खास कलम : गरिमा सक्सेना

1
इस सूखे में बीज न पनपे
फिर जीवन से ठना युद्ध है

पिॆछली बार मरा था रामू
हल्कू भी झूला फंदे पर
क्या करता इक तो भूखा था
दूजा कर्जा भी था ऊपर
घायल कंधे, मन है व्याकुल
स्वप्न पराजित, समय क्रुद्ध है

सुता किसी की व्याह योग्य है
कहीं बीज का कर्जा भारी
जुआ किसानी हुआ गाँव में
मदद नहीं कोई सरकारी
चिंताओं, विपदाओं का पथ
हुआ कभी भी नहीं रुद्ध है

भूखे बच्चे व्याकुल दिखते
आगे दिखता है अँधियारा
सोच न पाता गलत क्या सही
जब मिलता न कहीं सहारा
ऐसे में जीवन अपना ही
लगता जैसे की विरुद्ध है

2
वृद्धाश्रम में माँ बेटे की
राह देखती

है सूनी आँखों में धुँधली-सी
अभिलाषा
पुत्र व्यस्त हैं, कहकर देती
रोज दिलासा
नहीं मानती बिसराएँगे
नहीं बिसरती

नहीं सीख पाई है मतलब
खुद से रखना
जिसे जना है, उसे समझती
केवल अपना
हुई अनुपयोगी ये बातें नहीं
समझती

अँगुल-अँगुल सींचा जिसने
दूध पिलाकर
उसे कहाँ माँ कहते हैं बेटे
अब आकर
कँपती हाथें, रोज पकाती, बरतन
मँजती

3
नए दौर में नए तरह से
बदल रहा है गाँव हमारा

झाल-चाट को छोड़ सभी अब
पिजा-बरगर लगे हैं खाने
लोकगीत की धुन बिसराई
लगे गूँजने फिल्मी गाने
सेंडिल, बूट पहनने वाला
हुआ आधुनिक पाँव हमारा

छप्पर नहीं बचे हैं और न
गौरैयों का ठोर-ठिकाना
धीरे-धीरे जाल बिछाकर
शहर बुन रहा ताना-बाना
टावर, चिमनी खड़े हो गए
खोया पीपल छाँव हमारा

सूख रहे तुलसी के पौधे
बने सजावट गमले घर में
किट्टी पार्टी की रौनक है
काम बहुत है अब दफ्तर में
जहाँ कभी मिलते थे सब जन
नहीं रहा वह ठाँव हमारा

4
पतझर-सा यह जीवन जो था
शांत, दुखद, बेहाल
उसमें तुम फागुन-सा आकर
प्रिय मल गए गुलाल

गम को निर्वासित कर तुमने
मेरा मोल बताया
जो भी था अव्यक्त उसे
अभिव्यक्त किया समझाया
उत्तर तुम हो और तुम्हारे
बिन मैं सिर्फ सवाल

आज प्यार का स्वाद मिला है
जिह्वा फिसल रही है
थिरक रहे अंतर के घुँघरू,
चाहत मचल रही है
चुप थे जो मधु-वचन हृदय के
हुए पुन: वाचाल

कहाँ बीतते थे दिन पल में,
युग जैसे दिन थे वो
नहीं घड़ी की प्रिय वो सुइयाँ
चुभते से पिन थे वो
आए हो तुम तो लगता है
पल-पल रखूँ सँभाल

5
फूट आए नए कोंपल
यह ऋतु मधुमास की

छा गई है
फूल, फल आनंद की खुशबू
गुनगुनाती धूप भी अब
कर रही जादू
कूकने फिर लगी कोयल
यह ऋतु मधुमास की

खेत में फिर
दलहनी की फसल लहराई
और झूमे पात-डाली
मस्त पुरवाई
हर तरफ हो रही हलचल
यह ऋतु मधुमास की

महक महुए की
करें मन को नशीला-सा
हो गया है
प्रेममय मौसम हठीला सा
प्रिय-मिलन को हृदय विह्वल
यह ऋतु मधुमास की

6
मुनिया अक्सर अपने में ही
रहती है कुछ खोई-खोई
जन्म लिया तो दुख छाया था
बोझ सदृश लगता था होना
विदा करो जल्दी अब इसको
कई वर्षों से है यह रोना
कब की खूंटे से बँध जाती
मिलता नहीं मेल है कोई

पढ़-लिख कर ज्यादा क्या करना
दादी ने शिक्षा को रोका
बाहर आया-जाया मत कर
माँ ने बार-बार है टोका
भैया को आजादी मिलती
सगी नहीं क्या? कह-कह रोई

करछी ,कलछुल ,चौका-बरतन
इन सबसे ही नाता जोड़ा
मुनिया ने अपने सपनों को
बिस्तर से उठते ही छोड़ा
सोंच रही है सुता भाग्य में
क्यों लिक्खी है सिर्फ रसोई
………………………………………..
परिचय : गरिमा सक्सेना
शिक्षा- अभियांत्रिकी
कार्यक्षेत्र- गृहणी, स्वतंत्र लेखन
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं साझा संकलनों में गीत एवं कविताएँ प्रकाशित
कई संस्थाओं की ओर से सम्मानित
इमेल:- garimasaxena1990@gmail.com

Related posts

Leave a Comment