विशिष्ट ग़ज़लकार : ध्रुव गुप्त

1
हद से भी बढ़ जाएंगे तो क्या करोगे
चांद पर अड़ जाएंगे तो क्या करोगे

इस क़दर आवारगी में दिल लगा है
हम कभी घर जाएंगे तो क्या करोगे

लाख टूटी ख्वाहिशों से दिल भरा है
ख़ुद से ही लड़ जाएंगे तो क्या करोगे

यूं नहीं समझाओ रिश्तों की सियासत
शर्म से गड़ जाएंगे तो क्या करोगे

इनसे जी बहलाने की आदत पड़ी है
ज़ख्म सब भर जाएंगे तो क्या करोगे

बेसबब यह ज़िन्दगी गुजरी ख़ुदाया
हम अगर मर जाएंगे तो क्या करोगे

2
गरचे सौ चोट हमने खाई है
अपनी दुनिया से आशनाई है

ज़िंदगी तू अज़ीज़ है हमको
तेरी क़ीमत बहुत चुकाई है

जिनसे कुछ वास्ता नहीं मेरा
किसलिए उनकी याद आई है

दिल की बातें ज़मीं पे लिखता है
धूप सूरज की रोशनाई है

गम ख़ुशी का ये बदलता मंज़र
दिलों के हाथ की सफाई है

ख्व़ाब में सौ दफ़ा आते रहिए
ऐसे मिलने में कब ज़ुदाई है

जिसकी है वह भला बुरा जाने
हमने दुनिया कहां बनाई है

आप ग़ज़लों में दर्द मत खोजो
हमने अपनी हंसी उड़ाई है

3
रंग सारे थे, हम नहीं थे वहां
सौ सहारे थे, हम नहीं थे वहां

लफ़्ज़ खो आए थे मानी अपने
कुछ इशारे थे हम नहीं थे वहां

रात दरिया में बहुत पानी था
दो किनारे थे हम नहीं थे वहां

दरमियां जाने क्या उदासी थी
ग़म के मारे थे हम नहीं थे वहां

गरचे हर दिन तेरी तलाश रही
तुम हमारे थे, हम नहीं थे वहां

सबकी ज़द्दोजहद में साथ रहे
चांद-तारे थे, हम नहीं थे वहां

जिस जगह फ़ैसला हुआ अपना
लोग सारे थे, हम नहीं थे वहां

4
बाहर रह या घर में रह
मेरे दिल , बंजर में रह

सहरा जंगल में मत जा
नींद मेरे बिस्तर में रह

हद के बाहर पांव न दे
अपनी ही चादर में रह

बाहर जितना घूमके आ
कुछ अपने अंदर में रह

मंज़िल वंजिल धोखा है
मेरे पांव , सफ़र में रह

तू है खुदा मर्ज़ी तेरी
कंकड़ में, पत्थर में रह

तुमसे दुआ सलाम रहे
दुश्मन मेरे शहर में रह

आंसू है तो गिर भी जा
नदी है तो सागर में रह

अपना जीना मरना क्या
क़ातिल मेरे ख़बर में रह

जैसे दिन जो मौसम हो
तू हर वक़्त नज़र में रह

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परिचय : ग़ज़लकार भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी हैं. ग़ज़ल सहित साहित्य की अन्य विधाओं में निरंतर लेखन
संपर्क : ध्रुव गुप्त, 8,मित्र विहार कॉलोनी, चतुर्भुज काम्प्लेक्स के पीछे
पश्चिमी बोरिंग कनाल रोड, पटना – 800 00

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