ग़ज़लें
1
प्यार का नाम क्या लिया उसने
अपना  दामन सजा लिया उसने

गुनगुनाती  हुई  ग़ज़ल  की तरह
दर्द  अपना   छुपा   लिया   उसने

क्या  ग़रज़  थी   उसे  शरारत  की
हाथ  हँसकर  जला  लिया  उसने

उसकी   मासूमियत का क्या  कहना
रेत  का  घर  बना लिया  उसने

फूलों  से   शाखों   से  हवाओं  से
तितलियों   का   पता  लिया उसने

2
मेरी आँखों को जगमगा करके
छुप गया आईना  दिखा  करके

ख़्वाब की छत से वो  गिरा  देगा
मेरी बातों  को  अनसुना  करके

अब नहीं  लौटकर  वो   आयेगा
जो  गया  है  ये  फैसला  करके

मुफलिसी  के   घने  अंधेरों  में
दिल  को  देखा  किए जला करके

पीठ  पर  हाथ  रखने  वालों  ने
रख  दिया  मुझको गुमशुदा करके

3
मैं चला तो रास्ता चलता रहा
साथ  मेरे  हौसला चलता रहा

ज़िन्दगी की धूप  का वो  कारवां
बनके  जैसे आईना चलता रहा

है हक़ीकत  ये  नहीं  झूठी ख़बर
होक  तनहा मैं चला चलता  रहा

रात  भर हम  नींद  में  जागे  रहे
साथ  कोई  बेवफा  चलता  रहा

जब  किसी  के  प्यार  में रुसवा हुए
तब भरम  का सिलसिला चलता रहा

4
खोटे सिक्के का दाम लगता है
ये भी किस्सा  तमाम लगता है

तपते  सूरज की धूप  में   कोई
जैसे  अल्लाह  व राम लगता है

उनकी  यादों  को  छोड़  दूँ  कैसे
सबसे  मुश्किल  ये काम लगता है

बन्द   मुट्ठी  है  उसके   हाथों   की
उसमें   मेरा  भी   नाम   लगता  है

जिनके  साये  में  दिन  गुजर जाये
वो  ही  अपना  मुकाम  लगता   है

5
इस अनोखी दोस्ती का ख़ूब यह अंदाज़ है
एक सेवादार है तो  दूसरा  लफ्फाज है

देखकर हैरान हूँ मैं  तितलियों के  देश  में
सूर्ख फूलों  में छुपा  क़ातिल  मेरा हमराज़ है

देखिये तो वो परिन्दा  आज  भी हारा नहीं
भूख से लिपटा हुआ है हाँ मगर परवाज़ है

रौशनी की बेबसी का कुछ नया है सिलसिला
चाँद की बाँहों में आकर रात ये नाराज़ है

क्या गुनाहों की सज़ा अब है अदालत में नहीं
घर किसी का वो जलाकर कह रहा आगाज़ है
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सपंर्क – गुलजार पोखर, मुंगेर

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