ग़ज़ल

  • डॉ. अफ़रोज़ आलम

ऐ मां मुझे करनी है सिफ़त तेरी रक़म आज
हैरान है मेरी अक़्ल, परेशान है क़लम आज

मिलती है शब ओ रोज़ मुझे तेरी दुआएं
मैं उनकी बदौलत नहीं महरूमे करम आज

जो कुछ भी मिला रब से मुझे तेरे सबब ही
मैं तेरी दुआओं से हूं हर एक का सनम आज

तक़दीर के मालिक का भी अहसान है मुझ पर
हम सबसे बहुत दूर है हर मौजे अलम आज

तहलील मेरे रग में तेरी तरबियत-उल्फ़त
रूकते नहीं मंज़िल पे किसी मेरे क़दम आज

जन्नत का तसव्वुर तेरी ख़िदमत में निहां है
आलम है मेरे वास्ते माइल ब करम आज

 

 

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