विशिष्ट ग़ज़लकार :: महेश अश्क

1

सुबह को मां ने कहा था चाय थोड़ी और दे

शाम तक चौके में बर्तन झनझनाते रह गए

 

तब जो अपनापन था सूरज में, वो अब है ही नहीं

तू किसी दिन धूप को,बाहों में भर के देख ले

 

भीड़ सब उनकी ही है,चाहे इधर चाहे उधर

और तुम्हें लगता है,तुम करते हो सारे फैसले

 

आपका तो झूठ भी, कुछ इसकदर भारी पड़ा

वाकई जो सच थे सब , किस्सा कहानी हो गए

 

जब तुम्हारे हाथ  कश्ती मौज तूफां कुछ नहीं

फिर तो दरिया पर है, जब चाहे किनारा तोड़ दे

 

पोंछ कर आंसू वो फिर से, फूल जैसा खिल गई

पढ़ के बच्चे आ गए घर, जैसे ही स्कूल से

 

प्यास जैसी प्यास तो  शायद नहीं लगती है अब

हां मगर ,दरिया को तो यह चाहिये दरिया लगे

 

वो अहिल्या थी, सो उसकी बात ही कुछ और थी

वर्ना  पत्थर, खाके ठोकर, आदमी- सा जी उठे

 

क्या भरा- पूरा समय था जो बुजुर्गों ने जिया

शहर छोटा ही था लेकिन, लोग थे कितने बड़े

 

 

2

सूरज सबका है तो फिर क्यों, सबके एकसां  दिन-रात नहीं

कुछ सिर पे रहें, कुछ पाँव तले,ये बात तो कोई बात नहीं

 

शो -केसों की इस दुनिया का, आंखों पे यही तो जादू है

बाजार दिखायी देता है ,उसके पीछे के हाथ नहीं

 

जो लोग तुम्हारे अपने हैं ,उनके सपने तो सपने हैं

जो गिनती में कम पड़ते हैं, क्या उनके कुछ जज्बात नहीं?

 

तुम भरते रहो तहखाने को, हम तरसें दाने-दाने को

और कुछ न कहें, चुपचाप रहें, इतने तो बुरे हालात नहीं

 

यारो गुमसुम- गुमसुम न रहो, जो भी कहना है खुल के कहो

यह वक्त है बातें करने का, चुप रहने के लमहात  नहीं

 

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