विशिष्ट गीतकार : पूर्णिमा वर्मन

अमलतास
डालों से लटके
आँखों में अटके
इस घर के आसपास
गुच्छों में अमलतास
झरते हैं अधरों से जैसे मिठबतियाँ
हिलते है डालों में डाले गलबहियाँ
बिखरे हैं–
आँचल से इस वन के आँचल पर
मुट्ठी में बंद किए सैकड़ों तितलियाँ
बात बात रूठी
साथ साथ झूठी
मद में बहती वतास
फूल फूल सजी हुईं धूल धूल गलियाँ
कानों में लटकाईं घुँघरू सी कलियाँ
झुक झुक कर झाँक रही
धरती को बार बार
हरे हरे गुंबद से ध्वजा पीत फलियाँ
मौसम ने टेरा
लाँघ के मुँडेरा
फैला सब जग उजास

कचनार के दिन
फिर मुँडेरों पर
सजे कचनार के दिन
बैंगनी से श्वेत तक
खिलती हुई मोहक अदाएँ
शाम लेकर उड़ चली
रंगीन ध्वज सी ये छटाएँ
फूल गिन गिन
मुदित भिन-भिन
फिर हवाओं में
बजे कचनार के दिन

खिड़कियाँ, खपरैल, घर, छत
डाल, पत्ते आँख मीचे
आरती सी दीप्त पखुरी
उतरती है शांत नीचे
रूप झिलमिल
चाल स्वप्निल
फिर दिशाओं ने
भजे कचनार के दिन

कमल खिला
सेवा का सुफल मिला
धीरे से
मन के इस मंदिर का ताल हिला
कमल खिला

पंकिल इस जीवन को
जीवन की सीवन को
अनबन के ताने को
मेहनत के बाने को

निरानंद विमल मिला
सुधियों ने
झीनी इस चादर को आन सिला
कमल खिला

अंतर में जाग हुई
आहट सी आज हुई
जन्मों के कर्म फले
क्यों कर संसार छले

चेतन का द्वार खुला
सुखमन ने
जीत लिया अनहद का राम किला
कमल खिला

जीने की आपाधापी में
कितने कमल खिले जीवन में
जिनको हमने नहीं चुना

जीने की
आपाधापी में भूला हमने
ऊँचा ही ऊँचा
तो हरदम झूला हमने
तालों की
गहराई पर
जीवन की
सच्चाई पर
पत्ते जो भी लिखे गए थे,
उनको हमने नहीं गुना

मौसम आए मौसम बीते
हम नहिं चेते
अपने छूटे देस बिराना
सपने रीते
सपनों की
आवाजों में
रेलों और
जहाज़ों में
जाने कैसी दौड़ थी जिसमें
अपना मन ही नहीं सुना

गुलमोहर
खिड़की के नीचे से प्यार गुनगुनाता है
गुच्छा गुलमोहर का हाथ यों हिलाता है
अभी नही अभी नहीं
कल आएँगे गाँव तुम्हारे।

मरमरी उँगलियों में मूँगिया हथेली
चितवन की चौपड़ पर प्यार की पहेली
रुको नहीं रुको नहीं
चित आएँगे
दाँव तुम्हारे

लेती मद्धम हिंडोल सपनों से भरी नाव
नीम तलक जा पहुँचा महुए का एक गाँव
यहाँ नहीं यहाँ नहीं
कहीं और देखे थे
पाँव तुम्हारे

मन में लहराते हैं रंगे रेशमी रूमाल
वृक्षों पर आवारा कोयल गाती धमाल
कहाँ गई कहाँ गई
चौबारे बसती थी
छाँव तुम्हारे

वक्त के सिरहाने यों एक बात उग आई
सुबह-सुबह लिखवाई पाती में पठवाई
आज नहीं आज नहीं
कल आएगी
नाम तुम्हारे

बोगनविला
फूला मुँडेरे पर बोगनविला
ओ पिया!

धूप घनी
धरती पर
अंबर पर छाया ज्वर
तपा खूब अँगनारा
विहगों ने भूले स्वर
लेकिन यह बेखबर
झूला मुंडेरे पर बोगनविला
ओ पिया!

जीना
बेहाल हुआ
काटे कंगना, बिछुआ
काम काज भाए नहीं
भाए मीठा सतुआ
लहराए मगर मुआ
हूला मुंडेरे पर बोगनविला
ओ पिया!

एक और साल
लो बीत चला एक और साल

अपनों की
प्रीत निभाता सा
कुछ चमक–दमक बिखराता सा
कुछ बारूदों में उड़ता सा
कुछ गलियारों में
कुढ़ता सा
हम पात पात वह डाल डाल
लो बीत चला एक और साल

कुछ नारों
में खोया खोया
कुछ दुर्घटनाओं में रोया
कुछ गुमसुम और उदासा सा
दो पल हँसने
को प्यासा सा
थोड़ी खुशियाँ ज्यादा मलाल
लो बीत चला एक और साल

भूकंपों
में घबराया सा
कुछ बेसुध लुटा लुटाया सा
घटता गरीब के दामन सा
फटता नभ में
दावानल सा
कुछ फूल बिछा कुछ दीप बाल
लो बीत चला एक और साल

कुछ शहर
शहर चिल्लाता सा
कुछ गाँव गाँव में गाता सा
कुछ कहता कुछ समझाता सा
अपनी बेबसी
बताता सा
भीगी आँखें हिलता रूमाल
लो बीत चला एक और साल
……………………………………….
परिचय :
अभिव्यक्ति अनुभूति हिंदी वेब पत्रिका की संपादिका
पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर कविताएं, कहानियां व बाल कविताएं प्रकाशित
साहित्यिक उपलब्धियों पर कई सम्मान प्राप्त

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