“ग़म-ए-दुनिया से गर पाई भी फ़ुरसत सर उठाने की”
तो फिर कोशिश करेँगे हम भी कुछ-कुछ मुस्कराने की।
बशर के बीच पहले भेद करते हैं सियासतदाँ
ज़रूरत फिर जताते हैं किसी क़ौमी तराने की ।

वतन की नीव मेँ शामिल है मिट्टी जिन शहीदों की
कभी भी भूल मत करना उन्हें तुम भूल जाने की ।

नगर मेँ जब से बच्चे रह गये और गाँव मेँ दादी
लगाए कौन फिर आवाज़ परियोँ को बुलाने की ।

सुनी थी बात घर की चाँद पर दादी के किस्सों मेँ
हक़ीक़त हो ही जाएगी वहां अब आशियाने की ।

नदी के वेग को हरगिज़ नहीं तुम बाँध पाओगे
जो हद हो जाएगी तो ठान लेगी सब मिटाने की ।

जलाओगे दिए तूफ़ाँ मे अपने हौसलोँ के गर
कोई आँधी नहीं कर पाएगी हिम्मत बुझाने की ।

कहा तुमसे अगर कुछ तो उसे क्या मान लोगे तुम
शिकायत फिर तुम्हें मुझसे है क्यों कुछ मत बताने की ।

यही क़िस्मत है क्या सच्ची महब्बत करने वालों की
उन्हें बस ठोकरेँ मिलती रहेँ सारे ज़माने की ।
सभी रंग उनके चेहरे पर लगे है प्यार के खिलने

ज़रूरत ही नहीं उनको हिना के अब रचाने की ।

(2)

गांव की अमराइयों का भूल जाना कब हुआ
भागते इस शह्र मेँ इक आबोदाना कब हुआ ।

रफ़्ता रफ़्ता ज़िंदगी का कारवां बढ़ता गया
पर सफ़र बचपन का था जो वो पुराना कब हुआ ।

ज़िंदगी भर लोग जो बुनते रहे लोगों के घर
रह गये महरूम ख़ुद का आशियाना कब हुआ ।

चाँदनी चंदा से पूरी रात बतियाती रही
मेरे ख़्वाबों  मेँ ज़रा भी उसका आना कब हुआ ।

ज़िंदगी जब से चली जद्दोजहद की राह पर
पाँव की छागल का तब से रूनझुनाना कब हुआ ।

आज आयी याद क्यूँ वो पहली बारिश और तुम
भूलना तो लाख चाहा था भुलाना कब हुआ ।

उसके हाथों की लकीरें दरबदर क्या हो गयीं
हाथ मेँ मह्ँदी का फ़िर उसके रचाना कब हुआ ।

मंज़िलों को चूमने की ठान ली क़दमों ने जब
राह की दुश्वारियों का सिर उठाना कब हुआ ।

(3)

राह मेँ काँटों का पहरा अच्छा लगता है मुझे
और फ़िर उनसे निपटना अच्छा लगता है मुझे ।

बंद दरवाज़े होँ जब मेरे प्रभु के द्वार के
द्वार पर तब थपथपाना अच्छा लगता है मुझे ।

शोरगुल के बीच तन्हा ख़ुद को पाऊं जब कभी
पंछियों से बात करना अच्छा लगता है मुझे ।

ओढ़कर ढेरों मुखौटे कब मुझे अच्छा लगा
जैसी हूँ मैं वैसे रहना अच्छा लगता है मुझे ।

बन सकी सूरज नहीं तो कोई मुझको ग़म नहीं
दीप मेँ बाती सा जलना अच्छा लगता है मुझे ।

भेजना माँ-बाप को पैसा दवा काफ़ी नहीं
उनको अपने साथ रखना अच्छा लगता है मुझे ।

चाहतों की रंगतों के ,खुशबुओं के पैरहन
हों अगर उधडें तो सिलना अच्छा लगता है मुझे ।

ओढ़ चादर छल कपट की बात कर सकती नहीं
सामने सच बात कहना अच्छा लगता है मुझे ।

ज़िंदगी पहलू मेँ आ के बैठती है जब कभी
उसके काँधे हाथ रखना अच्छा लगता है मुझे ।

(4)
दोस्त बिछुड़े हुए मिले हमको
दौरे-माज़ी मेँ ले गये हमको ।

साथ तेरे सदा रहूँँगी मैं
घर की दीवार ये कहे हमको

उलझे रिश्तों की गाँठ कैसे खुले
बात छोटी सी जब खले हमको ।

हाल-ए-दिल ख़ुद को ही सुनाएंगे
किसको फ़ुर्सत है जो सुने हमको ।

थी ललक आसमान छूने की
क़ैद मेँ डालते रहे हमको ।

जैसे जन्मों से जानते थे वो
भीड़ मेँ घूरने लगे हमको ।

आपसे ये ज़रा न थी उम्मीद
आप भी भूलने लगे हमको ।

ख़ामियां ढ़ूढ़ते थे जो हम में
वो ही अब मानने लगे हमको ।

घाव तेरे दिये भरें कैसे
घाव अब टीसने लगे हमको ।

(5)

छुपा है दिल मेँ क्या उनके ये सब हम जान लेते हैं
मुखौटा ओढ़ने वालों को हम पहचान लेते हैं ।

जो राहों मेँ तेरी यादें बहुत टकराती हैं मुझसे
तो रूक कर ख़ाक तेरे कूचे की हम छान लेते हैं ।

निखर जाऊं मैं तप कर जिस तरह सोना बने कुन्दन
परीक्षा मुश्किलों के रूप मेँ भगवान लेते हैं ।

मुझे मालूम है वो पीठ पीछे करते हैं साज़िश
मगर हम हैं कि उनको फ़िर भी अपना मान लेते हैं ।

जो बोले है मेरे छत की मुँडेरोँ पर कोई कागा
किसी अपने के घर आने की आहट जान लेते हैं ।

तू कैसे और किस सूरत में अब पेश आयेगी हम से
”तुझे ए ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं ”।

(6)

जाने कहाँ चले गये वो ज़िँदगी के पल
खुशियां थीँ ढेर सारी नहीं था कोई भी छल ।

मुरझा गये हैं फूल यहाँ शायद इसीलिये
आबो-हवा जो चाहिए वो ही गई बदल ।

जिसने बढ़ा चढ़ा के किया पेश स्वयं को
इस दौर मेँ तो ऐसे ही इन्साँ हुए सफल ।

दिल का कठोर था वो मगर बाप भी तो था
डोली चढ़ी जो बेटी तो आँखें हुईँ सजल ।

धन के नशे मे चूर हैं शहज़ादे इस क़दर
बेख़ौफ़ हो के ज़िँदगी को जा रहे कुचल ।

तारे हैं काफ़िए से तो है चाँद सी रदीफ़
अहसास मेँ जब उतरे तो हो ही गयी ग़ज़ल ।

हर ओर ख़ौफ़, बेबसी है झूठ और फ़रेब
दुन्या के मायाजाल से तू ए ‘किरण’ निकल ।

ममता किरण

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