“चलो फिर!” कहकशां ने अकरम के चेहरे पर उसकी चिपकी हुई आँखें देखकर उसे घूर कर कहा
सुन्दरी देवी इशारा समझ गयी थीं। खैर इशारा तो वह सबका समझ जाती थीं। बहुत हुआ। अकरम की आँखें फिर से उसका पीछा करने लगी थीं।
घर आकर फिर से वही हाल हो गया। माँ ने खाने का पूछा और आज फिर उसने मना कर दिया। माँ पिता जी आजकल बहुत परेशान थे। बाबा के मुक़दमे का कोई नतीजा नहीं आ पा रहा था और माँ के गहनों से कब तक घर चलता। बाबा समय बिताने के लिए कुछ टाइपिंग का काम करने लगे थे, पर सर पर जवान बेटी का बोझ था, जो उस मुक़दमे से अधिक दुखदाई था।
काम निपटाकर वह सोने गईं तो माँ बाबा की खुसुर फुसुर से ये तो पता चल गया कि लड़का देखा जा रहा है, पर क्या करता है? कैसा परिवार है? ये सब ज्यादा नहीं पता चल पाया। वैसे भी भिखारी के पास कोई विकल्प नहीं होता है। वह क्या करेगा? ऐसा ही कुछ सुन्दरी देवी के साथ था। बाबा के पास ज्यादा पैसे थे नहीं जिससे वह खरीद सकते दुल्हा और जिसकी आँखें चिपक रही थीं, जो शायद अपनी तरफ बुला रही थीं, उसकी तरफ वह जा नहीं सकती थीं।
सुन्दरी देवी ने करवट ली। खिड़की पर नज़र पड़ते ही वह चीख पड़ीं। चितेरे की आँखें फिर से वहीं थीं। वह आँखें वहीं टिकी थीं। ये आँखें पीछा क्यों नहीं छोड़ रहीं? आखिर ये आँखें चाहती क्या थीं? इन आँखों को पता था कि वह इस खिड़की की सीमा पार नहीं कर सकती थीं, फिर भी क्यों बार बार वह आ रही थीं। आज उसे लगा कि बात करें इन आँखों से! वह उठीं, खिड़की तक गईं। खिड़की के पार खड़ी परछाईं को खुद के अन्दर महसूस किया और फिर चाहा कि वह उसमें भीगी चांदनी को ओढ़ लें, मगर वह ऐसा कर न सकीं। उसने चाहा कि बारिश हो जाए, और वह उन आँखों के साथ भीग जाएं, पर ऐसा भी नहीं हो सका।
माँ बाबा बगल वाले कमरे में बैठे बैठे उनके दहेज़ का इंतजाम कर रहे थे और बुन रहे थे सपने। वह इन आँखों के साथ सोने और जागने का ख्वाब देख रही थीं। जबकि वह खूब जानती थीं कि वे चल नहीं सकते हैं साथ फिर भी वह चलना चाहती थीं। उधर दहेज़ का सामान बुना जा रहा था इधर अनदेखे ख्वाब बुने जा रहे थे। उसने थाम लिया खिड़की के इस पार से उन आँखों का हाथ! उस हाथ ने उसकी हथेलियों में कुछ चांदनी भरने की कोशिश की, मगर भर न सका। वह पसीजी हुई हथेली से फिसल गयी, हालांकि वह जानती थीं कि उसे पसीजना नहीं था, फिर भी वह पसीज गईं। उन पसीजी हथेलियों में बहुत कुछ बह रहा था।
उसने फुसफुसाते हुए कहा “तुम अकरम क्यों हो?”
उस हाथ ने अपनी पकड़ और कस ली और कोशिश की चांदनी को कुछ और देर के लिए थामे रहे। पर ऐसा मुमकिन न था। उस रात खिड़की पर एक पकड़ बन गयी, एक छाप बन गयी। मगर उस छाप में सुन्दरी देवी ने खुसरो और ग़ालिब समेट लिए। उस रात वह दीवानी बन गईं, पर दीवानगी का कोई मतलब नहीं था। उस रात दो आँखें और उन दो हाथों ने उसे हमेशा के लिए दीवाना कर दिया और वह खुद से बेगानी हो गईं। उस रात उसे पता चला कि सावित्री ने सत्यवान में क्या देखा होगा? पर सावित्री तो अपने सत्यवान को वापस ले आई थीं, सुन्दरी देवी ऐसा नहीं कर सकती थीं! सत्यवान को यमराज ले गए थे, मगर उनके सत्यवान को तो समाज उनसे छीन रहा था, शायद यमराज से ज्यादा दुष्ट समाज होता है।
उसे बहुत गुस्सा आ रहा था, उस रात वह गाती बैठी रह गयी थीं “छाप तिलक सब छीन ली रे तोसा नैना मिलाय के”। उस रात खुसरो बहुत याद आए उसे। खुसरो उनके आंसुओं में बह कर गाते रहे। वह भीगती रहीं और भीगते हुए उस दूसरी हथेली की पसीजी बूंदों को चुपके से मांग में भर दिया।
वे हाथ समझ गए जैसे हर बात!
“अरे कौन है?”
माँ की आवाज़ आई। वह खिड़की पर खड़ी खड़ी पसीने को सहेज और सम्हाल ही रही थी कि माँ आ गयी। आज माँ को कोई भ्रम नहीं हुआ।
“कौन है” ये बाबा की आवाज़ आई
“कोई नहीं, बिलौटा था, भगा दिया” माँ ने कहा
उसका पसीना पोंछते हुए बस इतना कहा “तुम्हारा ब्याह तय कर आए है, तुम्हारे पिताजी। परसों तुम्हें देखकर बे लोग बात पक्की कर जइयें। अब कॉलेज जानो बंद”
माँ की बात सुनकर हाथों का सहेजा पसीना मेहंदी बन गया और हमेशा के लिए उनके पास ही रह गया।
उसकी शादी में कहकशां नहीं आई थी, पता नहीं माँ ने नहीं बुलाया या फिर?
वह उस रात पसीने की मेहंदी रचाकर तिवारी परिवार की बहू बनकर इस मकान में आ गईं थीं।
फेरे हुए, विदा हुई। सब कुछ हुआ। वह एक कठपुतली की तरह सब करती रहीं।
क्या करना था? छाप तिलक तो वह छोड़ आईं थीं, उन आँखों के लिए।
उसकी हथेलियों में अभी तक उन हाथों का पसीजापन था।
कंगन खुलने के बाद, रात में सब कुछ धुला, काजल धुला, रंग धुला पर उसका पसीजापन न धुल सका।
वह सिमटा रहा। वह सिमटा रहा, जब जब काजल धुलता तब तब उसकी हथेलियों में कच्ची मेहंदी और पक्की हो जाती।
और काली हो जाती, वह हथेली की काली होती मेहंदी को सबसे छिपाकर जीती रहीं।
शादी के बाद, कहकशां की कोई खबर नहीं थी।
वह अपनी शादी के बाद मायके गईं, तो कहकशां के घर जाने के लिए माँ ने मना कर दिया। अब वह एक कुलीन घराने की बहू थी, जो कैसे जा सकती थी ऐसे ही किसी के यहाँ!
उसे बहुत लम्हों का हिसाब करना था।
मगर उस रात फिर से खिड़की में कोई आया।
वह रात सिहरने की रात थी। वह रात अपने आगोश में चांदनी नहीं लेकर आई थी! वह रात अपने साथ शायद तबाही लेकर आई थी।
उस रात जब वह सहेज रही थीं उन हथेलियों को, तभी माँ कब आईं, उसे पता ही न चला। कब माँ ने देख लिया, उसे पता ही न चला।
कब माँ ने देख लिया कि उसने हथेली के पसीने को अपनी मांग में संजो लिया, उसे पता ही न चला।
वह खिड़की के उस पार खड़े तिलक छीनने वाले को देखकर ही शायद तृप्त हो रही थीं, वह लम्हों में भीग रही थीं। माँ आ गईं। माँ का आना, उन लम्हों के लिए आघात साबित हुआ था। माँ समझ गयी सब कुछ।
वह ऑंखें माँ को भी कहीं अन्दर तक खोखला कर गईं।
माँ ने छुआ तो उसने बस इतना ही कहा “माँ, कभी कभी सत्यवान को यमराज नहीं, ये समाज छीन लेता है। और समाज से तो सावित्री भी नहीं लड़ सकती। क्या फर्क पड़ता है सत्यवान अकरम की शक्ल में है या किसी तिवारी की शक्ल में?”
माँ के सामने अब सब कुछ साफ था। और साफ था कि करना क्या है?
उसे अगले ही दिन ससुराल भेज दिया गया, तिवारी निवास में। और अब वह सफेद जोड़े में अंतिम सफर पर निकलने तक उसका निवास था। आज तीन साल हो गए थे उनके ब्याह को! हर बार वटअमावस्या पर उसकी सास उसे व्रत कराती थीं। हर बार वह अपने सत्यवान के लिए फिर से रख लेती थीं व्रत! हर बार व्रत रखते समय वह अपनी हथेलियों पर चुपके से अ लिखवा लेतीं।
हर बार वह अपने माथे के तिलक को और गाढा कर लेतीं।
मगर इन तीन सालों में माँ और बाबा ने उसे मायके न बुलाया था। कभी मुक़दमे का तो कभी तबियत का बहाना कर दिया। इस बार तो एक्सीडेंट में दोनों के अचानक गुजर जाने पर वह आईं थीं। और बैठ गईं थीं इस टूटे घर के सामने!
वह घर के अन्दर घुसने की हिम्मत नहीं कर पा रही थीं, कैसा छोड़कर गईं थीं और कैसा ढेर मिल रहा है। उस घर में से चुपके से खुसरो झाँक रहे हैं, कभी मीर झाँक रहे हैं तो कभी उर्दू उसे बुला रही है। उस घर का हर कतरा उसे परेशान कर रहा है। माँ बाबा के अंतिम संस्कार के बाद इस घर में आने का कोई मतलब ही नहीं था। चाचा वगैर सब यज्ञ आदि करेंगे। वह क्या करेगी? वह आज ही तिवारी निवास चली जाएगी। जो उसका घर है।
वह घर के बाहर बैठी बिलख रही है।
चाचा लोग इस घर को बेचकर कर्जा पटाकर, रकम उसे दे देंगे, ऐसा तय हुआ है।
आज वह खिड़की वाकई पराई हो गयी जिस खिड़की से कभी वो दो आँखें झांका करती थीं।
वह टूटी खिड़की के किवाड़ को पकड़ कर खड़ी हैं, और उनके सामने जिगर बरेलवी, इकबाल वर्मा के लिखे लफ्ज़ हवा में उड़ रहे हैं। सच में आज सब कुछ छूट गया। वो हरसिंगार भी सूख चला था। ऐसा लग रहा था जैसे वाकई उनके जाने के बाद इस घर के भाग्य चले गए। पर वह तो सब कुछ यहीं छोड़ गयी थी। अपने सबसे अनमोल लम्हे।
अब उसे समेटना मुमकिन न था, और उसने सोच लिया था, सब कुछ छोड़कर चली जाएंगी। आज भी हथेली पसीज रही थीं, उस खिड़की पर। उस खिड़की पर दो हाथ ही थे, और वह उसे महसूस कर रही थीं। आज सोच रहीं थीं कि उधार के पसीजेपन को भूल जाएं, उसने चुपके से खिड़की के किवाड़ों से और लोहे की टूटी रॉड से केवल उतना हिस्सा उठाया जिसपर उन हाथों की छाप थी, उस किवाड़ को थैले में डाला जिस पर वह दो आँखें टिक जाती थीं। और हमेशा के लिए सहेजने के लिए धर लिया।
जिगर बरेलवी के कागज़ इकट्ठा कर उसे जलाते हुए कहा “तुमने सावित्री की कहानी तो उर्दू में कह दी, मगर यह भी कह देते कि सत्यवान अब मन से नहीं मिलते हैं। सत्यवान के लिए अब धर्म की खिड़की पार करनी होती है। सब झूठे हो……………………….”
उनके हाथ बढ़े किवाड़ जलाने के लिए, पर एकदम से कांपे और थैले में समेट लिया फिर से उस किवाड़ को……………….
उसकी हथेलियों में उस पसीजेपन को वह ज़िंदा रखेगी.
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परिचय : लेखिका एवं अनुवादक
कथादेश, परिकथा, लोकमत, जनसत्ता, जानकीपुल, यथावत समेत पत्रिकाओं में कहानियां व समीक्षा प्रकाशित
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका रस-प्रसंग में लेखों का अनुवाद
हिंदी अकादमी दिल्ली की ओर से आशुलेखन प्रतियोगिता में पुरस्कृत
मो. 9810499064
email : sonalitranslators@gmail.com

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