नज़्म – रेप
शेख फ़रमाते हैं
डार्विन झूठा था
इंसान कब बंदर था?
इंसान तो ऐसा कभी भी नहीं था
शेख फ़रमाते हैं
लटकना, झपटना,कभी मुँह चिढाना
ये आदत हमारी कभी भी नहीं थी
मेरी अदाओं में ये सब नहीं थे
किताबें तो कहतीं हैं हम बंदर नहीं थे
माज़ी के जब भी झरोखे से देखो
तारीख़ के जब भी अवराक पलटो
अपने ही घर में ज़रा पीछे जाकर
मुहल्लों की गलियों में कुछ देर रूककर
जो शहरों और मुल्कों की सरहद पर जाओ
ज़रा देर रूककर कभी सोच लो तो
खुद अपने से शर्मिंदा होते रहोगे
किताबों की बातों पर सोचा करोगे
अकेले में खुद से ये कहते रहोगे
लटकना, झपटना, कभी मुँह चिढाना
इंसां की आदत पुरानी रही है
अगर शेख़ कुछ कह रहे हैं तो कह लें
मासूमों पर हम झपटते रहेंगे
शरीफों को हम मुँह चिढाते रहेंगे
हम जालिम हैं ज़ुल्मत बढ़ाते रहेंगे
अगर शेख कुछ कहते हैं तो वो कह लें
हम डार्विन को सच साबित करके रहेंगे
– अफरोज आलम- (जिद्दाह- सउदी अरब)

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