विशिष्ट गजलकार : ज्ञान प्रकाश विवेक

1
तमाम घर को बयाबां बना के रखता था
पता नहीं वो दिये क्यों बुझा के रखता था

बुरे दिनों के लिए तुमने गुल्लकें भर लीं
मैं दोस्तों की दुआएं बचा के रखता था

मेरे फिसलने का कारण भी है यही शायद
कि हर कदम मैं बहुत आजमा के रखता था

वो जिस नदी पे उछाले हैं आपने पत्थर
मैं उसपे कागजी कश्ती बना के रखता था

वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारों
इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था

हमेशा बात वो करता था घर बनाने की
मगर मचान का नक्शा छुपा के रखता था

2
मैं वक्त का अंदाजे-बयां बेच रहा हूं
मिटते हुए पैरों के निशां बेच रहा हूं

तकलीफ तो होगी मेरे बच्चों को यकीनन
मैं आज खिलौनों की दुकां बेच रहा हूं

इस मुश्किले-दौरां का सितम पूछ न मुझसे
जो मैंने बनाया था मकां बेच रहा हूं

रहजन है, लुटेरे हैं, कई डॉन खड़े हैं
तू देख कि मैं खुद को कहां बेच रहा हूं

हैरानी तो ये है कि खराीदार कई हैं
बाजार में जख्मों के निशां बेच रहा हूं

क्या और कोई मुझ-सा बुरा होगा जहां में
मण्डी में चिताओं का धुआं बेच रहा हूं
3
ऐ मेरे जान के देवता, ये तेरा बितान अजीब है
तेरी वेदना में हैं रौशनी, तेरी आनबान अजीब है

तेरे अश्क जलते हुए दिये, तेरी मुस्कराहटें चांदनी
मैं तुझे कभी न समझ सका, तेरी दास्तान अजीब है

नहीं मौसमों से गिला इसे, नहीं तितलियों से शिकायतें
तेेरे बंद कमरे का जाने-मन, तेरा फूलदान अजीब है

यहां मुद्दतों से खड़ा हूं मैं, यही सोचता कि कहां रहूं
यहां सबके घर में दुकान है, यहां हर मकान अजीब है

मुझे इल्म है मेरे दोस्तों, मेरा तुम मजाक उड़ाओगे
मैं बिना परों का परिंद हूं कि मेरी उड़ान अजीब है

4
क्या बताऊं कि हुआ मुझको अचंभा कितना
मैंने हाथों में उठा रक्खा था दरिया कितना

कह रहा था वो कि उस पार उतर जाऊंगा मैं
कागजी नाव पे उसको था भरोसा कितना

उसने बरसात में दे दी मुझे अपनी छतरी
तू जरा सोच वो इंसान था अच्छा कितना

पाठशाला में सभी आये थे भूखे बच्चे
ऐसे बच्चों को भला मैं भी हंसाता कितना

भाप उसने मेरे अश्कों की बनाकर बेची
ये है अफसोस कि वो शख्स था अपना कितना

5
फ्यूज बल्बों का मेला लगा है
इस शहर का वही तज्किरा है

आंख-वालों की सहता है ठोकर
ये जो नाबीना पत्थर पड़ा है

रात का जख्म इतना है गाढ़ा
दर्द का चांद बुझने लगा है

एक नन्हे-से बच्चे की जुर्रत
प्रश्न मुझसे बहुत पूछता है

मैं शजर बन न पाऊंगा हरगिज
उसका किरदार इतना बड़ा है
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परिचय : इस अंक के विशिष्ट गजलकार ज्ञान प्रकाश विवेक की कई गजल व कहानी-संग्रह प्रकाशित हैं. लेखक फिलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं.
पता – 1875, सेक्टर-6, बहादुरगढ़ हरियाणा, मो. 9813491654

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