श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी / दोहे :: हरिनारायण सिंह हरि

श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी / दोहे :: हरिनारायण सिंह हरि

अमन शांति की खोज में, गया स्वर्ग के द्वार ।
यहाँ निरंतर रो रही, कविता जार-बेजार ।

ऐसे निष्ठुर क्यों बने, अमन!गये क्यों भाग ।
यहाँ अभागा रो रहा, सुबुक-सुबुक अनुराग ।

सबके प्रिय तुम थे बने, सबके जिगरी यार ।
अमन! तुम्हारे बिन यहाँ,फीके सब त्योहार ।

यद्यपि परिचय था नहीं, भले बहुत थे दूर ।
तुमको रचता देख-सुन, मैं भी था मगरूर ।

दोहा मंथन में अमन हम हैं तेरे साथ ।
इतनी जल्दी चल दिये, अरे, छुड़ाकर हाथ !

राहुल रो-रो कह रहा, कहाँ गये तुम यार ।
फैजाबादी हरि सुबक, करता दुख इजहार ।

खेरवार तो दुःख से हुआ कि ऐसा मौन ।
उसे मनाये किस तरह, और मनाये कौन ।

गरिमा और सुमित्र हरि , करुण और कवि अन्य ।
सभी शोक विह्वल अमन! तुम थे प्रिय अनन्य ।

वश में रही न ‘भावना’, आँखों में है लोर।
अमन! हाय!क्यों चल दिये, इतनी जल्दी छोड़ ।
– हरिनारायण सिंह ‘हरि ‘

 

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