विशिष्ट ग़ज़लकार : कमलेश भट्ट कमल

1
कई गलियाँ कई रस्ते कई मंज़र समेटे है
ज़रा-सी याद पूरा गाँव पूरा घर समेटे है.

तुम्हें भी हौसले का उसके अन्दाजा नहीं होगा
परिन्दा जो अभी बैठा है अपने पर समेटे है.

शराफ़त सादगी संवेदना सम्मान सच्चाई
भलेपन में वो अपने कितने ही जेवर समेटे है.

वो जो फुटपाथ है उसको हिकारत से नहीं देखो
वो अपने साथ ही बेबस कई बेघर समेटे है.

कभी कुछ देर बैठो पास तो ख़ुद जान जाओगे
स्वयं में कितनी बेचैनी कोई सागर समेटे है.

उसे केवल किसी की आस्था ही जान सकती है
किसी भगवान को कैसे कोई पत्थर समेटे है.

वो गमले में उगी है और छोटी-सी है तो भी क्या
वो है एक बोनसाई और कद्दावर समेटे है.

हजारों कर्मफल, प्रारब्ध सारे इसमें संचित हैं
हमारी देह ख़ुद में जन्म-जन्मान्तर समेटे है.

अमर है आत्मा और देह नश्वर है ये कहते हैं
मगर उस आत्मा को देह यह नश्वर समेटे है.

2
काश हो पाती सभी से दोस्ती, लेकिन
ख़त्म हो जाती हमारी दुश्मनी, लेकिन.

जाने कब से हम सभी प्यासे के प्यासे हैं
हाँ हमारे पास है भागीरथी, लेकिन.

खूब सारा है उजाला उस तरफ कब से
इस तरफ आती नहीं है रोशनी लेकिन.

खत्म होता ही नहीं संघर्ष उन सब का
खत्म होती जा रही है ज़िन्दगी लेकिन.

भीड़ में चारों तरफ अपने ही अपने हैं
उनमें से अपना नहीं है एक भी लेकिन.

मान लेना भर ही तो काफी नहीं होता
मान लेता हूँ चलो तुम हो सही, लेकिन.

सुख तो दरवाजे से आना चाहता ही है
दुख वहीं बैठा है मारे पालथी, लेकिन.

जोड़ लेना चाहता हूँ खुद को हिन्डन से
मेरे ज़हनों में बसी है गोमती लेकिन.

मैं भी शायद टूटकर बिल्कुल बिखर जाता
मुझको ज़िन्दा रख रही है शायरी लेकिन.

3
करेंगे और क्या ख़ुद में नया जज़्बा तलाशेंगे
जिन्हें जीना है वे फिर से कोई रस्ता तलाशेंगे.

हमारे आचरण से क्या है लेना-देना ग़ैरों को
जो अपने हैं वही हमसे कोई शिकवा तलाशेंगे.

हमें दुश्मन बना देता है सच-सच बोल देनाभी
वो अपने वास्ते एक बार फिर गूँगा तलाशेंगे.

नहीं है हौसलों से ज्यादा ऊँचा कोई भी पर्वत
जिन्हें एवरेस्ट छूना है निशान ऊँचा तलाशेंगे.

मिलेगी ही नहीं वह कोख जिसमें सृष्टि पलती है
अगर हम कोख में बेटी नहीं, बेटा तलाशेंगे.

4
जैसा भी है बुरा या अच्छा नहीं बदलता
कपड़े बदलने भर से चेहरा नहीं बदलता .

बनता है जन्म लेने के साथ-साथ ही वो
बन जाय तो लहू का रिश्ता नहीं बदलता .

मंज़िल से उसकी अपनी पहचान है पुरानी
राही बदलते हैं बस , रस्ता नहीं बदलता .

बदलेगा सिर्फ वो ही जिसमें भी जान होगी
इन्सान ही बदलते , पुतला नहीं बदलता .

आये निज़ाम आये, आकर चले गये भी
चीखों-कराहटों का क़िस्सा नहीं बदलता .

मरना पड़े है सबको इसके लिए हमेशा
ज़िन्दा शरीर अपने चोला नहीं बदलता .

5
किसी सूरत भी ये बन्धन नहीं छूटे
हमारे हाथ से जीवन नहीं छूटे !

बची अब भी बहुत संभावनाएँ हैं
अभी उम्मीद का दामन नहीं छूटे !

जला सकते हो तो सारे जला डालो
कहीं पर एक भी रावन नहीं छूटे !

किसी दिन उम्र ख़ुद ले जाएगी उससे
मगर बचपन से ही बचपन नहीं छूटे !

भले शहरों से हो गुड मार्निंग-इवनिंग
कभी गाँवों से पालागन नहीं छूटे !

इसी मन से ही आख़िर जीत होनी है
पकड़ से लोगों की यह मन नहीं छूटे !

मिले जिस भी जगह से ज़िन्दगी,ले लो
कोई भी स्रोत, संसाधन नहीं छूटे !

भले ही झूठ को करना पड़े सिज्दा
मगर सच का भी अभिनन्दन नहीं छूटे !
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परिचय : कमलेश भट्ट कमल की ग़ज़ल, कहानी, कविता सहित अन्य विधाओं पर पुस्तकें प्रकाशित. शिव मंगल सिंह सुमन सहित कई सम्मान से सम्मानित.
संपर्क : सी-631,गौड़ होम्स, गोविंदपुरम, हापुड़ रोड, ग़ाज़ियाबाद-201013(उ.प्र.)
मो.9968296694.

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