विशिष्ट गजलकार : शिवकुमार बिलगरामी

(1 )
एक महफ़िल सजाये बैठा हूँ
तुझ से दिल को लगाए बैठा हूँ

तुझ से मिलने की बेक़रारी है
बेक़रारी  दबाये   बैठा   हूँ

तेरे दीदार की तमन्ना में
चन्द साँसें बचाये बैठा हूँ

मुझ में मेरा न कुछ रहा बाक़ी
अपनी हस्ती मिटाये बैठा हूँ

आ भी जाओ अगर मगर छोड़ो
कब से पलकें बिछाये बैठा हूँ

तेरे ख़ातिर मैं साडी दुनिया को
अपना दुश्मन बनाये बैठा हूँ

(2 )

मेरा बेचैन बदन मेरा परेशान बदन
रोज़ होता है दिले हाल पे हैरान बदन

इतना मज़बूर न देखा था कभी भी ख़ुद को
साँस चलती है मगर फिर भी है बेजान बदन

ख़ून शौक़त ने दिया है तो मेरी जान बची
आधा हिन्दू है तो आधा है मुसलमान बदन

अपने लोगों को बता दो कि रहें वो हद में
रोज़ करते हैं मेरी रूह का हलकान बदन

कब चला जायेगा इसका न भरोसा कोई
चन्द घड़ियों के लिए और है मेहमान बदन

(3 )

अगर मैं अपने मन की इक नई दुनिया बसा लूँ तो

मैं अपनी उस नई दुनिया में तुमको भी बुला लूँ तो

तुम्हारे दिल की धड़कन पर बताओ क्या असर होगा
तुम्हारी बिन इजाज़त के तुम्हें अपना बना लूँ तो

कोई अरमान था दिल में मगर वो सो गया दिल में
वही सोया हुआ अरमान दिल में फिर जगा लूँ तो

किसी दिन दफ़अतन मुझको मिलो तुम राह में यूँ  ही
तुम्हें देखूं मैं यकटक और गले अपने लगा लूँ तो

हज़ारों मिट गये तुझ पर तेरे इस हुस्न-ए -मुत्लक़ पर
तेरे इस हुस्न-ए -मुत्लक़ पर मैं ख़ुद को भी मिटा लूँ तो

(4 )

हँसते  रहते हो ग़म -ओ -रंज छुपाने के लिए
तुम भी क्या ख़ूब पहेली हो ज़माने के लिए

ख़ुद से रूठे हुये क्यों बैठे हो तन्हाई में
कौन आएगा यहाँ तुमको मनाने के लिए

ग़म भुलाने की कोई और ही राह करें
मयकशी राह नहीं ग़म को भुलाने के लिए

अश्क़ पीने से तपिश और भी बढ़ जाती है
बहने दो अश्क़ ये होते हैं बहाने के लिए

इश्क़ जब हो ही गया है तो शिकायत क्या है
इश्क़ होता ही है कमबख़्त सताने के लिए

(5 )

मुद्दतों के बाद उनके ज़ख्म जो अब कुछ भरे होंगे
आज देखेंगे मुझे तो ज़ख्म उनके फिर हरे होंगे

वक़्त में ताक़त कहाँ है जो मिटा दे प्यार के रिश्ते
प्यार तो होगा उन्हें पर बात कहने से डरे होंगे

आपकी खामोशियों की ये सदायें कह रहीं मुझसे
होंठ तक आने से पहले शब्द घुट घुट कर मरे होंगे

दर्द के रिश्तों को ढोती ज़िन्दगी रफ़्तार क्या लेती
थक चुकी आँखों से आंसूं भी तो रुक रुक कर झरे होंगे

(6 )

सामने आ के मेरे ज़ुर्म गिनाओ तो सही
मैं गुनहगार तुम्हारा हूँ बताओ तो सही

मुझ पे इल्ज़ाम है मैंने तुम्हें चाहा क्यों है
कोई इसकी भी सज़ा है तो सुनाओ तो सही

आप से दूर बहुर दूर चला जाऊँगा मैं
अपनी नज़रों से कभी मुझको गिराओ तो सही

मैंने कब की है शिकायत की सताते हो तुम
तुम कभी मुझको तबीयत से सताओ तो सही

मैं गया तीर नहीं हूँ जो न लौटे वापस
तुम मुझे दौड़ के रोको तो मनाओ तो सही

(7 )
कभी दरिया , कभी कूज़े में तेरे आब नहीं है
सभी प्यासे हैं यहाँ कोई भी सेराब नहीं है

किसी मतलब के लिए ग़ैर भी अहबाब बने हैं
यहाँ कोई भी किसी का दिली अहबाब नहीं है

किसी हँसते हुए चेहरे को कभी ग़ौर से पढ़ तू
वो जो शादाब है दिखता वो भी शादाब नहीं है

यूँ तो कहने के लिए रात है महताब से लेकिन
यहाँ हर रात की क़िस्मत में भी महताब नहीं है

किसी अपने ने ही हँस हँस के मुझे दर्द दिया है
मेरी आँखों में यूँ ही दर्द का सैलाब नहीं है

(8)
तू ख़ुदा  के हुक़्म की तामील तो अच्छे से कर
कर नहीं सकता भलाई तो बुराई से तो डर

बम धमाकों से भले तुम मार दो सबको मगर
जीत पाओगे नहीं तुम दिल किसी का इंच भर

ख़ौफ़ के दम पर न अपना राज क़ाइम कीजिये
ख़ौफ़ के दम पर हुआ है कौन दुनिया में अमर

क्यों कोई चाहे कि उसके रास्ते पर सब चलें
सबका अपना रास्ता है सबका अपना है सफ़र

क्या तुम्हें दिखता नहीं है पाप क्या है पुण्य क्या
आँख पाकर भी बने हो किसलिए तुम बेबसर

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परिचय  :  शायर व गीतकार, कई गीत संगीतबद्ध, नई कहकशाँ ” गजल-संग्रह प्रकाशित
संप्रत्ति : लोकसभा में संपादक
संप्रत्ति : 418 , मीडिया टाइम्स अपार्टमेंट, अभय खंड -4 , इंदिरापुरम
गाज़ियाबाद -201012

 

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