खास कलम :: ड़ा. अँजुम बाराबन्कवी

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जब चमकने लगा क़िस्मत का सितारा मेरा

खुद बखुद बनने लगे लोग सहारा मेरा

 

आप को चाँद सितारों के सलाम आएंगे

आप समझें तो किसी रोज़ इशारा मेरा

 

जानें किस किस की दुआएँ मेरे काम आई हैं

वर्ना तक़दिर में लिख्खा था, ख़सारा मेरा

 

अब तो वह भी मेरे कपड़ो में शिकन ढुंढता है

जिस ने पहना है कई साल उतारा मेरा

 

तुम भी गढ़ने लगे सैराबी के झूठे किस्से

तिश्नगी पर तो अभी है इज़ारा  मेरा

 

कुछ नशा कम हो अमीरी का तो आकर देखो

कैसा होता है ग़रीबी में गुज़ारा मेरा

 

2

हर तरफ धूम है ल्फजो के बदौलत मेरी

कुछ बड़े लोग भी करने लगे इज्ज़त मेरी

 

हौसला मेरा बढाने लगी वहशत मेरी

अब तो मिल जाएगी खोई हुई  जन्नत मेरी

 

एक काग़ज़ पे मेरा नाम पत्ता भी लिख लो

जाने किस मोड़ पे पड़ जाए जरूरत मेरी

 

नूर हुँ नूर मुहब्बत के खरे रंगौ का

दूर तक फैली है दुनिया में हुकूमत मेरी

 

दिन तो कट जाता है आबादी के वीराने में

शाम के बाद उल्झती है तबीय़त मेरी

 

मैं तो मामुली सा मिट्टी का दिया हुँ फिर भी

लोग करते हैं हवाओं से शिकायत मेरी

 

ऐसे कुछ लोग हैं इस शह्र में बेक़ीमत से

जो घटाने पे तूले रहते हैं क़ीमत मेरी

 

ये ज़मीं तुम को बतायेगी कब कब मुझ पर

आफतें आई हैं टूटी नहीं हिम्मत मेरी

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ग़ज़लकार की कई रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है

स्थायी निवास – भोपाल

 

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