खास कलम : डाॅ. महेन्द्र नारायण

अनकही

तुम्हारे प्यार पर
कई कविताएँ
या तो कम हो जाती हैं
या छोटी पड़ जाती हैं
जिसे अधरों की अभिव्यक्ति
प्रगट कर न सकी
आज तक
अमर, अटूट , असीम , अपार
शायद इसीलिए बना हुआ है
तुम्हारा प्यार
मूक भावना का वाचाल है
उदाहरण है
अतुलनीय अपरिमेय जैसे शब्द
किसी भी विचारों से फिट नही बैठते
जब मूक दीवानेपन की दृष्टि
बार-बार करती हैं
तुम्हारा आभास
मेरे मुखमण्डल पर
तुम भले भले न समझो
मैं प्रत्येक दृष्टि का हिसाब रखता हूँ
जिसे खर्च न करके
इस प्रेम सम्पत्ति को –
अथाह करने में लगा रहता हूँ

मेरे प्रेम की ओर

निर्मिमेष आकांक्षाएँ
षटपद आलोकमय , रूपमय
तरंगित बाह्येन्द्रियाँ
संगीतमय चक्षु
लज्जागर्वित कपोल
सब दौड़ रहें हैं
मेरे प्रेम की ओर
अलकों की उलझनें
नासिका सारंगमय
अधरों की गुदगुदी
अनुभूति का स्पर्श
उँगलियों की आहट
झुक रहीं हैं
मेरे प्रेम की ओर
और मैं पुतलवत खड़ा हूँ
उन्हें देख रहा हूँ…

कहानी बदल गयी है

चॉकलेट काफी सी तेरी यादें
एक दिन मुझसे मिली
शहर के सुनसान चौराहे पर
कविता लिखती हुई
मैं उसमें शामिल होकर
स्वयं को कवि मान बैठा
मेरे बालों पर
विचारों ने उँगलियाँ फेरना शुरू ही किया था
कि मैंने फेसबुक पर तुम्हारा स्टेटस पढ़ा
कॉलेज के वे दिन
फिर बैठ गया
एक अन्य यादों के पार्क में
निष्ठुर सीमेण्ट की बेंच पर
जिस पर दोपहरी की छन छन
शाम तक ठण्डी नही होती थी
वो तुम्हारी डायरी
जिसको पढ़ कर मैं शायर बना था
शायद पैंतालिस वर्ष का उम्र
पच्चीस वर्ष के एहसास को पेट से बाहर निकाला
बीस वर्ष बाद
अचानक उसी रेस्टोरेण्ट में
उसी टेबल पर
तुम्हें जोड़े में देखकर
मैं अपने बूढ़े होते कुंवारेपन पर हँस रहा था
और तुम मुझे बिना पहचाने
मुस्कुरा रही थी
अपनी जिन्दगी के साथ
और मैं जज्बातों की दलदल से बाहर निकल रहा था
एक नए फैसले के साथ
कि समय बदल गया है
कहानी बदल गयी है।

परिस्थितियों के घर में

मँहगाई से घिरी दीवारें
चक्रवृद्धि व्याज सी चिन्ता के फर्श
बजट का छत
असहाय आँखों की खिड़कियाँ
उम्मीदों का कपाट
जिस पर चौधरी पीर बक्श का पर्दा
इच्छाओं की पायदान
कल्पनाओं का कालीन
कोने में रखी साईकिल की कतरनें
रेडियो का टूटा युग
फैशन की मोबाइल
घुने हुए दाल
आलू प्याज के दलदल
साबुन के टुकड़ों की सुबह
खाली जेबों की विस्तरों की चरपाईयाँ
जिसपर खाँसता बूढ़ा अतीत
रिवाजों की कुर्सियाँ
दीमक भरे दस्तावेजों सा मेज
औपचारिकता के कपड़े
विचारों के खाली डब्बे
न जाने क्या क्या रहतें हैं
जिन्हें वही देखता है
जो उसमें रहता है
……………………………………………..
परिचय : रचनाकार के दो कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन
संपर्क : श्री चन्दन लाल नेशनल काॅलेज, कान्धला, जिला -शामली, पिन – 247775 (उ.प्र.)
मो. 9412637489

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