श्रद्धांजलि :: अमन चांदपुरी / यादें जो शेष रह गईं :: स्मिता श्री
हम भावनाओं के अधीन बहुत कुछ करना चाहते हैं। अपनी तरफ से, सही है।
पर क्या पता हमारी श्रद्धांजलि पहुंचती भी है?
पता नहीं कोई ईश्वर चले जाने के बाद पास रखता भी है?
कोई आत्मा शरीर के बाद भी शांति की तलाश पूरी करती है क्या?
कह नहीं सकती, पर यह मुझे अच्छी तरह से पता है कि गये हुए की भरपाई कभी संभव नहीं है। न ही हमेशा के लिए चले जाने से पास दूर के लोगों की क्षति कभी पूरी होती है।
“अपूरनीय क्षति”
यह केवल शब्द नहीं है सचमुच अपूरनीय ही होती है। और हर बार पलटकर सोचने के बाद एक हूक – सी उठती है कि पलट जाए समय, काश! कि थाम लूँ वापस लौटा कर हाथ। कुछ भी करके लौटा लाऊँ।
वो भी जब जानेवाला अमन – सा हो। लगता ही नहीं कि वो चला गया या उसे जाना भी था। ओह!
जिंदगी है, उसके उसूल हैं, हम फिर चलने लगेंगे और चल भी रहे हैं।
अब कुछ भी करके पीड़ा तो कम नहीं हो सकती उसके जनकों की।
कुछ भी करके नहीं।
और फिर लगता है कि कुछ नहीं कर सकते, कुछ भी नहीं।
अत्यंत पीड़ादायक है उसका जाना कि तसल्ली हो चली थी वो हमारे बीच मुस्कराने लौट रहा है।
मेरा भोगा जिया पल है।
इसी तरह कुछ अपनों को खोकर समझ आता है मुझे अब असहनीय और अपूरनीय का मतलब।
बस, एक याद और एक कसक, पीछे पलट जाएं। काश!
उफ!………..

 

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