खास कलम : अंजना बाजपेयी

1
तेजाब

कुछ आवाजें उठीं
कुछ कलम से दर्द बहा
कुछ लोगों के मन पिघल गये ..

एक माँ की आँखों से आँसू बहते रहे
आग भरी थी आँखों में
आज ईश्वर भी कहीं छुप गये
इन आँखों के सामने आते तो जलकर भस्म हो जाते..

इन आँखों से गिरते आँसू तेजाब बनते रहे
अंतर में ज्वालामुखी जो उफन रहा था
न्याय की देहरी पर अन्याय होता रहा
ईश्वर न जाने कहाँ सोता रहा …

संवेदनाओं के छीटें से कुछ अखबार रंगे
फिर शांति, तूफान से पहले जैसी
कुछ दिन बाद फिर …कोई बच्ची..
फिर किसी माँ की गोद…
फिर मारा जायेगा कोई पिता

गहरी नींद आ गई सभी को
पर वो माँ जागती रही, रोती रही
अपनी आँखों से बहते तेजाब में जलती रही
पल-पल मरती रही, पल-पल गलती रही

2
नारी

नारी न ही चिड़िया, न ही नाजुक फूल है
वक्त आने पर दिखा देगी, वह दुर्गा ही नहीं, शिव का त्रिशूल है
नारी सिर्फ आश्रिता नहीं, मुश्किलों में कठोरता है
दुखों में सबंल हैं ,परिवार की दृढ़ता है
सरस्वती का रूप बन बच्चे को देती ज्ञान है
पिता का गर्व है, पति का सम्मान हैं
ममता की छांव हैं, बच्चे का अभिमान है

नारी के बिना अधूरा इतिहास है
मिटा दे जो तम को, जीवन का वह प्रकाश है.

3
कभी खोजा करती थी तुमको

कभी खोजा करती थी तुमको
बहुत उत्सुकता से निहारती रहती थी तुम्हें
हाँ तुुम्हे, अपनी कल्पना में …

आज खोजती नहीं, क्योंकि जानती हूँ
तुम बहुत करीब हो
मुझमें ही तो हो ना तुम …

तुम मुझमें हो, तुम सबमें हो
सबको मालूम है
पर फिर भी सब तुम्हे बाहर खोजते
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे व गिरजाघरों में ..

तुम सबके मन की प्रार्थनायें सुन लेते हो न
सबके मन में जो रहते
पर क्या तुम खुश हो ? कहो ना !

तकलीफ होती होगी तुम्हे न ?
जब तुम्हारे भक्त एक दूसरे को मारते होगें
तुम्हे चोट लगती होगी न

और जब दैवीय रूप का अपमान होता है
तब आप सांस भी ना पाते होगें न ?
पहले कन्या खिलाते प्रणाम करते सब
फिर वही नरभक्षी उन्ही कन्याओं की बलि ले लेते…

इन राक्षसों के मन में आप कैसे रहते होगें
आप नन्ही बच्चियों की
मुस्कान में रहने वाले
उनकी आँसूओं में बह जाते होगे न?

बाेलो मेरे ईश्वर, बोलो
तुम क्यों चुप हो

4
पापा आप मुझे, कितना प्यार करते
बिन कहे मन की, हर बात जान लेते
बिन सुने मेरी हर बात मान लेते …
जब कभी गिर जाउँ खेलते-खेलते
हिन्दुस्तान की शेरनी मुझे बना देते…..
आँसू मेरी आँखों में ही मुस्कुराने लगते ,
पापा आप मुझे इतना हँसा देते …..
अपनी हथेलियों को,आपकी हथेली पर रखकर
जब पूछती, पापा मै कब बड़ी होउंगी
आप मुस्कुराके कहते, लो तुम बड़ी हो गई
और हवा में मुझको ऊँचा उठा लेते ….
कभी एक पल को जो उदास हो जाउँ ,
पापा आप कितने परेशान हो जाते ,
बिन कहे सब कुछ ला देते ,
खिलौनों के, तोहफों की अंबार लगा देते ..
पापा आप मुझे , राजकुमारी बना रखते
पापा आप मुझे कितना प्यार करते …….
पापा, अब मुझे बड़ा नहीं रहना,
काश,आप फिर मुझे बच्ची बना लेते
देखो ना,आपके बिना रहती हूँ कितनी उदास
आप अभी आके, मुझे क्यूँ नहीं हँसा देते ….
आपको आपकी बेटी के पास जाना हैं
उसे आपसे मिलने का, इंतजार हैं
आपकी बेटी को, आपसे बहुत प्यार है
ये बात भगवान को आप, समझा क्यूँ नहीं देते …….

5
दीप जलाये रखती हूँ

कुछ लम्हे सुनहरे से, कुछ पलकों में छुपी नमी से,
कुछ लफ्ज बेमानी से, कुछ राहत के, कुछ तूफानी से ….
टुकड़े अधूरे ख्वाबों के, कुछ दर्द भीगे-भीगे से
यादें बहुत से अपनों की, शरारतों के किस्से खजानों से….
जोड़ घटाना करती हूँ ,पाने खोने का हिसाब रखती हूँ
लगते है ये बहुत ही अपनों से ,हमेशा संभाले रखती हूँ….
देवालय के फूलों से, जीवन के बहुमूल्य धरोहर से
स्नेह दुलार देते अपनों के आशीष संभाले रखती हूँ
समय की बहती धारा में खो गये
उन हाथों का स्पर्श मस्तक पर महसूस करती हूँ…

स्नेह की बगिया में फूलों को जगाये रखती हूँ
कुछ बिन माँ के बच्चों से, कुछ जख्मी चिड़िया
गिलहरी से प्रीत बनाये रहती हूँ ….

कुछ बेगानों में अपनों से, कुछ अकेले बुजुर्गों में
अपनों को खोजती रहती हूँ , मुस्कान बांटती रहती हूँ
आशाओं के दीप जलाये रखती हूँ…..
………………………………………………………
परिचय : लेखिका अंजना बाजपेयी कविताएं व लघुकथा लिखती हैं. कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित.
लेखन के क्षेत्र में कई संस्थाओं से सम्मानित
संपर्क – जगदलपुर, छत्तीसगढ़

Related posts

Leave a Comment