माँ

  • ब्रह्मजीत गौतम

उम्र अधिक है, तन जर्जर है
माँ फिर भी सबसे सुंदर है

माँ से ही घर होता घर है
वरना तो केवल खँडहर है

ममता, प्रेम, दया, वत्सलता
माँ इन सबकी रत्नाकर है

माँ की गोदी में सब खेले
क्या रघुवर क्या नटनागर है

स्वर्ग-नरक या जन्नत-दोज़ख़
माँ सब पायों से ऊपर है

क्या काबा क्या काशी, मथुरा
माँ सब तीर्थों से बढ़कर है

माँ का आशीर्वाद मिले तो
जीवन का हर पल सुखकर है

एक मुसलसल ग़ज़ल-सरीखी
माँ अमृत – रस की गागर है

सब कुछ नश्वर है दुनिया में
केवल माँ का प्यार अमर है

जिसकी माँ है वृद्धाश्रम में
वह सबसे हतभागी नर है

‘जीत’ मिली है ममता जिसको
वह निश्चित ही क़िस्मतवर है

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