विशिष्ट ग़ज़लकार :: स्वदेश भटनागर

1

वक्त ने कैसी तल्खियां दे दी
कब्र के नाम चिट्ठियां दे दी

ले के लम्हों ने हमसे आवाजें
बात करने को चुप्पियां दे दी

छुप गये हर्फ जाके लफ्जों में
किसने कागज को बर्छियां दे दी

ऊंघते हैं ये क्यों हसीं मंजर
सुबह को किसने लोरियां दे दी

हमने बच्चों से छीनकर तितली
याद करने को गिनतियां दे दी

2
किरनों की तरह हंस पड़ा अंदर
कौन सूरज-सा यह उगा अंदर

ये जो उठकर गया है इक लम्हा
देर तक शाख-सा हिला अंदर

रास्ते खुद में जब उलझ जाये
नक्श-ए-पा अपने ढूंढ़ना अंदर

मोतियों-सा पिरो दिया खुद को
किसने आदाब-सा कहा अंदर

सर बरहना ख्याल निकले हैं
क्या हुआ कोई हादसा अंदर

धूप-सा शाख पे मैं बैठा हूं
बर्फ-सा कुछ पिघल गया अंदर

झुटपुटा है कि तुनू-ए-सुब्ह
झांककर देख तो जरा अंदर

हर्फ इक लिखते, गुनगुनाते हुए
रात का एक बज गया अंदर

3
कैसी भी दास्तान में रखना
मुझको उर्दू जुबान में रखना

खुद को लिखता रहूं मैं आयत-सा
मुझको यूं इम्तहान में रखना

इक उजाला-सा है मेरे अंदर
मेरा दिल जाफरान में रखना

बुद्ध का मौन, नाच मीरा का
बेखुदी के बयान में रखना

जह्न से मेरे उगता है सूरज
जिस्म को सायबान में रखना

कौन इस दौर में है तेरा, स्वदेश
इस हकीकत को ध्यान में रखना

4
खुद को यूं बंजारा कर
अपना नाम पुकारा कर

जाेगी-सा रह दुनियां में
रिश्तों को इकतारा कर

जीवन को इक मानी दे
हर लम्हा आवारा कर

जेब में अपनी बाद में रख
चांद को पहले उतारा कर

कभी जुस्तजू में अपनी
तन्हा वक्त गुजारा कर

एक हाथ की ताली सब
किस्से का निपटारा कर

5
रात भर झिलमिलाता रहता है
मुझमें इक नाम ऐसा रहता है

दिल के आंगन में जलते दीपक का
आस्मां तक उजाला रहता है

उम्र भर कितना भागिये साहब
फासला खुद से थोड़ा रहता है

खुद से घबराके छुट न जाए कहीं
खुद में वो शख़्स उलझा रहता है

फिक्र छू ले तो इक बने आयत
वर्ना हर हर्फ सादा रहता है
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परिचय . ग़ज़लकार स्वदेश भटनागर ग़ज़ल लेखन में निरंतर सक्रिय. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन

 

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