वर्जना का दौर, इसमें प्रेम का अध्याय गढ़ना,
है कठिन क्या?

पर्वतों से हो गए जग के प्रणेता राह में जब,
प्रेम की नदिया निकल बहती धरा की चाह में तब,
नेह की मुस्कान वितरित कर सकें जल की तरंगें,
शुष्क हिय के दो अधर पर नेह का ‘पर्याय’ धरना,
है कठिन क्या?
वर्जना का दौर…..

पुष्प कलियों को सहेजे हँस रहे हैं खिलखिलाकर,
चाँद तारों से लिपटने चल पड़ा विश्वास पाकर,
कुछ गुलाबी रंग ले रंगने चला हूँ कालिमा को,
कालिमा के गाल पर इस नेह का ‘अभिप्राय’ मलना,
है कठिन क्या?
वर्जना का दौर….

कवि! लुटाते फिर रहे हैं कोष संचित गीत गाकर,
इस दुआरे उस दुआरे रिक्ति को अपना बनाकर,
खो दिया क्या पा लिया है प्रश्न यह झकझोरता है,
प्रेम के इस पृष्ठ पर जो व्यय हुआ ‘प्रत्याय’ लिखना,
है कठिन क्या?
वर्जना का दौर….

2

प्रेम के सारे कथानक तुम बिना आधे रहेंगे।

जो तुम्हारी हर हँसी के गूँजते अनुप्रास में था,
प्रेम का सौंदर्य प्रियतम उस मधुर अहसास में था
छोड़ दी है जो यकायक डोर तुमने प्रेम की शुचि!,
याद रखना, इक सिरा उसका ‘शिवम’ थामे रहेंगे।
प्रेम के सारे कथानक……

हैं अधूरे गीत, ग़ज़लें, छंद भी पूरे नहीं हैं,
गीत मैं कैसे पढ़ूँ जब बन्ध ही पूरे नहीं हैं,
एक तुमसे ही अलंकृत कर रहा था लेखनी को,
याद रखना, तुम बिना सब बिम्ब अब सादे रहेंगे।
प्रेम के सारे कथानक….

नेह के संसार से हर पुष्प खुशियाँ छाँटता है,
भर मधुर सी गंध उनमें तब सभी को बाँटता है,
याद के पहलू पकड़ यह बाग अब तक है सुगंधित,
याद रखना! नेह बिन पर फूल-फल प्यासे रहेंगे।
प्रेम के सारे कथानक….

सब विहग दाना लिए घर को गए अनुमोद में तब,
सूर्य भी छिपने चला था साँझ की प्रिय गोद में जब,
तुम कहाँ हो? लौट आओ! रात-दिन करके प्रतीक्षा,
याद रखना! दो नयन हर पल यहाँ जागे रहेंगे।
प्रेम के सारे कथानक….

3
समय किस क़दर मौन हुआ है।

आँखों पर काला चश्मा जड़,
थोथेपन की दो पोथी पढ़,
बनकर सभी स्वयंभू कहते,
हमसा ज्ञानी कौन हुआ है।
समय किस क़दर मौन हुआ है।

सत्ता की भाषा कहते हैं,
हम चुगली करते रहते हैं,
पृथक मानसिकता के युग में,
विषय अर्थ से गौण हुआ है।
समय किस क़दर मौन हुआ है।

महँगाई भी नित्य छल रही,
श्रम की रोटी नित्य जल रही,
चटनी खाना भी दूभर है,
महँगा जबसे नौन हुआ है।
समय किस क़दर मौन हुआ है।

ले उधार करते हैं खेती,
लली कुँवारी घर पर बैठी,
फाँसी की तादात बढ़ गई ,
महँगा जबसे लौन हुआ है।
समय किस क़दर मौन हुआ है।

4

प्रश्न पूछते रहते मुझसे, उत्तर ख़ुद से भी तुम पूछो,
राजनीति की भाषा पर क्यों, मुझे क्रोध आ जाता है।

सर्दी में जब फुटपाथों पर, कम्बल के लाले पड़ते हैं,
दो रोटी की आशा में जब आशा पर ताले पड़ते हैं,
इक दिन भूखे सो जाओ तुम, समझ तुम्हें आ जाएगा,
क्यों क्षुधा अग्नि में जल-जलकर आँतों में छाले पड़ते हैं।
झूठे भाषण दे जब नेता मुफ़लिस को बहलाता है,
तब समझोगे,
राजनीति की भाषा पर क्यों, मुझे क्रोध आ जाता है।

इसकी-उसकी चुगली करना राजनीति का काम रहा है,
झूठे वादे करने वाले नेता का ही नाम रहा है,
धन काला, चारा घोटाला, मर्डर, किडनैपिंग औ शोषण,
करके जो नेता भारत में, जनता का ‘अभिराम’ रहा है,
वही राम के आदर्शों को जब सबको समझाता है,
तब समझोगे,
राजनीति की भाषा पर क्यों, मुझे क्रोध आ जाता है।

सीमा पर आए दिन देखो दुश्मन गोलीबारी करता,
काश्मीर के हिस्से में जब, सैनिक बारी-बारी मरता,
नेता के घड़ियाली आँसू तब शहीद के हिस्से आते,
उसी शहादत पर हर नेता, भाषण की तैयारी करता,
शांति दूत बनकर जब नेता, दुश्मन के घर जाता है,
तब समझोगे,
राजनीति की भाषा पर क्यों, मुझे क्रोध आ जाता है।

 

……………………………………………………..
परिचय : शिवम के गीत पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं.
संपर्क – 149/9, दिनेश नगर, एटा(उ.प्र.)- 207001
मोब.: 7599609190

 

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *