मनोज अहसास की कविताएं
एक
कुछ जिंदगियां होती हैं
सीलन भरे अंधेरे कमरों की तरह
जिनके खिड़की दरवाज़े
मुद्दत से बंद हैं
वहां कोई भी नही जाता
वहाँ घूमते हैं
कुंठाओं के कॉकरोच
उदासियों की छिपकलियां
वेदनाओं की चीटियां
और
कश्मकश की मकड़ियां
जो बुनती रहती हैं सदा
एक जाल
जिससे
कभी हल्की सी भी दरार होने पर
दरवाजे में
अगर आ जाये
कोई तितली
उल्लास की
तो
उलझकर
घुटकर
मर जाये
कुछ जिंदगियां…..
धीरे धीरे
ये सब चीज़े मिलकर
निगल जाती हैं
नैतिकता का प्लास्टर
उखड़ जाता है संस्कारों का फर्श
गिर जाती है
उद्दात की छत
अफसोस
कुछ खूबसूरत हो सकने वाली जिंदगियां…..
दो
मैं तो सदा उसकी ही रहूंगी,
मुझे उसी की रहना है बस
इससे क्या
कि
मेरे जिस्म की मासूमी पर,
उसने दर्द के दाग लिखे हैं ।
मेरी सुर्ख आंखों का काजल ,
उसके जुर्म बह निकला है
और चेहरे की रंगत है
उसके दिए हुए निशान
अंतिम लफ्ज़ से उसके नाम के,
बस मेरी पहचान बची है
मैंने उसकी खातिर अपना,
चेहरा सब से छुपा लिया है
मैं फिर भी उसकी ही हूं
जबकि
वो जब चाहे मुझको अपनी,
जीस्त से रुखसत कर सकता है
वो जब चाहे मेरी देह को,
अंगारों में धर सकता है
मुझे बनाकर अपनी आबरु,
उसने अंधेरा उढा दिया है
अपने लफ्जों से वो जब चाहे,
मुझको को नंगा कर सकता है।
मैं उसकी आखिर क्योंकर हूँ
क्योंकि
मेरे जिस्म के सन्नाटे पर सबसे पहली आहट है वो
मैंने कुबूल किया है उसको जान समझकर सारी बातें
सारे जग को बना साक्षी ,
पिता ने मुझ को दान दिया है
वह मेरे जीवन से बंधा है,
वह मेरे बच्चों का पिता है।
मेरी जरूरत के सब ताले
उसकी चाबी से बंद पड़े हैं।
और जहां के दरवाजे सब
मेरी खातिर बंद पड़े हैं
मेरी शोहरत,
मेरी इज्जत ,
मेरी दौलत ,
सब कुछ है वो
उसके लिए हर दर्द में भी
मेरे जीवन का आधार छुपा है
जीना है
तो जीना होगा
मुझको उसकी औरत बनकर
किसी की बेटी
किसी की बहन
किसी की दोस्त
का जीवन
मुझ को कभी स्वीकार नहीं है
तीन
सुबह आयी
तेरे इंतज़ार की खुशबू लेकर
फिर तमाम दिन मुझे तेरा इंतज़ार रहा
शाम आयी
तेरे ना आने की मायूसी लेकर
फिर तमाम रात अंधेरो मे ढूढ़ा है तुझे
और बांधी है उम्मीद अगली सुबह से
मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल
तू कहाँ था?
आज आया है
तो मेरी आँखों में चमक ही नहीं
बुझ गया है तेरा इंतज़ार
जला कर खुद को
तुझको पाने को लगाया था खुद को दाँव पर
ऐसा लगता है
तुझ को पाया है खोकर खुद को
मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल
तू कहाँ था?
साथ लेकर तुझे
होकर जुदा अपनों से
मैं भटकता हूँ जैसे आज रेगिस्तानों में
इश्क़ के कतरे मुकद्दर में कभी थे ही नहीं
चंद समझोते थे
जो तेरी आहटों से
मोजुदगी से
कैद हो गए ज़रूरतो के मकानों में
मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल
तू कहाँ था?
जी मे आता है भगा दू तुझ को
या फिर तुझसे भाग जाऊ कहीं
नहीं है तू हसीन पल जीवन का
तू मेरा वो ही पुराना साथी है
खेलता आया है जो बचपने से साथ मेरे
तेरा नाम दर्द है तू वही तन्हाई है
बस आज इस दुनिया के रंगीन मौसम में
अपनी सूरत बदल कर साथ मेरे
चल रहा है बड़ी कशिश के साथ
शायद खुश है
सुन रहा है मेरी बेचैन आवाज़
के
मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल
तू कहाँ था ?
कहाँ?
चार
वो जाग रहे हैं
दिन है फिर भी जाग रहे हैं
अक्सर वो रात में जागते है
अँधेरी और खामोश रात में
अब वो दिन में भी जाग रहे हैं
रात रौशन जो हो रही है
उन्हें एतराज़ है इस बात पर
रात रौशन क्यों है
वो बहुत गुस्से में है
वो बहुत गुस्से में है
वो साबित करना चाहते है
वो भी प्रहरी है
सूखी हुई खेती के
और उसको काटने नहीं देगे
और अपने मुलायम आसान से उतर आये है
वो अनशन भी कर सकते है
उन्हें डायबटीज़ है मानसिक
मीठा नहीं खा सकते
वो रूढ़िवादी भी है
पर वो स्वतंत्र है
आजकल विरोध पर है कारण बताओ नोटिस दिए बिना
अब वो अपनी स्तुति करवाने से मना कर रहे है
उनका विरोध का तरीका उनके पेशे के अनुकूल नहीं है
क्योंकि कलम में बहुत ताकत होती है
अगर सियासत से बची रहे तो
पांच
अभी मैं जा नहीं सकता
अभी कुछ गीत बाकी हैं
जो तुमको कह सुनाने हैं
अभी मैं जा नहीं सकता
ख्वाबों के कई जुगनू
जो सीने में हुए हैं गुम
ग़ज़ल की मांग में भरकर
तुम्हे सारे दिखाने है
अभी मैं जा नहीं सकता
अभी तन्हाइयो में ज़िन्दगी का शोर बाकी है
अभी होनी हैं मेरी दर्द से गहरी मुलाकाते
थकन से जो सफर मैं बीच राह छोड़ आया था
सलामत हैं मेरे सीने में वो विरहा भरी रातें
फिर उसी रंग से जीवन के सब रस्ते सजाने हैं
अभी मैं जा नहीं सकता
अभी कुछ गीत बाकी हैं
जो तुमको कह सुनाने हैं
अभी मैं जा नहीं सकता
तमन्ना रोज उठती है ज़रा देखु तेरी आँखे
छुपा लूँ अपनी आँखों में मेरे दिलबर तेरी आँखे
मुझे ये लग रहा है फ़िक्रों गम के बोझ से दबकर
न जाने कितनी रातों से नहीं सोई तेरी आँखे
तेरी आँखों से मुझको गम के सब बादल हटाने हैं
अभी मैं जा नहीं सकता
अभी कुछ गीत बाकी हैं
जो तुमको कह सुनाने हैं
अभी मैं जा नहीं सकता
तमन्नाओं के गुलशन में खिज़ा का दौर हावी है
न तेरी याद है दिल में न कोई बेकरारी है
तुम्हारे ज़िक्र में जिन साँसों को पलपल सुलगना था
ज़माने का उन्ही साँसों में पलपल शोर जारी है
मुझे इस शोर में चाहत के लम्हे ढूंढ लाने हैं
अभी मैं जा नहीं सकता
अभी कुछ गीत बाकी हैं
जो तुमको कह सुनाने हैं
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परिचय : मनोज अहसास का एक काव्य संकलन प्रकाशित हो चुका है. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और ग़ज़लें भी प्रकाशित
संपर्क : सुधासदन ,महादेव 2, नकुड़, सहारनपुर
मो. 9027221387,8630390606

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