विशिष्ट ग़ज़लकार : कृष्ण कुमार प्रजापति

1
खुलके हँसना – मुस्कुराना आ गया
हमको भी अब ग़म छिपाना आ गया

दोस्त भी दुश्मन नज़र आने लगे
जाने कैसा ये ज़माना आ गया

जब चमन में टूट कर बिजली गिरी
जद में अपना आशियाना आ गया

चोट सह लेने की हिम्मत आ गयी
दर्द में भी गुनगुनाना आ गया

आँधियों से कह दो मैं डरता नहीं
अब मुझे भी घर बनाना आ गया

इक जवानी आप पर क्या आ गयी
हर किसी से दिल लगाना आ गया

ये तो उसकी मेहरबानी है “कुमार”
शेर कहना , गीत गाना आ गया .

2
अपनी अपनी लोग यहाँ फ़रमाने लगते हैं
क्या समझाएँ उनको, वो समझाने लगते हैं

गिर जाने पर हँस पड़ते हैं अपने लोग
आ जाते हैं दौड़ के जो अनजाने लगते हैं

मेरा दिल दीवाना चाहे ख़ुशियों के दो बोल
जब मिलते हैं आप तो रोने गाने लगते हैं

अपनी अपनी धुन में सारे बच्चे हैं मशगूल
अब तो अपने घर में हम बेगाने लगते हैं

सच्चाई ने झूठ का चोला ओढ़ लिया है
क़ौल सियासी लोगों के अफ़साने लगते हैं

मिलना जुलना बरसों तक जब हो जाता है बंद
चेहरों के आईने सब धुँधलाने लगते हैं

पर्वत जैसा सह लेते थे सारे दर्द “कुमार”
अब छोटी सी बातों पर घबराने लगते हैं

3
साँस को करते छल देखा
मृत्यु को हर पल देखा

मुश्किल से घबराना क्या
हर मुश्किल का हल देखा

खोकर पछताओगे कल
लौट के किसने कल देखा

नाच उठा है मन का मोर
उठते जब बादल देखा

प्यार में अपना दिल बेचैन
उसको भी बेकल देखा

हाथों में पत्थर देखे
शाख़ों पर जब फल देखा

सूखे लब हैं आज “कुमार”
प्यासा अपना नल देखा ..

4
फ़ासले बढ़ जाएँगे लोगो दिलों के दरमियाँ
मज़हबी झगड़े न डालो दोस्तों के दरमियाँ

ज़िन्दगी की जंग में होना अगर है कामयाब
बुज़दिली आने न पाए हौसलों के दरमियाँ

आदमी ने आदमीयत छोड़ दी है आजकल
जानवर सहमे हुए हैं जंगलों के दरमियाँ

दोस्ताना राज करने का इरादा है अगर
दोस्ती अपनी बढ़ाओ दुश्मनों के दरमियाँ

रह के लोगों में कोई ख़ामी छुपी रहती नहीं
एब हो जाता है ज़ाहिर आइनों के दरमियाँ

आपकी संजीदगी को क्या हुआ आलमपनाह
आप तो रहने लगे हैं मसखरों के दरमियाँ

गर सितारों से भी आगे तुमको जाना है “कुमार”
रास्ता कोई निकालो मुश्किलों के दरमियाँ
…………………………………………………………….
परिचय : परिचय : कहानी सहित विभिन्न विधाओं के 14 संग्रह प्रकाशित
संपादन : शब्द शिल्प के साधक
संपर्क : प्रजापति भवन, मेन रोड, राउरकेला – 769001, उड़ीसा
मो. 9437044680

 

Related posts

Leave a Comment