1
बहुत बारीकियों से तोलता है
खरा सिक्का कभी जब बोलता है

नसीहत है के उससे बच के रहिए
जो कानों में ज़हर को घोलता है

किसी के वश में ये रहता नहीं है
सिंहासन है ये अक्सर डोलता है

मैं फिर मशहूर होता जा रहा हूँ
वो मेरे पीठ पीछे बोलता है

जरूरतमंद की खातिर ए ‘पंकज’
कहाँ कोई दरों को खोलता है

2
रोज़ एक ज़ख़्म नया आ के लगा देता है
मेरा क़ातिल मुझे जीने की दुआ देता है

क्यों न उठ जाए अदालत से भरोसा अपना
मेरा मुंसिफ़ मुझे बेजुर्म सज़ा देता है

क्या ये कम है कि अंधेरों के इलाक़े में कोई
इक मोहब्बत का दिया आ के जला देता है

मेरे दिलबर के मोहब्बत का है अंदाज भी ख़ूब
जब भी मिलता है वो इक दर्द नया देता है

घर की गिरती हुई दीवार न देखो ‘पंकज’
तेरे पुरखों की बुलंदी का पता देता है

3
मुश्किल में लग रहा है ये अम्न-ओ-अमान क्या
वहशी के हाथ लग गया गीता कुरान क्या

फुटपाथ हो या रास्ता चादर है तान दी
ख़ानाबदोश के लिए ऊँचा मकान क्या

हम चाह लें तो एक नया संसार बन उठे
आगे हमारे आपका ये हुक़्मरान क्या

जो धूप के सफर में गुज़ारी है ज़िन्दगी
उसके लिए शजर का भला सायबान क्या

‘पंकज’ जो हौसलों से उड़ा करते हैं यहां
उनके लिए ज़मीन है क्या आसमान क्या

4
जो अंधेरा हो जहालत का मिटा देते हैं
रोज़ हम इल्म की इक शम्आ जला देते हैं

चंद सिक्कों के लिए देखा है हमने कुछ लोग
ख़ुद को ही अपनी बुलंदी से गिरा देते हैं

ऐसा है कौन जिसे कुछ भी सुनाया जाए
तुम जो मिलते हो तो कुछ दिल की सुना देते हैं

हमको मौका ही नहीं मिलता है यारो वरना
हम तो सेहराओं में भी फूल खिला देते हैं

ज़ख़्म-ए-दिल ताजा रहे मेरा कभी भर न सके
मेरे अहबाब मुझे ऐसी दवा देते हैं

लफ्ज काग़ज़ पे है जो दर्द की सूरत ‘पंकज’
आप अक्सर ही ग़ज़ल इसको बना देते हैं
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परिचय : डॉ पंकज कर्ण सक्रिय लेखन से जुड़े हैं. कई पत्र-पत्रिकाओं में इनकी ग़ज़लें प्रकाशित हो चुकी हैं.
संप्रत्ति : प्राध्यापक, अंग्रजी विभाग, डॉ जगन्नाथ मिश्र महाविद्यालय

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