ग़ज़ल

  •  संजीव प्रभाकर

हमेशा काम करती माँ, यूँ सुब्ह-ओ-शाम करती माँ
कभी देखा नहीं लेटी हुई आराम करती माँ

कड़ी मेहनत बताती थी -मेरी हर कामयाबी को
मेरी सब मुश्किलों की साज़िशें नाकाम करती माँ

पिता की दी सज़ाओ से बचाने की क़वायद में
मेरी गुस्ताख़ियाँ हर बार अपने नाम करती माँ

जला देती वो धीमी आँच पर अपने सभी सपने
न जाने किस तरह हिम्मत भरा यह काम करती माँ

सगे-सम्बन्धिओं की हर ख़ुशी अपनी समझती थी
अकेले ही पड़ी बिस्तर पे सीताराम करती माँ

 

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