विशिष्ट गजलकार : वशिष्ठ अनूप

1
सारे जग से निभाया तुम्हारे लिए
हर किसी को मनाया तुम्हारे लिए

तुमको अपना बनाना था बस इसलिए
सबको अपना बनाया तुम्हारे लिए

नाज़ से सर उठाकर चला हर जगह
हर जगह सर झुकाया तुम्हारे लिए

जाने किस रूप में तुम कहाँ पर मिलो
द्वार हर खटखटाया तुम्हारे लिए

चाहता था तुम्हारी हँसी देखना
मैंने सबको हँसाया तुम्हारे लिए

कौन सा राग तुमको सुरीला लगे
राग हर गुनगुनाया तुम्हारे लिए

2
अड़े हैं तो मंज़िल की ज़िद में अड़े हैं
बहुत छोड़ कर ही हम आगे बढ़े हैं

अदब से उठाना ज़रा उन दियों को
अमावस में जो तिरगी से लड़े हैं

झुके हैं फलों से लदे ये शजर जो
यकीनन ये हमसे बहुत ही बड़े हैं

बिना अन्न के है नहीं कुछ भी मुमकिन
सृजन के तो हथियार हल-फावड़े हैं

तपन में जो शीतल बनाते हैं जल को
वे मिट्टी के अनमोल सुन्दर घड़े हैं

3
चाँद-सा रूप यह सलोना है
दमका-दमका-सा जैसे सोना है

जब से देखा है ख़ुद को भूल गया
तेरी आँखों में जादू-टोना है

जानता हूँ ये राह.है मुश्किल
तुम को पाना है, ख़ुद को खोना है

प्यार लम्हों का,दर्द जन्मों का
“आओ हँस लें कि फिर तो रोना है”

प्यार की उम्र ओस के मोती
टूट जाना है, फिर पिरोना है

4
छल से, कपट से,भय से,भरमा रहे हो कब से,
दरपेश हक़ीक़त को,झुठला रहे हो कब से

बच्चों को दाल-रोटी, मिलती नहीं है लेकिन,
तुम दूध-भात-चंदा,दिखला रहे हो कब से

प्यारी-सी एक लड़की ,का दिल समझ न पाये,
तुम चाँद-वाद कहकर,बहका रहे हो कब से

कितने घरों में अब भी, पहुँचा नहीं उजाला
घाटों को रोशनी से ,नहला रहे हो कब से

जो देव कर न पाए,अपनी कभी हिफ़ाज़त
इंसाँ को उनकी ख़ातिर, मरवा रहे हो कब से

5
तुलसी के,जायसी के,रसखान के वारिस हैं
कविता में हम कबीर के ऐलान के वारिस हैं

हम सीकरी के आगे माथा नहीं झुकाते,
कुम्भन की फ़कीरी के,अभिमान के वारिस हैं

सीने में दिल हमारे आज़ाद का धड़कता,
हम वीर भगत सिंह के बलिदान के वारिस हैं

एकलव्य का अंगूठा कुछ पूछता है हरदम,
हम तीर कमानों के संधान के वारिस हैं

हमने समर में पीठ दिखाई नहीं कभी भी,
आल्हा के हम सहोदर, मलखान के वारिस हैं

6
गाँव-घर का नज़ारा तो अच्छा लगा,
सबको जी भर निहारा तो अच्छा लगा

गर्म रोटी के ऊपर नमक-तेल था,
माँ ने हँस कर दुलारा तो अच्छा लगा

अजनबी शह्र में नाम लेकर मेरा,
जब किसी ने पुकारा तो अच्छा लगा

हर समय जीतने का चढ़ा था नशा
अपने बच्चों से हारा तो अच्छा लगा

एक लड़की ने बिखरी हुई ज़ुल्फ़ को
उँगलियों से सँवारा तो अच्छा लगा

यूँ ही टकरा गई थी नज़र राह में,
मुड़ के देखा दुबारा तो अच्छा लगा

रेत पर पाँव जलते रहे देर तक,
जब नदी ने पखारा तो अच्छा लगा

एक खिड़की खुली,एक परदा उठा,
झिलमिलाया सितारा तो अच्छा लगा

दो हृदय थे, उफनता हुआ सिन्धु था,
बह चली नेह-धारा तो अच्छा लगा

चाँद-तारों की, फूलों की चर्चा चली,
ज़िक्र आया तुम्हारा तो अच्छा लगा
………………………………………………….
परिचय :
प्रकाशन : ग़ज़ल संग्रह – बंजारे नयन, रोशनी खतरे में है, रोशनी की कोपलें, अच्छा लगता है, मशालें फिर जलाने का समय है, तेरी आँखें बहुत बोलती हैं
कविता-संग्रह– स्वप्न के बाद, गीत-संग्रह – बेटियों के पक्ष में,
स्थायी पता : 204/11, राजेन्द्र अपार्टमेंट्स, रोहित नगर (नरिया), वाराणसी–221005
पत्र–व्यवहार का पता : प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी–221005

 

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3 Thoughts to “विशिष्ट गजलकार : वशिष्ठ अनूप

  1. डॉ हरीश कुमार सोनी "पथिक"

    आदरणीय वशिष्ट सर सादर नमन

    शानदार गजल

    हर एक शब्द अतुलनीय है।

  2. Suman Uadhyay

    सभी रचनाएँ बेहतरीन हैं ।

  3. हातिम जावेद

    वाह क्या ख़ूब !

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