खास कलम :: कुमारी लता प्रासर

1

कह दे कोई मौसम से

हम प्रेम की वफ़ा लिखते हैं
आता जाता रहे वह
यूं हीं मेरी जिंदगी में
मोहब्बत की कलम से
हम सहीफा लिखते हैं!

2
सारे गिले-शिकवे भुलाकर हवा ने
मौसम का एहतराम किया
मौसम को भी जाने क्या इलहाम हुआ!

3
गुजर किसका हुआ ज़मानें में
प्यार के बगैर
कांटे भी कर लेता है फूलों संग सैर!

4
उन आंसुओं को कौन गिनेगा
जो बिना किसी पत्थर से टकराये गिरते हैं
उसके लिए तेरा उस पर हंसना ही काफी है!

चलो क्षितिज के पार चलते हैं
अपने सपनों का व्यापार करते हैं

मैं खुशियों की बरसात कर दूं
तू मेरे नयनों में सागर भर देना
हम मिलकर प्रकृति रचते हैं
चलो क्षितिज के पार चलते हैं

मेरे हाथों में तुम्हारा हाथ रहे
अनंत तक तुम्हारा साथ रहे
ऐसे ही कुछ किस्से गढ़ते हैं
चलो क्षितिज के पार चलते हैं

तुम्हारे आंखों में हम हों न हों
मेरी आंखों में तुम्हीं बस्ते हो
कहो सपनों के संसार बुनते हैं
चलो क्षितिज के पार चलते हैं

हरियाली संग मिट्टी पुकार रही है
तेरे मेरे भीतर पैर पसार रही है
आओ मिलकर इन्हें संवारते हैं
चलो क्षितिज के पार चलते हैं

उड़ान भर लें आसमान तक हम
कभी चांद कभी मंगल चलें हम
दूरियां अब आगोश में भरते हैं
चलो क्षितिज के पार चलते हैं!

5
मैं जब जब मुस्कुराई तुम्हारी याद में
तुम्हें हिचकियां जरूर आई होंगी
अपनी मोहब्बत पर भरोसा है मुझे
तुझसे भी यही उम्मीद रखती हूं
पैगाम हवाएं लेकर गईं हैं अभी-अभी
उम्मीद है तुम तक पहुंचाईं होंगी
हां मैं जब जब मुस्कुराई तुम्हारी याद में
तुम्हें हिचकियां जरूर आई होंगी

आसमां के सितारे मेरे खाब बुनते हैं
हौसलों की उड़ान भर लूं जरा
बस चुप न रहना कुछ कह देना
सितारों ने अपनी चमक तुम्हें दिखलाई होंगी
हां मैं जब जब मुस्कुराई तुम्हारी याद में
तुम्हें हिचकियां जरूर आई होंगी

नाज़ुक बहुत है मोहब्बत की डालियां
हवा के आने से हिचकोले खातीं हैं
विश्वास के दरख़्त पर झूले डालकर
नर्म पत्तियां थपकाकर तुम्हें सुलाई होंगी
हां मैं जब जब मुस्कुराई तुम्हारी याद में
तुम्हें हिचकियां जरूर आई होंगी

गीत समंदर सा मचलता है मेरे अंदर
तेरे एहसास से कभी बहकता है कभी सिमटता है
कुछ स्वर छुकर तुम्हें भी लहराईं होंगी
मैं जब जब मुस्कुराई तुम्हारी याद में
तुम्हें हिचकियां जरूर आई होंगी

अश्क से शब्द और शब्द से अश्क बनते बिगड़ते रहते हैं
इश्क क्या है कोई तो बता दे मुझे
मेरी याद में तुम्हारी भी आंसू छलछलाई होंगी
हां मैं जब जब मुस्कुराई तुम्हारी याद में
तुम्हें हिचकियां जरूर आई होंगी

आंखें खुली हैं तो क्या तेरे बिना अंधेरा ही लगता है
दर्पण सा मुखड़ा तेरा सामने हो तो खुद को देखूं
तरानों में इबादत में खुशबू में पहलू में
इन एहसासों ने मेरी तस्वीर तुम्हें भी दिखाई होंगी
तड़प यूं ही जिंदा रहे वक्त ने यही सिखलाई होंगी
हां मैं जब जब मुस्कुराई तुम्हारी याद में
तुम्हें हिचकियां जरूर आई होंगी!
………………………………………………………….
परिचय : कुमारी लता प्रासर कविता के क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम है. इनकी कई कविताएं व काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है.
पता- निर्मला कुंज,अशोक नगर, रोड नंबर-1, कंकड़बाग, पटना-20,
मो.7277965160

 

Related posts

Leave a Comment