खास कलम : विनय

हँसी का सौंदर्य
झरने की तरह कल–कल करती ध्वनि
आसमान में चिड़ियों का कलरव
फूलों पर मंडराते भौंरों का गुंजन
या फिर अल्हड़ हवाओं की सनसनाहट
सच कहूँ
ऐसे ही हँसती हो तुम

तुम्हारी हँसी में जैसे
ढलता है प्रकृति का सौंदर्य
साज पर सँवरता है कोई राग
सुबह की पहली किरण पर उल्लासित
कूकती है कोई कोयल
चाँदनी की फुहारों में जैसे
मचलती है नदी की जलधारा

तुम्हारी हँसी जैसे
सावन की पहली घटा
जीवन का पहला वसंत
सौंदर्य रस का पहला छंद
किसी युवती का पहला शृंगार
शिशु की पहली किलकारी
बाग में खिला कोई पहला फूल

सच कहता हूँ
तुम्हारी हँसी से
धरती लेती है अँगड़ाई
नाचता है मोर
गाती है बुलबुल
और पृथ्वी एक बार घूम जाती है
अपनी धुरी पर

मैं चाहता हूँ
तुम खूब हँसो
इतना हँसो
कि पतझड़ में पत्तों की तरह बिखर जाए
तुम्हारा दुख
और मैं सहेजता रहूँ
तुम्हारी हँसी की मोतियों को
तमाम उम्र
तुम्हें महसूस करने के लिए

मिलन की उम्मीद
कितना सुंदर
कितना मधुर
मन के कोलाहल के बीच
भाब्दों की सर्जना

दिल की बगिया में
कैसे खिलते हैं फूल
कहाँ से लाते हो तुम
भावों की उष्मा
प्रेम का माधुर्य
रिश्तों में मधुमास
जीवन का संगीत
संबंधों में मिठास
और सतरंगी सपने

भाायद संवेदनाओं को सहेजता
आपका मन
किसी गौरैये की तरह
जमा करता है एक-एक तिनका
एक मुकम्मल सृजन के लिए
आपका कोमल मन
भावनाओं को वैसे ही उड़ेलता है
जैसे निचोड़ दिये जाते हैं
भीगे कपड़े

आपकी आँखों में
जीवन का राग
कंठ में सरगम की लय
चेहरे पर सूरज की लालिमा
आपके अनगढ़े शब्दों में भी
उल्लास है जीवन का
मस्ती है तरुणाई की

मन के उपवन में
जब तक खिलेंगे फूल
तब तक बचे रहेंगे शब्द
बची रहेगी धरती
बची रहेगी शब्दों की उष्मा
बची रहेगी क्षितिज पर
मिलन की उम्मीद

चाँद की याद में
मैं तालाब के पानी की तरह
ठहरा ही रहा
और चाँद ने अपने भायन–कक्ष की
बत्तियाँ बुझा दी
मेरी धौंकनी तेज हो गई
और धड़कनें नगाड़ों की तरह बजने लगीं
चाँद को पता था कि
जब तक पानी में नहीं घुलेगी
उसकी चाँदनी
रात भर नमकीन होता रहेगा पानी
बावजूद चाँद ने न जलायी बत्तियाँ
न खोली खिड़कियाँ

और सुबह
पानी नदी के रास्ते चल पड़ा
अथाह सागर में
खुद को विलीन करने के लिए

सच कहता हूँ
सच कहता हूँ
कलम उठा कर कहता हूँ
सारी कायनात तुम्हारी है
ये सूरज, चाँद और सितारे
तुम्हारे लिए निकलते हैं
ये उजाला भी तुम्हारा
और ये चाँदनी भी तुम्हारी
तुम्हारे अक्स में ही ढला है
संपूर्ण ब्रह्मांड
तुम सृष्टि हो
जीवन की

सच कहता हूँ
तुम्हारी हँसी की आहट भर से
चटक जाती है कलियाँ
और खिल जाते हैं फूल
आह्लादित हो मोर
फैला देता है पंख
तुम्हें छू कर गुजरने के लिए
बढ़ जाती है हवा की चाल
और रात भर तुमसे बिछड़ने के गम में
शाम ढले ही लाल हो जाती है
सूरज की आँखें

सच कहता हूँ
तुम्हारा होना
शर्त है जीवन की
जब तक बचा रहेगा
तुम्हारी आँखों में कोमल अहसास
तब तक बची रहेगी सृष्टि
बची रहेगी मेरे फेफड़ों के लिए हवा
बची रहेगी मेरी आँखें
तुम्हें अपलक निहारने के लिए
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परिचय : कविताएं व समीक्षा लेखन. पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन
संप्रति : सीनियर रिपोर्टर, प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर
मो: 9470420276

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