श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी / एक भाई का चले जाना :: गरिमा सक्सेना
अमन चाँदपुरी २०-२१ साल का एक लड़का, कोई नहीं सोचता होगा कि लेखन में इस उम्र में कोई इतना परिपक्व व साहित्य के प्रति गम्भीर हो सकता है। अमन से मेरा पहला परिचय दोहा दंगल समूह में दोहा रत्न प्रतियोगिता के दौरान हुआ। वर्ष था २०१७ अमन ने जिस बारीकियों के साथ मेरे दोहों पर टिप्पणियां की वह अद्भुत था। जितना मैं उससे प्रभावित थी शायद उतना ही वह भी। इसके बाद उसका और मेरा साहित्यिक संबंध भाई बहन के स्नेहिल संबंध में बदल गया। जब भी किसी पत्रिका का कोई विशेषांक आता वह कहता दीदी शाम तक इस विषय पर आपकी रचनायें चाहिये, शायद वह जानता था मैं उसकी बात को रख लेने के लिये रचना लिख ही दूंगी। अमन से मेरी तीन बार ही मुलाकात हुई, पहली बार मैं लखनऊ में जून २०१८ में मिली थी, डालीगंज क्रासिंग पर वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। इसके बाद हम दोनों डाॅ. हरि फ़ैज़ाबादी भय्या के घर गये, हरि भय्या के घर में अमन उनके घर के सदस्य की तरह था। उसने न सिर्फ मेरा अतिथि सत्कार किया अपितु मेरी साहित्य साधना से सबको अवगत भी कराया। वह कहता था दीदी वह गीत, वह ग़ज़ल, वह दोहे हरि भय्या को सुनाइये। मानो जैसे उसे सब याद हो, यह ही तो थी उसकी दक्षता वह सिर्फ चीजों को केवल पढ़ता ही नहीं था बल्कि याद भी रखता था । अमन ने काव्य की लगभग हर विधा और गद्य में भी कलम चलाई, निश्चित तौर पर उसका अध्ययन बहुत गहन था तभी लेखन में इतनी गहराई आ पायी, जब मेरी पहली किताब आयी तो ज़िद करके उसने मेरी किताब मँगवायी और बोला मैं समीक्षा जरूर लिखूंगा, मैं अपनी पुस्तक पर उसकी टिप्पणी का इंतज़ार करती ही रह गयी और मेरा भाई अमन किसी दूसरी दुनिया में हमेशा को खो गया। भले ही यह संबंध महज दो ढाई वर्ष का था पर उसने मेरे जेह्न में ऐसी पहचान बना ली जिसे मैं सम्पूर्ण जीवन नहीं भूल पाऊँगी। एक सच्चे साहित्यकार को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

 

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