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दर्द से, रंज से, तकलीफ़ से हलकान हैं हम,

इतनी आबादी में रहते हुए वीरान हैं हम।

 

इन दिनों ख़ौफ़ का बेचैनी का उन्वान हैं हम,

एक बे-देखे से दुश्मन से परेशान हैं हम।

 

ग़म की ये धुंध छटेगी तो खुलेगा ये भी,

किन मसाइल के सबब दर्द का दीवान हैं हम।

 

इस मुसीबत में भी लोगों का बुरा चाहते हैं,

शर्म आती है ये कहते हुए इंसान हैं हम।

 

जिसको देखो वो हिफाज़त की क़सम खाए है,

ऐसा लगता है कि लूटा हुआ सामान हैं हम।

 

हद तो तब हो गई ‘अन्जुम’ कि कोरोना के लिये,

हैरतें चीख़ के कहने लगीं हैरान हैं हम।

By admin

One thought on “खास कलम : डॉ अन्जुम बाराबंकवी”
  1. आप की पत्रिका उत्कृष्ट है| सभी विधाओं की रचनाएँ अच्छे स्तर की हैं, विशेषकर ग़ज़लें| हिंदी पत्रिकाओं में अक्सर अधिकतर ग़ज़लें अशुद्ध ही होती हैं लेकिन आप के यहाँ ऐसा नहीं है यह देख कर प्रसन्नता हुई| लेकिन पत्रिका में कहीं भी रचनाएँ प्रेषित करने का सूत्र नहीं दिया गया|

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