विशिष्ट ग़ज़लकार : कुँअर बेचैन

1
मिल न पाए जब ज़मीं पर, तो उड़ानों में मिले
बन के बादल दोस्त हम कितने ज़मानों में मिले

अपनी क्या औक़ात जब बिकने लगेभगवान भी
उनके बुत मंदिर से भी पहले दुकानों में मिले

हमसे मत पूछो निचोड़ा किस क़दर उनको गया
फूल क्यारी में कहाँ, अब इत्रदानों में मिले

ये नई कालोनियाँ, ये फ्लेट क्या दे पायेंगे
वो जो रिश्ते हमको गलियों के मकानों में मिले

जिनकी ख्वाहिश है कि फिर टुकड़ों में बँट जाए चमन
ऐसे कुछ चेहरे भी अपने बाग़वानों में मिले

क्या पता सादा से दिखने वाले भी हो क़ीमती
हीरे भी तो कोयले की ही खदानों में मिले

शीशमहलों में कहाँ हैं इतनी मेहनत के ज़नाब
वो जो तिनके पंछियों के आशियानों में मिले

झाँकती रहती है जिन तारों से इतनी रौशनी
ये सुराख हैं जो गगन के शामियानों में मिले

जिन उसूलों पर टिकी है सारी दुनिया आज भी
क्या नयों में इतने हैं जितने पुरानों में मिले

जी, बहू-बेटों ने अच्छे कमरे तो खुद ले लिए
अब बुज़ुर्गों के पलंग बाहर दलानों में मिले

कितने लोगों का तज़ुर्बा है कि दुश्मन से नहीं
ज़ख़्म लोगों को कि जितने दोस्तानों में मिले

इतने तो मेरी नज़र में आज तक आये नहीं
हौसले जितने जवानों और किसानों में मिले

फैसला उनपर भले ही कुछ भी हो पर सच है ये
झूठ भी कितने, गवाहों के बयानों में मिले

जिनको थी पहचान वे बोले कि ऐसे प्रीति-पल
कब मिले जितने कि शिकवों और तानों में मिले

आप ही बतलाइयेगा क्या कहीं मिल पाएंगे
जितने जीवन अन्न के इन चंद दानों में मिले

इतने तो इस पूरी दुनिया में न हों शायद ‘कुँअर’
मोड़ जितने तेरी मेरी दास्तानों में मिले

2
छत की ईंटें ही अगर बारूद से मिल जायेंगीं
तो यक़ीनन घर की नीवें दूर तक हिल जायेंगीं

यूँ ही दीवारें अगर आँगन में अब उठती रहीं
देख लेना रौशनी की कुहनियाँ छिल जायेंगीं

माँ का आँचल फट गया तो उसका सिलना है कठिन
आपकी बातें तो जब चाहोगे तब सिल जायेंगीं

यह प्रजा का है स्वयंवर इसमें वो राजा हैं कुछ
जिनकी बातें, क्या पता था, तोड़कर दिल जायेगीं

ओ सियासत, कैंचियों जैसी ज़ुबाँ काबू में रख
वर्ना तुझको ही ये सब कहकर के क़ातिल जायेंगीं

दो समानांतर खिंची रेखाएँ मत कहिये हमें
हमने जिस दिन ठान ली, सीमाएँ ये मिल जायेंगीं

3
रेत में हैं नहर से बाहर हैं
सारी नावें लहर से बाहर हैं

आजकल इश्क़ की ग़ज़ल के भी
सारे मिसरे बहर से बाहर हैं

धूप का अर्थ कैसे समझेंगे
लोग जो दोपहर से बाहर हैं

वो भी तो ज़हर से नहीं बाहर
वो जो बूँदें ज़हर से बाहर हैं

चलते रहियेगा आखिरी दम तक
साँसें ही कब क़हर से बाहर हैं

हर क़दम पर लिखा ‘ठहर’ लेकिन
हम तो अब हर ‘ठहर’ से बाहर हैं

मेहरबानी करेगा कौन उन पर
वो जो उसकी महर से बाहर हैं

आत्मा उनमें ही मिलेगी ‘ कुँअर’
गाँव जो भी शहर से बाहर हैं

4
मैं तो अंदर था आपके दिल में
जी, मेरा घर था आपके दिल मे

उसने पूछा कहाँ पे रहते हो
मेरा उत्तर था –‘ आपके दिल में’

शुक्रिया आपने चुना मुझको
जब स्वयंवर था आपके दिल में

आपने भी ज़मीर बेच दिया
ये तो ज़ेवर था आपके दिल में

आप, फिर बेवफ़ा न हो जाएँ
क्या यही डर था आपके दिल में

लो, उसे भी बना दिया मूरत
वो जो पत्थर था आपके दिल में

धड़कनें आ गईं वो ग़ज़लों तक
जिनका इक स्वर था आपके दिल में

आज कैसे वो बाज़ बन बैठा
जो कबूतर था आपके दिल में

प्यार था तो नया उजाला था
कैसा मंज़र था आपके दिल में

रात में चाँद है वो इक चेहरा
वो जो दिन भर था आपके दिल में

आह भरते हो, सच बताना, क्या-
कोई दिलवर था आपके दिल में

नफ़रतों और प्यार में ऐ ‘कुँअर’
प्यार बेहतर था आपके दिल में

5
मैं तो अंदर था आपके दिल में
जी, मेरा घर था आपके दिल मे

उसने पूछा कहाँ पे रहते हो
मेरा उत्तर था –‘ आपके दिल में’

शुक्रिया आपने चुना मुझको
जब स्वयंवर था आपके दिल में

आपने भी ज़मीर बेच दिया
ये तो ज़ेवर था आपके दिल में

आप, फिर बेवफ़ा न हो जाएँ
क्या यही डर था आपके दिल में

लो, उसे भी बना दिया मूरत
वो जो पत्थर था आपके दिल में

धड़कनें आ गईं वो ग़ज़लों तक
जिनका इक स्वर था आपके दिल में

आज कैसे वो बाज़ बन बैठा
जो कबूतर था आपके दिल में

प्यार था तो नया उजाला था
कैसा मंज़र था आपके दिल में

रात में चाँद है वो इक चेहरा
वो जो दिन भर था आपके दिल में

आह भरते हो, सच बताना, क्या-
कोई दिलवर था आपके दिल में

नफ़रतों और प्यार में ऐ ‘कुँअर’
प्यार बेहतर था आपके दिल में
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परिचय : मशहूर रचनाकार. एक दर्जन से अधिक गीत और ग़ज़ल संग्रह, पांचाली महाकाव्य, उपन्यास और ग़ज़ल का व्याकरण प्रकाशित
सम्मान : साहित्य सम्मान (1977), उ. प्र. हिन्दी संस्थान का साहित्य भूषण (2004) सहित अनेक सम्मान

 

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