1

मुझमें इक दुःख भरा आदमी रहता है

वर्षों से अधमरा आदमी रहता है

 

झुकता नहीं किसी भी ताकत के आगे

ऐसा ही इक खरा आदमी रहता है

 

खुद सहता गम मगर बांटता है खुशिया

हरदम ही मसखरा आदमी रहता है

 

जीवन की धरती पर सुख के सूखे में।

कुम्हलाया सा हरा आदमी रहता है

 

नफरत की बस्ती में प्यार मुहब्बत का

बना हुआ मकबरा आदमी रहता है

 

2

बात तेरी फरेबियों जैसी

घात होती है भेड़ियों जैसी

 

ना तो सुनता है ना समझता है

ज़ात तेरी मवेशियों जैसी

 

ओर और छोर कुछ नहीं मिलता

नीतियां सब जलेबियों जैसी

 

दूरियां है जो पट नहीं सकती

किंतु लगती करीबियों जैसी

 

बिन पिये ही नशे में रहता है

आदतें हैं शराबियों जैसी

 

सारे कपड़े उतर गये अब तो

नौबतें हैं लँगोटियों जैसी

 

3

नहीं पहुंची किसी मज़लूम के बेबस ठिकानों तक

सिमटकर रह गयी सारी तरक्की बेईमानों तक

 

उड़ानें चोंच में लाएं दबाकर कामयाबी को

परिंदों को पहुंचना चाहिए गेहूं के दानों तक

 

पढ़ें जब आयतें मस्जिद तो मंदिर को मज़ा आये

पहुंचना चाहिए आवाज़ घंटों की अज़ानों तक

 

दिखाया जा रहा है ज़िंदगी को इश्तहारों में

सुबूते ज़िंदगी अब कैद है केवल दुकानों तक

 

गए राजा सियासत में कई सामंत आ बैठे

सिमटकर रह गयी सत्ता उन्हीं ऊंचे घरानों तक

 

सदी अट्ठारवीं की ओर वापस जा रहे हैं हम

वो रखना चाहते सबको कुरां, वेदों, पुरानों तक

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परिचय : महेश कटारे सुगम चर्चित ग़ज़कार हैं.

 

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