ज़हीर अली सिद्दीक़ी की तीन कविताएं

नंगे पांव

‘सड़क’ ख़ासा तप रही
रास्ते कांटें भरे
नंगे पांव चल पड़े
मंज़िल ए उत्साह में

सफ़र लम्बा देखकर
उलझनें बढ़ती गयीं
देखकर कतार पीछे
हौसला बढ़ता गया

देखकर पैरों में छाले
दूर मंज़िल राह की
सड़क भी बेचैन थी
बेबशी के आह पर

हौसला बेशक़ बुलन्द
देखकर मंज़िल क़रीब
कितने हैं दम तोड़ देते
जीत के बेहद क़रीब

फ़तह होती जंग में
ज़िंदादिली की राह से
टूट जाती हार भी
जीजिविषा की प्रहार से

मैं सरहद हूँ

गोलियों की आवाजें
ये कैसी रिवाजें
सोती नही हूँ
दिन हो या हो रातें
मैं सरहद हूँ,
दो मुल्क़ों की आँख और कान हूँ..

मिट्टी यहां की
खून से रंगी है
नफ़रत क्यों इतनी
इंसान सभी हैं
मैं सरहद हूँ,
दो मुल्क़ों की आँख और कान..

ये सरहदी जंगें
अंत इनका नही है
इंसान होते कहाँ!
हैवान बसते जहां हैं
मैं सरहद हूँ,
दो मुल्क़ों की आँख और कान हूँ..

कोई जान जाती,
कलेजा है दुखता
मुझे ऐसा लगता,
जगह ही चुना है
मैं सरहद हूँ,
दो मुल्क़ों की आँख और कान हूँ..

तकलीफ़ होती,
अगर होता ऐसा
नही चाहती
गम के आंसू यहाँ हो
मैं सरहद हूँ,
दो मुल्क़ों की आँख और कान हूँ..

आगोश मेरा
ख़ुशी का है पहरा
फ़िज़ाएँ यहां की
सुनहरी बसेरा
मैं सरहद हूँ,
दो मुल्क़ों की आँख और कान हूँ..

 

कुपोषण से बचाता  है

हल चलाता हूँ,
पाटा लगाता हूँ,
खाद डालता हूँ,
उर्वरा बढ़ाता हूँ,
मिट्टी को खेती के लायक बनाता हूँ
बीज डालता हूँ,
धरती से रोता हूँ,
पुतला बनाता हूँ,
पंछी भगाता हूँ,
बीज को अंकुरण का ताज पहनाता हूँ
सिंचाई करता हूँ,
खाद डालता हूँ,
निराई करता हूँ,
पशु से बचाता हूँ,
खड़ी फसल को कुपोषण से बचाता हूँ
मड़ाई करता हूँ,
अनाज ढ़ोता हूँ,
डेहरी में रखता हूँ,
भूखों को खिलाता हूँ
आज अनाज कुपोषण से बचाता  है

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परिचय : कवि कविताएं साहित्यकुञ्ज, अक्षर वार्ता सहित कई पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैँ.

सम्प्रति- पी-एच.डी.(शोधरत) आय. सी.टी. मुम्बई,महाराष्ट्र

 

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